Thursday, 2 August 2018

आध्यात्मिक रूप से अपनी वाणी को तेजस्वी बनाने के लिए तीन नियम .....

आध्यात्मिक रूप से अपनी वाणी को तेजस्वी बनाने के लिए तीन नियम .....
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(१) समाज में जहाँ कहीं भी जाएँ, नाप-तोल कर कम से कम और सिर्फ आवश्यक, त्रुटिहीन व स्पष्ट शब्दों का ही प्रयोग पूरे आत्मविश्वास से करें| गपशप न करें, गपशप हमारे शब्दों को प्रभावहीन बनाती है|
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(२) आत्मनिंदा, आत्मप्रशंसा और परनिंदा से बचें| किसी की अनावश्यक प्रशंसा भी न करें| दूसरों द्वारा की गयी प्रशंसा और निंदा की ओर ध्यान न दें| किसी की भी बातों से व्यक्तिगत रूप से आहत न हों, और आल्हादित भी न हों|
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(३) परमात्मा की चेतना से बात करें| कुछ भी बोलते समय हमारी आतंरिक चेतना कूटस्थ में हो| अपनी बात को पूरे आत्मविश्वास से प्रस्तुत करें| बोलते समय यह भाव रखें कि स्वयं भगवान हमारी वाणी से बोल रहे हैं|
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उपरोक्त तीनों नियमों का ध्यान रहेगा तो लोग हमारी बात सुनेंगे, उस को याद रखेंगे और उस से प्रभावित भी होंगे|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ जुलाई २०१८

भोजन ..... एक प्रत्यक्ष वास्तविक यज्ञ और ब्रह्मकर्म है ....

भोजन ..... एक प्रत्यक्ष वास्तविक यज्ञ और ब्रह्मकर्म है ......
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हम जो भोजन करते हैं, वास्तव में वह भोजन हम स्वयं नहीं करते, बल्कि भगवान स्वयं ही प्रत्यक्ष रूप से हमारे माध्यम से करते हैं| 
भोजन इसी भाव से करना चाहिए कि भोजन का हर ग्रास हवि रूप ब्रह्म है जो वैश्वानर रूपी ब्रह्माग्नि को अर्पित है| भोजन कराने वाले भी ब्रह्म हैं और करने वाले भी ब्रह्म ही हैं| सब प्राणियों की देह में वैश्वानर अग्नि के रूप में, प्राण और अपान के साथ मिलकर चार विधियों से अन्न (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य) ग्रहण कर वे ही पचाते हैं|
अतः भोजन स्वयं की क्षुधा की शांति और इन्द्रियों की तृप्ति के लिए नहीं, बल्कि एक ब्रह्मयज्ञ रूपी ब्रह्मकर्म के लिए है| यज्ञ में एक यजमान की तरह हम साक्षिमात्र हैं| कर्ता और भोक्ता तो भगवान स्वयं ही हैं| गीता में भगवान ने इसे बहुत अच्छी तरह समझाया है|
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ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् | ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ||४:२४||
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अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः| प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ||१५:१४||
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>>> गहरे ध्यान में मेरुदंड में एक शीत और ऊष्ण प्रवाह की अनुभूति सभी साधकों को होती है जो ऊपर नीचे बहते रहते हैं, वे ही सोम और अग्नि है, वे ही प्राण और अपान है जिनके समायोजन की प्रक्रिया से प्रकट यज्ञाग्नि वैश्वानर है| भोजन हम नहीं बल्कि वैश्वानर के रूप में भगवान स्वयं करते हैं जिससे समस्त सृष्टि का पालन-पोषण होता है| जो भगवान को प्रिय है वही उन्हें खिलाना चाहिए| कर्ताभाव शनेः शनेः तिरोहित हो जाना चाहिए|
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जैसा मैनें अनुभूत किया और अपनी सीमित व अल्प बुद्धि से समझा वैसा ही मेरे माध्यम से यह लिखा गया| यदि कोई कमी या भूल है तो वह मेरी सीमित और अल्प समझ की ही है| कोई आवश्यक नहीं है कि सभी को ऐसा ही समझ में आये| किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए भगवान से क्षमा याचना करता हूँ|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२३ जुलाई २०१७
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पुनश्चः :--- भगवान कहते हैं .....
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति| तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ||९:२६||
अर्थात् जो भक्त मुझे पत्र, पुष्प, फल, और जल आदि कुछ भी वस्तु भक्तिपूर्वक देता है, उस प्रयतात्मा ... शुद्धबुद्धि भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक अर्पण किये हुए वे पत्र पुष्पादि मैं ( स्वयं ) खाता हूँ अर्थात् ग्रहण करता हूँ||

