Friday, 23 March 2018

शुभ वेलेंटाइन दिवस .....

१४ फरवरी को वेलेंटाइन दिवस मनाने वाले इसे अवश्य पढ़ें ------
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वेलेंटाइन दिवस शुभ हो !!!!! सर्व प्रथम तो यह दिवस मनाने वालों के लिए शुभ कामना प्रकट करता हूँ कि भगवान आपको सद्बुद्धि दे|


यहाँ मैं वेलेंटाइन की जीवन गाथा बताता हूँ -------
ईसा की चौथी शताब्दी में वैलेंटाइन नाम के एक आदमी का जन्म हुआ जो बाद में एक पादरी बना| उस समय यूरोप के लोग कुत्तों आदि जानवरों की तरह यौन सम्बन्ध रखते थे| कहीं कोई नैतिकता नहीं थी| इन महाशय ने लोगों को सिखाना शुरू किया कि यह अच्छी बात नहीं है, और एक प्रेमी या प्रेमिका चुन कर सिर्फ उसी से प्यार को और उसी से शारीरिक संबंध बनाओ, विवाह करो आदि| रोम में घूम घूम कर वे लोगों को प्रेमी/प्रेमिका चुनने और विवाह करने का उपदेश देते थे| उन्होंने प्रेमी प्रेमिकाओं का विवाह कराना शुरू कर दिया जिससे वहाँ के लोग नाराज़ हो गए क्योंकि वहाँ के समाज में बिना विवाह के रखैलें रखना शान समझी जाती थीं और स्त्री का स्थान मात्र एक भोग की वस्तु था|

रोम के राजा क्लोडियस ने उन सब जोड़ों को एकत्र किया जिनका विवाह वेलेंटाइन ने कराया था और १४ फरवरी ४९८ ई. को उसे सबके सामने खुले मैदान में फाँसी दे दी| उसका अपराध था कि वे बच्चों के विवाह करवाते हैं| उस वैलेंटाइन की दुखद याद में 14 फ़रवरी को वहाँ के प्रेमी प्रेमिकाओं ने वैलेंटाइन डे मनाना शुरू किया तो उस दिन से यूरोप में वैलेंटाइन डे मनाया जाता है|
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भारत में लड़के-लड़िकयां बिना सोचे-समझे एक दुसरे को वैलेंटाइन डे का कार्ड दे रहे हैं | और जो कार्ड होता है उसमे लिखा होता है " Would You Be My Valentine" जिसका मतलब होता है "क्या आप मुझसे शादी करेंगे"|
मतलब तो किसी को मालूम होता नहीं है, वो समझते हैं कि जिससे हम प्यार करते हैं उन्हें ये कार्ड देना चाहिए तो वो इसी कार्ड को अपने माँ-बाप और दादा-दादी को भी दे देते हैं| एक दो नहीं दस-बीस लोगों को ये ही कार्ड वो दे देते हैं|
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इस धंधे में बड़ी-बड़ी कंपनियाँ लग गयी हैं जिनको कार्ड बेचना है, जिनको गिफ्ट बेचना है, जिनको चाकलेट बेचनी हैं और टेलीविजन चैनल वालों ने इसका धुआधार प्रचार कर दिया है|
अरे प्यारे बच्चो कुछ नकल में भी अकल रखो|

इससे अच्छा तो है कि इस दिन को मातृ-पितृ पूजा दिवस के रूप में ही मनाओ|
प्रेम ही करना ही तो भगवान से करो| भारत में बड़े बड़े प्रभुप्रेमी हुए हैं, उन्हें याद करो| धन्यवाद|

पुनश्चः: शुभ वेलेंटाइन दिवस !!!!!
कृपा शंकर
१४ फरवरी २०१४

समर्पण .....

सूर्य, चन्द्र और तारों को चमकने के लिए क्या साधना करनी पडती है?
पुष्प को महकने के लिए कौन सी तपस्या करनी पडती है?
महासागर को गीला होने के लिए कौन सा तप करना पड़ता है?

पुष्प को महकने के लिए कौन सी तपस्या करनी पडती है?
महासागर को गीला होने के लिए कौन सा तप करना पड़ता है?

