Saturday, 23 April 2022

धर्म एक ही है जो हमारा स्वधर्म है, अन्य सब परधर्म (अधर्म) हैं ---

 धर्म एक ही है जो हमारा स्वधर्म है, अन्य सब परधर्म (अधर्म) हैं, जो बड़े भयावह हैं; हमारा स्वधर्म ही हमारी रक्षा करेगा ---

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यहाँ थोड़ा विचार करते हैं कि हमारा स्वधर्म क्या है? "परमात्मा से अहैतुकी परम प्रेम" -- पूरी मनुष्य जाति का स्वभाविक स्वधर्म है (अन्य सब अधर्म है)। यही आत्म-साक्षात्कार यानि भगवत्-प्राप्ति का हेतु है जो जीवन का परम लक्ष्य है। नारद भक्ति सूत्रों, और शांडिल्य सूत्रों में इसी को 'भक्ति' बताया गया है। यही परमधर्म है, और यही सनातन-धर्म का सार है। हम परमात्मा के प्रति समर्पित होकर जीवन का हर कार्य करें, यही धर्म का पालन है। हम धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म भी हमारी रक्षा करेगा। बिना धर्म का पालन किये हम निराश्रय और असहाय हैं।
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताई हुई ध्यान की विधि से अपने दिन का आरम्भ करें, दिन में हर समय भगवान को अपनी चेतना में रखें, यदि भूल जाएँ तो याद आते ही पुनश्चः उन्हें अपनी चेतना में जीवन का केंद्रबिंदु बनाएँ। उनके उपकरण मात्र बनें, यानि उन्हें अपने माध्यम से हर कार्य करने दें। रात्रि को सोने से पहिले यथासंभव गहनतम ध्यान करके ही सोयें। जैसा हम सोचते हैं वैसा ही हम बन जाते हैं। निरंतर भगवान का ध्यान करेंगे तो स्वतः ही भगवान के सारे गुण हमारे में भी खिंचे चले आयेंगे, और हमारी सारी विकृतियाँ स्वतः ही दूर हो जायेंगी। "ध्यान" क्या है? इसे भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के छठे अध्याय में बहुत अच्छी तरह समझाया है। भगवान कहते हैं --
"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥६:२५॥"
अर्थात् - " शनै: शनै: धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा (योगी) उपरामता (शांति) को प्राप्त होवे; मन को आत्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करे॥"
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आचार्य शंकर के अनुसार -- धैर्य से धारण की हुई धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा शनैः शनैः अर्थात् सहसा नहीं, क्रम-क्रम से उपरति को प्राप्त करे। तथा मन को आत्मा में स्थित करके अर्थात् यह सब कुछ आत्मा ही है, उससे अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है, इस प्रकार मन को आत्मा में अचल करके अन्य किसी भी वस्तु का चिन्तन न करे। यह योग की परम श्रेष्ठ विधि है। (उपरोक्त श्लोक का शंकर भाष्य)
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आगे भगवान कहते हैं --
"यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥"
अर्थात् - यह चंचल और अस्थिर मन जिन कारणों से (विषयों में) विचरण करता है, उनसे संयमित करके उसे आत्मा के ही वश में लावे अर्थात् आत्मा में स्थिर करे॥"
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यह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ-जहाँ विचरण करता है, वहाँ-वहाँ से हटाकर इस को एक परमात्मा में ही लगाये। भगवान कहते हैं ---
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् -- "जो सबमें मुझे देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।" He who sees Me everywhere and sees everything in Me, he never becomes separated from Me, nor do I become separated from him.
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण का वचन है --
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥२:४०॥"
अर्थात् - "इसमें क्रमनाश और प्रत्यवाय दोष नहीं है। इस धर्म (योग) का अल्प अभ्यास भी महान् भय से रक्षण करता है॥"
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जब भगवान श्रीकृष्ण का आदेश है तो उसकी पालना हमें करनी ही होगी। अन्य सारे उपाय अति जटिल और कठिन हैं, अतः सबसे सरल मार्ग के रूप में स्वभाविक रूप से धर्म का पालन हमें करना ही चाहिए, तभी धर्म हमारी रक्षा करेगा। धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है, और धर्म की रक्षा ही हमारी स्वयं की रक्षा है॥ ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
१२ अप्रेल २०२२

भगवान हैं, यहीं पर, इसी समय हैं; और सर्वदा व सर्वत्र भी हैं ---

 भगवान हैं, यहीं पर, इसी समय हैं; और सर्वदा व सर्वत्र भी हैं. यदि नहीं दिखाई देते, तो दोष हमारे बुरे कर्मों का है.