अनन्य भक्ति सबसे बड़ी साधना है. हमें अनन्य भक्ति प्राप्त हो ...

अनन्य भक्ति सबसे बड़ी साधना है. हमें अनन्य भक्ति प्राप्त हो ...
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भगवान कहते हैं .....
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते | तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ||९:२२||
अर्थात् जो अनन्य भाव से युक्त हो कर परम देव मुझ नारायण को आत्म रूप से जानते हुए मेरा निरन्तर चिन्तन करते हुए मेरी श्रेष्ठ निष्काम उपासना करते हैं, निरन्तर मुझमें ही स्थित उन का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ|
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यहाँ अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति का नाम "योग" है, और प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम "क्षेम" है| ये दोनों काम भगवान ही करते हैं| योगक्षेम की व्याकुलता सभी में होती है| हमें वह व्याकुलता भगवान को ही सौंप देनी चाहिए| हमारे अवलंबन भगवान ही हों|
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अनन्य भक्ति और अव्यभिचारिणी भक्ति एक ही हैं| भगवान कहते हैं ....
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी | विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ||१३:११||
अर्थात मुझ ईश्वरमें अनन्य योग (एकत्व रूप) अव्यभिचारिणी भक्ति है| (भगवान् वासुदेव से परे अन्य कोई भी नहीं है, अतः वे ही हमारी परमगति हैं. इस प्रकार की जो निश्चित अविचल बुद्धि है वही अनन्य योग है| उससे युक्त होकर भजन करना ही कभी विचलित न होने वाली अव्यभिचारिणी भक्ति है).
विविक्तदेशसेवित्व अर्थात् एकान्त पवित्र देश सेवन का स्वभाव, और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना, इसमें सहायक है|
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अनन्य योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति का होना, एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव होना और विषयासक्त जन समुदाय में प्रीति न होना…. इस प्रकार की जिसकी भक्ति होती है, ऐसा साधक आध्यात्म ज्ञान में नित्य रमण करता है|
परमात्मा को सर्वत्र देखना ज्ञान है, और इस से विपरीत जो है, वह अज्ञान है|
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भगवान आचार्य शंकर के अनुसार .....
गलिते देहाध्यासे विज्ञाते परमात्मनि| यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः||
अर्थात् जब देहाध्यास गलित हो जाता है, परमात्मा का ज्ञान हो जाता है| तब जहाँ जहाँ मन जाता है, वहाँ वहाँ समाधि का अनुभव होता है|
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जीवन का हर कार्य, हर क्षण, परमात्मा की प्रसन्नता के लिए हो|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ जुलाई २०१८

तमसो मा ज्योतिर्गमय .....