शांत होकर प्रभु को अपने भीतर बहने दो|
उन की उपस्थिति के सूर्य को अपने भीतर चमकने दो|
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जब उन की उपस्थिति के प्रकाश से ह्रदय पुष्प की भक्ति रूपी पंखुड़ियाँ खिलेंगी तो उन की महक अपने ह्रदय से सर्वत्र फ़ैल जायेगी|
हे प्रभु, ना मैं रहूँ, ना मेरी कोई वासना रहे, बस तूँ रहे और एकमात्र तेरा ही अस्तित्व रहे|
जल की यह बूँद तेरे महासागर में समर्पित है जो तेरे साथ एक है, अब फिर कोई भेद ना रहे|
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दादू धरती क्या साधन किया, अंबर कौन अभ्यास ?
रवि शशि किस आरंभ तैं ? अमर भये निज दास  ||
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ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ मार्च २०१४

एक श्रौत्रीय ब्रह्मनिष्ठ आचार्य ही गुरु हो सकता है .....

एक श्रौत्रीय ब्रह्मनिष्ठ आचार्य ही गुरु हो सकता है .....
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हब सब सांसारिक मोह से ग्रस्त हैं, यही हमारे बंधनों का कारण है| इस मोह से कितना भी संघर्ष करो पर पराजय ही हाथ लगेगी| इस मोह से मुक्ति हमें परमात्मा की कृपा ही बचा सकती है| परमात्मा एक सदगुरु के रूप में हमारा मार्गदर्शन करते हैं|

श्रुति भगवती कहती है कि गुरु वही हो सकता है जो श्रौत्रीय हो यानि जिसे श्रुतियों का ज्ञान हो, और जो ब्रह्मनिष्ठ हो|
परीक्ष्य लोकान्‌ कर्मचितान्‌ ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन |
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्‌ समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्‌ ||
(मुण्डक. १:२:१२)

ऐसे गुरु ही हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं| ऐसे गुरु किसी न किसी परम्परा से जुड़े होते हैं| हमें मार्गदर्शन उन्हीं से लेना चाहिए|

Thursday, 22 March 2018

मगन भया मन मेरा .....

मगन भया मन मेरा .....
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भगवान श्री कृष्ण की बांसुरी की ध्वनी से मधुर और कुछ भी नहीं है| यह निरंतर हर मनुष्य में बज रही है| बस सुनने वाला प्रेमी चाहिए| जिस धरातल पर यह ध्वनी बजती है वह मनुष्य के भौतिक, प्राणिक और मानसिक चैतन्य से परे है| यह एक वास्तविकता है जिसकी महिमा में हमारे शास्त्र भरे पड़े हैं| सूक्ष्म देहस्थ मेरुदंड व मस्तिष्क में स्थित सुषुम्ना नाड़ी वह बांसुरी है जिसमें प्रभुजी निरंतर प्राण फूँक रहे हैं, जिसकी प्रतिक्रिया से साँसें चल रही हैं और ह्रदय धडक रहा है| सातों चक्र ही उस बांसुरी के छिद्र हैं| सहस्रार से तो साक्षात प्रभुजी स्वयं इस बांसुरी को बजाकर पूरी सृष्टि में प्राण भर रहे हैं| मानव देह में त्रिभंग मुद्रा में उन बिहारी जी की छवि अनुपम है| जीवन और मृत्यु का वहाँ कोई महत्व नहीं है| जहाँ वे हैं वहाँ अन्य कुछ भी नहीं हो सकता| वे ही सब कुछ हैं और सब कुछ उन्हीं में है|
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प्रणव ध्वनी उनकी बांसुरी की आवाज है| एक मधुमक्खी मधु चखने के पश्चात पुष्पों की गंध से और आकर्षित नहीं होती वैसे ही उस बांसुरी की ध्वनी सुनने के पश्चात वासनओं का आकर्षण क्षीण होने लगता है| उस ध्वनी को निरंतर सुनने का प्रयास हम करते रहें| प्रयास छोड़ने पर पतन ही पतन है|
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आगे का मार्ग प्रभुजी स्वयं दिखाते हैं, शर्त यही है कि हम उन से प्रेम करें| भगवान के पास सब कुछ है पर एक चीज का उनके पास भी निरंतर अभाव है जिसके लिए वे भी तरसते हैं, और वह है हमारा प्रेम| जिसने हमें सब कुछ दिया, क्या हम उन्हें अपना प्रेम नहीं दे सकते?

