Thursday, 5 September 2019

अब मन तृप्त और शांत है ....

अब मन तृप्त और शांत है ....
मन में जिज्ञासा, प्रश्न और कामनाएँ तभी तक उठती हैं, जब तक मन सीमित व अशांत रहता हो| मन के शांत और विस्तृत हो जाने पर सारी जिज्ञासाएँ, प्रश्न और कामनाएँ भी तिरोहित हो जाती हैं| मैं जुलाई २०११ में फ़ेसबुक और ट्वीटर पर आया था सिर्फ स्वयं को व्यक्त करने की एक गहन कामना की पूर्ति के लिए, जिसका पूरा अवसर फ़ेसबुक ने दिया| आरंभ में मन भरकर राष्ट्रवाद पर खूब लिखा, फिर भक्ति और आध्यात्म पर खूब लिखा| अनेक दिव्य आत्माओं से परिचय और मित्रता हुई, जो जीवन में अन्यथा कभी नहीं हो सकती थी|
अब मन तृप्त और शांत है, कोई कामना नहीं है, अतः लिखने की आवृति (frequency) भी कम हो जाएगी| जितना समय यहाँ लिखने में व्यतीत होता है वह समय परमात्मा के ध्यान और स्वाध्याय में व्यातीत करेंगे| अब जीवन में कोई उद्देश्य नहीं है, कोई कामना नहीं है; जो परमात्मा की इच्छा है वह ही मेरी इच्छा है|
"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः|
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम||१८:७८||" (गीता)
कहीं जा नहीं रहा| आप सब के मध्य ही रहूँगा, जब भी कुछ लिखने की प्रेरणा मिलेगी तब अवश्य लिखूंगा| परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्तियाँ हैं आप सब| बहुत अधिक कहने से कोई लाभ नहीं है| समस्त योग और उनके बीज सर्व व्याप्त, अनंत, असीम, योगेश्वर भगवान परमशिव से ही उत्पन्न हुए हैं| वे ही आदि और अंत हैं| अवशिष्ट सम्पूर्ण जीवन उन्हीं के ध्यान में उन्हीं के साथ बीते, कहीं कोई भेद न हो, कभी किसी कामना का जन्म न हो|
मंगलमय शुभ कामनाएँ और नमन !
ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ अगस्त २०१९

मैं तो एक फूल हूँ, मुरझा गया तो मलाल क्यों ? ...

मैं तो एक फूल हूँ, मुरझा गया तो मलाल क्यों ?
तुम तो महक हो, हवाओं में जिसे समाना है ...
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भूतकाल चाहे जितना भी दुःखद हो, उसे तो हम बदल नहीं सकते, भविष्य हमारे लिए एक स्वप्न मात्र है| हमारा अधिकार सिर्फ वर्तमान पर है| जैसा भविष्य हम चाहते हैं, वैसे ही वर्तमान का निर्माण करें| यह परिवर्तन स्वयं से हो, वर्तमान हमारे आदर्शों का हो|
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"इंसान मुस्तक़बिल को सोच के अपना हाल ज़ाया करता है |
फिर मुस्तक़बिल में अपना माज़ी याद कर के रोता है ||" (शे.सादी)
(मुस्तकबिल = भविष्य, माज़ी = भूतकाल, हाल = वर्तमान)
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"यादों को भुलाने में कुछ देर तो लगती है,
आँखों को सुलाने में कुछ देर तो लगती है |
पुरानी बातों को भुला देना इतना आसान नहीं होता,
दिल को समझाने में कुछ देर तो लगती है ||" (अज्ञात)
भूतकाल को याद कर कर के अपना वर्तमान खराब करने का क्या औचित्य है .....
"मुझे पतझड़ों की कहानियाँ, न सुना सुना के उदास कर |
तू खिज़ाँ का फूल है, मुस्कुरा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया ||
वो नही मिला तो मलाल क्या, जो गुज़र गया सो गुज़र गया |
उसे याद करके ना दिल दुखा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया ||" (ब.बद्र)
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं .....
"उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌ | आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः||६:५||"
अर्थात हम अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करें, और अपने को अधोगति में न डाले| क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है||"
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दुनियादारी की सब पुरानी बातों को भूल कर अपना हृदय, पूर्ण प्रेम पूर्वक परमात्मा को ही दे देने में सार्थकता और समझदारी है| यह दुनिया परमात्मा की है, हमारी नहीं| उसकी मर्जी, वह इसे चाहे जैसे चलाये| पर उसकी अभिव्यक्ति उसके विश्व में निरंतर हो|
ॐ तत्सत ! ॐ नमो भगवाते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० अगस्त २०१९

भ्रामरी गुफा, आवरण, विक्षेप और कूटस्थ-चैतन्य .....

