Tuesday, 7 February 2017

आप सब परमात्मा की अभिव्यक्तियाँ हैं .......

प्रिय निजात्मगण, आप सब में मुझे परमात्मा के दर्शन होते हैं| मेरे प्रिय प्रभु, मेरे इष्ट देव ही आप सब में व्यक्त हो रहे हैं| आप सब के देवत्व को मेरा नमन!
आप सब के ह्रदय में उस परम तत्व की अनुभूति हो जिसे प्राप्त करने के पश्चात इस सृष्टि में प्राप्त करने योग्य अन्य कुछ भी नहीं है|
आप सब तरह के नाम रूप के भेदों से ऊपर उठें, और सदा कूटस्थ चैतन्य अर्थात ब्राह्मी स्थिति में रहें|
आप स्वयं परम प्रेम हैं, परमशिव हैं, नारायण हैं, जगन्माता हैं| पुनश्चः आप सब को मेरा नमन|
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हमारे राष्ट्र की आत्मा है -- सनातन धर्म| सनातन धर्म ही भारत की पहिचान है|
सनातन धर्म का आधार है --- परमात्मा के प्रति अहैतुकी परम प्रेम और समर्पण| इसी से अभ्युदय और नि:श्रेयस की सिद्धि होती है|
यह जीवन एक पाठशाला है जहाँ एक ही पाठ निरंतर सिखाया जा रहा है| वह पाठ सब को सीखना ही पड़ेगा चाहे बाद में सीखो या अब| यदि नहीं भी सीखोगे तो सीखने के लिए बाध्य कर दिए जाओगे|
आप सब परमात्मा की अभिव्यक्तियाँ हो| आप सब को मेरा नमन| उसका पूर्ण अहैतुकी परम प्रेम भी आप सब को ही समर्पित है|
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | ॐ शिव शिव शिव शिव शिव | ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर

स्वामी लोकनाथ ब्रह्मचारी और उन्हें नर्मदा तट पर माँ गंगा के दर्शन .....

नर्मदा जयंती पर सभी श्रद्धालुओं को शुभ कामनाएँ.....
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स्वामी लोकनाथ ब्रह्मचारी और उन्हें नर्मदा तट पर माँ गंगा के दर्शन .....
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आज के युग में यह बात अविश्वसनीय सी लगती है पर यह पूर्ण सत्य है| भारत माँ ने हर युग में महान कालजयी संतों को जन्म दिया है| ऐसे ही एक महातपः सिद्ध ब्रह्मज्ञानी महात्मा थे बाबा लोकनाथ ब्रह्मचारी जिनका जन्म 31 अगस्त 1730 को कृष्ण जन्माष्टमी के दिन बंगाल के चौबीस परगना जिले के कचुआ गाँव में श्री रामनारायण घोषाल और श्रीमती कमला देवी के घर हुआ| उनका नाम रखा गया लोकनाथ घोषाल| उनके पारिवारिक गुरु भगवान गांगुली उन्हें यज्ञोपवीत संस्कार के पश्चात तपस्या कराने के लिए हिमालय क्षेत्र में ले गए| तपस्या पूर्ण होने के पश्चात श्री लोकनाथ घोषाल बाबा लोकनाथ ब्रह्मचारी के नाम से प्रसिद्द हुए| बाबा लोकनाथ ब्रह्मचारी ने 160 वर्ष की आयु में हिमालय में समाधी अवस्था में अपनी शिवदेह का त्याग किया और ब्रह्मलीन हो गये|
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ऐसे जीवनमुक्त शिवदेह प्राप्त महापुरुष ने अपने शिष्यों को बताया था कि एक बार नर्मदा की परिक्रमा करते समय वे नर्मदा तट पर मुंडमहारण्य में निर्जन गंगावाह घाट पर बैठे हुए थे कि एक विचित्र दृश्य देखा| एक काली गाय जिसका शरीर एकदम काला था आई और नर्मदा नदी में स्नान करने उतर गयी| जब वह नहाकर बाहर निकली तो उसका रंग बिलकुल गोरा हो गया और वह गाय बहुत तेजी से उस महारण्य में लुप्त हो गयी|
इसका रहस्य जानने के लिए वे समाधिस्थ हुए और उन्हें बोध हुआ कि वह काली गाय और कोई नहीं साक्षात माँ गंगा थीं जो नर्मदा में स्नान करने आई थीं|
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इसके बारे में एक पौराणिक कथा है जिसमें मार्कन्डेय मुनि कहते हैं कि माँ गंगा ने भगवान विष्णु की घोर तपस्या की और भगवान से निवेदन किया कि हर प्रकार के पापी लोग मुझमें स्नान कर पापमुक्त होते हैं उनके पापविष की ज्वाला में मैं झुलसती रहती हूँ, अतः इस पाप की जलन से मुक्त होने का कोई उपाय मुझे बताइये| भगवान विष्णु ने प्रतिदिन गंगाजी को नर्मदाजल में स्नान कर पापमुक्त होने को कहा|
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नर्मदा रुद्रतेज से उत्पन्न हुई भगवान शिव की मानस कन्या है| भारत की पवित्र नदियों के दो रूप हैं| एक तो उनका भौतिक जलरूप है, दूसरा उनकी सूक्ष्म रूप में एक दैवीय सत्ता है जिसका दर्शन ध्यान में ही होता है|
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इस लेख का उद्देष्य भारत भूमि की महिमा का बर्णन करना था जहाँ पवित्र मोक्षदा नदियाँ, अनेक तपोभूमियाँ, हिमालय और महान संतजन हैं| जय जननी, जय माँ ||
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ॐ नमः शिवाय | हर नर्मदे हर | ॐ ॐ ॐ ||

