Monday, 26 January 2026

निजी अनुभवों पर आधारित मेरे जीवन के निष्कर्ष ---

  निजी अनुभवों पर आधारित मेरे जीवन के निष्कर्ष ---

(१) सृष्टिकर्ता को जानने की मनुष्य की जिज्ञासा शाश्वत है, वह सभी युगों में थी, अभी भी है और भविष्य में भी सदा रहेगी| जन्म-जन्मान्तरों में भटकता हुआ प्राणी अंततः यह सोचने को बाध्य हो जाता है कि मैं क्यों भटक रहा हूँ, मैं कौन हूँ, और मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? तब मनुष्य के जीवन की दिशा बदलने लगती है|
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(२) मनुष्य की चेतना कभी तो बहुत अधिक उन्नत हो जाती है, और कभी बहुत अधिक अधम हो जाती है, इसके पीछे कोई न कोई अतिमानसी अज्ञात ज्योतिषीय कारण है जिसके आधार पर युगों की रचना हुई है| जैसे हमारा पृथ्वी ग्रह अपने उपग्रह चन्द्रमा के साथ सूर्य की परिक्रमा करता है, वैसे ही अपना यह सूर्य भी निश्चित रूप से पृथ्वी आदि अपने सभी ग्रहों के साथ सृष्टि में किसी ना किसी बिंदु (विष्णु नाभि) की परिक्रमा अवश्य करता है| जब अपना सूर्य उस बिंदु के निकटतम होता है वह सत्ययुग का चरम होता है, और उस बिन्दु से दूरी कलियुग का चरम होता है| यह क्रम सुव्यवस्थित रूप से चलता रहता है| सृष्टि में कुछ भी अव्यवस्थित नहीं है, सब कुछ व्यवस्थित है, पर हमारी चेतना में हमें उसका ज्ञान नहीं है| काश! हमें वह ज्ञान होता!
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(३) जिस कालखंड में मनुष्य की जैसी समझने की बौद्धिक क्षमता होती है और जैसी चेतना होती है उसी के अनुसार प्रकृति जिसे हम जगन्माता भी कह सकते हैं, वैसा ही ज्ञान और वैसे ही ग्रंथ हमें उपलब्ध करवा देती है| जब मनुष्य की चेतना उच्चतम स्तर पर थी तब वेद थे, जिनमे समस्त ज्ञान था| वे प्राचीन भारत में कभी लिखे नहीं गए थे| हर पीढ़ी में एक वर्ग उन्हें कंठस्थ रखकर अगली पीढ़ी को प्रदान कर देता था| जब मनुष्य की स्मृति मंद हुई तब ही वे लिखे गए|
फिर उनके ज्ञान को समझाने के लिए पुराणों की रचना हुई| उनका उद्देश्य वेदों के ज्ञान को ही बताना था| पुराणों के शब्दों का अर्थ लौकिक नहीं, आध्यात्मिक है| उनका आध्यात्मिक अर्थ बताने वाले आचार्य मिलने अब दुर्लभ हैं, अतः वे ठीक से समझ में नहीं आते|
फिर मनुष्य की चेतना और भी नीचे गिरी तो आगम ग्रंथों की रचना हुई, जिन्होंने हमारी आस्था को बचाए रखा|
जब हमारे धर्म और संस्कृति पर आतताइयों के मर्मान्तक प्रहार हुए तब एक भक्तिकाल आया और अनगिनत भक्तों ने जन्म लिया| उन्होंने भक्ति द्वारा हमारी आस्थाओं की और धर्म की रक्षा की|
अब मुझे लगता है कि जितना पतन हो सकता था उतना हो चुका है, और अब आगे उत्थान ही उत्थान है| इसका प्रमाण है कि पिछले कुछ वर्षों से पूरे विश्व में 'गीता' क्रमशः बहुत अधिक लोकप्रिय हो रही है| उपनिषदों के ज्ञान को जानने की जिज्ञासा भी पूरे विश्व में बढ़ रही है| परमात्मा को जानने की जिज्ञासा, योग साधना, ध्यान और भक्ति का प्रचार प्रसार भी निरंतर हो रहा है|
रूस जैसे पूर्व साम्यवादी देशों में जहाँ साम्यवाद जब अपने चरम पर था तब भगवान में आस्था रखना भी अपनी मृत्यु को निमंत्रित करना था| पर अब वहाँ की स्थिति उस से विपरीत है| अब से पचास वर्ष पूर्व जब साम्यवाद अपने चरम शिखर पर था, उस समय में मैं रूस में लगभग दो वर्ष रहकर एक प्रशिक्षण ले रहा था| चीन, उत्तरी कोरिया, युक्रेन, लाटविया, रोमानिया आदि पूर्व साम्यवादी देशों का भ्रमण भी मैं कर चुका हूँ| विश्व के अनेक देशों की मैं यात्राएँ कर चुका हूँ, और पूरी पृथ्वी की परिक्रमा भी एक बार की है| अतः पूरे अधिकार से यह बात कह रहा हूँ कि अब आने वाला समय बहुत अच्छा होगा, सनातन धर्म की सारे विश्व में पुनर्स्थापना होगी, और असत्य व अन्धकार की शक्तियाँ क्षीण होंगी|
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(४) यह सृष्टि, ज्ञान रूपी प्रकाश और अज्ञान रूपी अन्धकार के संयोग से बनी है अतः कुछ न कुछ अज्ञान रूपी अन्धकार तो सदा ही रहेगा| हमारा कार्य उस प्रकाश में वृद्धि करना है|
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(५) हमारे जीवन का प्रथम, अंतिम और एकमात्र उद्देश्य ईश्वर की प्राप्ति है| जब तक हम ईश्वर को यानि परमात्मा को प्राप्त नहीं करते तब तक इस दुःख रूपी महासागर के जीवन में यों ही भटकते रहेंगे|
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ये मेरे अनुभवजनित दृढ़ निजी विचार हैं, अतः जिनके विचार मुझ से नहीं मिलते उन्हें आहत और उत्तेजित होने की आवश्यकता नहीं है| मैं मेरे विचारों पर दृढ़ हूँ| भगवान सदा मेरे साथ हैं|
सभी को मेरी शुभ कामनाएँ और नमन ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ जनवरी २०१८

