Friday, 27 December 2019

परमात्मा की उपस्थिती का आभास ही आनंद है .....

परमात्मा की उपस्थिती का आभास ही आनंद है .....
जिस आनंद को हम अपने से बाहर खोज रहे हैं, वह आनंद तो हम स्वयं हैं| संसार में हम विषयभोगों में, अभिमान में, और इच्छाओं की पूर्ति में,सुख की खोज करते हैं, पर उस से तृप्ति और संतोष नहीं मिलता| संसार में सुख की खोज अनजाने में आनंद की ही खोज है|
भगवान की अनन्य भक्ति और समर्पण से ही हमें आनंद प्राप्त हो सकता है| अन्य कोई स्त्रोत नहीं है| सार की बात है कि आनंद कुछ पाना नहीं, बल्कि स्वयं का होना है| हम आनंद को कहीं से पा नहीं सकते, स्वयं आनंदमय हो सकते हैं| हमारा वास्तविक अस्तित्व ही आनंद है|
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः| ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !
कृपा शंकर
१७ दिसंबर २०१९

जीवन में संतुष्टि और तृप्ति कैसे मिले? ....

जीवन में संतुष्टि और तृप्ति कैसे मिले? जीवन में प्राप्त करने योग्य क्या है? जीवन में क्या करें और क्या न करें? ......
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इन जैसे प्रश्नों ने बहुत उलझाये रखा है| इन सब का उत्तर भगवान से यही मिला है कि अपना छोटे से छोटा हर काम खूब मन लगाकर करो, किसी भी काम को आधे-अधूरे मन से मत करो| हर काम अपनी सर्वश्रेष्ठ लगन से और अपनी पूर्णता से करो|
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इससे जीवन में मुझे वास्तव में बड़ी संतुष्टि और तृप्ति मिली है| जो काम आधे-अधूरे मन से किए, वे सब इस जीवन में असंतोष और कुंठा के कारण बने| गीता के कुछ श्लोकों ने जीवन को नई दिशा दी और उत्साह बनाए रखा| जीवन की हर समस्या का समाधान और हर प्रश्न का उत्तर मुझे गीता में मिला|
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"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि| अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि|१८:५८||
"नेहाभिक्रम-नाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते| स्वल्पम् अप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्||२:४०||"
"योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय| सिद्धय्-असिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते||२:४८||"
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भगवान ने इतनी बड़ी बात कह दी है, अब और कुछ है ही नहीं| भगवान "हैं", यहीं "हैं", सर्वत्र "हैं", इसी समय "हैं", सर्वदा "हैं", और वे ही वे "हैं"| अन्य कोई है ही नहीं| पृथकता का बोध एक भ्रम है|
ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ || ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||
कृपा शंकर
१६ दिसंबर २०१९

१९७१ में हम युद्ध में विजयी रहे पर कूटनीति में हार गए ....

हम युद्ध में विजयी रहे पर कूटनीति में हार गए| हम विजयी हैं और सदा विजयी ही रहेंगे -----
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आज एक गर्व का दिन है| आज से 48 वर्ष पूर्व 16 दिसम्बर 1971 को भारत ने पाकिस्तान को पूर्ण रूप से हराकर पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों को बंदी बना कर बांग्लादेश का निर्माण किया था| इसी दिन की स्मृति में विजय दिवस मनाया जाता है|
हम युद्ध में जीते तो अवश्य पर वार्ता की टेबल पर पाकिस्तान की कूटनीति से हार गए| पाकिस्तान अपने सैनिकों के बदले कुछ भी देने को तैयार था| हम उनके बदले पाक-अधिकृत कश्मीर का सौदा कर सकते थे, लाहोर भी ले सकते थे| पर अपने भोलेपन (या मूर्खता) के कारण अपने लगभग 55 युद्धबंदियों को भी पाकिस्तान से नहीं छुड़ा पाये और पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों को सही सलामत बिना एक भी खरौंच भी आए छोड़कर पाकिस्तान पहुंचा दिया| भारतीय युद्धबंदियों को पाकिस्तान ने बहुत ही यातना दे देकर मार दिया| यह हमारी कूटनीतिक पराजय थी|
फिर भी यह हमारी सैनिक विजय थी जिस पर हमें गर्व है| उस युद्ध में मारे गए सभी भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि | जो भी उस समय के पूर्व सैनिक जीवित हैं, उन सब को नमन | भारत माता की जय |
१६ दिसंबर २०१९

हमारे हृदय के एकमात्र राजा भगवान श्रीराम हैं ....