Friday, 3 February 2017

भगवान यहीं है, इसी समय हैं और सर्वदा हैं .....

प्रिय निजात्मगण, सप्रेम सादर नमन!
आप सब मेरी ही निजात्मा हो, आपका ह्रदय भी मेरा ही ह्रदय है| आप में और मुझ में कोई भेद नहीं है|
जब प्रभु साक्षात् हमारे समक्ष प्रकट हैं और हमारा समर्पण बिना किसी शर्त के स्वीकार कर रहे हैं तो उन्हीं में पूर्णतः समर्पित हो जाने के अतिरिक्त हमें और क्या चाहिए ? ........ कुछ भी नहीं|
यह जीवन धन्य और कृतार्थ हुआ|
सारी साधनाओं का, सारी भक्ति का और सारे शास्त्रों का सार है..... शरणागति द्वारा समर्पण| यही सनातन धर्म है|
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भगवान यहीं है, इसी समय हैं और सर्वदा हैं| वे ही हमारे ह्रदय में धड़क रहे हैं, फेफड़ों से सांस ले रहे हैं, आँखों से देख रहे हैं, कानों से सुन रहे हैं, पैरों से चल रहे हैं और दिमाग में सोच रहे हैं| वे निकटतम से भी निकट हैं| अब और कुछ भी नहीं चाहिए| सब कुछ तो मिल गया है| भगवान स्वयं ही चल कर आ गए हैं, अतः अब कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं है| जन्म से अब तक वे ही माता-पिता भाई-बहिन, सम्बन्धियों व शत्रु-मित्रों के रूप में आये और वे ही सर्वस्व हैं|
वे ही "मैं" बन गए हैं, यह "मैं", "मेरापन", "तूँ", और "तेरापन" सब कुछ वे ही हैं|
यह व्यष्टि भी वे हैं और समष्टि भी वे ही हैं|
कुछ भी अपने लिए नहीं बचाकर रखना है, सब कुछ उनको समर्पित है| वे ही वे हैं, मैं नहीं और मेरा कुछ भी नहीं है| ॐ ॐ ॐ ||
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | ॐ शिव शिव शिव शिव शिव | ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर

ध्यान साधना --- (भाग २)

ध्यान साधना --- (भाग २)
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कल मैंने भाग १ में ध्यान साधना के बारे में आरंभिक जानकारी दी थी और अजपा-जप के बारे में लिखा था| अनाहत नाद यानि ओंकार पर ध्यान का भी थोडा जिक्र किया था|
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पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस साधना में सिद्धि उसी को मिलती है जिसका आचार विचार सही होता है| इसलिए ऋषि पातंजलि ने यम नियमों की आवश्यकता पर जोर दिया है|
योग मार्ग में जो उच्चतर साधनाएँ हैं उन्हें गुरुमुखी यानि गुरुगम्य रखा गया है| वे प्रत्यक्ष गुरु द्वारा शिष्य की पात्रता देखकर ही दी जाती है| उनके बारे में सार्वजनिक चर्चा का निषेध है|
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सूक्ष्म प्राणायाम की क्रियाओं व ध्यान साधना के साधना काल में यदि साधक का आचरण सही नहीं होता तो उसे या तो मस्तिष्क की गंभीर विकृति हो जाती है या वह असुर बन जाता है| जिनके आचार विचार सही थे वे देवता बने, जिनके गलत थे वे असुर बने|
"आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः" आचारहीन को वेद भी नहीं पवित्र कर सकते| श्रुति भगवती कहती है कि दुश्चरित्र कभी भी आत्मज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकता। सदाचार होने पर ही धर्म उत्पन्न होता है।
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हमें मंत्रसिद्धि असत्यवादन के कारण नहीं होती| असत्य बोलने के कारण हमारी वाणी दग्ध हो जाती है| जैसे जला हुआ पदार्थ यज्ञ के काम का नहीँ होता है, वैसे ही जिसकी वाणी झूठ बोलती है, उससे कोई जप तप नहीं हो सकता| वह चाहे जितने मन्त्रों का जाप करे, कितना भी ध्यान करे, उसे फल कभी नहीं मिलेगा|
दूसरों की निन्दा करना भी वाणी का दोष है। जो व्यक्ति अपनी वाणी से किसी दूसरे की निन्दा करता है वह कोई जप तप नहीं कर सकता| इसलिए अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह की आवश्यकता है|
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शिष्यत्व की भी पात्रता होती है जिसके होने पर भगवन स्वयं गुरु रूप में साधक का मार्गदर्शन करते हैं|
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सभी को शुभ मंगल कामनाएँ| आप सब में हृदयस्थ भगवान नारायण को प्रणाम| परमशिव सब का कल्याण करें|
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय| ॐ ॐ ॐ ||
इति||

Thursday, 2 February 2017

ध्यान साधना (भाग - 1) ---

ध्यान साधना (भाग - 1) ---
(यह लेख सिर्फ उन उन्नत ध्यान साधकों के लिए है जिनके ह्रदय में प्रभु को समर्पित होने यानि उपलब्ध होने की गहन अभीप्सा और भक्ति है)
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संधिक्षणों में की गयी साधना "संध्या" कहलाती है|
जब साँस दोनों नासिकाओं से चल रही हो वह ध्यान का सर्वश्रेष्ठ समय है|
उन्नत साधक को नासिका से चल रही साँस के प्रति सजग ना होकर मेरुदंड में सुषुम्ना नाड़ी में चल रही प्राण ऊर्जा के प्रति सजग होना चाहिए| साँस जब अन्दर जाती है उस समय एक शीत लहर मूलाधार चक्र से उठकर आज्ञा चक्र तक जाती है| साँस बाहर आती है तब एक उष्ण लहर आज्ञा चक्र से मूलाधार तक पुनरागमन करती है| वही असली साँस हैं| नाक से ली जा रही साँस तो उसकी प्रतिक्रया मात्र है|
ध्यान से पूर्व सूर्य नमस्कार जैसे कुछ व्यायाम, तीन चार बार महामुद्रा और पंद्रह बीस बार अनुलोम-विलोम प्राणायाम आदि कर लेने चाहियें इससे पञ्च प्राणों में सामंजस्य भी रहेगा और साँस दोनों नासिकाओं से भी चलती रहेगी|