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सब का कल्याण हो| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ मार्च २०१४

जीवन में हम आनंदमय रहें, प्रेम ही आनंद का द्वार है .....

जीवन में हम आनंदमय रहें, प्रेम ही आनंद का द्वार है .....
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हम प्रसन्न रहें, प्रेममय रहें, प्रेम सब में बाँटें, यह हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है| जब हम जीवन की संपूर्णता व विराटता को त्याग कर लघुता को अपनाते हैं तो निश्चित रूप से विफल होते हैं| दूसरों का जीवन हम क्यों जीते हैं ? दूसरों के शब्दों के सहारे हम क्यों जीते हैं ? पुस्तकों और दूसरों के शब्दों में वह कभी नहीं मिलेगा जो हम ढूँढ रहे हैं क्योंकि अपने ह्रदय की पुस्तक में वह सब लिखा है| कुछ बनने की कामना से कुछ नहीं बनेंगे क्योंकि जो हम बनना चाहते हैं, वह तो हम पहले से ही हैं| कुछ पाने की खोज में भटकते रहेंगे, कुछ नहीं मिलेगा क्योंकि जो हम पाना चाहते हैं वह तो हम स्वयं ही हैं|
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भाई रे घर ही में घर पाया ।
सहज समाइ रह्यो ता मांही, सतगुरु खोज बताया ॥ टेक ॥
ता घर काज सबै फिर आया, आपै आप लखाया ।
खोल कपाट महल के दीन्हें, स्थिर सुस्थान दिखाया ॥ १ ॥
भय औ भेद भरम सब भागा, साच सोई मन लाया ।
पिंड परे जहाँ जिव जावै, ता में सहज समाया ॥ २ ॥
निश्चल सदा चलै नहिं कबहूँ , देख्या सब में सोई ।
ताही सौं मेरा मन लागा, और न दूजा कोई ॥ ३ ॥
आदि अनन्त सोई घर पाया, अब मन अनत न जाई ।
दादू एक रंगै रंग लागा, तामें रह्या समाई ॥ ४ ॥
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ मार्च २०१४

संसार में सुख की खोज मनुष्य के सब दुःखों का कारण है .....

संसार में सुख की खोज मनुष्य के सब दुःखों का कारण है .....
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मनुष्य संसार में सुख ढूंढ़ता है पर निराशा ही हाथ लगती है| यह निराशा और सुख की अपेक्षा सदा दुःखदायी है| परमात्मा से बिना किसी शर्त से किये गए प्रेम में ही आनंद है| परमात्मा से प्रेम ही आनंददायी है| उस आनंद की एक झलक पाने के पश्चात ही संसार की असारता का बोध होता है| हमारी सबसे बड़ी सम्पत्ति भगवान के श्री-चरणों में आश्रय पाना है|
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जो योग-मार्ग के पथिक हैं उनके लिए सहस्त्रार ही गुरुचरण है| आज्ञाचक्र का भेदन और सहस्त्रार में स्थिति बिना गुरुकृपा के नहीं होती| जब चेतना उत्तर-सुषुम्ना यानि आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य विचरण करने लगे तब समझ लेना चाहिए कि गुरु महाराज की परम कृपा हो रही है| जब स्वाभाविक और सहज रूप से सहस्त्रार में व उससे ऊपर की ज्योतिर्मय विराटता में ध्यान होने लगे तब समझ लेना चाहिए कि श्रीगुरुचरणों में अर्थात प्रभुचरणों में आश्रय प्राप्त हो गया है| तब भूल से भी पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए| एक योगी की चेतना वैसे भी अनाहत चक्र से ऊपर ही रहती है| एकमात्र मार्ग है .... परम प्रेम, परम प्रेम और परम प्रेम | इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है| भगवान से खूब प्रेम करो, प्रेम करो और खूब प्रेम करो|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ मार्च २०१४

इस राष्ट्र के और भी अच्छे दिन अवश्य ही आयेंगे ......

