Monday, 3 January 2022

सत्य की अनुभूति तो स्वयं को ही करनी होगी ---

 

सत्य की अनुभूति तो स्वयं को ही करनी होगी ---
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मैं भगवान को धन्यवाद देना चाहता हूँ कि उन्होंने सगे-संबंधियों, शत्रु-मित्रों, व परिचितों-अपरिचितों के रूप में आकर मेरा सदा मार्गदर्शन, प्रोत्साहन, प्रेरणा, शक्ति, और बहुत ही अच्छा साथ दिया है। जीवन में अच्छे-बुरे जो भी लोग मिले, वे सब भगवान के ही रूप थे। अच्छे-बुरे सारे अनुभव भी भगवान का ही प्रसाद था। मुझे सही मार्ग पर चलने का प्रोत्साहन और प्रेरणा सदा मिलती रही है। कोई कमी थी तो मुझ में ही थी, दूसरों में नहीं। मैं सभी का कृतज्ञ हूँ।
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भगवान की पूरी कृपा मुझ अकिंचन पर सदा बनी रही है। जितनी मेरी पात्रता थी, उससे बहुत ही अधिक आध्यात्मिक अनुभूतियाँ, ज्ञान और भक्ति भगवान ने मुझे प्रदान की हैं। आध्यात्मिक भावभूमि पर किसी भी तरह का कोई संशय और शंका मुझे नहीं है, सारी अवधारणाएँ स्पष्ट हैं। मेरी हिमालय से भी बड़ी-बड़ी भूलों की भी भगवान ने उपेक्षा की है। उनके कृपासिंधु में वे छोटे-मोटे कंकर-पत्थर से अधिक नहीं हैं, जो वहाँ भी शोभा दे रहे हैं। अब पूरा जीवन भगवान को समर्पित है, जो भगवान के साथ ही बीत जाएगा। कोई कामना अवशिष्ट नहीं है। भगवान हैं, अभी है, इसी समय हैं, यहीं पर हैं, सर्वत्र और सर्वदा मेरे साथ हैं। मुझे और कुछ भी नहीं चाहिए।
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हमें नित्य कम से कम तीन घंटे तक पूरी सत्यनिष्ठा से आध्यात्मिक साधना करनी ही होगी, तभी हम भगवान के उपकरण बन सकेंगे। तभी हम राष्ट्र और धर्म की रक्षा कर सकेंगे। बड़ी बड़ी बातों में कुछ नहीं रखा है। धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है। जो धर्म की रक्षा करेगा, धर्म उसी की रक्षा करेगा।
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आध्यात्म में कमाई स्वयं की ही काम आएगी, दूसरों की नहीं। साधना के उत्तुंग शिखरों पर चढ़ कर उनके पार देखने और बाधाओं के विशाल महासागरों को पार करने वाले ही आगे के दृश्य देख पायेंगे और विजयी होंगे। सुनी-सुनाई बातों और दूसरों के अनुभवों में कुछ नहीं रखा है; इनसे हमें सिर्फ प्रेरणा ही मिल सकती है। सत्य की अनुभूति तो स्वयं को ही करनी होगी। जितना परिश्रम करोगे, भगवान से उतना ही अधिक पारिश्रमिक मिलेगा। बिना परिश्रम के कुछ भी नहीं मिलेगा। भगवान भी अपना अनुग्रह उन्हीं पर करते हैं जो परमप्रेममय होकर उनके लिए परिश्रम करते हैं। मेहनत करोगे तो मजदूरी भी मिलेगी। संसार भी हमें मेहनत के बदले मजदूरी देता है, तो फिर भगवान क्यों नहीं देंगे? संत तुलसीदास जी ने कहा है --
"तुलसी विलम्ब न कीजिए भजिये नाम सुजान।
जगत मजूरी देत है क्यों राखे भगवान॥"
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अधिकांश लोग संत-महात्माओं के पीछे पीछे इसलिए भागते हैं कि संभवतः संत-महात्मा अपनी कमाई में से कुछ दे देंगे, पर ऐसा होता नहीं है। संत-महात्मा अधिक से अधिक हमें प्रेरणा दे सकते हैं, मार्गदर्शन कर सकते हैं, और सहायता कर सकते हैं, इस से अधिक नहीं। वे अपनी कमाई यानि अपना पुण्य किसी को क्यों देंगे? पुण्यार्जन के लिए परिश्रम तो स्वयं को ही करना होगा।
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सभी को मंगलमय शुभ कामना और नमन !! भगवान की परम कृपा आप सब पर बनी रहे।
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ नमः शिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ दिसंबर २०२१

