Thursday, 2 February 2017

मनुष्य के भाव और उसके सोच-विचार ही उसके पतन के कारण हैं .....

मनुष्य के भाव और उसके सोच-विचार ही उसके पतन के कारण है, कोई अन्य कारण नहीं हैं| बचपन से अब तक यही सुनते आये हैं कि कामिनी-कांचन ही मनुष्य की आध्यात्मिक प्रगति में बाधक हैं| पर यह आंशिक सत्य है, पूर्ण सत्य नहीं| जैसे एक पुरुष एक स्त्री के प्रति आकर्षित होता है वैसे ही एक स्त्री भी पुरुष के प्रति होती है, तो क्या स्त्री की प्रगति में पुरुष बाधक हो गया?
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कांचन के बिना यह लोकयात्रा नहीं चलती| मनुष्य को भूख भी लगती है, सर्दी-गर्मी भी लगती है, बीमारी में दवा भी आवश्यक है, और रहने को निवास की भी आवश्यकता होती है| हर क़दम पर पैसा चाहिए| जैसे आध्यात्मिक दरिद्रता एक अभिशाप है वैसे ही भौतिक दरिद्रता भी एक महा अभिशाप है| वनों में साधू-संत भी हिंसक प्राणियों के शिकार हो जाते हैं, उन्हें भी भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी और बीमारियाँ लगती है, उनकी भी कई भौतिक आवश्यकताएँ होती हैं, जिनके लिए वे संसार पर निर्भर होते हैं| पर जो वास्तव में भगवान से जुड़ा है, उसकी तो हर आवश्यकता की पूर्ति स्वयं भगवान करते हैं|
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कामिनी बंधनकारक नही है| विद्यारण्य स्वामी के अनुसार एक स्त्री को कामी पुरुष काम-संकल्प से देखता है, कुत्ता कुछ खाने को मिल जाएगा इस लोभ से देखता है, ब्रह्मविद अनासक्ति के भाव से देखता है, और एक भक्त उसे माता के रूप में देखता है|
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मनुष्य की कल्पना मनुष्य की ही सृष्टि है जो बाधक है, ईश्वर की सृष्टि नहीं| यदि ईश्वर की सृष्टि बाधक होती तो सभी को बंधनकारक होती| अतः अपने विचारों पर और अपने भावों पर ही नियंत्रण रखें, ईश्वर की सृष्टि को दोष न दें|
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एक आदमी एक महात्मा के पास गया और बोला कि मुझे संन्यास चाहिए, मैं यह संसार छोड़ना छाह्ता हूँ| महात्मा ने इसका कारण पूछा तो उस आदमी ने कहा कि मेरा धन मेरे सम्बन्धियों ने छीन लिया, स्त्री-पुत्रों ने लात मारकर मुझे घर से बाहर निकाल दिया, और सब मित्रों ने भी मेरा त्याग कर दिया, अब मैं उन सब का त्याग करना चाहता हूँ| महात्मा ने कहा कि तुम उनका क्या त्याग करोगे, उन्होंने ही तुम्हे त्याग दिया है|
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भौतिक समृद्धि ...... आध्यात्मिक समृद्धि का आधार है| एक व्यक्ति जो दिन-रात रोटी के बारे में ही सोचता है , वह परमात्मा का चिंतन नहीं कर सकता| पहले भारत में बहुत समृद्धि थी| एक छोटा-मोटा गाँव भी हज़ारों साधुओं को भोजन करा सकता था और उन्हें आश्रय भी दे सकता था| पर अब वह परिस्थिति नहीं है|
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सबसे महत्वपूर्ण तो व्यक्ति के विचार और भाव हैं, उन्हें शुद्ध रखना भी एक साधना है| मनुष्य के भाव और उसके सोच-विचार ही उसके पतन का कारण है, कोई अन्य कारण नहीं| धन्यवाद, मेरी इस प्रस्तुति को पढने के लिए| आप में हृदयस्थ श्रीहरि को नमन!
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | ॐ शिव शिव शिव शिव शिव | ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर

प्रभु से प्रेम करो ....