इस राष्ट्र के और भी अच्छे दिन अवश्य ही आयेंगे ......
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इस राष्ट्र के और भी अच्छे दिन तभी आयेंगे जब इस राष्ट्र में सब चरित्रवान होंगे, कोई चोर, डाकू, ठग और नशेड़ी नहीं होगा व यह राष्ट्र इतना सशक्त होगा कि किसी का साहस ही नहीं होगा इसकी ओर आँख उठाकर देखने का| जब यहाँ कोई डरपोक, दब्बू और कायर नहीं होगा, कहीं भी असत्य और अन्धकार नहीं होगा वे ही भारतवर्ष के अच्छे दिन होंगे| जब सब के ह्रदय में परम प्रेम होगा, जीवन में तपश्चर्या और चेतना में पूर्ण समर्पण होगा, तभी मानूंगा कि अच्छे दिन आ रहे हैं| वे दिन भी कभी न कभी अवश्य आयेंगे जब ह्रदय में न कोई वासना होगी, न कोई कामना और न कोई अपेक्षा|
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कहते हैं कि जीवन शाश्वत है जहाँ कोई मृत्यु नहीं है, आत्मा सिर्फ अपना आवरण बदलती है|
सभी अभीप्साएँ, कामनाएँ व वासनाएँ पूर्ण अवश्य होती हैं और सभी संकल्प व विचार निश्चित रूप से घनीभूत होकर फलीभूत होते हैं| जीवन के वे ही क्षण सार्थक होते हैं जो परमात्मा के चिंतन में व्यतीत होते हैं, बाकी तो सारा समय मरुभूमि में गिरे हुए जल की बूंदों की तरह निरर्थक होता है| व्यक्ति अपनी भूलों से बहुत कुछ सीखता है, पर जब तक वे समझ में आती है तब तक बहुत देरी हो चुकी होती है| जीवन अति अल्प है|
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सांसारिक उपलब्धियों से और इन्द्रीय सुखों से जीवन में सिर्फ अहंकार ही तृप्त होता है| इनमें कोई स्थायित्व नहीं है, ना ही इनसे कोई संतुष्टि मिलती है| यह संसार जीव को आनंद की लालसा देता है पर मात्र दुःख और पीड़ा ही देता है| लगता है इस संसार में मनुष्य यही पाठ सीखने बार बार जन्म लेता है| यही पाठ निरंतर सिखाया जा रहा है| कोई इसे शीघ्र सीख लेता है, कोई देरी से| जो इसे नहीं सीखता वह सीखने के लिए बाध्य कर दिया जाता है|
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सुख की खोज में पता नहीं मैंने भी कितने हाथ पैर मारे, कितना संघर्ष किया, कहाँ कहाँ देश विदेशों में भटका, कैसे कैसे लोगों के मध्य रहा, कितने सारे म्लेच्छ देशों में गया, विश्व भ्रमण किया, विश्व की परिक्रमा की, पता नहीं कैसे कैसे लोगों के हाथ का बनाया आहार ग्रहण किया, और कितनी हिमालय जितनी बड़ी अक्षम्य भूलें की? प्रकृति का सौम्य से सौम्य और विकराल से विकराल रूप भी देखा पर ह्रदय नहीं भरा, अभी भी अतृप्त है|
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ह्रदय में गहनतम अभीप्सा के साथ एक प्रचंड अग्नि जल रही है उस अवस्था को प्राप्त करने की जिसके बारे में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ----
"यं लब्ध्या चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः |
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ||"
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सब का जीवन सार्थक हो, धन्य हो, सब के ह्रदय में प्रभु के प्रति प्रेम भक्ति जागृत हो| सबके अच्छे दिन आयें| यही मेरी कामना है| आप सब में हृदयस्थ परमात्मा को प्रणाम !

ॐ तत्सत् || ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२३ मार्च २०१६