Thursday, 18 August 2016

श्रावणी पूर्णिमा यानि रक्षा बंधन पर्व की सभी को शुभ कामनाएँ .......

श्रावणी पूर्णिमा यानि रक्षा बंधन पर्व की सभी को शुभ कामनाएँ .......
--------------------------------------------------------------------
रक्षा बंधन पर बहुत सारे लेख और साहित्य उपलब्ध है, अतः उस पर और अधिक नहीं लिखना चाहता| पर कुछ विस्मृत होती जा रही बातों को अपनी सीमित बुद्धि से आवश्यक समझ कर लिख रहा हूँ| कोई अशुद्धि होगी तो उसमें सुधार करूँगा|
(1) यह ब्राह्मणों का सबसे बड़ा पर्व है ....
-----------------------------------------
ब्राह्मण लोग इस दिन श्रावणी कर्म करते हैं| ब्राह्मणों के लिए यह श्रावणी कर्म अनिवार्य है| इस कर्म में अभिमंत्रित करके पूजे हुए पूजे गए यज्ञोपवीत (जनेऊ) ही ब्राह्मण पहिनते हैं, अन्य नहीं| बिना अभिमंत्रित किये हुए जनेऊ पहिनने का निषेध है|
.
जनेऊ यानि यज्ञोपवीत कोई धागा मात्र नहीं होता| इसमें ओंकार रूप में परमात्मा और अग्नि आदि विभिन्न देवताओं का आह्वान किया जाता है| ब्राह्मण लोग प्रति वर्ष रक्षाबंधन के दिन श्रावणी कर्म में वर्ष भर के लिए जनेऊ अभिमंत्रित कर लेते हैं| ब्राह्मण लोग इस दिन आत्मशुद्धि के लिए अभिषेक और हवन करते हैं|
वैदिक काल से ही ब्राह्मण लोग पवित्र नदियों या तालाबों के तट पर आत्मशुद्धि का यह कर्म मनाते आये हैं| इस कर्म में आंतरिक व बाह्य शुद्धि गोबर, मिट्टी, भस्म, अपामार्ग, दूर्वा, कुशा एवं मंत्रों द्वारा की जाती है| पंचगव्य महाऔषधि है| श्रावणी कर्म में दूध, दही, घृत, गोबर, गोमूत्र प्राशन कर अंतःकरण को शुद्ध किया जाता है| यह कर्म ब्राह्मण के शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि करता है|
.
विधिवत यज्ञोपवीत धारण करने के पश्चात ही कोई द्विज बनता है| द्विज को ही वेदपाठ करने का अधिकार है| गायत्री मन्त्र का जाप करने का अधिकार भी उसी को है जो विधिवत रूप से यज्ञोपवीत धारण कर के द्विज बना है| अन्यों को गायत्री मन्त्र के जप का अधिकार नहीं है| द्विज (यानि जिसने विधिवत यज्ञोपवीत धारण कर रखा है) की पत्नी भी गायत्री मन्त्र के जाप की अधिकारिणी है, अन्य स्त्रियाँ नहीं|
.
श्रावण की पूर्णिमा को ब्राह्मण लोग श्रावणी कर्म क्यों करते हैं इसका कारण निम्न है.....
एक कल्पांत में वेदों का ज्ञान लुप्त हो गया था| मधु और कैटभ नाम के राक्षसों ने ब्रह्मा जी से भी वेदों को छीन लिया और रसातल में छिप गए| ब्रह्मा जी ने वेदोद्धार के लिए भगवान विष्णु की स्तुति की| स्तुति सुन कर भगवान विष्णु ने हयग्रीव के रूप में अवतार लिया और श्रावण की पूर्णिमा के ही दिन ब्रह्माजी को वेदों का ज्ञान दिया| हयग्रीव विद्या और बुद्धि के देवता हैं| तभी से वेदपाठी विप्र श्रावणी पूर्णिमा के ही दिन यह उपाकर्म करते हैं|
.
(2) संघ के प्रमुख उत्सवों में से यह एक उत्सव है ......
-----------------------------------------------------
इस दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक भगवा ध्वज को रक्षा बंधन (राखी) बाँध कर राष्ट्र रक्षा का संकल्प लेते हैं|
.
(3) ऐतिहासिक व सामाजिक रूप से राखी का त्योहार .....
------------------------------------------------------------