मैं आप सब का सेवक हूँ ---

मैं आप सब का सेवक हूँ। आप को इसका पता नहीं चलता, लेकिन आप सब के साथ मेरा सत्संग निरंतर होता रहता है। मैं आप सब के साथ एक हूँ। आप सब के आध्यात्मिक कल्याण के लिए भगवान से निरंतर प्रार्थना करता रहता हूँ। मेरी एक ही प्रार्थना है कि सब के हृदयों में भगवान की भक्ति (परमप्रेम) जागृत हो, भगवान का प्राकट्य सभी के हृदयों में हो, और सभी को भगवत्-प्राप्ति हो। भगवान की छवि सदा हमारे समक्ष कूटस्थ में रहे। हम उनके एक उपकरण/निमित्त मात्र हैं। वे ही हमारा अस्तित्व हैं।
ॐ स्वस्ति ! ॐ ॐ ॐ !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!

कृपा शंकर
२६ जनवरी २०२४

Friday, 23 January 2026

उन सब महान आत्माओं का स्वागत है जिन्होंने आत्म-साक्षात्कार यानि भगवत्-प्राप्ति को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना रखा है --

 उन सब महान आत्माओं का स्वागत है जिन्होंने आत्म-साक्षात्कार यानि भगवत्-प्राप्ति को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना रखा है। निज जीवन में धर्म की रक्षा होगी तो राष्ट्र में भी होगी। असत्य और अंधकार की शक्तियों का निरंतर प्रतिकार करें। जितना हो सके उतना अधिक से अधिक समय परमब्रह्म परमात्मा के चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान में व्यतीत करें। यह सबसे बड़ी सेवा है जो हम अपने राष्ट्र और समष्टि के लिए कर सकते हैं।