सौ बात की एक बात ---

 

सौ बात की एक बात ---
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पिछले दस वर्षों से अब तक भगवान की भक्ति के बारे में जो कुछ भी लिखा है, वह सब एक तरफ, और आज जो लिखने जा रहा हूँ वह एक तरफ है। इधर उधर की बड़ी-बड़ी बातों से कोई लाभ नहीं है, सबसे बड़ी काम की बात सीधे ही कहना चाहता हूँ। इसके बाद मेरे पास भी समय नहीं है, क्योंकि भगवान से उधार मांगे हुये समय में जी रहा हूँ।
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मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य भगवत्-प्राप्ति है, यही हमारा स्वधर्म है, और यही सत्य-सनातन-धर्म का सार है। यदि कोई व्यक्ति अपने निज जीवन में भगवत्-प्राप्ति के लिए गंभीर और निष्ठावान है, तो उसे प्रतिदिन पूरी सत्यनिष्ठा से कम कम तीन घंटे तो भगवान का ध्यान करना ही होगा। उससे कम में काम नहीं चलेगा। इससे अधिक की कोई सीमा नहीं है। भगवान ने हमें दिन में २४ घंटे दिये हैं, उसके आठवें भाग पर तो भगवान का पूरा अधिकार है। अतः वह भाग भगवान को बापस दें।
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यदि ध्यान नहीं कर सकते तो नित्य कम से कम एकसौ माला अपने इष्ट देवी/देवता के बीज मंत्र की जपें। बीजमंत्र की एकसौ माला जपने में कम से कम ढाई से तीन घंटे लगेंगे। जो शक्ति साधक हैं, वे कमलगट्टे की, शिव साधक रुद्राक्ष की, और वैष्णव तुलसी माला का प्रयोग करें। निष्काम साधना में नियमों के अधिक बंधन नहीं हैं। अतः तीन घंटे तक पूरी सत्यनिष्ठा से यानि ईमानदारी से जपयोग करें। तीन घंटे तक सत्यनिष्ठा से बीज मंत्र के जप करने को एक सौ माला के बराबर मान लीजिये।
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यदि आप बीजमंत्र के स्थान पर अपने इष्ट देवी/देवता के पूरे मंत्र का जप करते हैं तो भी कम से कम तीन घंटे तक जप करना चाहिए। इसे दिन में दो टुकड़ों में भी कर सकते हैं। जो द्विज हैं उन्हें दिन में कम से कम से कम संख्या में दस बार गायत्री जप अनिवार्य हैं। यदि वे एक बार भी नहीं करते तो द्विजत्व से च्युत हो जाते है, और प्रायश्चित करना पड़ता है। अधिक से अधिक वे जितना भी जप कर सकते हैं करें, फिर भी वह कम ही रहेगा।
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जपयज्ञ सबसे बड़ा यज्ञ है क्योंकि श्रीमद्भवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥१०:२५॥"
अर्थात् -- महर्षियों में भृगु और वाणियों-(शब्दों-) में एक अक्षर अर्थात् प्रणव मैं हूँ। सम्पूर्ण यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहनेवालों में हिमालय मैं हूँ।
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वैसे मानसिक रूप से हमें हर समय चौबीस घंटे निरंतर भगवान के नाम का मानसिक जप करते रहना चाहिए। यह संसार एक युद्धभूमि है जहाँ हम निरंतर एक युद्ध लड़ रहे हैं। वह युद्ध अधर्म के विरुद्ध है। भगवान का निरंतर अनुस्मरण करते हुए हम यह युद्ध करें। भगवान कहते हैं --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् -- इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो। मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
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इतना ही लिखने की प्रेरणा भगवान से मिली थी, सो लिख दिया। मैं आप सब का एक सेवक मात्र हूँ। समष्टि के कल्याण हेतु ही मेरे माध्यम साधना होती है। समष्टि का हित ही मेरा हित है। मेरी कोई कामना नहीं है। मैं सदा आपके साथ हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० दिसंबर २०२१

हमारी सबसे बड़ी समस्या और उसका समाधान क्या है?