पुराणों में बर्णन मिलता है कि देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव हावी होते नज़र आने लगे| देवराज इन्द्र घबरा कर बृहस्पति के पास गये| वहाँ बैठी इन्द्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी| उसने रेशम का धागा मन्त्रों की शक्ति से अभिमंत्रित करके अपने पति के हाथ पर बाँध दिया| वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था| इन्द्र उस लड़ाई में इसी धागे की मन्त्र शक्ति से ही विजयी हुए| उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन यह धागा बाँधने की प्रथा चली आ रही है|
.
दानवेन्द्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की| भगवान विष्णु वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा माँगने पहुँचे| गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी| भगवान ने तीन पग में सारा आकाश पाताल और धरती नापकर राजा बलि को रसातल में भेज दिया|
बलि ने अपनी भक्ति के बल से भगवान को रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया| भगवान के घर न लौटने से परेशान लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय बताया| लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे रक्षाबन्धन यानि राखी बाँध कर अपना भाई बनाया और उससे दक्षिणा के रूप में अपने पति को माँग कर अपने साथ ले आयीं| उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी|
इसीलिए कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधते हुए निम्न मंत्र का उच्चारण करते हैं .....
"येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबल: | तेन त्वां प्रति बच्नामी, रक्षे मा चल मा चलः ||" अर्थात् रक्षा के जिस साधन (राखी) से अतिबली राक्षसराज बली को बाँधा गया था, उसी से मैं तुम्हें बाँधता हूँ | हे रक्षासूत्र ! तू भी अपने कर्त्तव्यपथ से न डिगना अर्थात् इसकी सब प्रकार से रक्षा करना|
.
भारतवर्ष पर जब अरबों और मध्य एशिया से आये अति क्रूर मुसलमानों के आक्रमण आरम्भ हुए तब आक्रमणकारी अपने साथ महिलाओं को तो लाये नहीं थे| वे हिन्दुओं की ह्त्या कर उनकी महिलाओं को छीन ले जाते थे| तब से हिन्दू बहिनें अपने भाइयों को राखी बाँधकर उनसे अपनी रक्षा का वचन लेने लगीं|
.
(4) रक्षा सूत्र बनाने की विधि .....
--------------------------------
पुराने ज़माने में राखी इन पाँच चीजों से बनती थी ......
(१) दूर्वा (घास) (२) अक्षत (चावल) (३) केसर (४) चन्दन (५) सरसों के दाने|
इन ५ वस्तुओं को रेशम के कपड़े में बांधकर कलावा बना देते थे|
इसके पीछे यह प्रतीकात्मक भावना थी .....
(१) दूर्वा ....दुर्वा गणेश जी को प्रिय है| मेरे भाई या जिसके भी हम राखी बाँध रहे हैं, उसके जीवन से भी विघ्नों का नाश हो और उसका वंश तेजी से बढे|
(२) अक्षत .... धर्म के प्रति उसकी श्रद्धा कभी क्षत ना हो|
(३) केसर .... वह तेजस्वी बनो|
(४) चन्दन .... उसके जीवन में शीतलता बनी रहे| उसके गुणों की सुगंध सर्वत्र फैले|
(५) सरसों के दाने .... वह शत्रुओं के प्रति तीक्ष्ण बने|
इस प्रकार इन पांच वस्तुओं से बनी हुई एक राखी को संकल्प कर के बांधते थे|
महाभारत में यह रक्षा सूत्र माता कुंती ने अपने पोते अभिमन्यु को बाँधा था| जब तक यह धागा अभिमन्यु के हाथ में था तब तक उसकी रक्षा हुई, धागा टूटने पर अभिमन्यु की मृत्यु हुई|
.
अब तो यह भाई-बहिन के प्रेम के प्रतीक का त्यौहार बन गया है|
मैं समस्त मातृशक्ति और विप्रगण को इस पावन पर्व की बधाई और शुभ कामना प्रेषित करता हूँ| भगवान आप सब की और सत्य सनातन धर्म की रक्षा करें|
.
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