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बौद्धिक धरातल पर आध्यात्म में किसी भी तरह का कोई संशय मुझे नहीं है, सिर्फ एक तड़प है परमात्मा को समर्पित होने की। जो भी करना है वह वे ही करेंगे। मैं तो एक निमित्त मात्र उपकरण हूँ। दक्षिणामूर्ति भगवान शिव और जगद्गुरू भगवान श्रीकृष्ण को नमन !!
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१ जनवरी २०२६

अब से यह अवशिष्ट जीवन पूरी तरह परमात्मा को समर्पित है ---

 अब से यह अवशिष्ट जीवन पूरी तरह परमात्मा को समर्पित है। किसी भी तरह का कोई कण मात्र भी संशय नहीं है। अपने भूत और भविष्य को तो तो मैं बदल नहीं सकता अतः उनका चिंतन ही छोड़ दिया है। वर्तमान में निरंतर कूटस्थ-चैतन्य में परमात्मा की चेतना में रहूँ, यही मेरा प्रयास है, और यही सदा रहेगा।

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श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान द्वारा दिये गये अनेक शाश्वत वचनों में से ये दो हैं जो हर समय मेरी चेतना में रहते हैं --
(१) "मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
अर्थात् -- मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥
(२) "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
अर्थात् -- सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो॥
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सभी सिद्धांतों, नियमों व हर तरह के साधन विधानों से ऊपर उठकर हमें शरणागति द्वारा स्वयं का समर्पण परमात्मा को कर देना चाहिए। आप सब में परमब्रह्म को नमन करता हूँ। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ जनवरी २०२६

अमेरिका का यह राक्षसी कृत्य अक्षम्य अपराध है --

 अमेरिका का यह राक्षसी कृत्य अक्षम्य अपराध है ---

वेनेज़ुएला पर अमेरिकी आक्रमण की मैं निंदा करता हूँ। यह वेनेजुएला के खनिज तेल की खुली लूट है। वेनेजुएला के पास विश्व का सबसे अधिक खनिज तेल है। अमेरिका की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है, जिसे सशक्त बनाने के लिए अमेरिका ने यह खुली लूट और डकैती की है। ड्रग पकड़ने का तो बहाना है, असली लक्ष्य तो खनिज तेल की लूट है। विश्व के हरेक देश को अमेरिका के विरुद्ध सशक्त होना होगा। भारत ने अपनी सैनिक शक्ति बढ़ाई है जिसके लिये मैं वर्तमान केंद्र सरकार को धन्यवाद देता हूँ।
अमेरिका को ब्रिटेन, स्पेन और पुर्तगाल के डाकुओं ने बसाया था। उन्होंने वहाँ के करोड़ों निवासियों की हत्या कर के गोरों को बसाया। उनके स्वभाव में अभी भी डाकूपन है।
३ जनवरी २०२६

हम किसका ध्यान करें ?

 (Re-Posted after 10 years) हम किसका ध्यान करें ? -- (Very Important)