प्रभु से प्रेम करो, प्रभु से प्रेम करो, प्रभु से प्रेम करो, और सिर्फ प्रभु से प्रेम करो .....
वो जो हमारी आँखों से देख रहा है, वो जो हमारी देह को चला रहा है, वो जो हमारे दिल में धड़क रहा है, जब धड़कना बंद कर देगा तो बाकी के सब प्रेम समाप्त हो जायेंगे| हमारा घर-परिवार, धन-संपत्ति, यार-दोस्त, सगे-संबंधी यहाँ तक कि यह पृथ्वी भी किसी काम नहीं आएगी| वह कौन है जो जन्म से पूर्व हमारे साथ था, और मृत्यु के पश्चात भी साथ रहेगा, जो कभी साथ नहीं छोड़ेगा| उस प्रेमियों के प्रेमी से परिचय, मित्रता और प्रेम करना ही सार्थक है|
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जैसे एक पक्षी किसी वृक्ष की टहनी के सिरे पर बैठा चीं चीं करता है...... भयानक आँधी में भी और टहनी टूटने पर भी घबराता नहीं है| उसकी चीं चीं चलती रहती है क्योंकि उसे भरोसा टहनी का नहीं है जिसके ऊपर वह बैठा है, उसे भरोसा है अपने पंखों पर जो उसकी देह के ही भाग हैं| वैसे ही हम सभी को संसार के मध्य रहते हुए भी सच्चा भरोसा परमात्मा पर ही रखना चाहिए, जो सदा-सर्वथा हमारे साथ हैं|
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परमात्मा से सम्बन्ध बना रहे, इसके लिये नियमित साधना की आवश्यकता होती है| मन लगे या न लगे, नियमित साधना का उत्साह बना रहना चाहिए|
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | ॐ शिव शिव शिव शिव शिव | ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
माघ कृ.९ वि.स.२०७२, 02फरवरी2016

क्या अन्धकार और प्रकाश एक साथ रह सकते हैं ? ....

क्या अन्धकार और प्रकाश एक साथ रह सकते हैं ? .....
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अन्धकार और प्रकाश एक साथ नहीं रह सकते| सूर्य और रात्री भी एक साथ नहीं रह सकते| यह जीवन दो शक्तिशाली चुम्बकीय ध्रुवों .... राम और काम ..... के मध्य की द्वन्द्वमय अंतर्यात्रा है| दोनों के प्रबल आकर्षण हैं| एक शक्ति हमें राम की ओर यानि परमात्मा की ओर खींच रही है, वहीँ दूसरी शक्ति हमें काम की ओर यानि सान्सारिक भोग-विलास की ओर खींच रही है| हम दोंनो को एक साथ नहीं पा सकते| हम को दोनों में से एक का ही चयन करना होगा| भूमध्य रेखा से हम उत्तरी ध्रुव की ओर जाएँ तो दक्षिणी ध्रुव उतनी ही दूर हो जाएगा, और दक्षिणी ध्रुव की ओर जाएँ तो उत्तरी ध्रुव उतनी ही दूर हो जाएगा| दोनों स्थानों पर साथ साथ नहीं जा सकते|
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भगवान के पास सब कुछ है पर एक चीज नहीं है जिसके लिए वे भी तरसते हैं ....
वह है हमारे ह्रदय का पूर्ण प्रेम| प्रभु भी प्रतीक्षा कर रहे है कि संभवतः कभी तो हम अपना प्रेम उन्हें दे ही देंगे | हम उन्हें अपने प्रेम के अतिरिक्त अन्य दे ही क्या सकते हैं? सब कुछ तो उन्हीं का है| विषयों के प्रति प्रेम ही हमें परमात्मा से दूर कर रहा है| प्रेम के उच्चतम आदर्श हैं .....श्रीराधा जी और श्रीहनुमान जी| श्रीराधा जी में जो प्रेम भगवान श्रीकृष्ण के लिए था, और श्रीहनुमान जी में जो प्रेम भगवान श्रीराम के प्रति था, उस प्रेम से बड़ा अन्य कुछ भी नहीं है| वैसे प्रेम के अतिरिक्त अन्य कुछ कामना हमारी होनी भी नहीं चाहिए|
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प्रार्थना आत्मा की तड़प है प्रभु को पाने की| प्रभु ने हमें भिखारी नहीं बनाया है| हम तो उसके अमृत पुत्र हैं| जो कुछ भी भगवान का है वह स्वतः ही हमारा भी है, उस पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है| हमारे घर कोई भिखारी आये तो हम उसे भिखारी का ही भाग देंगे, पर पुत्र द्वारा माँगने पर अपना सब कुछ दे देते हैं| अतः भगवान का पुत्र ही बन कर रहना श्रेष्ठ है, न कि भीख माँगना|
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | ॐ शिव शिव शिव शिव शिव | ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर

Tuesday, 31 January 2017

मदर टरेसा को संत की उपाधि दी किस आधार पर ? .....

मदर टरेसा को संत की उपाधि दी किस आधार पर ? .....
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आधार ये है की मदर टरेसा ने एक बार किसी महिला के शरीर पर हाथ रखा और उस महिला का गर्भाशय का कैंसर ठीक हो गया तो POP का कहना था की मदर टरेसा मे चमत्कारिक शक्ति है
इसलिए वो संत होने के लायक है !

अब आप ही बताए क्या ये scientific है ???
की उन्होने ने किसी महिला पर हाथ रखा और उसका गर्भाशय का कैंसर ठीक हो गया ?
इस लिए मदर टरेसा संत होने के लायक है !