इस राष्ट्र भारतवर्ष में धर्म रूपी बैल पर बैठकर भगवान शिव ही विचरण करेंगे, भगवान श्रीराम के धनुष की ही टंकार सुनेगी और नवचेतना को जागृत करने हेतु भगवान श्रीकृष्ण की ही बांसुरी बजेगी| सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा होगी व असत्य और अन्धकार की शक्तियों का निश्चित रूप से पराभव होगा|
हमारे हृदय के एकमात्र राजा भगवान श्रीराम हैं| उन्होंने ही सदा हमारी ह्रदय भूमि पर राज्य किया है, और सदा वे ही हमारे राजा रहेंगे| अन्य कोई हमारा राजा नहीं हो सकता| हमारे ह्रदय की एकमात्र महारानी सीता जी हैं| वे हमारे ह्रदय की अहैतुकी परम प्रेमरूपा भक्ति हैं| वे ही हमारी गति हैं| वे ही सब भेदों को नष्ट कर हमें राम से मिला सकती हैं, अन्य किसी में ऐसा सामर्थ्य नहीं है| हमारे शत्रु कहीं बाहर नहीं, हमारे भीतर ही अवचेतन मन में छिपे बैठे विषय-वासना रुपी रावण और प्रमाद व दीर्घसूत्रता रूपी महिषासुर हैं|
राम से एकाकार होने तक इस ह्रदय की प्रचंड अग्नि का दाह नहीं मिटेगा, और राम से पृथक होने की यह घनीभूत पीड़ा हर समय निरंतर दग्ध करती रहेगी| राम ही हमारे अस्तित्व हैं और उनसे एक हुए बिना इस भटकाव का अंत नहीं होगा| उन से जुड़कर ही हमारी वेदना का अंत होगा|
अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए हमें स्वयं को भी और निर्वीर्य हो चुके असंगठित बिखरे हुए बलहीन समाज को भी संगठित व शक्तिशाली बनाना होगा| इसके लिए सूक्ष्म दैवीय शक्तियों की सहायता भी लेनी होगी| सिर्फ जयजयकार करने से काम नहीं चलेगा| निज जीवन में देवत्व को व्यक्त करना होगा| तभी हम स्वयं की, समाज की और धर्म की रक्षा कर सकेंगे|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ दिसंबर २०१९

भगवान स्वयं हम सब के समक्ष खड़े हैं, कहीं दूर नहीं हैं .....