तमसो मा ज्योतिर्गमय .....
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सत्य ही नारायण हैं, वे ही अमृत हैं, और वे ही हमें ज्योतिर्मय बना सकते हैं| हमारी हर साधना का लक्ष्य है ...... असत्य से सत्य की ओर गमन| बिना किसी पूर्वाग्रह के जहाँ भी हमें लगे कि असत्य और अन्धकार हमारे साथ है, तो विष की तरह उनका साथ छोड़ देना चाहिए| मेरी यह बात अधिकाँश लोगों को बुरी लगती है, पर यह उनकी समस्या है, मेरी नहीं| हर समाज में अधिकांश लोगों का यही मानना है कि असत्य यानी झूठ-कपट के बिना संसार का काम नहीं चल सकता| धर्म और आध्यात्म की बड़ी बड़ी बातें करने वाले सज्जन लोग भी दो पैसे के लाभ के लिए सत्य का साथ छोड़ देते हैं| उनको नहीं पता कि असत्य और अन्धकार ही मृत्यु है| असत्य से प्राप्त होने वाला लाभ यहीं रह जाएगा, पर जो सदा सत्य हैं वे भगवान सत्य नारायण ही हमारे साथ शाश्वत रूप से रहेंगे| 
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वेदों के ऋषि प्रार्थना करते हैं ..... "ॐ असतोमासद्गमय | तमसोमाज्योतिर्गमय | मृत्योर्मामृतंगमय | ॐ शान्ति शान्ति शान्तिः||" (बृहदारण्यकोपनिषद् १:३:२८)
इसी उपनिषद् के आरम्भ और अंत में पूर्णता के लिए भी प्रार्थना है .....
"पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते | पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ||"
सत्य ही पूर्णता है, यही परमात्मा का सर्वोपरी गुण है|
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सत्य की खोज ही अन्धकार से प्रकाश की ओर जाने की यात्रा है| इसका आरम्भ कहाँ से हो? इस यात्रा का आरम्भ वही कर सकता है जिसके हृदय में भगवान के प्रति भक्ति और उन्हें पाने की अभीप्सा हो| अन्य लोगों के लिए यह मार्ग नहीं है| अन्य लोग धीरे धीरे अनेक कष्ट पाकर कुछ जन्मों के बाद इस मार्ग पर आ ही जायेंगे| 
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जहाँ भक्ति और अभीप्सा होगी, वहीं मार्ग भी प्रकट होगा| अतः मैं साधना मार्गों की चर्चा करना यहाँ अनावश्यक समझता हूँ| जो साधक हैं, उन्हें तो मार्ग मिला ही हुआ है और जो निष्ठावान मुमुक्षु हैं उन्हें मार्ग भगवान स्वयं सदगुरु के रूप में दिखाते हैं| जो भगवान को ठगना चाहते हैं उन्हें ठगगुरु मिल जाते हैं| यही चलता आया है और यही चलता रहेगा| 
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निज स्वभाववश कुछ चर्चा यहाँ करने को बाध्य हूँ| जहाँ तक मैं समझता हूँ, सनातन हिन्दू धर्म के सभी सम्प्रदायों में "अजपा-जप" साधना की परंपरा है| यह बहुत ही प्रभावशाली साधना है जिसे प्रत्येक साधक को आरम्भ में सीखना और उसका नियमित अभ्यास करना चाहिए| किसी भी साधना की उपयोगिता उसके अभ्यास में है, न कि सिर्फ बौद्धिक संतुष्टि में| इसका अभ्यास करते करते हमारी सूक्ष्म देह में सुषुम्ना जागृत हो जाती है, और धीरे धीरे कुण्डलिनी महाशक्ति भी जागृत होने लगती है| फिर हमें भगवान का ध्यान करना चाहिए, जिसकी विधि भगवान स्वयं हमें गुरुरूप में बताते हैं| यह अजपाजप की विधि वैदिक् है जिसका वर्णन कठोपनिषद में है|
"हँसः शुचिषद्वसुरान्तरिक्षसद्-
होता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् ।