जब लगे कि -- ध्यान, ध्याता, व ध्येय; -- दर्शन, दृष्टा, व दृश्य; -- उपासना, उपासक, व उपास्य; --- ये सब एक हो गए हैं, तब समझना चाहिए कि आध्यात्मिक उन्नति हो रही है। यही मुक्ति व मोक्ष का मार्ग है।

भगवान हमारे माध्यम से स्वयं साधना करते हैं, हम तो निमित्त मात्र हैं। कर्ता होने का भाव मिथ्या 'अहंकार' है, और कुछ पाने का भाव 'लोभ' है। यह लोभ और अहंकार -- सबसे बड़ी हिंसा है। लोभ और अहंकार से मुक्ति -- 'अहिंसा' है, जो हम सब का परम धर्म है।

भगवान कहते हैं ---
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥११:३३॥"
अर्थात् -- इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो।।
[ बायें हाथसे भी बाण चलानेका अभ्यास होनेके कारण अर्जुन सव्यसाची कहलाता है ]

समाज में कदम-कदम पर हर ओर छाई हुई हर तरह की भयंकर कुटिलता (छल, कपट, झूठ) व विपरीत परिस्थितियों के होते हुए भी मैं अपनी आस्था पर पूरी श्रद्धा, विश्वास और निष्ठा से दृढ़ हूँ|
भगवान की पूर्ण कृपा है| जब उनका निरंतर साथ है तो किसी से कोई अपेक्षा नहीं है| वे हर समय अपने हृदय व स्मृति में रखते हैं| उन की कृपा सब पर बनी रहे|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१२ अप्रेल २०२२

उपासना और समर्पण में क्या अंतर है? ---

 उपासना और समर्पण में क्या अंतर है? ---

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उपासना और समर्पण -- शब्दों में अंतर सिर्फ शाब्दिक है। तात्विक दृष्टि से कोई अंतर नहीं है। 'उपासना' का शब्दार्थ है - 'अपने इष्टदेवता की समीप (उप) स्थिति या बैठना (आसन)'। परमात्मा की प्राप्ति का एक साधन विशेष है "उपासना"। गीता के १२वें अध्याय "भक्ति योग" में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥१२:३॥"
अर्थात् - "जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।"
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यहाँ भगवान श्री कृष्ण ने "उपासते" यानि उपासना शब्द का प्रयोग किया है। स्वनामधान्य भाष्यकार भगवान आचार्य शंकर की व्याख्या के अनुसार -- "उपास्य वस्तु को शास्त्रोक्त विधि से बुद्धि का विषय बनाकर, उसके समीप पहुँचकर, तैलधारा के सदृश समानवृत्तियों के प्रवाह से दीर्घकाल तक उसमें स्थिर रहने को उपासना कहते हैं" (गीता १२:३ पर शंकर भाष्य)।
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एक बर्तन से दूसरे बर्तन में जब तेल डालते हैं तब आपने देखा होगा कि तेल की धार टूटती नहीं है। अपने प्रेमास्पद का ध्यान निरंतर तेलधारा के समान अखंड होना चाहिए, यानि बीच-बीच में खंडित न हो। साथ-साथ यदि भक्ति यानि परमप्रेम भी हो तो आगे का सारा ज्ञान स्वतः ही प्राप्त हो जाता है, और आगे के सारे द्वार भी स्वतः ही खुल जाते हैं। यही उपासना है।
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सार की बात यह है कि ---द्वैत भाव की समाप्ति -- समर्पण है।
और आत्मतत्व में स्थिति -- ध्यान, उपासना, व उपवास है।
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अब और लिखने का समय नहीं है। आपके सामने मिठाई पड़ी है तो मिठाई को चखिए, खाइये और उसका आनंद लें। उसके बखान में कोई आनंद नहीं है। भगवान सामने बैठे हैं, उनमें स्वयं को समर्पित कर दीजिये। बातों में कोई सार नहीं है। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
११ अप्रेल २०२२

जीवन का एकमात्र उद्देश्य भगवत्-प्राप्ति है, अन्य कुछ भी नहीं ---

 जीवन का एकमात्र उद्देश्य भगवत्-प्राप्ति है, अन्य कुछ भी नहीं। जीवन में सुख, शांति, सुरक्षा, संतुष्टि और तृप्ति -- सब भगवत्-कृपा से ही प्राप्त होते हैं।