ध्यान की विधी .........
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कम्बल के ऊनी आसन पर एक रेशमी वस्त्र बिछा कर स्थिर होकर सुख से बैठिये| मुख पूर्व या उत्तर दिशा में हो, कमर सीधी हो| दृष्टि भ्रूमध्य में स्थिर रहे| आवश्यकता हो तो नितम्बों के नीचे एक पतली गद्दी रख लें ताकि कमर सीधी रहे|
अपनी आँखें बंद करें और अपने ह्रदय में उस परम प्रेम को जागृत करे जो अधिक से अधिक आप किसी के लिए भी कर सकते हो| उस प्रेम को आप अपनी देह के कण कण में अनुभूत करें| अब उस प्रेम की अनुभूति का विस्तार करते हुए उसमें अपने परिवार, मित्रगण, और सभी को सम्मिलित कर लें| धीरे धीरे अपने नगर, सम्पूर्ण भारतवर्ष, पूरी पृथ्वी, समस्त सृष्टि और सम्पूर्ण ब्रह्मांड को उस प्रेम के वृत्त में सम्मिलित कर लें| सारी आकाश गंगाएँ और जो कुछ भी सृष्ट और असृष्ट है, सम्पूर्ण अस्तित्व को उस प्रेम में सम्मिलित कर लें जिसके बाहर कुछ भी नहीं है|
सम्पूर्ण अस्तित्व उस प्रेम के घेरे में तैर रहा है| उससे बाहर कुछ भी नहीं है|
यह सर्वव्यापी प्रभु का प्रेम है जिसका ध्यान करें| अपने आप को, अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को उस प्रेम में अर्पित कर दें| आप यह देह नहीं, बल्कि वह प्रेम हैं| बीच बीच में कभी कभी आँख खोलकर अपनी देह को देख लो और यह भाव करें कि आप यह देह नहीं बल्कि वह सर्व व्यापी प्रेम हैं| मन इधर उधर भागे तो बलात उसे बापस ले आएँ| अपने आप को उस प्रभुप्रेम में समर्पित कर दें|
जो भी प्रकाश दिखे उसे दिखने दो, जो भी ध्वनी सुने उसे सुनने दो| दृष्टी भूमध्य में स्थिर रहे और चेतना सर्वव्यापी प्रभु प्रेम में स्थिर रहे| जब साँस स्वाभाविक रूप से अन्दर जाए तो मानसिक रूप से जप करो ... "सो.....", बाहर आये तो .... "हं......" | इसका अर्थ है --- "मैं वह हूँ"|
"हं..." "सः..." या "हौं.." "सः..."भी जप सकते हैं, अर्थ और भाव एक ही हैं|
साँस स्वतः जितनी भी देर रुक जाये रुक जाने दो, चलनी प्रारंभ हो जाए तो हो चलने दो|
यह देह तो एक उपकरण मात्र है, आप तो हैं ही नहीं, साँस लेना और छोड़ना तो स्वयं भगवान ही कर रहे हैं, आप नहीं| इसी को अजपा-जप कहते हैं|
भगवान श्रीकृष्ण कि बंसी की ध्वनी प्रणव यानि ओंकार के रूप में अनाहत नाद की ध्वनी सुननी आरम्भ हो जाए तो साथ साथ उसे भी सुनते रहो| चैतन्य में ॐ ... का जाप भी करते रहो|
आप मुझसे पूछ सकते हैं कि इतने काम एक साथ कैसे करें?
वैसे ही करें जैसे साइकिल चलाते समय पैडल भी चलाते है, हैंडल भी पकड़ते हैं, ब्रेक पर अंगुलियाँ भी रखते हैं, सामने भी देखते हैं और याद भी रखते हैं कि कहाँ जाना है, आदि आदि|
यह सर्वव्यापक प्रेम ही कृष्ण चैतन्य है| उनकी बंसी की ध्वनि ही समस्त सृष्टि का निर्माण, पालन-पोषण और संहार कर रही है| उनके प्रेम की जिस शक्ति ने पूरी सृष्टि को धारण कर रखा है वे श्रीराधा जी हैं| सारी सृष्टि उनका एक संकल्प मात्र है| समस्त अस्तित्व उनका ही है, वे ही वे हैं, हम और आप नहीं|
ह्रदय के प्रेम से आरम्भ करते है और सर्वव्यापी अनंत प्रेम रूपी कृष्ण चैतन्य में स्थित रहते है| वही हमारा अस्तित्व है| उसका ध्यान जब भी जितनी भी देर तक नियमित रूप से कर सकें करें| उसका इतना चिंतन करें कि आपका चिंतन उनको हो जाए|
वे ही विष्णु हैं, वे ही नारायण हैं और वे ही परम शिव हैं|
ध्यान के पश्चात तुरंत उठें नहीं, खूब देर तक उनके आनंद की अनुभूति करें| हर समय उनकी स्मृति रखें| उनका त्रिभंग मुरारी विग्रह सदा भ्रूमध्य में (यानि कूटस्थ में) रहे|
सब का कल्याण हो|
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय|
ॐ ॐ ॐ ||
=सावशेष =
(अगला भाग कुछ दिनों के पश्चात प्रस्तुत करूंगा)
कृपाशंकर

