Wednesday, 16 November 2016

यह मैं एक अनुभूत सत्य कह रहा हूँ .......

यह मैं एक अनुभूत सत्य कह रहा हूँ .......
.
हमारे मन में यदि यश की, प्रशंसा की और प्रसिद्धि की कामना है तो ये हमें प्राप्त तो हो जायेंगी पर साथ साथ इसका निश्चित दंड भी अपयश, निंदा, और अपकीर्ति (बदनामी) के रूप में भुगतना ही पड़ेगा|
इसके विस्तार में नहीं जाऊंगा, इतना ही पर्याप्त है|
.
जो कुछ भी हम इस सृष्टि में प्राप्त करना चाहते हैं वह तो हमें मिलता ही है पर उसका विपरीत भी निश्चित रूप से मिलता है| यह प्रकृति का नियम है|
.
इस से बचने का एक ही उपाय है ........ हम कर्ताभाव, कामनाओं और अपेक्षाओं से मुक्त हों| इसके लिए हमें साधना/उपासना करनी ही पड़ेगी|
.
भगवान परमशिव सब का कल्याण करें | ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

मेरा काला धन ....

मेरा काला धन ....
----------------
किसी मित्र ने आज मुझ से पूछा कि मेरे पास कितना काला धन है?
मेरा उत्तर था पाँच-छः बोरियों में खूब सारा काला धन घर के पिछवाड़े में पडा है जिसमें से आप चाहे जितना फ्री में ले सकते हैं|
उनकी उत्सुकता और अधिक बढ़ गई जब मैंने कहा कि काले धन को जलाकर मैं नित्य नहाने के लिए पानी गर्म करता हूँ|
उन्होंने देखने की इच्छा प्रकट की|
मैंने घर के पिछवाड़े में बोरियों में भरे कोयले और लकडियों को दिखाया कि यह ही मेरा काला धन है जो पानी गर्म करने के काम आता है|
पास में ही ईंटों पर रखे लोहे के जुगाड़ चुल्हे को देखकर वे समझ गए कि मैं लकडियाँ जलाकर नहाने का पानी गर्म करता हूँ और हर बार लकडियाँ बुझाने के पश्चात कुछ कोयले बच जाते हैं जिन्हें मैं काला धन कहता हूँ|
तो मित्रो, ये लकड़ियों के कोयले ही मेरा काला धन हैं|
.
एक हज़ार और पाँच सौ के नोट बदलने के निर्णय से मुझे कोई शिकायत नहीं है| सिर्फ एक दिन छुट्टे रुपये न होने से थोड़ी देर के लिए मामूली सी असुविधा हुई|
राष्ट्रहित में यह निर्णय बहुत अच्छा हुआ है जिसका मैं पूर्ण समर्थन करता हूँ|
.
मोदी जी सफल हुए तो निकट भविष्य में भारत में मुद्रा के रूप में नोटों का प्रयोग बहुत कम हो जाएगा और सारा लेन-देन बैंकों के माध्यम से ही होगा| यह एक बहुत बड़ी उपलब्धी होगी|

मेरा एक ही सुझाव है कि क्रेडिट या डेबिट कार्ड से सामान खरीदने पर कभी भी कोई सरचार्ज नहीं हो| अधिक से अधिक खरीददारी डेबिट कार्डों से हों|
प्रधान मंत्री मोदी जी को शुभ कामनाएँ| वे अपने उद्देश्य में सफल हों|

उन्होंने छुड़ाए थे गज के वो बंधन, वे ही मेरे बंधन छुड़ाया करेंगे ......

उन्होंने छुड़ाए थे गज के वो बंधन, वे ही मेरे बंधन छुड़ाया करेंगे ......
>
{1} अब तो मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को उस चोर-जार-शिखामणि, कुहुक-शिरोमणि और दुःख-तस्कर हरि ने चुरा लिया है| उस तस्कर का आकर्षण इतना प्रबल है कि छुटाने से नहीं छूटता| अब उससे हमें प्रेम हो गया है| उस हरि ने अब ह्रदय में अभीप्सा की प्रचंड अग्नि भी जला दी है|
.
उस हरि ने कभी गजराज को बंधनों से मुक्त किया था, अब मुझे भी उन बंधनों से मुक्त करेंगे| उस दुःख-तस्कर, चोर-जार-शिखामणि और कुहुक-शिरोमणि हरि से बस एक ही निवेदन है कि जो कुछ भी थोड़ा-बहुत तथाकथित 'मैं' और 'मेरापन' रूपी अज्ञान बचा है उसे भी चुरा ले| मेरे लिए पूर्ण समर्पण के अतिरिक्त अन्य सब मार्ग बंद हो गये हैं| मार्ग के अवरोध चोरी चोरी वह कब हटा लेगा इसका पता ही नहीं चलेगा|
.
{2}भारत में प्रेमवश भक्तों ने भगवान को उलाहना देते हुए उन्हें ईर्ष्यालु और चोर तक कहा है| पर किसी ने भी उनकी इस बात का कभी बुरा या ईशनिंदा नहीं माना है| गोपाल सहस्त्रनाम में भगवान को तस्कर और चोरों का चोर कहा है .....
"बालक्रीड़ासमासक्तो नवनीतस्य तस्करः |
गोपालकामिनीजारश्चोरजारशिखामणि: ||"
यहाँ भगवान को नवनीत तस्कर और चोरजारशिखामणि कहा गया है| इसका अर्थ है कि भगवान के समान चोर और जार और कोई है ही नहीं, और हो सकता भी नहीं है| दुसरे चोर और जार तो केवल अपना ही सुख चाहते हैं, पर भगवान केवल दूसरों के सुख के लिए चोर और जार की लीला करते हैं| उनकी ये दोनों ही लीलाएँ दिव्य, अलौकिक और विलक्षण हैं|
.
संसारी चोर तो केवल वस्तुओं की ही चोरी करते हैं, परन्तु भगवान् वस्तुओं के साथ-साथ उन वस्तुओं के राग, आसक्ति और मोह आदि को भी चुरा लेते है| वे सुखासक्ति का भी हरण कर लेते हैं, जिससे कामाकर्षण न रहकर केवल विशुद्ध प्रेमाकर्षण रह जाता है| अन्य की सत्ता न रहकर केवल भगवान की सत्ता रह जाती है|
.
भगवान अपने भक्तों में किसी को चोर और जार रहने ही नहीं देते, उनके चोर और जारपने को ही हर लेते हैं| कनक और कामिनी की इच्छा ही मनुष्य को चोर और जार बनाती है| भगवन अपने भक्त की इस इच्छा को ही हर लेते हैं इसी लिए वे "हरि" हैं| आसक्ति का सर्वदा अभाव करने वाले होने से भगवान् चोर और जार के भी शिखामणि हैं| अर्थात चोरों के भी चोर हैं जो चोरी की इच्छा को ही चुपचाप चुरा लेते हैं|
.
कुहुक का अर्थ होता है ..... कोहरा| जैसे कोहरे में कोई छिप जाता है वैसे ही वे अपने मायावी आवरण रुपी कोहरे में छिपे हैं| इसलिए वे कुहुक-शिरोमणि हैं| अब तो उनके बिना हम रह ही नहीं सकते|
दुःख तस्कर वे हैं क्योंकि अपने भक्तों के दुःखों को हर लेते हैं|
.
एक प्रचलित पुराना भजन याद आ रहा है .....

कन्हैया कन्हैया पुकारा करेंगे,
लताओं में ब्रज की गुजारा करेंगे |
कहीं तो मिलेंगे, वो बाँके बिहारी,
उन्हीं के चरण चित लगाया करेंगे।
जो रुठेंगे हमसे वो बाँके बिहारी,
चरण पड़ उन्हें हम मनाया करेंगे।
कन्हैया कन्हैया पुकारा करेंगे,
लताओं में ब्रज की गुजारा करेंगे॥
उन्हें प्रेम डोरी से हम बाँध लेंगे,
तो फिर वो कंहाँ भाग जाया करेंगे।
कन्हैया कन्हैया पुकारा करेंगे,
लताओं में ब्रज की गुजारा करेंगे॥
उन्होंने छुड़ाए थे गज के वो बंधन,
वहीँ मेरे संकट मिटाया करेंगे।
कन्हैया कन्हैया पुकारा करेंगे,
लताओं में ब्रज की गुजारा करेंगे॥
उन्होंने नचाये थे ब्रह्माण्ड सारे,
मगर अब उन्हें हम नचाया करेंगे।
कन्हैया कन्हैया पुकारा करेंगे,
लताओं में ब्रज की गुजारा करेंगे॥

Saturday, 12 November 2016

मेरी अभीप्सा .......

मेरी अभीप्सा .......
>>>>>
"वंशीविभूषितकरान्नवनीरादाभात्, पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात् |
पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविंदनेत्रात्, कृष्णात्परं किमपि तत्वमहम् न जाने ||"
 .
आचार्य मधुसुदन सरस्वती ने जो आचार्य शंकर की परम्परा में अद्वैत वेदान्त के स्वनामधन्य आचार्य हुए थे ने उपरोक्त श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण की वन्दना करते हुए "कृष्ण तत्व" को परम तत्व बताया है|
.
मैं ऐसे सभी आचार्यों की वन्दना करता हूँ जिनकी परम कृपा और प्रेरणा से हमारे ह्रदय में परमात्मा के प्रति परम प्रेम जागृत हुआ है| जब भी आवश्यकता होती है तब समय समय पर भगवान किसी न किसी माध्यम से अपना परम प्रेम फिर से जगा देते हैं|
.
उस परम प्रेम की एक अल्प झलक या आभास भी जिसको मिल जाए उसके लिए उस प्रेम को छोड़कर अन्य सब कुछ गौण हो जाता है| उस प्रेम को प्राप्त करना ही संसार की उच्चतम उपलब्धि है| उसी प्रेम को भक्ति सूत्रों में नारद जी ने "भक्ति" कहा है| उसी प्रेम को हम सब प्राप्त हों| उस प्रेम को प्राप्त करना ही मेरी अभीप्सा है|
.
सृष्टिकर्ता और सृष्टिपालक प्रभु ..... जो मेरे ह्रदय में तभी से धड़क रहा है जब से मैंने जन्म लिया है, उसे सिर्फ मेरा सम्पूर्ण प्रेम ही चाहिए| यह प्रेरणा मुझे बार बार अपने ह्रदय से मिल रही है| बार बार मेरी चेतना, मेरा अस्तित्व यही कह रहा है|
.
सब कुछ तो उसी का दिया हुआ है| उसे मैं और दे ही क्या सकता हूँ ? जो कुछ भी उसका है उसे बापस उसी को लौटाने के अतिरिक्त मेरे पास अब और है ही क्या ? यह प्रेम भी उसी का है, यह ह्रदय, यह चेतना और यह सम्पूर्ण अस्तित्व ---- अब तो सब कुछ बस उसी का ही है| मैं तो हूँ ही नहीं, जो कुछ भी है वो वो ही वो है| ये सारे अणु-परमाणु , ये उर्जा और उसके पीछे का विचार और संकल्प आदि ये सब कुछ उसी के हैं|
अब मैं उससे और पृथक नहीं रह सकता| उसे पाने की अभीप्सा इतनी तीब्र है कि या तो यह देह ही रहेगी या मेरे लक्ष्य ही सिद्ध होगा|
.
ॐ तत्सत् | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||

सबसे कठिन कार्य ......

सबसे कठिन कार्य ......
---------------------
हमारे लिए सबसे अधिक कठिन कार्य है ..... इस संसार में रहते हुए परमात्मा के प्रति अभीप्सा (कभी न बुझने वाली प्यास), तड़प और प्रेम की निरंतरता को बनाए रखना|
.
इससे अधिक कठिन कार्य और कोई दूसरा नहीं है| इस संसार में हर कदम पर माया विक्षेप उत्पन्न कर रही है जो हमें परमात्मा से दूर करती है|
.
घर-परिवार के लोगों, सांसारिक मित्रों और जन सामान्य के नकारात्मक स्पंदन हमें निरंतर परमात्मा से दूर करते हैं|
.
हमें ढूँढ़ ढूँढ़ कर समान सकारात्मक विचार और स्पंदन के साधकों जिनका एक ही लक्ष्य है ....परमात्मा की प्राप्ति, का एक समूह बनाना चाहिए और उनके साथ सप्ताह में कम से कम एक दिन सामूहिक ध्यान साधना और सत्संग आयोजित करने चाहियें| वे एक ही गुरु-परम्परा के हों| बड़े नगरों में ऐसे अनेक समूह हैं जिनके यहाँ सप्ताह में कम से कम एक बार तो सामूहिक ध्यान होता ही है| मैं यहाँ उनका अभाव अनुभूत कर रहा हूँ|
.
यदि ऐसे समूह न बना सकें तो प्रतिदिन किसी मंदिर में जाना चाहिए| यदि वहाँ भी सकारात्मकता न मिलती हो तो एकांतवास करें| नकारात्मक लोगों से मिलने से तो अच्छा है किसी से भी न मिलें|
.
मिलना भी उसी से है जो हमारे लक्ष्य में सहायक हो, चाहे किसी से भी न मिलना पड़े, बात भी वही करनी है अन्यथा बिना बात किये रहें, भोजन भी वो ही करना है जो लक्ष्य में सहायक हो, अन्यथा बिना भोजन किये रहें, हर कार्य वो ही करना है जो हमें हमारे लक्ष्य की ओर ले जाता हो| किसी भी तरह का समझौता एक धोखा है| एक साधक के लिए सबसे बड़ा धोखा हमारी तथाकथित सामाजिकता है| मैं पुनश्चः कह रहा हूँ कि सबसे बड़ी बाधा हमारी तथाकथित सामाजिकता है|
.
धन्य हैं वे परिवार जहाँ पति-पत्नी दोनों ही प्रभुप्रेमी हो, और जिनका एक ही लक्ष्य है ..... परमात्मा की प्राप्ति|
.
हे परम ब्रह्म परमात्मा भगवान परम शिव, आपका विस्मरण एक क्षण के लिए भी ना हो| हमें अपने मायावी आवरण और विक्षेप से मुक्त करो| हमें निरंतर सत्संग प्राप्त हों, हम सदा आपकी ही चेतना में रहें|
.
ॐ तत्सत् | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||

हे परमशिव परमात्मा, तुम प्रसन्न हो तो सभी प्रसन्न हैं .....

हे परमशिव परमात्मा, तुम प्रसन्न हो तो सभी प्रसन्न हैं .....
---------------------------------------------------------
तुम मुझ पर प्रसन्न हो तो सभी प्रसन्न हैं| सारे संचित और प्रारब्ध कर्म भी तुम्हारे हैं| तुम ही कर्ता हो और तुम ही भोक्ता हो| तुम स्वयं में प्रसन्न रहो, और अन्य कुछ भी नहीं चाहिए| यह समस्त सृष्टि तुम्हारी है, तुम स्वयं ही यह सृष्टि हो| तुम्हारी मायावी आवरण और विक्षेप की शक्तियाँ निष्प्रभावी हों| तुम्हारे से कुछ भी माँगना मात्र एक दुराग्रह है| पूरा ब्रह्मांड ही तुम हो, तुम्हारे सिवा अन्य कुछ है ही नहीं| मैं तुम्हारी अनंतता और परम प्रेम हूँ| तुम्हारी पूर्णता मुझ में व्यक्त हो| ॐ ॐ ॐ ||
.
ॐ तत्सत् | ॐ नमःशिवाय | ॐ ॐ ॐ ||

हमारे ह्रदय की बंजर भूमि में भी भक्ति रुपी सुन्दर सुगन्धित पुष्प खिलें .....

घोर शुष्क मरू भूमि में और पथरीली बंजर भूमि में भी मैंने सुन्दर पुष्पों को उगते, खिलते और महकते हुए देखा है | अनेक प्रयास करने पर उपजाऊ भूमि में भी कई बार गुलाब के फूल नहीं उगते पर मैंने उनको अनायास ही गंदे पानी में भी उगते हुए देखा है | कीचड़ में कमल का उगना तो सामान्य है |
.
हमारे ह्रदय की बंजर भूमि में भी भक्ति रुपी सुन्दर सुगन्धित पुष्प खिलें और उनकी महक हमारे ह्रदय से सभी हृदयों में व्याप्त हो जाए | हे परम शिव, आपकी उपस्थिति का सूर्य सदा हमारे कूटस्थ में स्थिर रहे, और हमारे समक्ष कहीं भी अज्ञान रूपी तिमिर का अस्तित्व न रहे |
.
ॐ तत्सत् | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||