ये 100% superstition है अंध विश्वास है ! लेकिन भारत सरकार ने इसके खिलाफ कुछ नहीं किया !
अब अगर भारत के कोई साधू -संत ऐसा करे तो वो जेल के अंदर ! क्योंकि वो अंध विश्वास फैला रहे है !!

अब आप ही बताएं मदर टरेसा से बड़ा अंध विश्वास फैलाने वाला कौन होगा ??
अगर उसमे चमत्कारिक शक्ति होती तो उसने pop john paul के ऊपर हाथ क्यों नहीं रखा ???
अजीब बात ये है कि pop john paul को खुद parkinson नाम की बीमारी थी ! और 20 साल से थी !
(इस बीमारी मे व्यकित के हाथ पैर कांपते रहते हैं ! )
तो उस पर हाथ रख मदर टरेसा ने उसको ठीक क्यों नहीं किया ??

मदर टरेसा का एक मात्र उदेश्य सेवा के नाम पर भारत को ईसाई बनाना था !!

प्रत्यभिज्ञा हृदय :---

प्रत्यभिज्ञा हृदय :---

प्रत्यभिज्ञा का अर्थ है पूर्वज्ञात विषय को पुनश्चः यानि दुबारा जानना|

जब से मेरे हृदय में मेरे परम प्रिय परमात्मा भगवान परमशिवआये हैं, मेरा हृदय उन्हीं का हो गया है| अब तो वे ही मेरे हृदय भी हो गए हैं|

सारे साकार और निराकार रूप वे ही हैं| सारा अस्तित्व भी वे ही हैं| वे ही परम सत्य हैं| वे ही अनिर्वचनीय परम प्रेम और वे ही सच्चिदानंद हैं|
 

मैं असम्बद्ध, निर्लिप्त और निःसंग हूँ| ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ |
 

ॐ शिव ! ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ||

हमरा वातावरण हमारी इच्छा शक्ति से अधिक शक्तिशाली है .....

वह परिवेश जिसमें हम रहते हैं यानि हमारे आसपास का वातावरण, हमारी इच्छा-शक्ति से भी अधिक प्रबल होता है| हमारे विचार भी हमारे चारों ओर एक सूक्ष्म वातावरण का निर्माण करते हैं|
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पूर्व जन्मों के अच्छे संस्कार मनुष्य की रक्षा करते हैं पर कुसंगति बुरे संस्कारों और बुरे कर्मों को जन्म देती है|
मनुष्य के मन में आया हर विचार व हर भाव उसका कर्म होता है|
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जो बुरे बिचार हमारे अवचेतन मन में छिपे हैं उनके प्रतिकार के लिए सतत परमात्मा का चिंतन और ध्यान अति आवश्यक है| एक समय में दो विचार नहीं आ सकते अतः परमात्मा का ध्यान और चिंतन हमारे अवचेतन मन में गहराई से बैठकर हमारा स्वभाव बन जाएगा|
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बाकी हम सब समझदार हैं, सब समझते हैं, अतः अधिक कहना व्यर्थ है|
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ॐ शिव | ॐ ॐ ॐ ||

अपने बच्चों को घर में खूब प्यार दें ....

सभी माता-पिताओं से मेरा हाथ जोड़ कर अनुरोध है कि अपने बच्चों को घर में खूब प्यार दें जिसके लिए वे घर से बाहर प्यार नहीं ढूंढें|
मनोवैज्ञानिक रूप से जिन बच्चों को (विशेष रूप से बालिकाओं को) घर में बाप का प्यार नहीं मिलता है, वे बड़े होकर वैवाहिक जीवन में पर पुरुषों में प्यार ढूंढते हैं|
जिन बच्चों को (विशेष रूप से बालकों को) माँ का प्यार नहीं मिलता है, वे बड़े होकर अपने वैवाहिक जीवन में पर स्त्रियों में प्यार ढूंढते हैं|
अतः माँ और बाप दोनों का प्यार बच्चों के विकास के लिए आवश्यक है|
हम सब समझदार हैं, अतः समझ गए होंगे| ॐ ॐ ॐ ||
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पुनश्चः :---
मैंने जीवन में जो देखा है और अनुभूत किया है वही कह रहा हूँ| मेरे साथ कुछ ऐसे सहकर्मी भी थे जो घर में सुन्दर पत्नी के होते हुए भी और घर में अपने समझदार वयस्क बच्चों के होते हुए भी बेशर्म होकर परस्त्रीगामी थे| गहराई से विचार करने पर मैनें पाया कि उनकी विकृति का कारण बचपन में उन को माँ से प्यार न मिलना था| ऐसे ही कुछ महिलाओं को भी देखा जो घर में अच्छे पति के होते हुए भी परपुरुषगामी थीं| वे भी अपने बाल्यकाल में पिता के प्रेम से वंचित थीं|
कुसंगति दूसरा कारण था|