Sunday, 20 January 2019

कृष्णं वंदे जगद्गुरुम् .....

कृष्णं वंदे जगद्गुरुम् .....
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गीता के मेरे पास लगभग बारह से अधिक प्रसिद्ध भाष्य यानी टीकाएँ हैं| पर भाष्यों के अध्ययन और स्वाध्याय से आज तक कोई आत्म संतुष्टि नहीं मिली है| बौद्धिक संतुष्टि तृप्त नहीं करती क्योंकि इस अल्प बुद्धि की भी एक सीमा है|
मेरे सर्वाधिक प्रिय भाष्य हैं ..... 
(१) शंकर भाष्य का हिंदी अनुवाद, (२) स्वामी रामतीर्थ प्रतिष्ठान लखनऊ द्वारा प्रकाशित नारायण स्वामी की टीका, (३) वाराणसी के स्वामी प्रणवानंद द्वारा बँगला भाषा में लिखी प्रणवगीता का हिंदी अनुवाद, (४) भूपेन्द्रनाथ सान्याल द्वारा लाहिड़ी महाशय की मौखिक व्याख्या पर आधारित बँगला भाषा में लिखी टीका का हिंदी अनुवाद, (५) परमहंस योगानंद द्वारा अंग्रेजी में लिखी God Talks with Arjuna का हिंदी अनुवाद|
अंग्रेजी में लिखी पुस्तकों से कोई आनंद नहीं मिलता|
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अब इस अल्प और सीमित बुद्धि में अधिक समझने की क्षमता भी नहीं है और जीवन में अधिक समय भी नहीं बचा है क्योंकि आयु सत्तर को पार कर चुकी है| अतः सब पुस्तकों को बंद कर अब ध्यान साधना द्वारा सीखने का प्रयास आरम्भ करने की प्रेरणा मिल रही है| जीवन का संध्याकाल चल रहा है, पता नहीं कौन सी सांस अंतिम हो|
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मेरा यह मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण स्वयं ही गीता का वास्तविक ज्ञान सिखा सकते हैं| अतः प्रत्यक्ष उनसे सीखने में ही सार है| गीता की हजारों टीकाएँ हैं, उन सब की व्याख्या भी अलग अलग हैं, पर भगवान श्रीकृष्ण के मन में इतने अर्थ नहीं हो सकते थे| उनके मन में क्या था यह तो वे ही बता सकते हैं| अतः सब पुस्तकों को बंद कर भगवान श्रीकृष्ण का गहनतम ध्यान ही सार्थक है| इसमें खोने को कुछ नहीं है| जीवन के इस संध्याकाल के अंतिम क्षणों में भगवान श्रीकृष्ण की चेतना में तो रहेंगे|
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"वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् | देवकीपरमानन्दं कृष्णं वंदे जगद्गुरुम् ||"
"वंशी विभूषित करा नवनीर दाभात् ,
पीताम्बरा दरुण बिंब फला धरोष्ठात् |
पूर्णेन्दु सुन्दर मुखादर बिंदु नेत्रात् ,
कृष्णात परम किमपि तत्व अहं न जानि ||
"ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने, प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:||"
"ॐ नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च, जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः||"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् । यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्||"
"कस्तुरी तिलकम् ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम् ,
नासाग्रे वरमौक्तिकम् करतले, वेणु करे कंकणम् |
सर्वांगे हरिचन्दनम् सुललितम्, कंठे च मुक्तावलि |
गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते, गोपाल चूडामणी ||"
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||"
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० जनवरी २०१९

चीन की कम्पनियों में कर्मचारियों की स्थिति .....

चीन की कम्पनियों में कर्मचारियों की स्थिति .....
चीन के बारे में एक नई बात का पता चला है जिसकी जानकारी मुझे विगत में कभी नहीं मिली, हालाँकि मैं अब तक चार बार चीन की यात्रा कर चुका हूँ| वहाँ किसी कंपनी के कर्मचारी यदि अपने लक्ष्य (Target) को प्राप्त नहीं करते तो उन्हें बहुत बुरी सजा दी जाती है| कर्मचारियों को एक लाइन में खड़ा कर के उन के गालों पर थप्पड़ लगवाये जाते हैं, या सभी के पिछवाड़ों पर डंडों से पीटा जाता है| फिर कर्मचारियों को भरी सड़क पर चौपाये पशुओं की तरह घुटनों के बल चलने को बाध्य कर अपमानित किया जाता है| किसी भी कम्पनी के लिए उसके कर्मचारी एक खरीदे हुए गुलाम से अधिक नहीं होते| यह तो पता था कि वहाँ की जेलों में कैदियों से पशुओं की तरह काम करवाया जाता है जिसका उन्हें कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता| इसी लिए चीनी माल इतना सस्ता और हल्का होता है|
भारत के धूर्त साम्यवादी बड़ी बड़ी समता की झूठी बातें कहते हैं|
१८ जनवरी २०१९

प्रख्यात वैदिक विद्वान श्री अरुण उपाध्याय जी से एक भेंट .....