नृषद्वरसदृतसद्व्योमसद्
अब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ||कठोपनिषद २:२:२||
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असत्य से सत्य, अन्धकार से प्रकाश और मृत्यु से अमरता की ओर की यात्रा सनातन धर्म है| यही सृष्टि की प्रक्रिया है| तंत्र की भाषा में हमारी चेतना का निम्नतम बिंदु मूलाधार चक्र है, और उच्चतम बिंदु सहस्त्रार है| हमें अपनी चेतना को मूलाधार चक्र से बार बार उठाते हुए सहस्त्रार तक ले जाना होगा| यह क्रियायोग है| यह उच्चतम साधना इस देह रूपी साधन से हो सकती है| इसके बाद की देहातीत साधनाएँ सिद्धों की हैं|
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तंत्र की भाषा में कहते हैं कि मेरुदंड के मध्य में एक सुषुम्ना नाड़ी है जिसके नीचे ही नीचे मूलाधार चक्र है जहाँ कुण्डलिनी महाशक्ति सो रही है| सिद्ध गुरु की आज्ञा से, गुरुप्रदत्त विधि से इसे जागृत कर क्रमशः छओं चक्रों को भेदते हुए इसे सहस्त्रार तक ले जाते हैं, जहाँ परमशिव से मिलकर अमृतपान होता है| उससे तृप्त होकर कुण्डलिनी बापस लौट आती है| इस प्रक्रिया को बार बार दोहराना पड़ता है| 
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तंत्रराज तंत्र कहता है .....
"पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा यावत् पतति भूतले | उत्थाय च पुनः पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ||"
यह तंत्र की भाषा है, कोई शराब पीना नहीं है| यह तो कुण्डलिनी महाशक्ति और परमात्मा परमशिव का मिलन और अमृतपान है|
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भगवान आचार्य शंकर ने भी "सौंदर्य लहरी" ग्रन्थ में लिखा है .....
"महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं, 
स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदिमरुतमाकाशमुपरि |
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्वा कुलपथं,
सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसि ||९||
भगवान आचार्य शंकर का ग्रन्थ "सौंदर्य लहरी" तंत्र के सर्वश्रेष्ठ ग्रंथों में से है| 
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इस विद्या के बारे में स्कन्दपुराण में भी लिखा है| यह पूरी विद्या कठोपनिषद में है जो एक श्रौत्रीय ब्रह्मनिष्ठ सिद्ध आचार्य के चरणों में बैठकर ही सीखी जा सकती है|
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परमेश्वर की महिमा कोई नहीं बता सकता क्योंकि सब कुछ उसी से महिमान्वित है| (कठ) श्रुति भगवती कहती हैं .....
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं, नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः |
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं, तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ||"
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हम भगवान को सिर्फ अपना प्रेम ही दे सकते हैं, अन्य कुछ भी नहीं| बाकी सब कुछ तो उसी का है| अपने हृदय का सम्पूर्ण प्रेम परमात्मा को दें|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर 
२२ जुलाई २०१८

