Saturday, 2 October 2021

माँ काली ---

माँ काली
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जिस माँ के प्रकाश से समस्त नक्षत्रमंडल और ब्रह्मांड प्रकाशित हैं, उस माँ की महिमा के बारे में इस अकिंचन का कुछ भी लिखना, सूर्य को दीपक दिखाने का प्रयास मात्र सा है, जिसके लिए यह अकिंचन क्षमा याचना करता है| पता नहीं जिनकी देह से समस्त सृष्टि प्रकाशित है, उनका नाम "काली" क्यों रख दिया?
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सृष्टि की रचना के पीछे जो आद्यशक्ति है, जो स्वयं अदृश्य रहकर अपने लीला विलास से समस्त सृष्टि का संचालन करती हैं, समस्त अस्तित्व जो कभी था, है, और आगे भी होगा वह शक्ति माँ काली ही है| सृष्टि, स्थिति और संहार उसकी अभिव्यक्ति मात्र है| यह संहार नकारात्मक नहीं है, यह वैसे ही है जैसे एक बीज स्वयं अपना अस्तित्व खोकर एक वृक्ष को जन्म देता है|
सृष्टि में कुछ भी नष्ट नहीं होता है, मात्र रूपांतरित होता है| यह रूपांतरण ही माँ का विवेक, सौन्दर्य और करुणा है| माँ प्रेम और करुणामयी है|
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माँ के वास्तविक सौन्दर्य को तो गहन ध्यान में तुरीय चेतना में ही अनुभूत किया जा सकता है| उसकी साधना जिस साकार विग्रह रूप में की जाती है वह प्रतीकात्मक ही है|
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माँ के विग्रह में चार हाथ है| अपने दो दायें हाथों में से एक से माँ सृष्टि का निर्माण कर रही है और एक से अपने भक्तों को आशीर्वाद दे रही है| माँ के दो बाएँ हाथों में से एक में कटार है, और एक में कटा हुआ नरमुंड है जो संहार और स्थिति के प्रतीक है| ये प्रकृति के द्वंद्व और द्वैत का बोध कराते हैं|
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माँ के गले में पचास नरमुंडों कि माला है जो वर्णमाला के पचास अक्षर हैं| यह उनके ज्ञान और विवेक के प्रतीक हैं|
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माँ के लहराते हुए काले बाल माया के प्रतीक हैं| माँ के विग्रह में उनकी देह का रंग काला है क्योंकि यह प्रकाशहीन प्रकाश और अन्धकारविहीन अन्धकार का प्रतीक हैं, जो उनका स्वाभाविक काला रंग है| किसी भी रंग का ना होना काला होना है जिसमें कोई विविधता नहीं है|
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माँ की दिगंबरता दशों दिशाओं और अनंतता की प्रतीक है|
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उनकी कमर में मनुष्य के हाथ बंधे हुए हैं वे मनुष्य कि अंतहीन वासनाओं और अंतहीन जन्मों के प्रतीक हैं|
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माँ के तीन आँखें हैं जो सूर्य चन्द्र और अग्नि यानि भूत भविष्य और वर्तमान की प्रतीक हैं|
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माँ के स्तन समस्त सृष्टि का पालन करते हैं|
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उनकी लाल जिह्वा रजोगुण की प्रतीक है जो सफ़ेद दाँतों यानि सतोगुण से नियंत्रित हैं|
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उनकी लीला में एक पैर भगवान शिव के वक्षस्थल को छू रहा है जो दिखाता है कि माँ अपने प्रकृति रूप में स्वतंत्र है पर शिव यानि पुरुष को छूते ही नियंत्रित हो जाती है|
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माँ का रूप डरावना है क्योंकि वह किसी भी बुराई से समझौता नहीं करती, पर उसकी हँसी करुणा की प्रतीक है|
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माँ इतनी करुणामयी है कि उसके प्रेमसिन्धु में मेरी हिमालय सी भूलें भी कंकड़ पत्थर से अधिक नहीं है| माँ से मैंने उनके चरणों में आश्रय माँगा था तो उन्होनें अपने ह्रदय में ही स्थान दे दिया है| माँ कि यह करुणा और अनुकम्पा सब पर बनी रहे|
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जब तक मैं उनकी गोद में हूँ, तब तक ही जीवित हूँ| उनकी गोद से परे जो कुछ भी है वह मृत्यु का द्वार है| माँ, अपनी गोद में ही रखो, मृत्यु के द्वार पर मत जाने दो, अन्य कुछ भी मुझे नहीं चाहिए
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|| ॐ ॐ ॐ ||
२ अक्टूबर २०२०