प्रख्यात वैदिक विद्वान श्री अरुण उपाध्याय जी से एक भेंट .....
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पिछले दिनों अनेक लोगों से भगवान की प्रेरणा से मिलना हुआ जिनमें कई तो संत स्वभाव के बहुत ही अच्छे आध्यात्मिक साधक थे, कुछ आध्यात्मिक रुझान वाले बहुत बड़े बड़े उद्योगपति थे और कुछ सामान्य व्यक्ति भी थे जिनसे भगवान मुझे मिलाना चाहते थे| यहाँ मैं एक विलक्षण और रहस्यमय विद्वान् व्यक्तित्व से मिलने के बारे में लिख रहा हूँ|
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आठ जनवरी को प्रातः दस बजे ईश्वर की प्रेरणा से ही मैं श्री अरुण उपाध्याय जी के घर उनसे मिलने गया था| घर के द्वार पर उन्होंने मेरा स्वागत किया| मैंने यह स्पष्ट कह दिया था कि आध्यात्म के अतिरिक्त अन्य किसी भी विषय पर मैं बात नहीं करूँगा|
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उनके घर पर यह नहीं लगा कि मैं उड़ीसा राज्य में पुलिस विभाग के सर्वोच्च पद (D.G.P.) से सेवानिवृत हुए एक बड़े से बड़े पूर्व पुलिस अधिकारी से बात कर रहा हूँ| उनके घर का वातावरण एक सात्विक ब्राह्मण के घर का सा था और वे स्वयं भी एक सात्विक ब्राह्मण ही थे| बड़े सहज भाव से उनसे वार्ता हुई| अपनी अल्प और सीमित बुद्धि से मेरे मन में पुराणों, वेदों और ज्योतिष के बारे में जो भी शंकाएँ थीं उन सब का उन्होंने निवारण किया और बड़े प्रेम से मेरे हर प्रश्न का उत्तर देकर मुझे पूरी तरह संतुष्ट किया|
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दो-तीन अलौकिक और विलक्षण बातें उनके व्यक्तित्व में मुझे ध्यान में आईं ...
एक तो अहंकार उनमें बिलकुल भी नहीं दिखाई दिया|
दूसरा मैंने यह अनुभूत किया कि वेदों, पुराणों और ज्योतिष के बारे में उनको जो भी ज्ञान हैं, वह इस जन्म में अर्जित नहीं है|
उनको अपने कुछ पूर्व जन्मों का भी ज्ञान था और मैंने यह भी अनुभूत किया कि वे वेदों, पुराणों और ज्योतिष के बारे में जो भी जानना चाहते हैं वह ज्ञान स्वतः ही उनमें प्रकट हो जाता है|
यह सिद्धि ईश्वर और गुरु की परम कृपा से ही होती है जो उन पर स्पष्ट रूप से है|
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पूर्ण रूप से संतुष्ट होकर मैं ढाई घंटे तक उनसे चर्चा कर बापस आ गया| यह एक अलौकिक सत्संग था| इस से पूर्व भी जोधपुर में दंडी स्वामी मृगेन्द्र सरस्वती जी के आश्रम में उनसे मिलना हुआ था, पर उस दिन वहाँ बड़ी भीड़ थी अतः कोई आध्यात्मिक चर्चा नहीं हो पाई थी| ईश्वर ने पुनश्चः यह एक अवसर दिया|
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ॐ श्री गुरवे नमः ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ जनवरी २०१९

आध्यात्मिक साधना क्या होती है ?

आध्यात्मिक साधना क्या होती है ?
आध्यात्मिक साधना का अर्थ है आत्म-साधना यानि स्वयं की अपनी आत्मा को जानना और अपनी सर्वोच्च क्षमताओं का विकास करना| मनुष्य के जब पापकर्मफल क्षीण होने लगते हैं और पुण्यकर्मफलों का उदय होता है तब परमात्मा को जानने की एक अभीप्सा जागृत होती है और करुणा व प्रेमवश परमात्मा स्वयं एक सद्गुरु के रूप में मार्गदर्शन करने आ जाते हैं| स्वयं के अंतर में इस सत्य का बोध तुरंत हो जाता है|
साधक को उसकी पात्रतानुसार ही मार्गदर्शन प्राप्त होता है जिसका अतिक्रमण नहीं हो सकता| ये पंक्तियाँ लिखने का मेरा उद्देश्य यही है कि साधना के मार्ग में किसी भी प्रकार का लालच व अहंकार .... पतन का कारण हो जाता है| परमात्मा के सिवाय अन्य किसी भी लाभ की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए, अन्यथा पतन सुनिश्चित है|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ जनवरी २०१९

काले पानी की कुछ पुरानी स्मृतियाँ .....