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कूटस्थ में ज्योतिर्मय ब्रह्म भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण का नित्य नियमित ध्यान करते करते ऐसी अनुभूति होने लगती है कि चारों ओर वे ही छाए हुए हैं। उन की कुछ विशेष कृपा हर समय ही बनी रहती है। हर समय यही आभास होता है कि वे अपने आसन पर पद्मासन में बैठे हैं, और अपने स्वयं का ध्यान कर रहे हैं। उनकी छवि अलौकिक व अवर्णनीय है। सारी सृष्टि उनमें, और वे सारी सृष्टि में समाहित हैं। उनका ज्योतिर्मय कूटस्थ विग्रह शब्दब्रह्म -- चारों ओर गूंज रहा है। उनसे अन्य कोई भी या कुछ भी नहीं है। उनका संदेश स्पष्ट है --
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"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि..१८:५८।।"
अर्थात् - मच्चित्त होकर (मुझ में चित्त लगाकर) तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो नष्ट हो जाओगे।।"
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सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।१८:६६।।"
अर्थात् - "सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।।"
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आप किसी घोर वन में बिल्कुल अकेले यात्रा कर रहे हो और सामने से एक सिंह आ जाये तो आप क्या करोगे? जो करना है वह तो सिंह ही करेगा, हम कुछ नहीं कर सकते। वैसे ही जब स्वयं भगवान ही सामने आ गए हैं, तो जो कुछ भी करना है, वह तो वे स्वयं ही करेंगे। हमारे वश में पूर्ण समर्पण के सिवाय अन्य कुछ भी विकल्प नहीं है। ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
१० अप्रेल २०२२