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मेरे विचार से गहन ध्यान में कूटस्थ में दिखाई देने वाली विराट श्वेत ज्योति ही गायत्री मन्त्र के "सविता" देव हैं, वे ही परमशिव हैं, वे ही परम ब्रह्म हैं, वे ही नारायण हैं, वे ही आत्म-सूर्य और सभी तत्वों के तत्व हैं | एक जिज्ञासा उठी है जिसे यहाँ व्यक्त कर रहा हूँ --
हमारा सौर मंडल हमारे भौतिक सूर्य से जीवन पाता है| जो भी भौतिक ऊर्जा हमें प्राप्त है वह हमारे सूर्य से ही है| पर इस सृष्टि में अनंत सूर्य हैं जिनके अपने अपने सौर मंडल हैं, जहाँ पता नहीं कैसे कैसे लोक होंगे|
कहते हैं कि सृष्टि -- भौतिक, सूक्ष्म और कारण -- इन तीन आयामों में हैं| पर इनके मध्य भी अनेक आयामों में अन्य भी अनेक लोक निश्चित रूप से होंगे जो हमारी समझ से परे हैं|
भौतिक जगत भी पता नहीं कितने सारे होंगे| हम इस सौर मंडल में हैं जो हमारे भौतिक सूर्य के इर्दगिर्द है, पर अंतरिक्ष में तो हर तारा एक सूर्य है जिसके भी अनेक ग्रह-उपग्रह हैं| सृष्टि में भौतिक विश्व ही अनंत है, फिर सूक्ष्म जगत तो उससे भी बहुत बड़ा बताते हैं, और कारण जगत तो पता नहीं कितना विराट होगा जिस की कल्पना भी मनुष्य की क्षमता से परे है| देव-असुर आदि भी सर्वत्र होते होंगे|
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ध्यान साधना में हम देश-काल (Time & Space) से परे होते हैं| हमारी चेतना अनंत में होती है जो हमारा वास्तविक घर है| वहाँ इस सूर्य का कोई महत्व नहीं है|
ध्यान साधना में जिस ज्योतिर्मय ब्रह्म के दर्शन हमें कूटस्थ में होते हैं, वे ही सविता देव हैं -- ऐसी मेरी धारणा है|
सम्पूर्ण सृष्टि जिनसे आभाषित है, वे वही होंगे जिसके बारे में श्रुति भगवती कहती है --
"न तत्र सूर्यो भांति न चन्द्र-तारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कूतोऽयमग्नि |
तम् एव भान्तम् अनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वम् इदं विभाति ||"
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"हिरन्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्
तत् त्वं पूषन्न्-अपावृणु सत्य-धर्माय दृष्टये |"
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"पूषन्न् अकर्ये यम सूर्य प्राजापत्य व्युह-रश्मीन् समूह तेजो
यत् ते रूपं कल्याणतमं तत् ते पश्यामि यो ऽसव् असौ पुरुषः सो ऽहम् अस्मि ||"
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हमें उस आभासित ब्रह्म आत्मसूर्य का ही ध्यान करना चाहिए| वह ही हम हैं|
हे प्रभु, मैं अपनी तुच्छ और अति अल्प बुद्धि से कुछ भी समझने में असमर्थ हूँ| अपनी पवित्रता दो, अपना परम प्रेम दो|
हे प्रभु, "तुम हवाओं में बह रहे हो, झोंकों में मुस्करा रहे हो, सितारों में चमक रहे हो, हम सब के विचारों में नृत्य कर रहे हो, समस्त जीवन तुम्हीं हो| हे परमात्मा, हे गुरु रूप ब्रह्म, तुम्हारी जय हो| ॐ तत्सत् | सोsहं | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
३ जनवरी २०१६
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पुनश्च: --- ब्राह्मण को दिन में कम से कम १० गायत्री मन्त्र का जप नित्य करना अनिवार्य है| अपने ब्राहमणत्व की रक्षा के लिए कम से कम एक जप तो आवश्यक है| ब्राह्मण किसी भी तरह की कोई भी साधना करे पर गायत्री मन्त्र के बिना उसे कोई सिद्धि नहीं मिलती| गायत्री जप न करने वाला ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व से च्युत हो जाता है, जिसके लिए उसे प्रायश्चित करना पड़ता है।

गुरु महाराज का जन्म दिवस ---

 ग्रेगोरियन कलेंडर के अनुसार आज ५ जनवरी का दिन मेरे लिए एक विशेष दिन है जो अवशिष्ट निज जीवन में परमात्मा के प्रति गहनतम शर्तरहित अप्रतिबंधित पूर्णप्रेम व समर्पण की दिशा को और भी अधिक दृढ़ता से पुनः स्थापित करेगा।