 

(प्रश्न). हमारी सबसे बड़ी समस्या क्या है? और उसका समाधान क्या है?
(उत्तर). हमारी कोई समस्या नहीं है। हम स्वयं ही समस्या हैं।
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इसका समाधान है - "आत्म-साक्षात्कार", यानि परमात्मा में पूर्ण समर्पण और पृथकता के बोध की समाप्ती। आत्म-साक्षात्कार -- सबसे बड़ी सेवा है जो हम समष्टि के लिए कर सकते हैं। यही आत्माराम होना है, यही कूटस्थ-चैतन्य है, यही ब्राह्मी स्थिति है, और यही ईश्वर की प्राप्ति है। परमात्मा से जुड़कर हमें धर्म और अधर्म से भी ऊपर उठना ही होगा। ये भी अंतत एक बंधन हैं।
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इस विषय पर और कुछ भी नहीं लिखूंगा। श्रीमद्भगवद्गीता और उपनिषदों व रामचरितमानस, सम्पूर्ण महाभारत, भागवत पुराण आदि का स्वाध्याय करें; संत-महात्माओं का सत्संग करें, भगवान को अपना प्रेम दें, और भगवान की उपासना करें। भगवान स्वयं ही सब कुछ समझा देंगे। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१७ दिसंबर २०२१

सनातन धर्म ही इस देश का भविष्य है, हम अपनी उपासना भगवत्-प्राप्ति के लिए ही करें ---

 

सनातन धर्म ही इस देश का भविष्य है ---
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यहाँ की राजनीति, शिक्षा-व्यवस्था, कृषि-व्यवस्था, और अन्य सारी व्यवस्थाएं सनातन धर्म पर ही आधारित होंगी। एक आध्यात्मिक शक्ति इस दिशा में कार्य कर रही है जिसे रोकने का सामर्थ्य किसी में भी नहीं है। यह कार्य धीरे धीरे हो रहा है। असत्य का अंधकार भारत से दूर चला जाएगा। भारत विजयी होगा। हमारा कार्य स्वधर्म पर दृढ़ रहना है। स्वधर्म और परधर्म क्या है, यह मैं अनेक बार लिख चुका हूँ। यह युग-परिवर्तन का समय है। आने वाले समय में अनेक परिवर्तन होंगे। भयावह विनाश भी होगा और नवनिर्माण भी होंगे।
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जिनके जीवन में सदाचार है और जिन्होंने भगवान का आश्रय लिया है, भगवान उनकी रक्षा करेंगे। हम अपनी सारी आध्यात्मिक उपासना "भगवत्-प्राप्ति" के लिए ही करें। हमारे जीवन का उद्देश्य व लक्ष्य यही है। यही "सत्य-सनातन-धर्म" है और यही हमारा "स्वधर्म" है। इसका दृढ़ता से पालन ही हमारी रक्षा कर सकता है। अन्यथा विनाश सुनिश्चित है।
हर दृष्टिकोण से शक्तिशाली और संगठित बनें। हमारे चरित्र और आचरण में कोई कमी नहीं हो। नित्य ईश्वर का ध्यान करें, और ईश्वर-प्रदत्त विवेक के प्रकाश में ही निमित्तमात्र होकर हर कार्य करें। जीवन में मंगल ही मंगल और शुभ ही शुभ होगा।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ दिसंबर २०२१

आज "विजय दिवस" है, सभी देशवासियों का अभिनंदन, बधाई और मंगलमय शुभ कामनायें ---

 