 

Tuesday, 28 September 2021

अब उनकी ओर निहारें या उनके बारे में लिखें? ---

 

अब उनकी ओर निहारें या उनके बारे में लिखें?
फेसबुक पर जो कुछ जैसा भी मुझे आता-जाता है, वैसे ही लेख लिखता आ रहा हूँ| वही लिखा जिस को लिखने की प्रेरणा मिली| भगवान के प्रेम पर तो लिखना अब अति कठिन है क्योंकि अब उनकी ओर निहारें या उनके बारे में लिखें?
सारी भागदौड़ और दूसरों के पीछे भागना बंद हो गया है| जहाँ भी मैं हूँ, वहीं हर समय भगवान मेरे साथ हैं| जीवन में तृप्ति, संतुष्टि और आनंद है| सभी सत्संगी मित्रों को धन्यवाद, जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा और जिन्होंने मुझे खूब प्रोत्साहन और साथ दिया| समय समय पर फेसबुक पर आता रहूँगा|
"चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ||" "हरिः ॐ तत्सत् !!"
२९ सितंबर २०२०

अर्मेनिया और तुर्की सदा से ही एक दूसरे के कट्टर शत्रु रहे हैं ---

(दिनांक २९ सितंबर २०२० को लिखा लेख)

आज अभी कुछ देर पहिले एक टीवी चैनल पर समाचार देखा कि तुर्की को प्रसन्न करने के लिए पाकिस्तान, आर्मेनिया से लड़ने के लिए अपने सैनिक और जिहादी आतंकियों को अज़रबेजान भेज रहा है| यह समाचार पढ़कर बड़ा अच्छा लगा| यह आज की सबसे अच्छी खबर थी| देखते हैं, पाकिस्तान वहाँ कौन सी तोप चलाता है?
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अर्मेनिया और तुर्की दोनों ही सदा से एक दूसरे के कट्टर शत्रु रहे हैं, वैसे ही जैसे तुर्की और ग्रीस| इसका एकमात्र कारण है अर्मेनिया का कट्टर ईसाई होना, व तुर्की का कट्टर सुन्नी मुसलमान होना| आर्मेनिया की राजधानी येरेवान बहुत प्राचीन नगर है, वेटिकन व रोम से भी अधिक प्राचीन| १६ वी सदी में पूर्वी आर्मेनिया फारस के अधिकार में आ गया था और पश्चिमी भाग तुर्की के अधिकार में| १९ वीं सदी में रूस ने आर्मेनिया को तुर्कों से मुक्त कराया| इस बीच तुर्कों ने लाखों अर्मेनियाई लोगों का नरसंहार किया| आर्मेनिया के कई लाख लोग विश्व के दूसरे भागों में शरणार्थी होकर भाग गए थे| अभी वहाँ की जनसंख्या मुश्किल से ३० लाख से भी कम है, जो सभी कट्टर ईसाई हैं| आर्मेनिया के पूर्व में अजरबेजान है, पश्चिम में तुर्की, उत्तर में रूस, और दक्षिण में ईरान|
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आज़रबेजान अग्निपूजक लोगों का देश था जो अग्नि को देवता मानते थे| वहाँ की खुदाई में हिन्दू देवो-देवताओं की मूर्तियाँ भी निकलती हैं| फारसियों ने वहाँ के अग्निपूजकों को मारकर अधिकांश को मुसलमान बना दिया, व अन्यों को भगा दिया| अब वहाँ ८५% शिया और १५% सुन्नी मुसलमान हैं| वहाँ की कुल जनसंख्या ९९ लाख से भी कम है|
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सोवियत संघ के विघटन तक दोनों देश सोवियत संघ के भाग थे| कोई विवाद नहीं था| स्टालिन के आदेश से नगोरना-काराबाख का ईसाई बहुल क्षेत्र आज़रबेजान को दे दिया गया था| सोवियत संघ के विघटन के बाद नगोरना-काराबाख के ईसाईयों ने विद्रोह कर स्वयं को आर्मेनिया का भाग घोषित कर दिया| यही वहाँ के युद्ध का कारण है| एक बात तो निश्चित है कि रूस कभी भी किसी कीमत पर आर्मेनिया को नहीं हारने देगा|
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तुर्की ने मुस्लिम विश्व का नेता बनने के चक्कर में यह युद्ध आरंभ किया है, जिसमें उसकी पराजय निश्चित है| मुस्लिम देश कभी एक नहीं हो सकते| तुर्क और अरब ... एक-दूसरे की शक्ल भी देखना भी पसंद नहीं करते| शिया और सुन्नियों के बीच में तो एक स्थायी दीवार खिंच गई है| पाकिस्तान अब मुस्लिम विश्व का नेता बनना चाहता है क्योंकि वह स्वयं को अणुबम होने के कारण सबसे अधिक शक्तिशाली मुस्लिम देश मानता है|
२९ सितंबर २०२१