भ्रामरी गुफा, आवरण, विक्षेप और कूटस्थ-चैतन्य .....
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कई प्रतीकात्मक शब्द हैं जैसे "भ्रामरी गुफा", "आवरण", "विक्षेप", "कूटस्थ-चैतन्य" आदि आदि जिनका अर्थ साधक तो समझ सकते हैं, पर कोई सामान्य व्यक्ति नहीं| कई तथ्यों को समझाने के लिए प्रतीकात्मक शब्दों का प्रयोग करना पड़ता है अन्यथा उन्हें समझाना असंभव है| ऐसे ही ये शब्द भी हैं| महाभारत में यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में भी "धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्", गुहा यानि गुफा शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसमें धर्म के तत्व निहित हैं| एक बहुत महान संत के एक लेख में पढ़ा था कि सत्य को जानने के लिए भ्रामरी गुफा में प्रवेश करना होगा जिसके बाहर "आवरण" और "विक्षेप" नाम की दो राक्षसियाँ बैठी हैं, जिन्हें पराजित करना असंभव है, पर कैसे भी ईश्वर की कृपा से इनसे बचकर भीतर जाना है|
इस विषय पर चार वर्ष पूर्व एक विस्तृत लेख लिखा था जिसमें अनेक लोगों ने लेख का स्त्रोत पूछा तो मेरा उत्तर था कि मेरा एकमात्र स्त्रोत गुरुकृपा से प्राप्त निज अनुभव हैं| जिस विषय पर मेरे माध्यम से कुछ लिखा जाता है, उन सब का एकमात्र स्त्रोत है ... "गुरुकृपा", जिसके अतिरिक्त मेरे पास अन्य कुछ भी नहीं है| कुछ लोग शिकायत करते हैं कि मेरी भाषा बड़ी कठिन है| पर मैं जो कुछ भी लिखता हूँ उसे व्यक्त करने के लिए इस से अधिक सरल भाषा हो ही नहीं सकती|
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जो लोग नियमित ध्यान साधना करते हैं उन्हें जब गहरे ध्यान में कूटस्थ ज्योतिर्मय ब्रह्म का आभास होने लगता है तब आरम्भ में ज्योतिर्मय किरणों से घिरा एक काला बिंदु दिखाई देता है, यही भ्रामरी गुफा है| यह अमृतमय मधु से भरी होती है| इसको पार करने के पश्चात् ही एक स्वर्णिम और फिर एक नीली प्रकाशमय सुरंग को भी पार करने पर साधक को श्वेत पञ्चकोणीय नक्षत्र के दर्शन होते हैं| यह पञ्चकोणीय नक्षत्र पञ्चमुखी महादेव का प्रतीक है| जब इस ज्योति पर साधक ध्यान करता है तब कई बार वह ज्योति लुप्त हो जाती है, यह 'आवरण' की मायावी शक्ति है जो एक बहुत बड़ी बाधा है| इस ज्योति पर ध्यान करते समय 'विक्षेप' की मायावी शक्ति ध्यान को छितरा देती है| इन दोनों मायावी शक्तियों पर विजय पाना साधक के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है|
ब्रह्मचर्य, सात्विक भोजन, सतत साधना और गुरुकृपा से एक आंतरिक शक्ति उत्पन्न होती है जो आवरण और विक्षेप की शक्तियों को कमजोर बना कर साधक को इस भ्रामरी गुफा से पार करा देती है| आवरण और विक्षेप का प्रभाव समाप्त होते ही साधक को धर्मतत्व का ज्ञान होने लगता है| यहाँ आकर कर्ताभाव समाप्त हो जाता है और साधक धीरे धीरे परमात्मा की ओर अग्रसर होने लगता है| यह ज्ञान भगवान की परम कृपा से किन्हीं सद्गुरु के माध्यम से ही होता है|
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शिवनेत्र होकर (बिना तनाव के दोनों नेत्रों के गोलकों को नासामूल के समीप लाकर भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर कर, खेचरी मुद्रा में संभव हो तो ठीक है अन्यथा जीभ को ऊपर पीछे की ओर मोड़कर) प्रणव यानि ओंकार की ध्वनि को सुनते हुए उसी में लिपटी हुई सर्वव्यापी ज्योतिर्मय अंतर्रात्मा का चिंतन करने की साधना नित्य नियमित यथासंभव अधिकाधिक करनी चाहिए| समय आने पर हरिकृपा से विद्युत् की चमक के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होती है| उस ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के बाद उसी की चेतना में निरंतर रहने की साधना करें| यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता| लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है पर इस ज्योतिर्मय ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता| यही कूटस्थ है, और इसकी चेतना ही कूटस्थ चैतन्य है| इसकी साधना के लिए कुसंग का त्याग, यम-नियमों का पालन और सद्गुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य है|
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हम सब को परमात्मा की पराभक्ति प्राप्त हो और हम सब उसके प्रेम में निरंतर मग्न रहें| परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब को नमन !
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शिवमस्तु ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० अगस्त २०१९

भगवान शिव के पाँच मुख .....