आज "विजय दिवस" है, सभी देशवासियों का अभिनंदन, बधाई और मंगलमय शुभ कामनायें ---
(हम युद्ध में तो विजयी रहे पर कूटनीति में हार गए। अन्यथा हम विजयी हैं, और सदा विजयी ही रहेंगे)
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आज एक स्वाभिमान और आत्म-गौरव का दिवस है। ५० वर्ष पूर्व १६ दिसंबर १९७१ को भारत ने एक दुष्ट और अत्याचारी देश पाकिस्तान को पूर्ण रूप से युद्ध में हराकर, पाकिस्तान के ९३,००० से अधिक सैनिकों को युद्धबंदी बनाया और बांग्लादेश का निर्माण किया। हम युद्ध में जीते तो अवश्य पर वार्ता की मेज पर पाकिस्तान की कूटनीति से हार गए। पाकिस्तान से हम उसके सैनिकों के बदले कुछ भी ले सकते थे। हम उनके बदले पाक-अधिकृत कश्मीर का सौदा कर सकते थे, लाहौर भी ले सकते थे। पर अपने भोलेपन (या मूर्खता) के कारण अपने लगभग ५५ युद्धबंदियों को भी पाकिस्तान से नहीं छुड़ा पाये, और पाकिस्तान के ९३,००० से अधिक सैनिकों को सही सलामत बिना एक भी खरौंच भी आए छोड़कर पाकिस्तान पहुंचा दिया। भारतीय युद्धबंदियों को दुष्ट देश पाकिस्तान ने बहुत ही यातना दे देकर मार दिया। यह हमारी कूटनीतिक पराजय थी। फिर भी यह हमारी एक महान सैनिक विजय थी जिस पर हमें गर्व है।
उस युद्ध में मारे गए सभी भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि। जो भी उस समय के पूर्व सैनिक जीवित हैं, उन सब को नमन!! भारत माता की जय!!
कृपा शंकर
१६ दिसंबर २०२१
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पुनश्च :---
हम लोग 1971 की लड़ाई में इंदिरा गांधी की पीठ थपथपाते हैं लेकिन हम लोगों को बेनजीर भुट्टो के पति आसिफ अली जरदारी का पाकिस्तान के संसद में दिया गया यह बयान जरूर पढ़ना चाहिए-----
जब पाकिस्तान के 90000 से ज्यादा सैनिक भारत की कैद में थे उनके तीन हजार से ज्यादा सैनिक अधिकारी हमारी हिरासत में थे ..पाकिस्तान की सेना आत्मसमर्पण कर चुकी थी
भारतीय सेना सिंध के जिले थारपारकर को भारत में मिला शामिल कर चुकी थी और उसे गुजरात का एक नया जिला घोषित कर दिया गया था और मुजफ्फराबाद पार्लियामेंट पर तिरंगा झंडा फहरा दिया गया था
जुल्फिकार अली भुट्टो जब इंदिरा गांधी से शिमला समझौता करने आया तब वह अपनी बेटी बेनजीर भुट्टो को भी साथ में लाया था।
जुल्फिकार अली भुट्टो अपनी बेटी को राजनीति सिखा रहा था।
इंदिरा गांधी ने जुल्फिकार अली भुट्टो के सामने शर्त रखी यदि आपको अपने 93000 सैनिक वापस चाहिए तब आप कश्मीर हमें दे दीजिए, जुल्फिकार अली भुट्टो ने इंदिरा गांधी से कहा कि हम आपको कश्मीर नहीं देंगे, मैं कोई दस्तखत नहीं करूंगा, आप यह 93000 सैनिकों को अपने पास ही रखो।
इंदिरा गांधी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि जुल्फिकार अली भुट्टो उनसे भी बड़ा खिलाड़ी है। वह जानता है कि सीमाओं पर हारी हुई युद्ध को टेबल पर कैसे जीता जाता है।
इंदिरा गांधी की हालत ऐसी हो गई थी जैसे कोई नमाज़ पढ़ने जाए और उसके गले रोजे पड़ जाएं।
पुपुल जयकर और कुलदीप नैयर दोनों ने अपनी किताब में लिखा है, इंदिरा गांधी उस मौके पर चूक गई, उनके और उनके सलाहकारों के पास कोई ऐसा कूटनीतिक ज्ञान नहीं था कि ऐसी स्थिति को कैसे संभाला जाए।
जिनेवा समझौते के तहत यदि कोई देश किसी युद्ध बंदी को पकड़ता है तब उसे युद्ध बंदी की डिग्निटी का पूरा ख्याल रखना होता है।
जुल्फिकार अली भुट्टो ने शाम को होटल में अपनी बेटी बेनजीर भुट्टो से कहा इस युद्ध में भारत की कमर टूट चुकी है, हमने युद्ध पूरी बहादुरी से लड़ा हमने भारत की अर्थव्यवस्था को बहुत करारी चोट दिया है। भारत पहले ही बांग्लादेशी शरणार्थियों का बोझ झेल चुका है अब भारत 93000 पाकिस्तानी सैनिकों को कैसे पालेगा और अगर भारत 93000 पाकिस्तानी सैनिकों को अपने पास बसाना चाहता है तो बसाए और उन कायर सैनिकों को हम वापस लेकर भी क्या करेंगे? मैंने इंदिरा गांधी की हालत सांप के गले में पड़ी छछूंदर जैसी कर दी है।
और अंत में इंदिरा गांधी की हालत ऐसी हो गई जैसे कोई सौ जूते भी खाए और सौ प्याज भी खाए।
इंदिरा गांधी ने कश्मीर भी पाकिस्तान को दे दिया 93000 सैनिक भी वापस कर दिए और अपने 56 सैनिकों को पाकिस्तान की जेल में मरने को छोड़ दिया, और 8 महीने के बाद नोबेल पुरस्कार की इच्छा में भारत के गुजरात राज्य में शामिल जिला थारपारकर को भी पाकिस्तान को वापस कर दिया जबकि थारपारकर की उस वक्त 98% आबादी हिंदू थी।
शिमला समझौते के बाद उस वक्त के सेना प्रमुख ने रिटायरमेंट के बाद जो किताब लिखी थी उसमें कहा था इस युद्ध को हमने लड़ाई के मैदान में तो जीत लिया लेकिन टेबल पर राजनेताओं ने भारत को हरा दिया।
और वो राजनेता इंदिरा गांधी थी।
कांग्रेस का इतिहास बताता है की इन्होंने भारत को बर्बाद ही किया
 