परमात्मा यदि है तो मेरे ह्रदय में ही है, अन्यथा कहीं भी नहीं है.,,,,,

परमात्मा यदि है तो मेरे ह्रदय में ही है, अन्यथा कहीं भी नहीं है.,,,,,
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यह शत-प्रतिशत सत्य है कि भगवान् यदि कहीं हैं तो वे मेरे ह्रदय में ही हैं, उससे बाहर कहीं भी नहीं हैं| आप पूछेंगे कि क्या भगवान पर तुम्हारा एकाधिकार है, तो मेरा उत्तर है .... निःसंदेह, एकाधिकार ही नहीं पूर्णाधिकार है| वे मेरे ह्रदय में बंद हैं और सात-सात तालों के भीतर बंदी हैं| बाहर निकलने का कोई अन्य मार्ग ही नहीं है| बाहर वे अब आ ही नहीं सकते| अपनी इच्छा से ही वे मुझ में हृदयस्थ होकर बाँके हो गए हैं| सातों ताले भी उन्होंने ही लगवा दिये हैं और बाहर आने की उनकी इच्छा भी नहीं है| वहीं से वे मजे से अपनी बांसुरी बजा रहे हैं जिसकी धुन पर यह सम्पूर्ण सृष्टि चैतन्य यानि जीवंत होकर नृत्य कर रही है| मैं भी उस मधुर धुन में विभोर होकर मस्त हूँ| अब और क्या चाहिए? सब कुछ तो मिल गया|
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यह सम्पूर्ण समष्टि ही मेरा ह्रदय है और कूटस्थ चैतन्य ही मेरा अस्तित्व जिसमें यह सम्पूर्ण समष्टि भी समाहित है| हे सच्चिदानंद, तुम्हारी जय हो| तुम्हीं शिव हो, तुम्हीं विष्णु हो, तुम्हीं जगन्माता हो, और तुम्हीं सर्वस्व हो| ॐ ॐ ॐ ||
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आप सब मेरी ही निजात्मा हो, आपका ह्रदय भी मेरा ही ह्रदय है| आप में और मुझ में कोई भेद नहीं है| सप्रेम सादर नमन| ॐ ॐ ॐ ||
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | ॐ शिव शिव शिव शिव शिव | ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
माघ कृ.१० वि.स.२०७२, 03फरवरी2016

मनुष्य के भाव और उसके सोच-विचार ही उसके पतन के कारण हैं .....