(संशोधित व पुनर्प्रस्तुत लेख). भगवान शिव के पाँच मुख .....
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शिव-पुराण में भगवान शिव के पाँच मुखों का उल्लेख है| शैवागम शास्त्रों में भी शिवजी के प्रतीकात्मक रूप से पाँच मुखों की विस्तृत व्याख्या है| हैं| शैवागम शास्त्रों के आचार्य ... दुर्वासा ऋषि हैं| ये पाँचों मुख पाँच तत्वों के प्रतीक हैं| इनके नाम हैं .... (१) सद्योजात (जल), (२) वामदेव (वायु), (३) अघोर (आकाश), (४) तत्पुरुष (अग्नि), (५) ईशान (पृथ्वी)|
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व्यवहारिक रूप से योग साधना करने वाले सभी योगियों को पंचमुखी महादेव के दर्शन गहन ध्यान में एक श्वेत रंग के पंचमुखी नक्षत्र के रूप में होते हैं जो एक नीले आवरण से घिरा होता है| यह नीला आवरण भी एक सुनहरे प्रकाश पुंज से घिरा होता है| ध्यान साधना में योगी पहले उस सुनहरे आवरण को, फिर नीले प्रकाश को, फिर उस श्वेत नक्षत्र का भेदन करता है| तब उसकी स्थिति कूटस्थ चैतन्य में हो जाती है| यह योगमार्ग की सबसे बड़ी साधना है| उससे से परे स्थित होकर जीव स्वयं शिव बन जाता है| उसका कोई पृथक अस्तित्व नहीं रहता| यह अनंत विराट श्वेत प्रकाश पुंज ही क्षीर सागर है जहां भगवान नारायण निवास करते हैं| यह है भगवन शिव के पाँच मुखों का रहस्य जिसे भगवान शिव की कृपा से ही समझा जा सकता है| इन तीनो प्रकाश पुंजों को हम शिवजी के तीन नेत्र कह सकते हैं|
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"ॐ तत् सत्" भी तीनों रंगों का प्रतीक है| सुनहरा प्रकाश ॐ है| यह वह स्पंदन है जिससे समस्त सृष्टि बनी है| नीला रंग 'तत्" यानि कृष्ण-चैतन्य या परम-चैतन्य है| 'सत्' श्वेत रंग स्वयं परमात्मा हैं| ईसाई मत में 'Father', 'Son' and the 'Holy Ghost' की परिकल्पना 'ॐ तत्सत्' का ही व्यवहारिक अनुवाद है| Holy Ghost का अर्थ ॐ है, Son का अर्थ है कृष्ण-चैतन्य, और Father का अर्थ है स्वयं परमात्मा|
("Om Tat Sat" is the "Father", "Son" and the "Holy Ghost" of Christianity. Holy Ghost is the Om vibration which has created every thing. Son is the Krishna consciousness or Christ consciousness. Father is the Divine Himself. The five pointed white star is the Dove of light descending from heaven.)
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जिन के एक भ्रू-विलास मात्र से अनंत कोटी ब्रह्मांडों का नाश हो सकता है, उन अभयंकर भगवान शिव की कृपा सदा हम सब पर बनी रहे| "यस्य भ्रूभङ्गमात्रेण भवो भवति भस्मसात् | भक्ताsभयङ्करं शंभुं तं याचेsभद्रभेदनम् "||
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शिवमस्तु | ॐ नमः शिवाय |
कृपा शंकर
(मूल रूप से १० अगस्त २०१३ को लिखा हुआ)
संशोधित: १० अगस्त २०१९

प्राण चेतना की एक अनुभूति .....

आज्ञाचक्र से ब्रह्मरंध्र तक जो प्राण चेतना विचरण करती हैं, वे ही मेरे लिये जगन्माता माँ भगवती हैं.
ब्रह्मरंध्र से परे ज्योतिर्मय अनंताकाश परमशिव हैं.
वे परमशिव ही मेरे उपास्य देव हैं.
वे ही सर्वस्व हैं, वे ही गुरु, वे ही विष्णु, वे ही नारायण और वे ही वासुदेव हैं. वे ही एकमात्र लक्ष्य हैं, उनमें स्थिति ही मेरी उपासना है, उनसे सन्मुखता ही आनंद है, और उनसे विमुखता ही परम दुःख है. ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ अगस्त २०१९

पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क और शैतान .... ये मानसिक अवधारणायें ही हैं या भौतिक वास्तविकता ?

पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क और शैतान .... ये मानसिक अवधारणायें ही हैं या भौतिक वास्तविकता ?
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जहाँ तक मैं समझता हूँ ..... पूर्वजन्म और कर्मफलों का सिद्धांत शत-प्रतिशत सही है पर यह तभी तक सही है जब तक हम अहंकारग्रस्त यानि परमात्मा की अनंतता से पृथक हैं, और स्वयं को एक देह मानते हैं|
आकाश तत्व (ख) से दूरी ही दुःख है, और समीपता सुख| ये दोनों ही मानसिक अवस्थायें हैं| जब कोई व्यक्ति दुःखी होता है तब उसे लगता है कि वह पापी है, और जब सुखी होता है तब स्वयं को पुण्यवान समझता है| पाप और पुण्य दोनों हमारी स्वयं की रचनायें और अन्ततः बंधन ही हैं|
स्वर्ग और नर्क भी हमारी ही प्राणमय और मनोमय लोक की रचनायें हैं, वे मानसिक ही अधिक हैं|
शैतान कोई व्यक्ति नहीं, इब्राहिमी मतों (Abrahamic religions) में एक प्रतीकात्माक शब्द है वासनाओं के लिए, विशेषकर काम वासना के लिए| वासनायें हमें परमात्मा से दूर करती हैं, अतः एक बहाना बना लिया गया कि हमें शैतान ने बहका दिया| हमारी वासनायें ही शैतान हैं, कोई व्यक्ति नहीं| योग-दर्शन में चित्तवृत्तिनिरोध की बात कही गई है| ये चित्तवृत्तियाँ हमारी अधोगामी वासनायें ही हैं| चित्तवृत्तिनिरोध की साधनाओं से भी वासनायें तो रहेंगी ही पर वे ऊर्ध्वगामी होकर अन्ततः परमात्मा में विलीन हो जायेंगी|
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हमारे शास्त्र कहते हैं कि हमें एक ब्रह्मनिष्ठ और श्रौत्रीय (जिसे श्रुतियों का ज्ञान हो) मार्गदर्शक (सद्गुरु) का आश्रय लेकर उनसे मार्गदर्शन लेना चाहिए| पर .... "बिनु सत्संग विवेक न होई। रामकृपा बिनु सुलभ न सोई।।" अन्ततः एक ही प्रश्न रह जाता है कि परमात्मा की कृपा, उनका अनुग्रह हमारे पर कैसे हो? इसी पर विचार कर के इसका उत्तर हमें स्वयं को ही ढूँढना पड़ेगा| इस पर विचार करें| जीवन की सार्थकता इसी में है|
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ॐ तत्सत ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !
कृपा शंकर
७ अगस्त २०१९

Friday, 2 August 2019

आध्यात्मिक मार्ग पर प्रगति के मापदंड ;----

आध्यात्मिक मार्ग पर प्रगति के मापदंड ;----
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आचार्यों ने सात मापदंड बताए हैं जिनसे हम अपनी आंतरिक प्रगति को माप सकते हैं.....
(१) आहार संयम, (२) वाणी का संयम, (३) जागरुकता, (४) दौर्मनस्य का न होना, (५) दुःख का अभाव, (६) श्वास की संख्या में कमी हो जाना, (७) संवेदनशीलता |
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हमें आहार इस तरह से लेना चाहिए जैसे औषधि ली जाती है| उतना ही खाना चाहिए जो शरीर के पोषण के लिए पर्याप्त हो| स्वाद में रुचि का समाप्त हो जाना एक अच्छा लक्षण है| भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं....
"नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः| न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन||६:१६||"
"युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु| युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ||६:१७||"
आहार संयम हो जाएगा तो वाणी का संयम भी हो जाएगा| फालतू की बात करने की इच्छा ही नहीं होगी| जब वाणी का संयम हो जाएगा तब जागरूकता भी उत्पन्न होगी| जब जागरूकता आएगी तब दूसरों के प्रति दुर्भावना भी समाप्त हो जाएगी| धीरे धीरे दुःखों से भी मुक्ति मिल जाएगी| भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं ....
"यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः| यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते||६:२२||"
धीरे धीरे हम पायेंगे कि हमारे साँसों की गति भी कम होने लगी है| तब हम आंतरिक रूप से संवेदनशील भी हो जाएंगे| यह आंतरिक संवेदनशीलता जागृत होने पर हमारा अहंकार भी नष्ट होने लगेगा और भावों में करुणा व पवित्रता आने लगेगी| इति शुभम् |
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ॐ तत्सत ! ॐ नमो भगवते वसुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ अगस्त २०१९