पुत्र के लिए पिता ही कष्ट उठा सकता है (हृदय की एक घनीभूत पीड़ा) ---

पुत्र के लिए पिता ही कष्ट उठा सकता है (हृदय की एक घनीभूत पीड़ा) ---
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भगवान मेरे हृदय में हैं, मुझसे बिल्कुल भी दूर नहीं हैं। उनमें और मुझमें कोई दूरी नहीं है। उनकी उपस्थिति का पूर्ण आनंद मुझे होना चाहिए, लेकिन मेरे हृदय में एक घनीभूत पीड़ा है। यह पीड़ा मेरी नहीं, बल्कि सारी सृष्टि की है। सारे संसार का दुःख, वेदना और असह्य घनीभूत पीड़ा मुझे अनुभूत हो रही है, उससे मैं बच नहीं सकता। इस पीड़ा को मैं बापस भगवान को लौटा रहा हूँ। यह संसार भगवान की रचना है जिसके अच्छे-बुरे सभी कर्मों के लिए वे स्वयं जिम्मेदार हैं, मैं नहीं।
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अपनी व्यथा भगवान के समक्ष व्यक्त की तो उन्होंने उसका समाधान भी बता दिया है। भगवान कहते हैं कि मुझे अपनी निज चेतना में उनकी इस सृष्टि की अनंतता से भी ऊपर उठना होगा। इसके लिए उन्होंने मुझे सूक्ष्म जगत में उनकी अनंतता यानि दहराकाश से भी परे परमशिव का गहन ध्यान करने को कहा है। भगवान कहते हैं कि जब तक तुम इस अनंतता की सीमा में हो, तब तक तुम्हें सुख के साथ-साथ, दुःख भी भोगना ही पड़ेगा। तुम्हें इस अनंत विराटता से परे जाना होगा जहाँ आनंद ही आनंद है, कोई विषाद नहीं।
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मेरी अंतर्चेतना कह रही है कि इस शरीर की भौतिक मृत्यु से पूर्व ही मुझे निर्विकल्प समाधि की अवस्था को प्राप्त कर उस से भी परे जाना होगा। यहाँ भी मैं भगवान की सहायता पर ही निर्भर हूँ। मुझ अकिंचन में इतनी शक्ति, सामर्थ्य और क्षमता नहीं है। मेरी जगह स्वयं भगवान को ही साधना करनी होगी। हे भगवन्, जब इतनी दूर ले ही आये हो तो अब मुझे अधर में छोड़ नहीं सकते। पार तो आपको ही लगाना पड़ेगा। पुत्र के लिए पिता ही कष्ट उठा सकता है। ॐ तत्सत्॥
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कृपा शंकर
१४ दिसंबर २०२१