परमात्मा से परम प्रेम -- मेरा स्वभाव और मेरा जीवन है। इसकी गहनतम अभिव्यक्ति इस जीवन में अभी और इसी समय ही नहीं, बल्कि सभी भावी जन्मों में निरंतर हो। किसी भी तरह के अन्य विचार का जन्म ही न हो।
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मेरा परमप्रेम केवल परमात्मा से ही हो सकता है। वे ही मेरे विखंडित विचारों के ध्रुव हैं। इस जन्म में तो उनके साथ हूँ ही, इस जन्म से पूर्व भी उन्हीं के साथ था, और इस जन्म के उपरांत भी उन्हीं के साथ रहूंगा। इस जन्म में वे ही सभी संबंधियों, मित्रों व शत्रुओं के रूप में आये, इस जन्म का संचालन भी उन्हीं ने किया, और भविष्य में भी मेरे माध्यम से सदा वे स्वयं को ही व्यक्त करेंगे।
भगवान कहते हैं --
"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्"॥६:२५॥ (गीता)
अर्थात् - शनै: शनै: धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा (योगी) उपरामता (शांति) को प्राप्त होवे; मन को आत्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करे॥
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समय समय पर अपने मन को परमात्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करें। यह बड़ी से बड़ी साधना है। यह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ जहाँ विचरण करता है, वहाँ वहाँ से हटाकर इसको एक परमात्मा में ही लगायें। विक्षेप का कारण रजोगुण है। हम सर्वत्र यानि सभी प्राणियों में अपने स्वरूप को देखें, और सभी प्राणियों को अपने स्वरूप में देखें।
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ॐ हे प्रेममय ज्योतिर्मय गुरुरूप कूटस्थ ब्रह्म, मेरे ह्रदय को इतना पवित्र कर दो कि श्वेत कमल भी इसे देख कर शरमा जाय। तुम इस नौका के कर्णधार हो जिसे द्वैत से परे ले चलो। तुम सब नाम और रूपों से परे हो। तुम्हारा निवास कूटस्थ में है, जहाँ तुम सदा मेरे साथ हो। तुम स्वयं कूटस्थ ब्रह्म हो। जब तुम साथ में हो, तब मुझे अब और कुछ भी नहीं चाहिये। तुम्हारे विराट महासागर में मैं एक कण था, जो तुम्हारे में विलीन होकर तुम्हारा ही एक प्रवाह बन गया हूँ। मैं तुम्हारे साथ एक हूँ और सदा एक ही रहूँगा॥
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मैं, मेरे गुरु महाराज, और मेरे उपास्य परमशिव/पुरुषोत्तम -- ध्यान में तीनों एक हैं। मैं कूटस्थ सूर्यमंडल में उन्हीं का ध्यान करता हूँ। परमशिव के ध्यान में स्वयं की पृथकता के बोध को विलीन कर रहा हूँ। जो परमशिव हैं, वे ही पुरुषोत्तम हैं, वे ही श्रीहरिः भगवान विष्णु हैं।
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ब्रह्मानंदम् परम सुखदम् केवलं ज्ञान मूर्तिम्।
द्वन्द्वातीतं गगन सदृशं तत्वमस्यादि लक्ष्यम्।।
एकं नित्यं विमलं चलम् सर्वधीसाक्षी भूतम्।
भावातीतं त्रिगुण रहितं सद्गुरुं तम् नमामि।।
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त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥"
वायुर्यमोग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च
नमो नमस्तेस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोपि नमो नमस्ते॥"
नमः पुरस्तात् पृष्ठतस्ते नमोस्तु ते सर्वत एव सर्व
अनन्तवीर्याअमितविक्रमस्त्वम् सर्वं समाप्नोषि ततोसि सर्वः॥"
ॐ ॐ ॐ !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
५ जनवरी २०२६
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