काले पानी की कुछ पुरानी स्मृतियाँ .....
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पोर्ट ब्लेयर (अंडमान) जाने का जीवन में कई बार अवसर मिला है| वहाँ की सेल्युलर जेल जिसे काले पानी की जेल भी कहते हैं, कई बार देखी है| विशेष कर के वह कोठरी जिस में स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने दो दो उम्रकैद की सजा काटी, वहाँ श्रद्धासुमन अवश्य चढ़ाये हैं|
वहाँ की सबसे प्रमुख स्मृति ११ फरवरी १९७९ की है जिस दिन भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई ने उस जेल को एक राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया था| उस दिन उस समय मैं वहीं पर उपस्थित था| उस समय के जीवित बचे हुए स्वतन्त्रता सेनानियों को निमंत्रित कर के कोलकाता से एक पानी के यात्री जहाज से ससम्मान बुलाया गया था|
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उस जेल के सात भाग थे जिनमें से चार को जापानियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के समय नष्ट कर दिया था| बाकी बचे तीन में से एक भाग में वहाँ की स्थानीय जेल है, एक भाग में "गोबिंदवल्लभ पन्त अस्पताल" है, और बचा हुआ एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग है जिसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया हुआ है| वीर सावरकर की कोठरी इसी भाग में दूसरी मंजिल पर है जिस पर लोहे के सीन्खचों के दो दो दरवाजे हैं| शाम के समय वहाँ के मैदान में एक Light and Sound Show भी होता है जिसे देखने पर्यटकों की भारी भीड़ आती है| वहीं पास में एक म्यूजियम है और वह कोठरी भी है जहाँ फांसी दी जाती थी| पास में ही एक दूसरा छोटा सा वाइपर द्वीप है जहाँ महिलाओं को फांसी दी जाती थी|
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उस कालखंड के इतिहास पर अनेक शोध हुए हैं और अनेक पुस्तकें लिखी गयी हैं| मैं वहाँ के कई द्वीपों में खूब घूमा हूँ और बहुत अधिक स्मृतियाँ हैं| ग्रेट निकाबार द्वीप पर भारत के सबसे दक्षिणी भाग "इंदिरा पॉइंट" पर भी जाने का अवसर सुनामी से पहले मिला है| कुल मिलाकर यह बहुत ही सुन्दर स्थान है जहाँ जीवन में एक बार तो अवश्य ही जाना चाहिए|
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मुझे गर्व है कि भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने बीते हुए कल ३० दिसम्बर २०१८ को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेताजी सुभाष बोस को वह सम्मान दिया जिसके वे पूर्ण अधिकारी थे| ३० दिसंबर १९४३ को पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान में पहली बार सुभाष चंद्र बोस ने तिरंगा फहराया थ| भारत की धरती पर यह स्वतंत्रता की प्रथम निशानी थी| सुभाष चंद्र बोस भारत की पहली आज़ाद सरकार के प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री थे| उनकी सरकार को ९ देशों जिन में जर्मनी, फिलीपींस, थाईलैंड, मंचूरिया (अब चीन का भाग) और क्रोएशिया प्रमुख थे, ने मान्यता दी थी| आजाद हिन्द सरकार भारत की अस्थायी सरकार थी जिसे सिंगापुर में १९४३ में स्थापित किया गया था| दूसरी हर्ष की बात यह है कि एक करोड़ से अधिक भारतीयों के हत्यारे तीन अँगरेज़ सेनानायकों के सम्मान में रखे हुए तीन द्वीपों के नाम बदले गए हैं|
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पोर्ट ब्लेयर में रहने वाले राजस्थान के प्रवासियों ने वहाँ की एक पहाडी पर एक बहुत ही शानदार मंदिर बनाया हुआ है जिसे वहाँ के स्थानीय लोग "राजस्थान मंदिर" ही कहते हैं| वहाँ का मुख्य विग्रह भगवान श्री राधा-कृष्ण का है, साथ साथ अन्य देवी-देवताओं के विग्रह भी हैं|
पोर्ट ब्लेयर में हिंदी साहित्य का एक संग्रहालय भी है जिसमें हिन्दी साहित्य की लगभग डेढ़-दो हज़ार से अधिक अमूल्य पुस्तकों का संग्रह है|
धार्मिक दृष्टी से वहाँ "चिन्मय मिशन" का एक केंद्र है जहाँ कई धार्मिक कार्यक्रम होते रहते हैं| वहां के स्वामी जी मेरी बहुत घनिष्ठता थी|
माता अमृतानन्दमयी के भी कई अनुयायी हैं वहाँ जिन के भी कार्यक्रम होते रहते हैं|
वहाँ वनवासी कल्याण परिषद् का भी एक आश्रम है जहाँ से वनवासियों के कल्याण हेतु कई सेवा के कार्य होते रहते हैं| वनवासी कल्याण परिषद् से मैं भी कभी जुड़ा हुआ था| वहाँ २००१ में संघ के एक प्रचारक थे जो कभी मेरे बहुत घनिष्ठ मित्र थे, अब बंगाल में भाजपा के अध्यक्ष हैं| यदि बंगाल में भाजपा की सरकार बनी तो हो सकता है वे वहाँ के मुख्य मंत्री बनें| संघ से जुड़े हुए वहाँ के सभी स्वयसेवकों से २००१ में मेरी बहुत घनिष्ठता थी| अब इस समय तो कोई संपर्क नहीं है|
भारत माता की जय ! वन्दे मातरं !
कृपा शंकर
३१ दिसंबर २०१८