"श्रद्धा" और "व्रत" क्या हैं? ---

 

"श्रद्धा" और "व्रत" क्या हैं?
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जीवन में जैसी हमारी "श्रद्धा" है, वही हम हैं| जैसी हमारी "श्रद्धा" होती हैं वैसे ही हम बन जाते हैं| गीता में भगवान कहते हैं ...
"सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत| श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः||१७:३||"
अर्थात् हे भारत, सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके सत्त्व (स्वभाव, संस्कार) के अनुरूप होती है| यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जिस श्रद्धा वाला है वह स्वयं भी वही है अर्थात् जैसी जिसकी श्रद्धा वैसा ही उसका स्वरूप होता है||
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हमारे ऊपर जैसे संस्कार बार-बार डाले जाते हैं, वैसे ही हम बन जाते हैं| "श्रद्धा" का निर्माण "व्र्त" से होता है| "व्रत" का अर्थ भूखा रहना नहीं है| किसी नियम या विचार का वरण कर के उस पर स्थिर रहने का नाम "व्रत" है| जो हम बनना चाहते हैं, उसके संस्कार डालने पड़ेंगे, बार - बार उसको दोहराना पड़ेगा| यही वास्तविक "श्रद्धा" है और यही वास्तविक "व्रत" है|
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जैसा हम सोचते हैं वैसा ही हम बन जाते हैं| जो भी भाव गहराई से ह्रदय में बैठ जाता है, प्रकृति वैसा ही हमें बना देती है| जो और जैसे भी हम बनना चाहते हैं ह्रदय में गहराई से उसी का चिंतन करते हुए उस पर दृढ़ रहना चाहिए, हम निश्चित रूप से वह ही बन जायेंगे|
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उपास्य यानि परमात्मा के जिन गुणों का हम चिंतन करते हैं वे गुण निश्चित रूप से उपासक में आ जाते हैं| परमात्मा का निरंतर चिंतन करने से निश्चित रूप से हम मानवीय चेतना से मुक्त हो कर परमात्मा से जुड़ जाते हैं| यही अपने सच्चिदानंद स्वरूप में स्थित होना है, यही मुक्ति है| इसी के लिए ध्यान साधना की जाती है|
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ सितंबर २०२०

Sunday, 26 September 2021

भारत का उत्थान और सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा व वैश्वीकरण ---

