मैं आप सब का सेवक हूँ। आप को इसका पता नहीं चलता, लेकिन आप सब के साथ मेरा सत्संग निरंतर होता रहता है। मैं आप सब के साथ एक हूँ। आप सब के आध्यात्मिक कल्याण के लिए भगवान से निरंतर प्रार्थना करता रहता हूँ। मेरी एक ही प्रार्थना है कि सब के हृदयों में भगवान की भक्ति (परमप्रेम) जागृत हो, भगवान का प्राकट्य सभी के हृदयों में हो, और सभी को भगवत्-प्राप्ति हो।
भगवान की छवि सदा हमारे समक्ष कूटस्थ में रहे। हम उनके एक उपकरण/निमित्त मात्र हैं। वे ही हमारा अस्तित्व हैं।
ॐ स्वस्ति ! ॐ ॐ ॐ !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ जनवरी २०२४
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