भगवान स्वयं हम सब के समक्ष खड़े हैं, कहीं दूर नहीं हैं .....
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हम जहाँ हैं वहीं वृंदावन है, ठाकुर जी भी दूर नहीं, हमारे समक्ष ही खड़े हैं| इस हृदय की भावभूमि में जब से वे आए हैं, तब से स्वयं ही आड़े होकर फँस गए हैं| अब वे बाहर नहीं निकल सकते| कभी निकलेंगे भी नहीं| यही उनका आनंद है जिसमें हमारी भी प्रसन्नता है|
हमारे समक्ष भगवान स्वयं त्रिभंग मुद्रा में खड़े हैं| उन्होने कहीं भी अन्यत्र जाने के हमारे सारे मार्ग रोक दिये हैं| जंगल में यदि शेर सामने से आ जाये तो हम क्या कर सकते हैं? कुछ भी नहीं! जो करना है वह शेर ही करेगा| ऐसे ही जब भगवान स्वयं रास्ता रोक कर सामने खड़े हैं तो अन्यत्र जाएँ भी कहाँ? सर्वत्र तो वे ही वे हैं| उनकी यह त्रिभंग मुद्रा हमारे अज्ञान की तीन ग्रंथियों (ब्रह्म ग्रंथि, विष्णु ग्रंथि और रुद्र ग्रंथि) के भेदन की प्रतीक है| द्वादशाक्षरी भागवत मंत्र की एक विशिष्ट विधि से षड़चक्रों में जाप से इन ग्रंथियों का भेदन होता है| उनका एक नाम त्रिभंग-मुरारी है| मुर नामक असुर के वे अरि हैं इसलिए वे मुरारी हैं| यह मुर कौन है? हमारा आसुरी भाव और अज्ञान ही मुरासुर है जिसका नाश भगवान स्वयं ही कर सकते हैं| अपना परम प्रेम भगवान को दें और स्वयं को उन्हें समर्पित कर दें| भगवान बहुत भोले हैं| उन्हें ठगने का प्रयास न करें, अन्यथा वे चले जाएँगे| फिर वे ठगगुरु बन कर आएंगे और हमारा सब कुछ ठग लेंगे|
"ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्| मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः||४:११||"
उनका आदेश है .....
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः||९:३४||"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे||१८:६५||"
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हे प्रभु, आपकी जय हो .....
"कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे|
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्||११.३७||"
"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण-स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्|
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप||११.३८||"
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च|
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्त्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते||११.३९||"
"नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व|
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं-सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः||११.४०||"
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ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ दिसंबर २०१९

हिन्दू कौन है? .....

(प्रश्न). हिन्दू कौन है? .....
(उत्तर). मेरी व्यक्तिगत निजी मान्यता है कि जिस भी व्यक्ति के अन्तःकरण में परमात्मा के प्रति प्रेम और श्रद्धा-विश्वास है, जो आत्मा की शाश्वतता, पुनर्जन्म, कर्मफलों के सिद्धान्त, व ईश्वर के अवतारों में आस्था रखता है, वह हिन्दू है, चाहे वह विश्व के किसी भी भाग में रहता है और उसकी राष्ट्रीयता कुछ भी है|
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क्या हिन्दू माँ-बाप के घर जन्म लेने से ही हम हिंदु हैं? क्या दीक्षा लेकर ही कोई हिन्दू हो सकता है? या किसी दीक्षा की आवश्यकता ही नहीं है? इन सब प्रश्नों का उत्तर देना मेरे बौद्धिक सामर्थ्य से परे है| हिन्दू एक बहुत ही व्यापक नाम है जो विदेशियों ने दिया है| भारत के प्राचीन शास्त्रों में केवल धर्म और अधर्म का ही नाम है| धर्म को शास्त्रों ने परिभाषित किया है और धर्म के लक्षण बताए गए हैं, पर कहीं भी उसे सीमित नहीं किया गया है| धर्म को सीमाओं में नहीं बांध सकते| इस विषय पर अनेक स्वनामधन्य मनीषियों द्वारा इतना अधिक लिखा गया है कि उसका एक लाखवाँ भाग भी मैं नहीं लिख सकता| अतः यहाँ मैं अपनी निजी मान्यता की ही बात कर रहा हूँ|
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यह मेरी अपनी निजी दृढ़ मान्यता है इसलिए किसी विवाद का प्रश्न ही नहीं है| मैं अपना मार्गदर्शन गीता से लेता हूँ| वेदों को समझना मेरी बौद्धिक क्षमता से परे है| श्रुति-स्मृतियों व आगम शास्त्रों का मुझे कोई ज्ञान नहीं है| जो भी मेरा हृदय और अंतरात्मा कहती है उसे ही मैं मानता हूँ|
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आप सब परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्तियाँ हैं| आप सब को नमन|
ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ दिसंबर २०१९

जीवन का एक अति गूढ रहस्य ......

