Wednesday, 14 November 2018

प्रथम विश्व युद्ध में मारे गए सभी भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि .....

प्रथम विश्व युद्ध में मारे गए सभी भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि .....
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आज से पूरे एक-सौ वर्ष पूर्व ११ नवम्बर १९१८ को प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हुआ, जो २८ जुलाई १९१४ को आरम्भ हुआ था| भारत उस समय पराधीन था| इस युद्ध में ब्रिटिश आंकड़ों के अनुसार मारे गए सभी ७४,१८७ भारतीय सिपाहियों को श्रद्धांजलि| भगवान उन सब को सद्गति दे|
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वे तो बेचारे अपनी आजीविका के लिए ब्रिटिश-भारतीय सेना में भर्ती हुए थे जिन्हें ब्रिटिश हितों की रक्षा के लिए युद्ध की आग में ईंधन की तरह झोंक दिया गया और वे विदेशी धरती पर ही मारे गए| उनका कोई अंतिम संस्कार भी नहीं हुआ| जयपुर राज्य के शेखावाटी क्षेत्र (जहाँ मैं रहता हूँ) के ही लगभग ७००० सिपाही इस युद्ध में मारे गए थे|
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इस युद्ध में दस लाख से अधिक भारतीय सेना ने भाग लिया जो ब्रिटेन के आधीन थी| ६२,००० से अधिक सिपाही तो युद्ध के मोर्चे पर ही मारे गए, और ६७,००० से अधिक घायल हुए| ब्रिटिश आंकड़ों के अनुसार कुल ७४,१८७ भारतीय ब्रिटिश सिपाही इस युद्ध में मरे| ये जर्मनी के विरुद्ध पूर्वी अफ्रिका और पश्चिमी यूरोप में मारे गए थे|

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एक बात जो बताई नहीं जाती और छिपाई गयी है वह यह कि प्रथम और द्वितीय दोनों विश्वयुद्धों में सबसे अधिक सैनिक भारत के ही मारे गए थे| भारत चूंकि ब्रिटेन के आधीन था अतः असहाय था इसलिए भारत के सैनिकों को बलि के बकरों यानि युद्ध में चारे के रूप में मरवाया गया था|
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काश ! प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने वाले भारत के उन दस लाख सिपाहियों में समाज और राष्ट्र की चेतना होती और उनकी बंदूकों का मुंह अंग्रेजों की ओर मुड़ गया होता ! द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद आज़ाद हिन्द फौज द्वारा यही हुआ और अंग्रेजों को भारत छोड़कर भागना पडा| दुर्भाग्य से भारत को आज़ाद कराने का श्रेय आज़ाद हिन्द फौज को नहीं मिला और भारत की सत्ता अंग्रेजों के मानस पुत्रों के हाथ ही आ गयी|
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उन सभी दिवंगत सैनिकों को श्रद्धांजलि !
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ नवम्बर २०१८

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निम्न डॉ.विवेक आर्य के लेख से लिया गया है :---