ईसाई रिलीजन मुख्यतः दो काल्पनिक सिद्धांतों पर खड़ा है ---

  ईसाई रिलीजन मुख्यतः दो काल्पनिक सिद्धांतों पर खड़ा है ---

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(१) मूल पाप (Original Sin) की अवधारणा --
मनुष्य जन्म से ही पापी है क्योंकि अदन की वाटिका में आदम ने भले/बुरे ज्ञानवृक्ष से परमेश्वर की आज्ञा की अवहेलना कर के वर्जित फल को खा लिया| इससे परमेश्वर बहुत नाराज हुआ, और उस की दृष्टि में आदम की सारी औलादें जन्म से ही पापी हो गईं| आदमी का हर पाप अदन की वाटिका में आदम के पाप का सीधा परिणाम है| परमेश्वर ने करुणा कर के इंसान को इस पाप से मुक्त करने के लिए अपने एकमात्र पुत्र यीशु (Jesus) को पृथ्वी पर भेजा ताकि जो उस पर विश्वास करेंगे, वे इस पाप से मुक्त कर दिये जाएँगे, और जो उस पर विश्वास नहीं करेंगे उन्हें नर्क की अनंत अग्नि में शाश्वत काल के लिए डाल दिया जाएगा|
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(२) पुनरोत्थान (Resurrection) की अवधारणा --
सूली पर मृत्यु के बाद यीशु मृतकों में से जीवित हो गए, और अन्य भी अनेक मृतकों को खड़ा कर दिया| ईसाई मतावलंबी ईसा के पुनरुत्थान को ईसाई रिलीजन के केंद्रीय सिद्धांत के रूप में मानते हैं| यह चमत्कार उनके अवतार होने को मान्यता प्रदान करता है|
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सत्य क्या है मुझे पता नहीं| सत्य का अनुसंधान करना जिज्ञासु विद्वानों का काम है| पश्चिमी जगत में दो-तीन तरह के विचार फैल रहे हैं --
कुछ तो परंपरागत श्रद्धालु हैं|
कुछ पश्चिमी विद्वान कह रहे हैं कि -- ईसा मसीह नाम के व्यक्ति ने कभी जन्म ही नहीं लिया| इनके बारे में कही गई सारी बातें सेंट पॉल नाम के एक पादरी के दिमाग की उपज हैं|
कुछ विद्वान कह रहे हैं कि ईसा मसीह ने भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षाओं का ही प्रचार किया| उनकी पढ़ाई-लिखाई और मृत्यु भारत में ही हुई थी|
प्रमाणों और विवेक के आधार पर सत्य का अनुसंधान होना चाहिए| आँख मीच कर किसी की कोई बात नहीं माननी चाहिए|
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वास्तव में चर्च पश्चिमी साम्राज्यवादियों की सेना का अग्रिम अंग था| अपना साम्राज्य फैलाने के लिए साम्राज्यवादियों की सेना जहाँ भी जाती, उस से पूर्व, चर्च के पादरी पहुँच कर आक्रमण की भूमिका तैयार करते थे| विश्व में सबसे अधिक नरसंहार और अत्याचार चर्च ने किए हैं| इसका एक उदाहरण दे रहा हूँ ---
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यह सन १४९२ ई.की बात है| एक बार पुर्तगाल और स्पेन में लूट के माल को लेकर झगड़ा हो गया| दोनों ही देश दुर्दांत समुद्री डाकुओं के देश थे जिनका मुख्य काम ही समुद्रों में लूटपाट और ह्त्या करना होता था| दोनों ही देश कट्टर रोमन कैथोलोक ईसाई थे अतः मामला वेटिकन में उस समय के छठवें पोप के पास पहुँचा| लूट के माल का एक हिस्सा पोप के पास भी आता था| अतः पोप ने सुलह कराने के लिए एक फ़ॉर्मूला खोज निकाला और एक आदेश जारी कर दिया| ७ जून १४९४ को "Treaty of Tordesillas" के अंतर्गत इन्होने पृथ्वी को दो भागों में इस तरह बाँट लिया कि यूरोप से पश्चिमी भाग को स्पेन लूटेगा और पूर्वी भाग को पुर्तगाल|
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वास्कोडिगामा एक लुच्चा लफंगा बदमाश हत्यारा और समुद्री डाकू मात्र था, कोई वीर नाविक नहीं| अपने धर्मगुरु की आज्ञानुसार वह भारत को लूटने के उद्देश्य से ही आया था| कहते हैं कि उसने भारत की खोज की| भारत तो उसके बाप-दादों और उसके देश पुर्तगाल के अस्तित्व में आने से भी पहिले अस्तित्व में था| वर्तमान में तो पुर्तगाल कंगाल और दिवालिया होने की कगार पर है जब कि कभी लूटमार करते करते आधी पृथ्वी का मालिक हो गया था|
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ऐसे ही स्पेन का भी एक लुटेरा बदमाश हत्यारा डाकू था जिसका नाम कोलंबस था| अपने धर्मगुरु की आज्ञानुसार कोलंबस गया था अमेरिका को लूटने के लिए और वास्कोडीगामा आया था भारतवर्ष को लूटने के लिए| कोलंबस अमेरिका पहुंचा तब वहाँ की जनसंख्या दस करोड़ से ऊपर थी| कोलम्बस के पीछे पीछे स्पेन की डाकू सेना भी वहाँ पहुँच गयी| उन डाकुओं ने निर्दयता से वहाँ के दस करोड़ लोगों की ह्त्या कर दी और उनका धन लूट कर यूरोपियन लोगों को वहाँ बसा दिया| वहाँ के मूल निवासी जो करोड़ों में थे, वे कुछ हजार की संख्या में ही जीवित बचे| यूरोप इस तरह अमीर हो गया|
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कितनी दुष्ट राक्षसी सोच वाले वे लोग थे जो उन्होंने मान लिया कि सारा विश्व हमारा है जिसे लूट लो| कोलंबस सन १४९२ ई.में अमरीका पहुँचा, और सन १४९८ ई.में वास्कोडीगामा भारत पहुंचा| ये दोनों ही व्यक्ति नराधम थे, कोई महान नहीं जैसा कि हमें पढ़ाया जाता है|
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आज का अमेरिका उन दस करोड़ मूल निवासियों की लाश पर खडा एक देश है| उन करोड़ों लोगों के हत्यारे आज हमें मानव अधिकार, धर्मनिरपेक्षता, सद्भाव और सहिष्णुता का पाठ पढ़ा रहे हैं|
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ऐसे ही अंग्रेजों ने ऑस्ट्रेलिया में किया| ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में वहाँ के सभी मूल निवासियों की ह्त्या कर के अंग्रेजों को वहाँ बसा दिया गया| भारत में भी अँगरेज़ सभी भारतीयों की ह्त्या करना चाहते थे, पर कर नहीं पाए|
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यह हम सब अपने विवेक से तय करें कि सत्य क्या है| सभी को धन्यवाद!
ॐ तत्सत !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! कृपा शंकर
१० अप्रेल २०२२

इस पृथ्वी पर सभी मनुष्यों का स्वधर्म एक ही है ---

 इस पृथ्वी पर सभी मनुष्यों का स्वधर्म एक ही है ---

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इस पूरी सृष्टि में सारी मनुष्यता का स्वधर्म एक ही है, और वह है -- निरंतर परमात्मा का स्मरण, चिंतन, ध्यान, और उन्हीं में रमण। इसके अतिरिक्त अन्य कोई स्वधर्म नहीं है। यही सनातन धर्म का सार है। इससे अतिरिक्त बाकी सब अधर्म है। निज जीवन में उन्हीं परमात्मा को हर समय हम व्यक्त करें। भगवान यहीं पर, इसी समय, सर्वदा, और सर्वत्र हैं। भगवान कहते हैं --
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् - जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
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इस स्वधर्म का पालन इस संसार के महाभय से सदा हमारी रक्षा करेगा| भगवान का वचन है ---
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥२:४०॥"
अर्थात् इसमें क्रमनाश और प्रत्यवाय दोष नहीं है| इस धर्म (योग) का अल्प अभ्यास भी महान् भय से रक्षण करता है॥
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इस स्वधर्म में मरना ही श्रेयस्कर है| भगवान कहते हैं ---
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३:३५॥"
अर्थात् सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है; स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है॥
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रात्री को सोने से पूर्व परमात्मा का ध्यान कर के सोएँ, और प्रातःकाल उठते ही पुनश्च उनका ध्यान करें। पूरे दिन उन्हें अपनी स्मृति में रखें। साकार और निराकार -- सारे रूप उन्हीं के हैं। प्रयासपूर्वक अपनी चेतना को परासुषुम्ना (आज्ञाचक्र व सहस्त्रारचक्र के मध्य) में रखें। इसे अपनी साधना बनाएँ। जो उन्नत साधक हैं वे अपनी चेतना को ब्रह्मरंध्र से भी बाहर परमात्मा की अनंतता में रखें। अनंतता का बोध और और उसमें स्थिति होने पर आगे का मार्गदर्शन भगवान स्वयं करेंगे।
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ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० अप्रेल २०२२

स्वास्थ्य और स्वार्थ ---

 स्वास्थ्य और स्वार्थ ---

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हम सब स्वस्थ (स्व+स्थ) यानि परमात्मा में स्थित हों, व स्वार्थी (स्व+अर्थ) यानि परमात्मा से ही मतलब रखने वाले हों। स्वयं को यह भौतिक देह मानना सारे पापों का मूल है। मेरा "स्व" परमात्मा में है, इस भौतिक शरीर में नहीं। इस भौतिक शरीर की तृप्ति के लिए ही मनुष्य सारे पाप करता है। जब कि यह भौतिक शरीर हमारा सबसे बड़ा धोखेबाज़ मित्र है। सिर्फ लोकयात्रा के लिए एक वाहन के रूप में ही यह आवश्यक है।
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ज्योतिर्मय ब्रह्म की छटा ज्योतिषांज्योति के रूप में कूटस्थ में निरंतर पूरी सृष्टि को आलोकित कर रही है। उसके सूर्यमण्डल में स्वयं भगवान पुरुषोत्तम बिराजमान हैं। वे ही परमशिव हैं। हम उनके साथ एक हों, वे ही हमारे माध्यम से निरंतर व्यक्त हो रहे हैं।
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मैं यह कोई उपदेश नहीं दे रहा हूँ, न ही कोई नया लेख लिख रहा हूँ। यह तो परमात्मा का प्रेम है जो अपने आप ही छलक रहा है। मेरे अंतर में परमात्मा के अलावा अन्य कुछ है ही नहीं। उनका प्रेम कूट कूट कर इतना अधिक भरा हुआ है, कि छलके बिना नहीं रह सकता। मेरा अस्तित्व ही परमात्मा का अस्तित्व है। प्रार्थना तो उनसे की जाती है जो कहीं दूर हों। यहाँ तो कोई दूरी है ही नहीं। मैं और मेरे प्रभु एक हैं। अतः किन से प्रार्थना करूँ? कोई अन्य है ही नहीं।
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कई लोग मेरे हितैषी बनकर मुझे संदेश भेजते हैं कि मुझे एक सच्चे सद्गुरु की आवश्यकता है। उनसे मेरा निवेदन है कि मुझे कोई नया सद्गुरु नहीं चाहिए। कई जन्मों से जो मेरे सद्गुरु थे, सूक्ष्म जगत में वे मेरे साथ परमात्मा में एक हैं। उनमें और मुझमें कोई भेद नहीं है। मुझे जो भी मार्गदर्शन मिला है वह सूक्ष्म जगत की महान आत्माओं से मिला है। भौतिक देह में जो मिले, वे मेरे स्वयं के अनुरोध पर ही मिले हैं। मुझे पूर्ण संतुष्टि है। जीवन की उच्चतम उपलब्धि कई बार अनायास स्वतः ही मिल जाती है। आप सब महान आत्माओं को नमन !!
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ अप्रेल २०२२