गुरु चरणों का ध्यान :----

गुरु चरणों का ध्यान :----
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जैसे जैसे गुरु पूर्णिमा का दिन समीप आता जा रहा है, गुरुचरणों में ध्यान करने की प्रेरणा अधिक से अधिक होती जा रही है| इस तरह की प्रेरणा या विचार जब भी प्रभुकृपा से प्राप्त हो तो उसे तृप्त अवश्य कर लेना चाहिए| आध्यात्म मार्ग के पथिक को गीता में सभी जिज्ञासाओं का समाधान मिल जाता है, वह भी इतना स्पष्ट कि कण मात्र भी संदेह नहीं रहता| मनुष्य की जैसी चेतना होती है वैसी ही प्रेरणा उसे मिलती रहती है|
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उससे पूर्व यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि गुरु कौन है, गुरु सेवा क्या है और गुरु के चरण क्या हैं| आरम्भ मैं एक सामाजिक संस्था से करता हूँ, फिर आध्यात्म पर आऊँगा| भारत में रा.स्व.से.संघ सबसे बड़ी सामाजिक संस्था है| राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में परम पवित्र भगवा ध्वज को ही गुरु माना गया है, किसी मनुष्य को नहीं| उनके स्वयंसेवक सारी प्रेरणा भगवा ध्वज से ही लेते हैं| उनके लिए संघकार्य ही गुरुसेवा, राष्ट्रधर्म और राष्ट्र की आराधना है| संघ की प्रार्थना और एकात्मता स्तोत्र का पाठ स्वयंसेवकों द्वारा नित्य नियमित होता है| यह एक विशुद्ध सामाजिक कार्य है, इस से एक संतुष्टि तो मिलती है पर आध्यात्मिक अभीप्सा की तृप्ति नहीं होती|
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अब निज जीवन की बात करता हूँ| किशोरावस्था में घर पर ही रामायण और महाभारत का अध्ययन कर लिया था पर उस आयु में जैसी समझ होती है वैसा ही समझ में आया| उन्हीं दिनों एक बार रमण महर्षि की जीवनी कहीं से पढने को मिली, उस से सुप्त आध्यामिकता और बौद्धिक भूख जागृत हो उठी| उस बौद्धिक भूख को तृप्त करने के लिए सम्पूर्ण विवेकानंद साहित्य का अध्ययन दो बार किया| उस से बौद्धिक भूख तो तृप्त हुई पर ह्रदय में जल रही अभीप्सा की अग्नि कभी शांत नहीं हुई| जो भी आध्यात्मिक साहित्य कहीं से भी उपलब्ध हो जाता उसका अध्ययन करता और किसी भी संत-महात्मा के बारे में पता चलता तो उनसे जाकर मिलता| पर वह अभीप्सा दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जाती थी, कभी तृप्त नहीं हुई| पूरे भारत के ब्राह्मण परिवारों में गायत्री मन्त्र की साधना सबसे सामान्य बात है| भारत के प्रायः सभी ब्राह्मण गायत्री मंत्र का जाप करते हैं| पारिवारिक संस्कारों के कारण वह ही एकमात्र साधना थी| अन्य कुछ समझ में ही नहीं आता था| धीरे धीरे ईश्वर की कृपा से जीवन में सत्संग लाभ भी हुआ, बहुत ही अच्छे अच्छे संत-महात्माओं से भी मिलना हुआ और मार्गदर्शन व गुरु लाभ भी मिला| ध्यान और क्रियायोग के अभ्यास व निजानुभूतियों से हृदय में जगी हुई अभीप्सा भी तृप्त हुई| वेदान्त का भी निज अनुभूतियों और गुरु कृपा से बोध हुआ| पर यह तो यात्रा का आरम्भ मात्र है| दूसरी या तीसरी कक्षा का ही विद्यार्थी हूँ, अभी तो बहुत पढाई करनी है|
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ध्यान की गहराई में कूटस्थ चैतन्य की अनुभूतियों से ही यह समझ में आया कि कूटस्थ ही गुरु है, सहस्त्रार ही गुरु चरण हैं, और सहस्त्रार में ध्यान ही गुरु चरणों का ध्यान है| सहस्त्रार से परे अनंत आकाश के विस्तार की अनुभूतियों से समझ में आता है कि हम यह देह नहीं, ईश्वर की अनंतता हैं| ईश्वर की अनंतता में ही परमशिव की अवधारणा समझ में आती है, उससे पूर्व नहीं|
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आध्यात्म मार्ग पर चलने के लिए सबसे आवश्यक है .... "अभीप्सा", "भक्ति" और "आत्म संयम"| फिर आगे के सारे द्वार अपने आप ही खुल जाते हैं| गीता का छठा अध्याय ही आत्म-संयम योग है| उसका स्वाध्याय साधकों के लिए अनिवार्य ही समझ लीजिये| 
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इस समय अन्य कुछ भी लिखने की प्रेरणा नहीं मिल रही है| सामने गुरु महाराज के चरण कमलों के अतिरिक्त अन्य कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है| अगले कुछ दिनों तक गुरु चरणों का ही ध्यान करना है और कुछ भी नहीं| इस मंच पर यही कहना चाहता हूँ कि पूरी भक्ति से गुरु चरणों का ही ध्यान करो, आगे के सारे द्वार अपने आप ही खुल जायेंगे|
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सभी को नमन ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ जुलाई २०१८

वर्तमान विषम युग में गीता के अध्ययन और अध्यापन की आवश्यकता .....