प्रथम विश्व युद्ध में आधिकारिक रूप से 1215318 भारतीय सैनिकों ने भाग लिया जिनमें से 101439 मारे गए। 64350 घायल हुए जिनमें से अनेक की मृत्यु बाद में उन्हीं घावों के कारण हुई, 3762 लापता हुए अथवा युद्धबंदी हुए। आपको जानकर अचरज होगा कि युद्ध सम्बंधित अंग्रेजों द्वारा लिखित पुस्तकों में भारतीयों के योगदान चंद शब्दों में अथवा फुटनोट में केवल खानापूर्ति के लिए प्रस्तुत किया गया हैं। यहाँ तक की बीबीसी द्वारा प्रथम विश्व युद्ध पर 12 भागों में बनाई गई 23 घंटे 30 मिनट की डॉक्यूमेंट्री में भारतीयों को एक मिनट से भी कम समय दिया गया। अकेले पंजाब क्षेत्र से उन दिनों 470000 सैनिक लोग अंग्रेज सेना में शामिल हुए जिनमें से 70000 गैर सैनिक थे।
2. अधिकांश भारतीय सैनिक ऐसे विदेशी मोर्चों पर लड़े जहाँ का उन्होंने कभी नाम तक नहीं सुना था। न उनके पास जर्मन फौज के समान आधुनिक हथियार थे। न ही सर्दियों के कपड़े थे। अफ्रीका की गर्मी से लेकर यूरोप की कड़कड़ाती ठण्ड में सैनिकों को लड़ना पड़ा। आवश्यक संसाधनों से विहीन होते हुए भी सिख, गोरखा, बलूच, पंजाबी, कुमायूं, गढ़वाली, पठान,राजपूत, जाट, डोगरा, मराठा और मद्रास रेजिमेंट के अनेक सैनिकों ने अपनी बहादुरी और शौर्य की ऐसी गाथाएं लिखी। जो इतिहास में अपन विशेष महत्व रखती हैं। जिन सैनिकों की युद्ध में वीरगति हुई उन्हें से अनेकों को अंतिम सम्मान तक नहीं मिला। उनकी लाशें या तो युद्धक्षेत्र में ही दबा दी गई अथवा पशुओं का ग्रास बनी।
3. केवल सैनिक ही नहीं भारत देश के बाहर जब इतनी बड़ी सेना लड़ रही हो तो देश के संसाधन जैसे अन्न, गोला-बारूद, राशन, युद्ध सामग्री, कपड़े ,घोड़े से लेकर धन को भी विदेश भेजा गया। 1914 में भारत से युद्ध के नाम पर 100 मिलियन पौंड की राशि भी ब्रिटेन भेजी गई। इसके अतिरिक्त अन्य राशि भी भेजी गई जिसका कुल जोड़ उस काल में 146.2 मिलियन पौण्ड बैठता था। उस काल में भारत में न केवल अकाल पड़ा था, अपितु इन्फ्लुएंजा का भी देशव्यापी प्रकोप था। गरीबी, अशिक्षा से ग्रस्त देश में पहले से ही कठिन परिस्थितियां थी। ऐसे में देश पर युद्ध के नाम पर अतिरिक्त कर भी अंग्रेजों ने लाद दिया था।
4. सन 1914 से 1916 तक सेना में भारतीयों ने प्रवेश अपनी इच्छा से लिया। 1917 से अंग्रेजों ने जोर-जबरदस्ती करना आरम्भ कर दिया। पंजाब के तत्कालीन गवर्नर डायर ने 2 लाख लोगों की सेना में भर्ती का संकल्प लिया। उसके संकल्प के कारण स्थानीय जमींदारों और लम्बरदारों ने प्रजा पर अत्याचार आरम्भ कर दिया। उन परिवारों की सूची बनाई गई जिनके पास एक से अधिक युवा लड़के थे। धन-बल का भर्ती के लिए प्रयोग किया गया। जिन किसानों ने अपने बेटों को देने से मना कर दिया उन पर भारी कर लगा दिया गया। यह कर 300% तक भी गया। अटक और मियांवाली के किसान भाग कर नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस चले गये ताकि भर्ती से बच सके। मुल्तान में खेतिहर किसानों के भर्ती न होने पर खेतों को पानी तक रोक दिया गया। ऐसे अनेक अत्याचार उस काल में किये गए। एक सिपाही को 11 रुपये मासिक, एक तोपची को 14 रुपये और एक घोड़े के साथ 34 रुपये मासिक दिए जाते थे।
5. युद्ध क्षेत्र में बिमारियों की भरमार थी। बड़ी संख्या में सिपाही बीमारी से हताहत हो जाते थे। जत्थे के जत्थे एक ही बीमारी से एकसाथ ग्रस्त हो जाते थे। इनका नाम भी उस बीमारी के नाम से हो जाता था जैसे खसरा जत्था, काली खांसी जत्था, स्कारलेट बुखार जत्था, ट्रेंच बुखार जत्था आदि। अनेक सिपाहियों की मृत्यु तो रात में बर्फ में जम जाने से भी हो जाती थी। अंग्रेज सैनिक जहाँ कुछ दिनों के युद्ध के पश्चात छुट्टी पर चले जाते थे वहीं भारतीय सैनिकों को कभी कोई छुट्टी नहीं मिलती थी। एक तो वे अपने घरों से बहुत दूर थे। दूसरे उन्हें वापिस भारत लाने के लिए समुद्री जहाज उपलब्ध नहीं थे। तीसरे भेदभाव के चलते अंग्रेज उन्हें केवल युद्ध में लगाए रखना चाहता था। युद्धरत सैनिक अपनी मातृभाषा जैसे हिंदी, उर्दू, गुरुमुखी आदि में जो खत अपने परिवार को लिखते थे। वे सभी खत सीधे घर नहीं जाते थे। उनका न केवल अंग्रेज लोग अनुवाद करवाते थे अपितु उनमें से अनेकों को नष्ट कर दिया जाता था। युद्ध की कठिन परिस्थितियों, युद्धनीति, अंग्रेज महिलाओं के विषय में जानकारी, युद्ध क्षेत्र में शत्रु की बमवर्षा से लेकर संसाधनों की घोर कमी, बिमारियों , जर्मन सैनिकों की प्रशंसा , भारतीय सैनिकों का अंग्रेजों के प्रति विरोध आदि के विषय में अगर कोई जानकारी होती तो उसे छुपा लिया जाता था। ऐसे अनेक खत थे जिनमें लिखा था कि शत्रु की गोलीबारी ऐसे होती है, जैसा वर्षा हो रही हो। लाशों के ढेर मक्की की फसल के समान युद्धक्षेत्र में लगे हुए है। अंग्रेज नर्स भारतीय सैनिकों की चिकित्सा सेवा नहीं करती थी। क्यूंकि अंग्रेजों को लगता था कि उनकी जाति श्रेष्ठ है और काले भारतीयों की उनसे कोई तुलना नहीं हैं। उन्हें यह किसी भी प्रकार से स्वीकार नहीं था कि किसी भारतीय सैनिक का किसी गोरी महिला से किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध स्थापित हो।
6. अफ्रीका से लौटकर आये महात्मा गाँधी की भूमिका विश्व युद्ध के सम्बन्ध में जानना अत्यंत आवश्यक है। यह सत्य है कि अंग्रेजों ने विश्व युद्ध भारत के सैनिक और संसाधनों के बल पर लड़ा। अगर भारत का साथ अंग्रेजों को न मिलता तो उनकी जर्मन के आगे हार सुनिश्चित थी। ऐसी परिस्थिति में भारत स्वत: ही स्वतंत्र हो जाता। मगर महात्मा गाँधी को अंग्रेजों ने युद्ध में साथ देने के बदले एक वायदा दिया कि बदले में भारतीयों को शासन में भागीदारी दी जाएगी। यह अधिकार कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे कामनवेल्थ देशों को मिले अधिकारों के जैसा होगा। मगर हुआ बिलकुल विपरीत। युद्ध समाप्त होने पर अंग्रेज अपने वायदे को भूल गए। उन्होंने भारतीयों के अधिकार देने के विपरीत उस काल का सबसे विवादित काला कानून रौलेट एक्ट दिया। जिसमें किसी को कभी भी बिना कारण बताये कितने भी समय के लिए राष्ट्रद्रोह के लिए हिरासत में लिया जा सकता था। इस कानून के विरोध में हुई जनसभा पर निरीह भीड़ पर गोलीबारी कर डायर ने 1919 में जलियांवाला कांड को अंजाम दिया था। भारतीयों के घावों पर नमक लगाते हुए नग्रेजों ने इस अत्याचार के लिए उसे सम्मानित किया था। महात्मा गाँधी की असफलताओं की लम्बी सूची में यह यह एक ओर असफलता थी।
इन उदहारणों से यह स्पष्ट होता है कि सोने की चिड़िया कहलाने वाले हमारे देश को अंग्रेजों ने किस प्रकार से खोखला कर दिया। उस काल में अंग्रेजों की नौकरी करने वाले भारतीयों को आर्यसमाज के शीर्घ नेता स्वामी श्रद्धानन्द कहा करते थे कि
" क्या तुम चंद रुपयों के लिए गोरे साहिब को सल्यूट करते हो। क्या तुम्हारा आत्म-स्वाभिमान समाप्त हो चूका है?"
यही प्रश्न अंग्रेजों के हिमायती साम्यवादी से भी है जो इन सत्य तथ्यों को कभी स्वीकार नहीं करते।
[यह लेख संक्षिप्त रूप में दिया गया है। हिंदुस्तान टाइम्स दिनांक 11 नवंबर, दिल्ली, अंग्रेजी संस्करण के आधार पर यह सामग्री लिखी गई है।]

Saturday, 10 November 2018

त्याग किस का और कैसे करें (क्या अभी भी कोई उम्मीद बाकी है?) .....

त्याग किस का और कैसे करें (क्या अभी भी कोई उम्मीद बाकी है?) .....
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व्यक्ति भावावेश में आकर त्याग करने का निश्चय तो कर लेता है, पर बाद में उसका चित्त उठ आता है और किन्तु-परन्तु के अनेक विचार आने लगते हैं और त्याग पता नहीं कहाँ चला जाता है| इस तरह के कई मामले देखे हैं|
वास्तव में त्याग भगवान की परम कृपा से ही होता है, सिर्फ संकल्प शक्ति से नहीं| त्याग से ही परम शांति मिलती है|
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गीता के अनुसार चार चीजों का त्याग होता है :---
(१) जो प्राप्त नहीं है उसकी कामना|
(२) जो प्राप्त है उसकी ममता|
(३) निर्वाह की स्पृहा, यानि जीवन यापन की चिंता|
(४) अहंकार और अपेक्षा|
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गीता में भगवान कहते हैं .....
"विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः| निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति||२:७१||"

भावार्थ : जो मनुष्य समस्त भौतिक कामनाओं का परित्याग कर इच्छा-रहित, ममता-रहित और अहंकार-रहित रहता है, वही परम-शांति को प्राप्त कर सकता है||
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जिस भी साधक को यह त्याग सिद्ध हो जाए तो उसे स्थितप्रज्ञ होने में देरी नहीं लगती| वह ब्राह्मी स्थिति को भी प्राप्त कर सकता है| भगवान कहते हैं.....
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति| स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति||२:७२||
भावार्थ : हे पार्थ! यह आध्यात्मिक जीवन (ब्रह्म की प्राप्ति) का पथ है, जिसे प्राप्त करके मनुष्य कभी मोहित नही होता है, यदि कोई जीवन के अन्तिम समय में भी इस पथ पर स्थिति हो जाता है तब भी वह भगवद्‍प्राप्ति करता है||
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इसका अर्थ है अभी भी उम्मीद बाकी है| निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है| भगवान से प्रार्थना करेंगे तो वे अपनी कृपा अवश्य करेंगे|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० नवम्बर २०१८

अपने शिवत्व की ओर हम निरंतर अग्रसर रहें ....

पूर्णता शिव में है, जीव में नहीं.
अपने शिवत्व की ओर हम निरंतर अग्रसर रहें .....
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भगवान भुवन-भास्कर आदित्य की तरह हम अपने पथ पर चलते रहें| अपनी विफलताओं व सफलताओं की परवाह न करें, उनका आना-जाना एक अवसर था कुछ सिखाने के लिए| हमारा कार्य सिर्फ चलते रहना है क्योंकि ठहराव मृत्यु और चलते रहना ही जीवन है| इस यात्रा में वाहन यह देह पुरानी और जर्जर हो जायेगी तो दूसरी देह मिल जायेगी, पर अपनी यात्रा को मत रोकें, चलते रहें, चलते रहें, चलते रहें, तब तक चलते रहें, जब तक अपने लक्ष्य परमात्मा को न पा लें|
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अंशुमाली मार्तंड भगवान सूर्य अपनी दिव्य आभा और प्रकाश के साथ जब अपने पथ पर अग्रसर होते हैं, तब उन्हें क्या इस बात की चिंता होती है कि मार्ग में क्या घटित हो रहा है? निरंतर अग्रसर वे ही इस साधना पथ पर हमारे परम आदर्श हैं जो सदा प्रकाशमान और गतिशील हैं|
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हमारे कूटस्थ आत्मसूर्य की आभा निरंतर सदा हमारे समक्ष रहे, वास्तव में वह आत्मसूर्य हम स्वयं ही हैं| उस ज्योतिषांज्योति आत्मज्योति के चैतन्य को निरंतर प्रज्ज्वलित रखें और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को उसी में विलीन कर दें| वह कूटस्थ ही परमशिव है, वही नारायण है, वही विष्णु है, वही परात्पर गुरु है और वही परमेष्ठी परब्रह्म हमारा वास्तविक अस्तित्व है|
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जो नारकीय जीवन हम जी रहे हैं उससे तो अच्छा है कि अपने लक्ष्य की प्राप्ति का प्रयास करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दें| या तो यह देह ही रहेगी या लक्ष्य की प्राप्ति ही होगी जो हमारे जीवन का सही और वास्तविक उद्देश्य है| भगवान हमें सदा सफलता दें|
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ॐ तत्सत् ! ॐ शिव ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० नवम्बर २०१८

यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः :----

यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः :----

देश में कई तरह के विवाद चल रहे हैं| मेरी सोच स्पष्ट है, किसी भी तरह का कोई भ्रम या कोई शंका नहीं है| जो राष्ट्र और धर्म के पक्ष में है उसका मैं समर्थक हूँ| जहाँ अधर्म है और जिस से राष्ट्र का अहित है, उसका मैं विरोध करता हूँ| अंततः एक ही बात कहूंगा कि धर्म की जय हो और अधर्म का नाश हो|

"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः| तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवानीतिर्मतिर्मम||१८:७८||
(जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं, और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन है, वहीं पर श्री विजय विभूति और ध्रुव नीति है, ऐसा मेरा मत है||) हर हर महादेव !

क्या "राम नाम सत्" और "ॐ तत्सत्" दोनों का अर्थ एक ही है ? .....

क्या "राम नाम सत्" और "ॐ तत्सत्" दोनों का अर्थ एक ही है ? .....
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:"ॐ तत्सत्" शब्द परमात्मा की ओर किया गया एक निर्देश है| इस का प्रयोग गीता के हरेक अध्याय के अंत में किया गया है ....."ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुन ... ."
इस शब्द का विशेष प्रयोग भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के सत्रहवें अध्याय के २३ वें श्लोक में किया है .....
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः| ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा||१७:२३||
इस का भावार्थ है ..... सृष्टि के आरम्भ से "ॐ" (परम-ब्रह्म), "तत्‌" (वह), "सत्‌" (शाश्वत) इस प्रकार से ब्रह्म को उच्चारण के रूप में तीन प्रकार का माना जाता है, और इन तीनों शब्दों का प्रयोग यज्ञ करते समय ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करके ब्रह्म को संतुष्ट करने के लिये किया जाता है|
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ईसाई मत में इसी की नक़ल कर के "Father Son and the Holy Ghost" की परिकल्पना की गयी है| गहराई से यदि चिन्तन किया जाए तो "Father Son and the Holy Ghost" का अर्थ भी वही निकलता है जो "ॐ तत्सत्" का अर्थ है|
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कल ६ नवम्बर को मैनें राम नाम के ऊपर एक लिखा था जिसमें वह कारण बताया था कि मृतक की शवयात्रा में "राम नाम सत्" का उद्घोष क्यों करते हैं| उस लेख की टिप्पणी में भुवनेश्वर के प्रख्यात वैदिक विद्वान् माननीय श्री अरुण उपाध्याय जी ने बड़े संक्षेप में एक बड़ी ज्ञान की बात कह कर सप्रमाण सिद्ध कर दिया कि "राम नाम सत्" और "ॐ तत्सत्" इन दोनों का अर्थ भी एक ही है, अतः यह लेख मुझे लिखना पड़ रहा है|
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जब प्राण की गति होती है, जैसे शरीर से बाहर निकला, तो वह "ॐ" से "रं" हो जाता है ..... प्राणो वै रं, प्राणे हि इमानि सर्वाणि भूतानि रमन्ते (बृहदारण्यक उपनिषद्, ५/१२/१)| किसी व्यक्ति को निर्देश (तत् = वह) करने के लिये उसका नाम कहते हैं| अतः ॐ तत् सत् का ’राम नाम सत्'’ भी हो जाता है|
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एक समय सनकादि योगीश्वरों, ऋषियों और प्रह्लाद आदि महाभागवतों ने श्रीहनुमानजी से पूछा ..... हे महाबाहु वायुपुत्र हनुमानजी ! आप यह बतलानेकी कृपा करें कि वेदादि शास्त्रों, पुराणों तथा स्मृतियों आदि में ब्रह्मवादियों के लिये कौन सा तत्त्व उपदिष्ट हुआ है, विष्णुके समस्त नामों में से तथा गणेश, सूर्य, शिव और शक्ति .... इनमें से वह तत्त्व कौन-सा है ?
इस पर हनुमानजी बोले – हे मुनीश्वरो ! आप संसारके बन्धन का नाश करने वाली मेरी बातें सुनें | इन सब वेदादि शास्त्रोंमें परम तत्त्व ब्रह्मस्वरूप तारक ही है । राम ही परम ब्रह्म हैं | राम ही परम तपःस्वरूप हैं | राम ही परमतत्त्व हैं | वे राम ही तारक ब्रह्म हैं --
भो योगीन्द्राश्चैव ऋषयो विष्णुभक्तास्तथैव च ।
शृणुध्वं मामकीं वाचं भवबन्धविनाशिनीम् ।।
एतेषु चैव सर्वेषु तत्त्वं च ब्रह्मतारकम् ।
राम एव परं ब्रह्म राम एव परं तपः ।।
राम एव परं तत्त्वं श्रीरामो ब्रह्म तारकम् ।।
(रामरहस्योपनिषद्)
(‘कल्याण’ पत्रिका; वर्ष – ८८, संख्या – ४ : गीताप्रेस, गोरखपुर)
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गीता में "ॐ तत्सत्" का अर्थ .....
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गीता के सत्रहवें अध्याय के अंतिम छः श्लोक "ॐ तत्सत्" का अर्थ बतलाते हैं....
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥ (२३)
भावार्थ : सृष्टि के आरम्भ से "ॐ" (परम-ब्रह्म), "तत्‌" (वह), "सत्‌" (शाश्वत) इस प्रकार से ब्रह्म को उच्चारण के रूप में तीन प्रकार का माना जाता है, और इन तीनों शब्दों का प्रयोग यज्ञ करते समय ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करके ब्रह्म को संतुष्ट करने के लिये किया जाता है। (२३)
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्तः सततं ब्रह्मवादिनाम्‌॥ (२४)
भावार्थ : इस प्रकार ब्रह्म प्राप्ति की इच्छा वाले मनुष्य शास्त्र विधि के अनुसार यज्ञ, दान और तप रूपी क्रियाओं का आरम्भ सदैव "ओम" (ॐ) शब्द के उच्चारण के साथ ही करते हैं। (२४)
तदित्यनभिसन्दाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्चविविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥ (२५)
भावार्थ : इस प्रकार मोक्ष की इच्छा वाले मनुष्यों द्वारा बिना किसी फल की इच्छा से अनेकों प्रकार से यज्ञ, दान और तप रूपी क्रियाऎं "तत्‌" शब्द के उच्चारण द्वारा की जाती हैं। (२५)
सद्भावे साधुभावे च सदित्यतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥ (२६)
भावार्थ : हे पृथापुत्र अर्जुन! इस प्रकार साधु स्वभाव वाले मनुष्यों द्वारा परमात्मा के लिये "सत्" शब्द ‍का प्रयोग किया जाता है तथा परमात्मा प्राप्ति के लिये जो कर्म किये जाते हैं उनमें भी "सत्‌" शब्द का प्रयोग किया जाता है। (२६)
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्यवाभिधीयते ॥ (२७)
भावार्थ : जिस प्रकार यज्ञ से, तप से और दान से जो स्थिति प्राप्त होती है, उसे भी "सत्‌" ही कहा जाता है और उस परमात्मा की प्रसन्नता लिए जो भी कर्म किया जाता है वह भी निश्चित रूप से "सत्‌" ही कहा जाता है। (२७)
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्‌ ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ (२८)
भावार्थ : हे पृथापुत्र अर्जुन! बिना श्रद्धा के यज्ञ, दान और तप के रूप में जो कुछ भी सम्पन्न किया जाता है, वह सभी "असत्‌" कहा जाता है, इसलिए वह न तो इस जन्म में लाभदायक होता है और न ही अगले जन्म में लाभदायक होता है। (२८)
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हरि: ॐ तत् सत् !
७ नवम्बर २०१८
(यह लेख मैनें स्वयं के आनंद के लिए ही लिखा है| इसे लिख कर मुझे बहुत आनंद प्राप्त हुआ है| कोई आवश्यक नहीं है कि यह लेख दूसरों को भी अच्छा लगे| सभी पाठकों को धन्यवाद!)

दीपावली पर सभी श्रद्धालुओं को शुभ कामनाएँ और नमन .....

दीपावली पर सभी श्रद्धालुओं को शुभ कामनाएँ और नमन !
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मेरे प्रिय निजात्मगण, आप सब परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ साकार अभिव्यक्तियाँ हैं, आप सब मेरे प्राण हैं, मैं आप सब को नमन करता हूँ| आज दीपावली का उत्सव है| यह हर व्यक्ति के विवेक और दृष्टिकोण पर निर्भर है कि वह इस उत्सव को किस प्रकार मनाये| दीपावली की रात्री में अधिकाँश श्रद्धालु जगन्माता के महालक्ष्मी रूप की आराधना करते हैं| इसमें भी दो अलग अलग दृष्टिकोण हैं| अधिकाँश में से अधिकाँश लोगों के लिए महालक्ष्मी धन देने वाली देवी है, और कुछ के लिए सब प्रकार के सर्वश्रेष्ठ गुण प्रदान करने वाली| इसी तरह जगन्माता का महाकाली का रूप है जिस की भी आराधना आज की रात्री में अनेक लोग करते हैं| अधिकाँश लोगों के लिए महाकाली सिद्धियाँ प्रदान करने वाली देवी हैं, कुछ के लिए आध्यात्म में बाधक सब प्रकार के विकारों, बाधाओं और अज्ञानता का नाश करने वाली देवी| कुछ लोग दीपावली जूआ खेल कर और शराब पीकर मनाते हैं, और कुछ लोग मंत्रसिद्धि के लिए| कुछ लोग श्रीकृष्ण की आराधना करते है, कुछ लोग शिव की, और कुछ लोग अपने अपने गुरु के रूप का ध्यान करते हैं| सब का अलग अलग दृष्टिकोण और सोच है|
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मैं न तो किसी को कोई सलाह दूंगा क्योंकि यह मेरा कार्य नहीं है| मैं सिर्फ अपने विचारों और भावों को ही व्यक्त करने के लिए अंतर्प्रेरणा से इस मंच पर हूँ| मैं यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं न तो किसी से कोई सहानुभूति प्राप्त करना चाहता हूँ, और न कोई अन्य लाभ| किसी से मुझे कुछ भी जो कुछ भी मिल सकता है, वह सब मुझे पहले से ही परमात्मा से प्राप्त है, अतः किसी से कुछ भी लेना-देना नहीं है|
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सबसे पहले तो मैं यह बता देना चाहता हूँ कि यह आध्यात्मिक यात्रा कोई फूलों की सेज नहीं है, अपितु एक कंटकाकीर्ण अति दुर्गम मार्ग है जिस में खांडे की धार पर चलना पड़ता है| इस में शक्ति और ऊर्जा का जो एकमात्र स्त्रोत है वह है "भक्ति" यानि परमात्मा के प्रति परमप्रेम और समर्पण| इस मार्ग में हमें सब कुछ खोना पड़ता है, हर तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ता है, और कई बार तो मरणान्तक पीड़ा तक भी सहन करनी पड़ती है| पाने को तो इस में कुछ भी नहीं है, सिर्फ खोना ही खोना है| एकमात्र लाभ जो है वह है ईश्वर-लाभ| पर उसको पाते पाते यानि वहाँ तक पहुँचते पहुँचते व्यक्ति वीतराग हो जाता है, कोई राग-द्वेष और अहंकार नहीं बचता और सांसारिक भोग महत्वहीन हो जाते हैं| श्रुति भगवती इसी के लिए कहती हैं .... "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत| क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति||" (कठोपनिषद्, १/३/१४)| श्रृति के वचन अंतिम प्रमाण और अंतिम आदेश हैं| इस पर किसी को कोई भी संदेह नहीं होना चाहिए|
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साधकों के लिए दीपावली की रात्रि का अत्यधिक महत्त्व है| दीपावली की रात्री को व्यर्थ की गपशप, इधर-उधर घूमने-फिरने, पटाखे फोड़ने, जूआ खेलने, शराब पीने, अदि में समय नष्ट नहीं करें| सब को पता होना चाहिए कि इस रात्री को समय का कितना बड़ा महत्त्व है| साधना की दृष्टी से चार रात्रियाँ बड़ी महत्वपूर्ण होती हैं ..... (१) कालरात्रि (दीपावली), (२) महारात्रि (शिवरात्रि), (३) दारुण रात्रि (होली), और (४) मोहरात्रि (कृष्ण जन्माष्टमी)| कालरात्रि (दीपावली) का आध्यात्मिक महत्व बहुत अधिक है| अपनी अपनी गुरु परम्परानुसार खूब जप तप व साधना इस रात्रि को अवश्य करनी चाहिए| कुछ समझ में नहीं आये तो राम नाम का खूब जप करें जो बहुत अधिक शक्तिशाली व परम कल्याणकारी है| राम नाम तारक मन्त्र है, जो सर्वसुलभ सर्वदा सब के लिए उपलब्ध है| जो योगमार्ग के साधक हैं, उन्हें इस कालरात्री में अनंत परमाकाश में ज्योतिर्मय कूटस्थ अक्षर ब्रह्म का ध्यान कालातीत अवस्था की प्राप्ति के लिए अवश्य करना चाहिए| शुद्ध आचार-विचार, और ब्रह्मचर्य का पालन करें|
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सभी को सभी को दीपावली की शुभ कामनाएँ और नमन!
हरि ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
०७ नवम्बर २०१८

छोटी दीपावली की शुभ कामनाएँ .....

छोटी दीपावली की शुभ कामनाएँ .....
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आज छोटी दीपावली है जिसे "नर्क चतुर्दशी" व "रूप चतुर्दशी" भी कहते हैं| नरकासुर नाम का एक राक्षस था, जिसने सोलह हजार एक सौ महिलाओं को बंदी बना रखा था| जब उसका अत्याचार बहुत अधिक बढ़ गया तब देवता और ऋषिमुनि भगवान श्रीकृष्ण की शरण में गए और उन्हें युद्ध के लिए मनाया| भयंकर युद्ध हुआ जिसमें भगवान श्रीकृष्ण कुछ समय के लिए मूर्छित हो गए| सारथी के रूप में गयी उनकी पत्नी सत्यभामा ने नरकासुर के साथ भयंकर युद्ध किया और उसका वध कर दिया| उस दिन कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी थी, अतः इस दिन को नरकासुर चतुर्दशी या #नर्क_चतुर्दशी भी कहते हैं|
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रन्तिदेव एक पुण्यात्मा राजा थे| उन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था, लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उन्हें नर्क में ले जाने उनके सामने यमदूत आ खड़े हुए| यमदूतों को सामने देख राजा अचंभित हुए और बोले मैंने तो कभी कोई पाप-कर्म ही नहीं किया फिर आप लोग मुझे लेने क्यों आए हो? पुण्यात्मा राजा की अनुनय भरी वाणी सुनकर यमदूतों ने कहा हे राजन् एक बार आपके द्वार से एक भूखा ब्राह्मण लौट गया था यह उसी पापकर्म का फल है| राजा रंतिदेव ने प्रायश्चित करने के लिए समय माँगा तो यमदूतों ने उन्हें एक वर्ष का जीवन और दे दिया| राजा ने कार्तिक माह की कृष्ण चतुर्दशी का व्रत किया और ब्राह्मणों को भोजन करवाकर अपनी भूल के लिए क्षमा माँगी| इस प्रकार राजा पाप मुक्त हुए और उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ| इस प्रकार इस दिन व्रत रखने की परम्परा पड़ी|
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इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर उबटन या तेल लगाकर स्नान करने का बड़ा महात्म्य है| फिर मंदिर में जाना बड़ा पुण्यदायक है| इससे पाप कटता है और रूप सौन्दर्य की प्राप्ति होती है| सर्वाधिक मोहक रूप तो सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति भगवान श्रीकृष्ण का है| इस दिन उन की उपासना से वैसा ही रूप हमें भी प्राप्त होता है| इस लिए इस दिन को रूप_चतुर्दशी भी कहते हैं|
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छोटी_दीपावली की शुभ कामनाएँ !
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
६ नवम्बर २०१८