मनुष्य के भाव और उसके सोच-विचार ही उसके पतन के कारण है, कोई अन्य कारण नहीं हैं| बचपन से अब तक यही सुनते आये हैं कि कामिनी-कांचन ही मनुष्य की आध्यात्मिक प्रगति में बाधक हैं| पर यह आंशिक सत्य है, पूर्ण सत्य नहीं| जैसे एक पुरुष एक स्त्री के प्रति आकर्षित होता है वैसे ही एक स्त्री भी पुरुष के प्रति होती है, तो क्या स्त्री की प्रगति में पुरुष बाधक हो गया?
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कांचन के बिना यह लोकयात्रा नहीं चलती| मनुष्य को भूख भी लगती है, सर्दी-गर्मी भी लगती है, बीमारी में दवा भी आवश्यक है, और रहने को निवास की भी आवश्यकता होती है| हर क़दम पर पैसा चाहिए| जैसे आध्यात्मिक दरिद्रता एक अभिशाप है वैसे ही भौतिक दरिद्रता भी एक महा अभिशाप है| वनों में साधू-संत भी हिंसक प्राणियों के शिकार हो जाते हैं, उन्हें भी भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी और बीमारियाँ लगती है, उनकी भी कई भौतिक आवश्यकताएँ होती हैं, जिनके लिए वे संसार पर निर्भर होते हैं| पर जो वास्तव में भगवान से जुड़ा है, उसकी तो हर आवश्यकता की पूर्ति स्वयं भगवान करते हैं|
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कामिनी बंधनकारक नही है| विद्यारण्य स्वामी के अनुसार एक स्त्री को कामी पुरुष काम-संकल्प से देखता है, कुत्ता कुछ खाने को मिल जाएगा इस लोभ से देखता है, ब्रह्मविद अनासक्ति के भाव से देखता है, और एक भक्त उसे माता के रूप में देखता है|
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मनुष्य की कल्पना मनुष्य की ही सृष्टि है जो बाधक है, ईश्वर की सृष्टि नहीं| यदि ईश्वर की सृष्टि बाधक होती तो सभी को बंधनकारक होती| अतः अपने विचारों पर और अपने भावों पर ही नियंत्रण रखें, ईश्वर की सृष्टि को दोष न दें|
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एक आदमी एक महात्मा के पास गया और बोला कि मुझे संन्यास चाहिए, मैं यह संसार छोड़ना छाह्ता हूँ| महात्मा ने इसका कारण पूछा तो उस आदमी ने कहा कि मेरा धन मेरे सम्बन्धियों ने छीन लिया, स्त्री-पुत्रों ने लात मारकर मुझे घर से बाहर निकाल दिया, और सब मित्रों ने भी मेरा त्याग कर दिया, अब मैं उन सब का त्याग करना चाहता हूँ| महात्मा ने कहा कि तुम उनका क्या त्याग करोगे, उन्होंने ही तुम्हे त्याग दिया है|
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भौतिक समृद्धि ...... आध्यात्मिक समृद्धि का आधार है| एक व्यक्ति जो दिन-रात रोटी के बारे में ही सोचता है , वह परमात्मा का चिंतन नहीं कर सकता| पहले भारत में बहुत समृद्धि थी| एक छोटा-मोटा गाँव भी हज़ारों साधुओं को भोजन करा सकता था और उन्हें आश्रय भी दे सकता था| पर अब वह परिस्थिति नहीं है|
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सबसे महत्वपूर्ण तो व्यक्ति के विचार और भाव हैं, उन्हें शुद्ध रखना भी एक साधना है| मनुष्य के भाव और उसके सोच-विचार ही उसके पतन का कारण है, कोई अन्य कारण नहीं| धन्यवाद, मेरी इस प्रस्तुति को पढने के लिए| आप में हृदयस्थ श्रीहरि को नमन!
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | ॐ शिव शिव शिव शिव शिव | ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर