Saturday, 6 July 2019

हिंदुत्व क्या है और हिन्दू कौन है ? .....

हिंदुत्व क्या है और हिन्दू कौन है ? .....
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सौभाग्य से इस विषय पर मुझे बड़े बड़े स्वनामधन्य विचारक मनीषियों के विचार पढ़ने को मिले हैं| मेरा स्वतंत्र चिंतन भी है| अब तक के जीवन में जो भी स्वाध्याय किया है और जो भी अनुभव प्राप्त किये हैं, उनके आधार पर मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि हिंदुत्व के चार आधार हैं....
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(१) परमात्मा से अहैतुकी परमप्रेम (Total and Unconditional love of the Divine).
(२) आत्मा की शाश्वतता.
(३) कर्मफलों का सिद्धांत.
(४) पुनर्जन्म.
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उपरोक्त चार सिद्धांत ही हिंदुत्व के प्राण हैं|
अन्य भी कुछ सिद्धांत हैं पर वे परमात्मा के परमप्रेम में ही समाहित हो जाते हैं|
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सामान्यतः भारतवर्ष को अपनी पुण्यभूमि और पितृभूमि मानने को ही हिंदुत्व कहते हैं| पर विश्व की वर्तमान परिस्थितियों में हिंदुत्व को खंडित व सिकुड़े हुए भारत तक ही सीमित नहीं कर सकते| हिंदुत्व एक जीवन पद्धति है, कोई व्यवस्थित औपचारिक पंथ, मत, मज़हब या Religion नहीं|
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आज के परिप्रेक्ष्य में विश्व का वह हर व्यक्ति हिन्दू है जिसे परमात्मा से परमप्रेम है, और जो आत्मा की शाश्वतता, कर्मफल और पुनर्जन्म को मानता है|
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आप सब निजात्मगण, परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्तियाँ हैं, आप सब को नमन ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ जून २०१९

गीता के अनुसार क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म .....

गीता के अनुसार क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म .....
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गीता में भगवान कहते हैं .....
"शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्| दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्||१८:४३||"
अर्थात् शौर्य, तेज, धृति, दाक्ष्य (दक्षता), युद्ध से पलायन न करना, दान और ईश्वर भाव (स्वामी भाव) ये सब क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं|
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क्षत्रिय को क्षत्रिय इसलिये कहते हैं .... "क्षतात् त्रायत इति" कहीं भी किसी की क्षति हो रही तो वह उसे बचाता है| क्षत्रिय की स्वाभाविक प्रवृत्ति सदा दूसरे की रक्षा के लिये ही है|
"शौर्य" का अर्थ है .....चाहे जितना शक्तिशाली विरोधी हो, बिना घबराये उसके साथ युद्ध करने की तत्परता "शूरवीरता" है, केवल लड़ाई करना मात्र नहीं| जिसमें शूरवीरता नहीं है, वह क्षत्रिय नहीं हो सकता|
"तेज" अर्थात् प्रगल्भता, किसी भी परिस्थिति में दूसरे से पराभूत नहीं होना, यानि दूसरे से दबना नहीं|
"धृति" यानी धैर्य, यानि कभी भी उदास नहीं होना|
"दाक्ष्यम्" यानि दक्षता|
"युद्धे चाप्यपलायनं" .... युद्ध से कभी भागना नहीं|
"दानम्," यानि दान देने में मुक्तहस्तता|
"ईश्वरभावः" ..... जो अधर्म का आचरण करते हैं उनको दण्ड देते समय अपनी प्रभुता को प्रकट करना, अर्थात् दण्ड देने में कभी पीछे नहीं हटना| जिनके ऊपर शासन करना है उन्हें अपराध करने पर दण्ड देना ईश्वरभाव है| जैसे भगवान पापियों को पाप का दण्ड देते हैं, पुण्यात्मा को पुण्य का पुरस्कार देते हैं इसी प्रकार ईश्वर का भाव होने के कारण जो क्षत्रिय होता है वह अधर्माचरण करने वाले को दण्ड देता ही है|
ये क्षत्रिय जाति के स्वभावज कर्म हैं|
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जून २०१९

ब्राह्मण कौन ? ....

. ब्राह्मण कौन ?
ब्राह्मण वह है जो अपने स्वाभाविक कर्मों में रत है| मनुस्मृति में मनु महाराज ने ब्राह्मणों के तीन स्वाभाविक कर्म बताए हैं, वहीं गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणों के नौ स्वाभाविक कर्म बताये हैं|
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भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं .....
"शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च | ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ||१८:४२||
अर्थात् शम? दम? तप? शौच? क्षान्ति? आर्जव? ज्ञान? विज्ञान और आस्तिक्य ये ब्राह्मण के स्वभाविक कर्म हैं||
और भी सरल शब्दों में ब्राह्मण के स्वभाविक कर्म हैं ..... मनोनियन्त्रण, इन्द्रियनियन्त्रण, शरिरादि के तप, बाहर-भीतर की सफाई, क्षमा, सीधापन यानि सरलता, शास्त्र का ज्ञान और शास्त्र पर श्रद्धा|
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मनु महाराज ने ब्राह्मण के तीन कर्म बताए हैं ....."वेदाभ्यासे शमे चैव आत्मज्ञाने च यत्नवान्"| अर्थात अन्य सारे कर्मों को छोड़कर भी वेदाभ्यास, शम और आत्मज्ञान के लिए निरंतर यत्न करता रहे|
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इनके अतिरिक्त ब्राह्मण के षटकर्म भी हैं, जो उसकी आजीविका के लिए हैं| पर यहाँ हम उन स्वभाविक कर्मों पर ही विचार कर रहे हैं जो भगवान श्रीकृष्ण ने और मनु महाराज ने कहे हैं|
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ब्राह्मण के लिए संध्या और गायत्री मन्त्र का जप भी अनिवार्य है| संधिकाल में की गयी साधना को संध्या कहते हैं| चार मुख्य संधिकाल हैं..... प्रातः, सायं, मध्याह्न और मध्यरात्रि| पर भक्तों के लिए दो साँसों के मध्य का संधिकाल सर्वाधिक महत्वपूर्ण है| हर सांस के साथ आत्म-तत्व का अनुसंधान होना चाहिए| इसे हंस-गायत्री और अजपा-जप भी कहते हैं| ब्राह्मण के लिए गायत्रीमंत्र की कम से कम दस आवृतियाँ अनिवार्य हैं|
*****जो ब्राह्मण दिन में एक बार भी गायत्रीमंत्र का पाठ नहीं करता उसका ब्राह्मणत्व से उसी समय पतन हो जाता है और वह शुद्र हो जाता है|*****
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जून २०१९
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(पुनश्चः :-- यह एक संक्षिप्त लेख है जिसमें कम से कम शब्दों में अपने भावों को व्यक्त किया है)

प्रत्येक सूर्योदय परमात्मा की ओर से एक सन्देश है .....

प्रत्येक सूर्योदय परमात्मा की ओर से एक सन्देश है .....
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प्रत्येक सूर्योदय परमात्मा की ओर से एक सन्देश है, और प्रत्येक सूर्यास्त परमात्मा का हस्ताक्षर है| ब्रह्ममुहूर्त में जगन्माता की गोद से उठकर अपने दिन का आरम्भ परमात्मा के गहनतम ध्यान से करें| पूरे दिन परमात्मा की स्मृति बनाए रखें| जब भी समय मिले परमात्मा का ध्यान करें| रात्री को सोने से पूर्व पुनश्चः परमात्मा का गहनतम ध्यान कर के जगन्माता की गोद में ही निश्चिन्त होकर एक छोटे बालक की तरह सो जाएँ| हम बिस्तर पर नहीं, माँ भगवती की गोद में सोते हैं, सिर के नीचे कोई तकिया नहीं, माँ भगवती का वरद हस्त होता है| जिसने सारी सृष्टि का भार उठा रखा है वह हम अकिंचन की देखभाल करने में समर्थ है| सारी चिंताएँ उन्हें सौंप दें| एकमात्र कर्ता वे ही हैं|
गीता में भगवान कहते हैं ....
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते| तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्||९:२२||
अर्थात् "अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ||"
इस से बड़ा आश्वासन और क्या हो सकता है?
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उन्हें हृदय के गहनतम भावों से नमन है .....
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च|
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते||११:३९||"
"नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व|
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः||११:४०||
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भजन .....
मैं नहीं, मेरा नहीं, यह तन किसी का है दिया।
जो भी अपने पास है, वह धन किसी का है दिया।
देने वाले ने दिया, वह भी दिया किस शान से।
"मेरा है" यह लेने वाला, कह उठा अभिमान से
"मैं", ‘मेरा’ यह कहने वाला, मन किसी का है दिया।
मैं नहीं......
जो मिला है वह हमेशा, पास रह सकता नहीं।
कब बिछुड़ जाये यह कोई, राज कह सकता नहीं।
जिन्दगानी का खिला, मधुवन किसी का है दिया।
मैं नहीं......
जग की सेवा खोज अपनी, प्रीति उनसे कीजिये।
जिन्दगी का राज है, यह जानकर जी लीजिये।
साधना की राह पर, यह साधन किसी का है दिया।
जो भी अपने पास है, वह सब किसी का है दिया।
मैं नहीं......
(प्रचलित भजन)
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१२ जून २०१९

Monday, 10 June 2019

माया का आकर्षण मनुष्य के कल्याण के लिए ही है ....

माया का आकर्षण मनुष्य के कल्याण के लिए ही है| परमात्मा की सृष्टि में जो कुछ भी सृष्ट है वह सृष्टि के कल्याण के लिए ही हो सकता है, किसी अनिष्ट के लिए नहीं| भगवान की माया का आवरण और विक्षेप भी मनुष्य के कल्याण के लिए ही है| इस समय मेरे मानस पटल पर संसार की अनेक विसंगतियाँ हैं, जो समझ से परे हैं| मैनें इन सब विसंगतियों का कारण जानने की इच्छा की तो मुझे अंतर में स्पष्ट उत्तर मिला कि भगवान ने मनुष्य को माया का आकर्षण यह देखने के लिए दिया है कि संभवतः कोई तो इस मायाजाल से ऊपर उठकर उन मायापति को जानने का प्रयास करेगा जिन्होनें इस सृष्टि की रचना की है| हमारी सब समस्याओं का पता भगवान को है| सब समस्याएँ उन्हीं की हैं, हम तो जबरदस्ती ही उन समस्याओं को पकड़ कर बैठे हैं| हमारी एकमात्र समस्या परमात्मा को प्राप्त करना है, अन्य कोई समस्या हमारी नहीं है|
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गुरु महाराज ने भी कहा है कि तुम्हारी एकमात्र समस्या ईश्वर को प्राप्त करना है, कूटस्थ में ईश्वर का सदा निरंतर ध्यान करो, अपना सर्वश्रेष्ठ प्रेम उन्हें दो, फिर अन्य सब समस्याएँ भी उन्हीं की हैं|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ जून २०१९

आसनं उपासनं, अच्युतस्य पादाम्बुजोपासनं .....

आसनं उपासनं, अच्युतस्य पादाम्बुजोपासनं .....
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भगवान अच्युत हैं, उन के चरण कमलों में आसन जमा लो| एक पुरानी कहानी है .... एक मछली मारने वाला मछुआरा नदी में जाल फैलाकर मछली पकड़ रहा था, वहीं एक संत नहा रहे थे| एक मछली ने संत को देखा और उन से प्रार्थना की कि हे महाराज, मुझे बचा लो| संत ने संकेत किया कि तुम मछुआरे के पाँव के पास चली जाओ| मछली मछुआरे के पाँव के पास ही रही, अंततः मछली जाल में नहीं फँसी, जाल से छूट गयी| यह जो मायाजाल जिसने फैलाया हुआ है, उसके चरणों में बैठ जाओ| मायाजाल में नहीं फँसोगे|
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दाल दली जा रही थी, आटा पिसा जा रहा था। उसमें था एक घुन जिसने अपने गुरुदेव का स्मरण किया| गुरुदेव ने कहा कि तुम कील के पास चले जाओ, जहाँ से चक्की घूमती है| वह तो बच गया, पर अन्य सारे पिस गए| यह संसार जिस कील पर घूम रहा है, यह मायाजाल जिसने बनाया है, उसके चरणों में जाकर बैठ जाओ| कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता|
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प्रार्थना :--- हे जगन्माता, हे परमशिव, जैसे सारी नदियाँ समुद्र में समाहित होती हैं वैसे ही ये सारी दृष्टियाँ आप में ही समाहित हैं| हमें इतनी सामर्थ्य दो की हम अपना दिव्य प्रेमरस .... शत्रु और मित्र दोनों में समान रूप में परोस सकें|
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इति शुभम् ! ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
८ जून २०१९

पृथ्वी पर नर्क .....

पृथ्वी पर नर्क .....
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यह सत्य है कि इसी पृथ्वी पर कई ऐसे स्थान हैं जो साक्षात् नर्क हैं| कुछ तो ऐसे देश भी हैं जहाँ जन्म लेना और रहना ही नर्क की सजा है| सार्वजनिक रूप से किसी देश को नर्क बताना अनुचित है अतः मैं ऐसे देशों के नाम नहीं लिखूँगा|
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कुछ देशों में ऐसे स्थान हैं जो वास्तव में नर्क हैं| उनके बारे में सार्वजनिक चर्चा हो सकती है| कई ऐसे पर्यटकों ने जिन्होनें पूरे विश्व की यात्रा की है, पृथ्वी पर दस ऐसे स्थानों के बारे में लिखा है जो वास्तव में नर्क के द्वार हैं| ऐसा ही एक स्थान "डानाकिल डिप्रेशन" है जो उत्तरी अफ्रीकी देश इथियोपिया के अफ़ार इलाक़े में समुद्र तल से लगभग एक-सौ मीटर नीचे है| यह विश्व का सबसे अधिक गर्म और सूखा स्थान है| यहाँ का तापमान ५० से ५५ डिग्री सेल्सियस के आसपास या अधिक ही रहता है फिर भी लोग यहाँ रहते हैं| यहाँ वर्षा नहीं के बराबर होती है| यहाँ भूमिगत एक ज्वालामुखी है जहाँ से गर्म पानी के झरने निकलते हैं जो गर्मियों में सूख जाते हैं| वे सूखे हुए झरने नमक की एक चट्टान बन जाते हैं| वह नमक बिलकुल सैंधे नमक जैसा होता है| उस नमक की चट्टान को तोड़कर बेचना ही यहाँ के लोगों का व्यवसाय है जिस की आय पर ये जीवित रहते हैं| यहाँ से सबसे पास मेकेले नाम का एक नगर है, जहाँ पर ये लोग गधों और ऊंटों पर नमक लाद कर बेचने लाते हैं| इस नगर तक गधों और ऊँट पर यात्रा करने में पांच-सात दिन लग जाते हैं|
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दूसरे देशों से यहाँ आने लोग इसे नर्क का द्वार कहते हैं|
कभी समय मिला तो इसी पृथ्वी पर नर्क के अन्य नौ द्वारों के बारे में भी लिखूंगा|
कृपा शंकर
६ जून २०१९