वर्तमान विषम युग में गीता के अध्ययन और अध्यापन की आवश्यकता .....
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आजकल दुराचार और हिंसा का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ रहा है| इसका कारण धर्मशिक्षा का अभाव है| बाहरी वातावरण से हम भी अछूते नहीं है| गीता का स्वाध्याय, तदनुसार आचरण और भगवान का ध्यान ही हमें सब प्रकार के विकारों से बचा सकता है| मुझे तो हमारे आचरण में परिलक्षित सब प्रकार के विकारों का उपचार गीता में ही दिखाई देता है| 
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गीता के १७ वें अध्याय में भगवान ने हर मनुष्य के स्वभाव के अनुसार आहार, यज्ञ, तप और दान के बारे में बताया है| गीता के इस अध्याय का स्वाध्याय और उसके अनुसार आचरण निश्चित रूप से हमें अनेक बुराइयों से बचाएगा, ऐसा मेरा विश्वास है| साथ साथ ध्यान भी करना होगा|
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विद्यालयों में बाल्यकाल से ही विद्यार्थियों को गीता पढ़ानी चाहिए और ध्यान साधना सिखानी चाहिए| इस अधर्मसापेक्ष (धर्मनिरपेक्ष) व्यवस्था में हिन्दू अपने विद्यालयों में अपने बच्चों को संविधान की धारा ३०(१) के कारण धर्म की शिक्षा भी नहीं दे सकता| मुसलमान और ईसाई अपने बच्चों को कुरआन और बाइबल पढ़ा सकता है पर हिन्दू गीता नहीं पढ़ा सकता| मदरसों और कोंवेंटों को मान्यता प्राप्त है पर गुरुकुलों को नहीं| धर्मशिक्षा के अभाव के कारण ही हमारे बच्चे अधर्मी हो रहे हैं| भविष्य में कभी भगवान की कृपा होगी तभी हिन्दुओं में चेतना आयेगी और वे अपने विरुद्ध हो रहे अन्याय का प्रतिकार कर पायेंगे| अभी तक तो स्थिति निराशाजनक ही है|
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मेरा सुझाव है कि हम अपनी निजी क्षमता में गीता का अध्ययन स्वयं करें और अपने बच्चों को भी करायें| स्वयं भी भगवान का ध्यान करें और अपने बच्चों को भी सिखायें| सिर्फ बातों से काम नहीं होगा| अनवरत प्रयास करना होगा|
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सभी को शुभ कामनाएँ और नमन! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृप शंकर
२० जुलाई २०१८