(१) हमारे निज जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो।
(२) सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण हो।
(३) भारत में व्याप्त असत्य के अंधकार का पूरी तरह पराभव हो, और भारत एक सत्यनिष्ठ, धर्मसापेक्ष, अखंड हिन्दू-राष्ट्र बने, जहाँ की राजनीति सत्य-सनातन-धर्म हो।
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हिन्दुत्व क्या है? -- हिन्दुत्व एक ऊर्ध्वमुखी चेतना है जिसका लक्ष्य जीवन में भगवत्-प्राप्ति है। वह प्रत्येक व्यक्ति हिन्दू है जिसके हृदय में भगवान के प्रति परमप्रेम है, जिसका आचरण सत्यनिष्ठ है और जो निज जीवन में भगवान को प्राप्त करना चाहता है; चाहे वह इस पृथ्वी पर कहीं भी रहता हो। आत्मा की शाश्वतता, कर्मफल, पुनर्जन्म, भक्ति, आध्यात्म और ईश्वर की उपासना -- ये ही सनातन सिद्धान्त हैं, जिनसे यह सृष्टि चल रही है।
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इन्हीं उद्देश्यों के लिए हमारी आध्यात्मिक साधना है, जिसके लिए परमात्मा से पूरा मार्गदर्शन प्राप्त है। इसके अतिरिक्त मुझ अभी तो इस समय और कुछ भी नहीं कहना है।
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मेरी रुचि सब ओर से सिमटकर एक ही बिन्दु पर आ गई है, और वह है भारत का उत्थान और सनातन धर्म का वैश्वीकरण। किसी व्यक्ति विशेष में मेरी कोई रुचि नहीं है, और न ही मेरे पास किसी व्यक्ति विशेष के लिए समय है।
भगवान ने इसके लिए मार्गदर्शन भी किया है। साधना का जो मार्ग भगवान ने दिखाया है, उसे मेरे एक-दो घनिष्ठ सत्संगी मित्रों के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं समझ सकता। एक-दो मित्र हैं जिनसे मैं कभी कभी संपर्क कर लेता हूँ। वे भी इसी पथ के अनुयायी हैं और भगवान को पूरी तरह समर्पित हैं। अब पीछे मुड़कर देखने का समय नहीं है। इस विषय पर और अधिक कुछ लिखने की अनुमति भगवान से नहीं है। जैसा भी भगवान चाहेंगे, वैसा ही होगा। लेकिन हृदय में जो अभीप्सा की प्रचंड अग्नि जल रही है, उसे केवल भगवान ही तृप्त कर सकते हैं, और करेंगे भी।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२५ सितंबर २०२१

गुरुकृपा उन्हीं पर होती है जो सत्यनिष्ठ होते हैं ---

 

