कोई क्या सोचेगा, क्या कहेगा? इसका कोई महत्व नहीं है। महत्व इसी बात का है कि हम अपनी स्वयं की दृष्टि में क्या हैं? कोई क्या कहता या सोचता है? यह उसकी समस्या है। हमारी एकमात्र समस्या भगवान को पाना है, क्योंकि हमारा एकमात्र शाश्वत संबंध भगवान से है। हम भगवान के साथ एक हों, और उन्हीं को निरंतर व्यक्त करें।
Sunday, 5 January 2025
हम यह क्षुद्र भौतिक शरीर नहीं, सर्वव्यापी सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान परमब्रह्म परमात्मा हैं --- .
मूँगे की चट्टानों (Coral Reefs) में तैराकी और Snorkeling :--- (भाग १)
National Geographic पत्रिका में मूँगे की चट्टानों के बारे में पढ़कर मेरा यह एक स्वप्न था कि जीवन में मुझे भी कभी मूँगे की चट्टानों में तैरने और Snorkeling का अवसर मिले। यह अवसर मिला सन १९८० में जब मुझे सपरिवार श्रीलंका में त्रिंकोमाली जाने का अवसर मिला। वहाँ एक त्रिकोणी पहाड़ी पर विशाल शिवालय है, इसलिए इस बन्दरगाह का नाम थिरुकोणमल्ले यानि त्रिंकोंमाली है। वहाँ दो टापू है जहां खूब मूँगे की चट्टानें हैं। मैंने चालक दल के साथ एक नौका किराये पर ली और एक जीवन-रक्षक गोताखोर को भाड़े पर साथ में लिया और गंतव्य स्थान पर पहुँच गया। पत्नी को तो नाव में ही बैठाये रखा, और स्वयं अपने साथी गोताखोर के साथ पानी में उतर गया। वह गोताखोर बहुत कुशल और वफादार था। उसने गोताखोरी के अनेक करतब दिखाए और मुझे स्नोर्केलिंग सिखलाई। वहाँ के प्रशासन ने तीन घंटों की ही अनुमति दी थी। इसलिए तीन घंटों में ही बापस लौटना पड़ा।
Saturday, 4 January 2025
सदगुरुदेव से प्रार्थना ---
ॐ हे प्रेममय ज्योतिर्मय गुरुरूप कूटस्थ ब्रह्म, अपने इस बालक के ह्रदय को इतना पवित्र कर दो कि श्वेत कमल भी उसे देख कर शरमा जाए| तुम इस नौका के कर्णधार हो जिसे द्वैत से परे ले चलो| इसके अतिरिक्त इस बालक की अन्य कोई अभीप्सा नहीं है|
पाकिस्तान के दिवंगत (कर्नल) शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का मैं समर्थक नहीं हूँ ---
पाकिस्तान के दिवंगत (कर्नल) शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (فیض احمد فیض) (१९११ - १९८४) (फौज में कर्नल के पद से १९४८ में इस्तीफा देकर सेवानिवृत) का मैं समर्थक नहीं हूँ| उनकी शायरी चाहे कितनी भी दमदार रही हो पर उनके जीवन का एक काला अध्याय भी है जिसे बताया नहीं जाता| सन १९७१ के भारत-पाकिस्तान के युद्ध से पूर्व उन्होने पाकिस्तानी फौज द्वारा वर्तमान बांग्लादेश में किए गए वीभत्स नर-संहार का समर्थन किया था और बांग्ला भाषा को उर्दू से हीन बताया था|
Friday, 3 January 2025
मेरे उपास्य परमशिव को नमन ---
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सारी अनंत विराटता, सारी सृष्टि -- सारी आकाश-गंगाएँ, उनके सभी नक्षत्र अपने ग्रहों-उपग्रहों के साथ, और उन पर निवास कर रहे सभी प्राणियों की देह मैं ही हूँ। मैं ही उनका प्राण हूँ। जो कुछ भी सृष्ट और अनसृष्ट है, वह मैं ही हूँ। सारी सृष्टि, सारा ब्रह्मांड मेरा घर है, और सारे प्राणी मेरा परिवार। मैं सभी को साथ लेकर परमशिव की उपासना कर रहा हूँ। कुछ भी मुझसे पृथक नहीं है। मैं साँस लेता हूँ तो सारा ब्रह्मांड साँस लेता है। मेरा अस्तित्व ही सारी सृष्टि का अस्तित्व है। मैं परमशिव के साथ एक हूँ।
कृपा शंकर
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५ जनवरी से मैं अपने जीवन को एक नई दिशा दे रहा हूँ, जिसके बारे में लिखना उचित नहीं है। आज ४ जनवरी को प्रातः जब नींद से उठा, उठा तब स्वयं को एक निर्विकल्प समाधि में पाया जिसका अनुभव एक घंटे से भी अधिक समय तक चलता रहा। यह परमशिव की ओर से एक संकेत था, आर या पार जाने का। या तो इस पार आराम से बैठे रहो, या उस पार निकल जाओ जहाँ प्रकाश ही प्रकाश है।
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अब सोचना छोड़ दिया है क्योंकि जिस विमान में मैं यात्रा कर रहा हूँ, उस विमान का चालक मैं नहीं हूँ। यह विमान भी वे हैं, और इसके चालक भी वे ही हैं। जैसी उनकी इच्छा, वे किसी भी दिशा में कहीं भी जाएँ। मैं निश्चिंत हूँ। मेरी दिशा तो उन्हीं की ओर है। अब दायें-बायें, ऊपर-नीचे, इधर-उधर कुछ भी अन्य नहीं दिखाई दे रहा है। किसी भी ओर मेरी दृष्टि नहीं है। मेरी दृष्टि सिर्फ उन्हीं की ओर है और सदा सिर्फ उन्हीं की ओर रहेगी।
मैं इसी क्षण स्वयं को सब तरह के संकल्पों-विकल्पों, धारणाओं-विचारधाराओं, दायित्वों, पाप-पुण्य, और धर्म-अधर्म से सदा के लिए मुक्त करता हूँ। मेरी चेतना में मैं इस समय ईश्वर की सर्वव्यापक विराट अनंतता व उससे भी परे हूँ। किसी के साथ मेरा कोई विशिष्ट संबंध नहीं है। मुझे न तो किसी से कुछ पूछना है, और न किसी को कुछ बताना। किसी से कुछ लेना-देना भी नहीं है। परमशिव सदा मेरे समक्ष ही नहीं, मेरे साथ एक हैं। उनके सिवाय कोई अन्य विचार मेरे मानस में इस समय नहीं है, और भविष्य में कभी न आये तो ही अच्छा है। ॐ स्वस्ति !! शिव शिव शिव शिव शिव ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ !! हरिः ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
यह विमान और उस का चालक मैं नहीं हूँ ---
यह विमान और उस का चालक मैं नहीं हूँ ---
भगवान में और स्वयं में कोई भेद न रहे ---
सार की बात एक ही है कि भगवान को अपना पूर्ण प्रेम दो, इतना प्रेम कि स्वयं में भी भगवान ही प्रतीत हों। भगवान में और स्वयं में कोई भेद न रहे। हमारा अस्तित्व ही भगवान का अस्तित्व हो जाए। हम निमित्त मात्र ही नहीं, स्वयं भगवान के साथ एक हो जाएँ।