Wednesday, 18 July 2018

"अभ्यास" और "वैराग्य" का महत्त्व :---

"अभ्यास" और "वैराग्य" का महत्त्व :---
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अभ्यास और वैराग्य की उपेक्षा न करें, अन्यथा यह जीवन यों ही व्यर्थ में बीत जाएगा| यह मैं अपने निज अनुभव से कह रहा हूँ| प्रमाद और दीर्घसूत्रता हमारे सबसे बड़े शत्रु हैं जिनके आगे हम असहाय हो जाते हैं| महिषासुर हमारे अंतर में प्रमाद और दीर्घसूत्रता के रूप में अभी भी जीवित है, बाकी अन्य सारे शत्रु (राग-द्वेष रूपी काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर्य) इसके पीछे पीछे चलते हैं| यह प्रमाद रूपी महिषासुर ही हमारी मृत्यु है| निरंतर प्रभु से प्रेम और उनके प्रेमरूप पर अनवरत ध्यान के अभ्यास और विषयों से वैराग्य द्वारा ही हम इन शत्रुओं पर विजय पा सकते हैं|
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मैंने अपना सारा जीवन कामनाओं की पूर्ती के लिए उनके पीछे भाग भाग कर नष्ट किया है| इससे मुझे कुछ भी नहीं मिला| मैं नहीं चाहता कि और भी कोई अपना जीवन इस तरह नष्ट करे| हो सकता है कि यह मेरा प्रारब्ध ही था|
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भगवान गीता में कहते हैं .....
"असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं| अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते||६:३५||"
अर्थात् हे महबाहो निसन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है परन्तु हे कुन्तीपुत्र उसे अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में किया जा सकता है|
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यहाँ अभ्यास का अर्थ है .... अपनी चित्तभूमि में एक समान वृत्ति की बारंबार आवृत्ति| वैराग्य का अर्थ है दृष्ट व अदृष्ट प्रिय भोगों में बारंबार दोषदर्शन और उन से विरक्ति|
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योगदर्शन में भी सूत्र है ..."अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः||१:१२||
इसके व्यास भाष्य में कहा गया है ....
"चित्तनदी नामोभयतोवाहिनी वहति कल्याणाय वहति पापाय च| या तु कैवल्यप्राग्भारा विवेकविषयनिम्ना सा कल्याणवहा| संसारप्राग्भाराऽविवेकविषयनिम्ना पापवहा| तत्र वैराग्येण विषयस्रोतः खिली क्रियते। विवेकदर्शनाभ्यासेन विवेकस्रोत उद्घाट्यत इत्युभयाधीनश्चित्तवृत्तिनिरोधः||"
अर्थात् .....
चित्तनदी नाम उभयतो वाहिनी, वहति कल्याणाय वहति पापाय च (चित्तरूपी नदी दो दिशाओं में प्रवाहित होती है, कल्याण के लिए बहती है और पाप के लिए भी बहती है)|
कैवल्यप्राग्भारा विवेकविषयनिम्ना सा चित्तनदी कल्याणाय वहति (कैवल्य की ओर ले जाने वाली विवेकयुक्त वह चित्तनदी की धारा कल्याण के लिए बहती है)|
संसारप्राग्भारा अविवेकविषयनिम्ना सा पापाय वहति (संसार की ओर ले जानेवाली अविवेक से युक्त वह पाप के लिए बहती है (अवनति की ओर ले जाती है)।
सर्वार्थसिद्धये सर्वभूतानाम् आत्मनश्च सुखावहम् आचरणं कुर्यात् (सकल प्रयोजनों की सिद्धि के लिए समस्त प्राणियों के लिए तथा अपने लिए जो सुखदायक आचरण है, उसे करना चाहिए)|
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हमारा चित्त "उभयतो वाहिनी नदी" यानि परस्पर दो विपरीत दिशाओं में प्रवाहित होने वाली अद्भुत नदी की तरह है| हमें किस और बहना है .... उस का अभ्यास वैराग्य के साथ साथ करें|
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हमारे चित्त में तमोगुण की प्रबलता होने पर निद्रा, आलस्य, निरुत्साह, प्रमाद आदि मूढ़ अवस्था के दोष उत्पन्न हो जाते हैं|
रजोगुण की प्रबलता होने पर चित्त विक्षिप्त अर्थात् चञ्चल हो जाता है|
इन दोनों प्रकार की बाधक वृत्तियों के प्रशमन के लिये अभ्यास तथा वैराग्य सर्वोत्तम साधन हैं| अभ्यास से तमोगुण की निवृत्ति और वैराग्य से रजोगुण की निवृत्ति होती है| वैराग्य से चित्त का बहिर्मुख प्रवाह रोका जाता है, व अभ्यास से आत्मोन्मुख प्रवाह स्थिर किया जा सकता है|
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आप सभी को सादर सप्रेम नमन ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ जुलाई २०१८