हमारा "स्वधर्म" क्या है? ---

हमारा "स्वधर्म" क्या है? ---
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हमारा स्वधर्म है निज जीवन में परमात्मा की अभिव्यक्ति। दिन में चौबीस घंटे, सप्ताह में सातों दिन, परमात्मा को अपनी स्मृति में रखते हुए, उन्हें कर्ता बनाकर, निमित्त मात्र होकर हर कार्य करें। यही हमारा स्वधर्म है। भगवान को भूलना ही परधर्म है।
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हमारे हृदय में भगवान होंगे तो हमारी भी रक्षा होगी और भारत की भी।
"यतः कृष्णस्ततो धर्मो, यतो धर्मस्ततो जयः॥" जहाँ भगवान श्रीकृष्ण हैं, वहाँ धर्म है। जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।
"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥"
जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन है वहीं पर श्री, विजय, विभूति और ध्रुव नीति है, ऐसा मेरा मत है॥
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सत्य-सनातन-धर्म की और परमात्मा की सर्वाधिक अभिव्यक्ति भारत में हुई है। अतः भारत निश्चित रूप से विजयी होगा। हमारा काम सिर्फ अपने स्वधर्म का पालन करना है। बाकी काम भगवान करेंगे।
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्वमहाङ्‍कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥"
मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा, और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा॥
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हमारे से भगवान को सिर्फ सत्यनिष्ठा और प्रेम चाहिए, अन्य कुछ भी नहीं। अन्य सब तो उन्हीं का है। प्रेम तभी होगा जब सत्यनिष्ठा होगी।
भारत माँ अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर बिराजमान होंगी। असत्य और अंधकार की शक्तियों का पराभव होगा। हर ओर परमात्मा की चेतना व्याप्त होगी।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ दिसंबर २०२१
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हमारा स्वधर्म है निज जीवन में परमात्मा की अभिव्यक्ति। दिन में चौबीस घंटे, सप्ताह में सातों दिन, परमात्मा को अपनी स्मृति में रखते हुए, उन्हें कर्ता बनाकर, निमित्त मात्र होकर हर कार्य करें। यही हमारा स्वधर्म है। भगवान को भूलना ही परधर्म है। जिस अभीप्सा को पूर्ण करने का इस जीवन में कभी साहस नहीं जुटा पाया था, वह श्रेष्ठतम विचार -- हरिःकृपा से अब फलीभूत हो।
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कब तक यह नारकीय जीवन जीते रहेंगे? अब समय आ गया है, हमें पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म से ऊपर उठना ही होगा। ॐ ॐ ॐ !!
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हमारे हृदय में भगवान होंगे तो हमारी भी रक्षा होगी और भारत की भी।
"यतः कृष्णस्ततो धर्मो, यतो धर्मस्ततो जयः॥" जहाँ भगवान श्रीकृष्ण हैं, वहाँ धर्म है। जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।
"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥"
जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन है वहीं पर श्री, विजय, विभूति और ध्रुव नीति है, ऐसा मेरा मत है॥
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सत्य-सनातन-धर्म की और परमात्मा की सर्वाधिक अभिव्यक्ति भारत में हुई है। अतः भारत निश्चित रूप से विजयी होगा। हमारा काम सिर्फ अपने स्वधर्म का पालन करना है। बाकी काम भगवान करेंगे।
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्वमहाङ्‍कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥"
मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा, और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा॥
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हमारे से भगवान को सिर्फ सत्यनिष्ठा और प्रेम चाहिए, अन्य कुछ भी नहीं। अन्य सब तो उन्हीं का है। प्रेम तभी होगा जब सत्यनिष्ठा होगी।
भारत माँ अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर बिराजमान होंगी। असत्य और अंधकार की शक्तियों का पराभव होगा। हर ओर परमात्मा की चेतना व्याप्त होगी।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ दिसंबर २०२१