जीवन का एक अति गूढ रहस्य ......
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जब हम साँस लेते हैं तब यह सारी सृष्टि .... ये सारे प्राणी हमारे साथ ही साँस लेते हैं| सत्य तो यह है कि स्वयं सृष्टिकर्ता परमात्मा ही ये सांसें ले रहे हैं| उनसे पृथकता का आभास एक भ्रम है| वास्तव में हम यह मनुष्य देह नहीं, परमात्मा की अनंत सर्वव्यापकता हैं| वे ही सर्वस्व हैं| यह देह तो उनका उपकरण मात्र एक वाहन है जो इस जीवात्मा को अपनी लोकयात्रा के लिए दिया हुआ है| यह सारी सृष्टि, परमात्मा का ही एक संकल्प है| उन्हीं से इस सृष्टि का उद्भव है, वे ही जीवनाधार हैं, और उन्हीं में यह सृष्टि बापस विलीन हो जाएगी|
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इस सूक्ष्म देह के ब्रह्मरंध्र से परे जो अनंत महाकाश है, जिसमें समस्त सृष्टि समाहित है और जो सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है, उस परम चैतन्य को मैं परमशिव कहता हूँ| वे ही वासुदेव हैं, वे ही विष्णु हैं, वे ही नारायण, और वे ही पारब्रह्म परमात्मा हैं| उन परमशिव की जिस शक्ति ने, इस ब्रह्मांड, यानि इस सारी सृष्टि को धारण कर रखा है, और जो इस सारी सृष्टि को संचालित कर रही हैं, वे पराशक्ति भगवती जगन्माता हैं| यह सारा अनंताकाश परम ज्योतिर्मय है, उसमें कहीं कोई अंधकार नहीं है| वह अनंत प्रकाश और उसकी शाश्वत अनंतता ही हम हैं, यह नश्वर देह नहीं|
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प्राण-तत्व यानि प्राण-ऊर्जा के रूप में जगन्माता ब्रह्मरंध्र से सहस्त्रार होते हुए सुषुम्ना पथ से सब चक्रों को जीवंत करते हुए नीचे उतरती है| उनके स्पर्श से सब चक्र मंत्रमय हो जाते हैं, और उन चक्रों में जागृत ऊर्जा ही इस देह को जीवंत रखती है| मूलाधार को स्पर्श करते हुए वे बापस इसी पथ से बापस लौट जाती हैं| मेरी अनुभूति यह है कि मूलाधार के त्रिकोण पर एक शिवलिंग भी है जिसका स्पर्श कर और भी अधिक घनीभूत होकर ऊपर यह प्राणऊर्जा ऊपर उठती है| इसका घनीभूत रूप ही कुंडलिनी महाशक्ति है|
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इस प्राणऊर्जा के विचरण और स्पंदन की प्रतिक्रिया से ही हमारी साँसे चल रही हैं| यह अपने आप में एक बहुत बड़ा विज्ञान है जो एक न एक दिन भारत की पाठ्य पुस्तकों में भी पढ़ाया जाएगा|
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जो मुमुक्षु जीवन में परमात्मा को पाना चाहते हैं, उन्हें जब यह बात समझ में आ जाये तभी से अपना अधिक से अधिक समय परमात्मा के ध्यान में ही बिताना चाहिए| संसार में अधिकांश परिवारों में आध्यात्मिक रूप से अच्छा वातावरण नहीं होता| घर-परिवार के सदस्यों के नकारात्मक विचार अपना प्रभाव डाले बिना नहीं रहते| मेरी सलाह तो यह है कि विवाह और घर-गृहस्थी के बंधन में भी तभी पड़ना चाहिए जब होने वाले जीवन साथी के विचारों और सोच में साम्यता हो| विपरीत सेक्स का आकर्षण सबसे अधिक भटकाने वाला होता है| जिसने राग-द्वेष, लोभ व अहंकार को जीत लिया है वह वीतराग व्यक्ति ही विश्व-विजयी है| गीता में तो भगवान श्रीकृष्ण ने वीतरागता से भी आगे की बात कही है| सभी का कल्याण हो|
ॐ तत्सत !
कृपा शंकर
10 दिसंबर 2019