अपराजिता स्तोत्र ....

"अपराजित नमस्तेऽस्तु नमस्ते रामपूजित | प्रस्थानं च करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ||"
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ब्रह्माण्ड पुराण में दिए हुए एकमुखी हनुमत् कवचम् में ध्यान का यह आठवाँ मन्त्र है| किसी दुर्घटना या चोर डाकुओं के भय, भूत-प्रेत बाधा अथवा शत्रुओं से किसी प्रकार के अनिष्ट की, अथवा रणभूमि में शत्रु के भीषण प्रहार की आशंका रहती है| ऐसी स्थिति आने के पूर्व ही हमे उपरोक्त मन्त्र का प्रस्थान करते समय या उससे पूर्व कम से कम ११ बार जप कर लेना चाहिए| सब संकट कट जायेंगे और हम सकुशल घर लौट आयेंगे| उच्चारण सही और शुद्ध होना चाहिए|
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आचार्य सियारामदास नैयायिक जी ने इस विषय पर अपने ब्लॉग में लेख लिखे हैं| उनके जैसे कोई आचार्य ही इसे सिद्ध करने की सही विधि बता सकते हैं| हनुमत्कवच .... एकमुखी, पंचमुखी, सप्तमुखी और एकादशमुखी ..... अलग अलग उपलब्ध हैं| सबकी फलश्रुति भी अलग अलग है| किसी सिद्ध संत के मार्गदर्शन में ही इसे सिद्ध करें|

इन्द्रियों पर संयम न होना हमारे सभी दुःखों का मुख्य कारण है .....

इन्द्रियों पर संयम न होना हमारे सभी दुःखों का मुख्य कारण है .....
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इन्द्रियों पर संयम न होना ही हमारे दुःखों का मुख्य कारण है| जिसकी इन्द्रियाँ बस में नहीं होती वह व्यक्ति कभी भी सुख नहीं पा सकता| यह बात मैं नहीं, गीता में भगवान स्वयं कह रहे हैं .....
"नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना| न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌||२:६६||"
अर्थात् जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ वश में नहीं होती है, उस मनुष्य की न तो बुद्धि स्थिर होती है, न मन स्थिर होता है, और न ही शान्ति प्राप्त होती है, उस शान्ति रहित मनुष्य को सुख किस प्रकार संभव है?||
"इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते| तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि||२:६७||"
अर्थात जिस प्रकार पानी पर तैरने वाली नाव को वायु हर लेती है, उसी प्रकार विचरण करती हुई इन्द्रियों में से किसी एक इन्द्रिय पर मन निरन्तर लगा रहता है, वह एक इन्द्रिय ही उस मनुष्य की बुद्धि को हर लेती है||
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इससे मुक्त होने का क्या उपाय करे ? यह भी भगवान् वासुदेव ने गीता में ही बड़ा स्पष्ट कहा है, जिसका हम सब स्वाध्याय करें|
वे भगवान वासुदेव और उनके सभी भक्त संत-महात्मा मुझ अकिंचन पर अनुग्रह करें|
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ दिसंबर २०१८