गुरुकृपा उन्हीं पर होती है जो सत्यनिष्ठ होते हैं; कोई भी साधना हो वह विधि-विधान से क्रमानुसार हो ---
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अपने प्रारब्ध कर्मों के अनुसार भगवान से जैसी भी और जो भी प्रेरणा मिले, वही साधना करनी चाहिए। महाभारत व रामायण आदि ग्रन्थों का स्वाध्याय सभी को करना चाहिए। समझने की बौद्धिक क्षमता हो तो उपनिषदों का स्वाध्याय भी सभी करें। यदि वे समझ में नहीं आते हैं तो उन्हें छोड़ दीजिये, और यथासंभव वही साधना खूब करें, जिसकी प्रेरणा भगवान से मिल रही हो। आपको आनंद मिलता है, और प्रेम की अनुभूतियाँ होती है तो आप सही मार्ग पर चल रहे हैं।
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आजकल अनेक साधक अति उत्साहित होकर देवीअथर्वशीर्ष या सौन्दर्य-लहरी के स्वाध्याय के उपरांत अपने आप ही श्रीविद्या के मंत्र का जप करने लगते है। बिना दीक्षा लिए और बिना किसी अधिकृत आचार्य के मार्गदर्शन के श्रीविद्या के "पञ्च-दशाक्षरी" मंत्र का जप और साधना नहीं करनी चाहिए। इसका उल्टा असर भी पड़ सकता है, यानि लाभ के स्थान पर हानि भी हो सकती है। इसका एक क्रम होता है, उसी क्रम में इसकी साधना होती है, जो किसी अधिकृत आचार्य से सीखें। आचार्य शंकर (आदि शंकराचार्य) श्रीविद्या के उपासक थे। उनका ग्रंथ सौंदर्य-लहरी श्री-विद्या की साधना का अनुपम ग्रंथ है, जो तंत्र-आगमों की अमूल्य निधि है। आचार्य शंकर की परंपरा में श्रीविद्या की दीक्षा अंतिम और उच्चतम दीक्षा होती है। जिसने श्रीविद्या की दीक्षा ले ली है, उसे अन्य किसी दीक्षा की आवश्यकता नहीं है।
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योगमार्ग में "क्रियायोग" की दीक्षा उच्चतम होती है। क्रियायोग की साधना से कुंडलिनी जागरण होता है, इसके साधक को यम-नियमों का पालन अनिवार्य है, अन्यथा लाभ के सथान पर हानि की संभावना अधिक है। (यम = अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) (नियम= शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान)
यदि अच्छा आचरण नहीं कर सकते तो क्रियायोग की साधना न करें। यह उन्हीं के लिए है जिनका आचरण और विचार सही हैं, व परमात्मा को पाने की अभीप्सा है। क्रियायोग के भी क्रम हैं, इसकी साधना भी क्रमानुसार होती है जिन्हें किसी अधिकृत आचार्य से दीक्षा लेकर ही सीखें। क्रियायोग की सिद्धि गुरुकृपा से होती है। गुरुकृपा भी उन्हीं पर होती है जो सत्यनिष्ठ होते हैं।
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जीवन का सार भगवान की भक्ति में है। अपने हर दिन का आरंभ और समापन भगवान की भक्ति से करें, और हर समय उन्हें अपनी स्मृति में रखें।
ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२४ सितंबर २०२१

अब समय आ गया है, भारत की उन्नति को कोई नहीं रोक सकता ---

 

अब समय आ गया है, भारत की उन्नति को कोई नहीं रोक सकता। सनातन धर्म की चेतना भी पूनर्प्रतिष्ठित और विश्वव्यापी होगी। लेकिन उसके लिए पहले हमें स्वाध्याय, तप, अध्ययन और साधना द्वारा अपनी आध्यात्मिक चेतना, और उच्च स्तर के अपने बौद्धिक ज्ञान को बढ़ाना होगा।
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भड़काऊ नारों, रोने, छाती पीटने, आत्मनिंदा और दूसरों की आलोचना से कोई लाभ नहीं होगा। हमें अब स्वयं तप करना होगा, अध्ययन करना होगा, और उच्च स्तर के ज्ञान को प्राप्त करना होगा; तभी दूसरे लोग हमारे से प्रभावित होंगे। हमारे चिंतन का स्तर उच्च होगा तो शीघ्रता से सब लोग हमारी ओर खिंचे चले आयेंगे। हम आध्यात्मिक रूप से उन्नत होंगे तो तो अगले चार-पाँच दशकों में पूरा ईसाई जगत -- सनातन धर्म को अपना लेगा। यह मैं स्वानुभूति से कह रहा हूँ।
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सनातन धर्म के विचार सम्पूर्ण मानवता के लिए हैं, किसी व्यक्ति या समाज विशेष के लिए नहीं। यूरोप, अमेरिका और सम्पूर्ण विश्व का कल्याण -- सनातन-धर्म के सिद्धांतों से ही हो सकता है। हमारी चेतना और चिंतन का स्तर उच्चतम हो, हीनता के बोध से हम मुक्त हों। ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२३ सितंबर २०२१