विश्व के विनाश की औत विश्वयुद्ध की सब भविष्यवाणियाँ झूठी हैं .....

सन १९७६ ई.से मुझे एक शौक सा जागृत हुआ जिसे मैं शौक नहीं एक अति तीब्र जिज्ञासा का जन्म कहूंगा, मैंने हर प्रकार की रहस्यमय साधनाओं, दर्शन, सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक विचारधाराओं, इतिहास, भूगोल व आध्यात्म की आसानी से उपलब्ध उन सभी पुस्तकों को ढूँढ ढूँढ कर पढ़ना आरम्भ कर दिया जिनको समझना मेरी अल्प बुद्धि की सीमा में था|
जब और भी अधिक समय मिलता तब मैं विभिन्न महत्वपूर्ण लोगों से मिलने जुलने और उनके विचारों को जानने का प्रयास करता| विश्व के अनेक देशों में जाने के बहुत अवसर मिले जिनका मैनें पूरा लाभ उठाया और अति प्रबल बौद्धिक जिज्ञासा को यथासंभव शांत किया| प्रकृति का सौम्यतम और विकरालतम रूप भी देखा| पूरे विश्व का भूगोल मस्तिष्क में समा गया कि विश्व के किस भाग में कैसा जीवन और कैसी परिस्थितियाँ है आदि आदि|
.
देश-विदेश के लोगों की अनेक भविष्यवाणियाँ पढ़ीं और उनसे उस समय प्रभावित भी हुआ| पर वे सारी भविष्यवाणियाँ झूठी सिद्ध हुईं| आज तक मैंने जितनी भी भविष्यवाणियाँ पढ़ीं हैं वे सब झूठी थीं| अनेक लोगों को मैंने फर्जी पाया जिनको मैं गहराई वाला समझता था| आजकल एक रूझान सा चल रहा है विश्व युद्ध और विश्व के विनाश के बारे में लिखने का| अब में पिछले एक-दो वर्षों की घटनाओं का विश्लेषण कर के कह सकता हूँ कि ऐसा कुछ नहीं होगा| न तो कोई विश्व युद्ध होने वाला है और न कोई महाविनाश| ऐसी परिस्थितयाँ वर्त्तमान में अनेक बार उत्पन्न हुईं हैं पर मनुष्य अभी इतना विवेकशील हो गया है कि कैसी भी विकट परिस्थिति हो उसका समाधान निकाल लेता है| आगे मनुष्य के विवेक का और भी अधिक विकास होगा|
.
अतः कुछ नहीं होने वाला है| जब तक जीवित हो तब तक प्रसन्न रहो| जब मृत्यु आ जायेगी तब वह अपना काम करेगी, उसके बारे में सोच कर क्यों दुखी होना? आध्यात्म में कुछ पूर्व जन्मों के संस्कार ही थे जिनसे वेदान्त दर्शन और भक्ति का उदय हुआ जिसे मैं अपने जीवन की एकमात्र उपलब्धी मानता हूँ| जिसे हम बाहर ढूंढते हैं वह तो हम स्वयं ही हैं| आगे आने वाला समय अच्छा ही अच्छा होगा| जीवन का एक अंधकारमय कालखंड भी था जिसमें मैं मार्क्सवादी हो गया था| पर उस अन्धकार से शीघ्र ही बाहर निकल आया| अब तो मैं सभी से परमात्मा की भक्ति और ध्यान साधना की बातें ही करता हूँ|
.
आप सब में भी मुझे प्रभु के ही दर्शन होते हैं| आप सब मेरे ही निजात्मगण हैं| आप सब को नमन ! जन्माष्टमी आने वाली है| अभी से तैयारियाँ आरम्भ कर दीजिये अपनी भक्ति यानि परम प्रेम को व्यक्त करने के लिए|
तत्व रूप में शिव, विष्णु और शक्ति एक ही हैं| महत्व सिर्फ प्रेम और समर्पण का है|
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

Monday, 15 August 2016

शरणागति की महिमा .....

शरणागति की महिमा ........
-------------------------
यह सृष्टि त्रिगुणात्मक है| पूरी प्रकृति और समस्त जीवों की सृष्टि और चेतना ..... सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण ..... इन तीन गुणों से निर्मित है| जिस भी प्राणी में जो गुण अधिक होता है उसकी सोच और चिंतन वैसा ही होता है|
मैंने जीवन में देखा और अनुभूत किया है कि गीता का अध्ययन करने वाले सतोगुण प्रधान व्यक्ति को ज्ञानयोग या भक्तियोग ही अच्छा लगता है, रजोगुण प्रधान व्यक्ति को कर्मयोग अच्छा लगता है, और तमोगुण प्रधान व्यक्ति को मरने मारने के अलावा और कुछ समझ में नहीं आता|
.
भगवन श्रीकृष्ण अपने भक्त को गीता के दुसरे अध्याय के ४५ वें श्लोक में निस्त्रेगुण्य यानि त्रिगुणातीत बनने, तीनों गुणों से परे जाने का आदेश देते हैं ....
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान ||"
समस्त दुःखों और क्लेशों का कारण ही कर्मबंधन है| जब तक मनुष्य इन तीनों गुणों से बंधा हुआ है वह कभी मुक्त नहीं हो सकता|
.
त्रिगुणातीत कैसे हों, इसका उत्तर मेरी सीमित और अल्प बुद्धि से मात्र "शरणागति" है जिसका वर्णन भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के अठारहवें अध्याय के ६६वें श्लोक में किया है| भगवान की शरण लेकर ही हम तीनों गुणों से परे जाकर कर्मफलों से मुक्त हो सकते हैं| यही आध्यात्मिक जीवनमुक्ति है|
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ||
.
इस श्लोक में भगवान् ने सम्पूर्ण धर्मों का त्याग करके अपनी शरण में आने की आज्ञा दी है, जिसे अर्जुन ने ‘करिष्ये वचनं तव’ कहकर स्वीकार किया और अपने क्षात्र-धर्म के अनुसार युद्ध भी किया है|
जब अर्जुन ‘शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्’ (गीता २/७) कहकर भगवान की शरण हुए तो उस शरणागति में कुछ ना कुछ कमी रही ही होगी जिसकी पूर्ति अठारहवें अध्याय के ६६वें श्लोक में हुई|
.
भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण धर्मों का आश्रय, धर्म के निर्णय का विचार छोड़कर अर्थात् क्या करना है और क्या नहीं करना है—इसको छोड़कर केवल एक मेरी ही शरण में आ जा|
स्वयं भगवान् के शरणागत हो जाना—यह सम्पूर्ण साधनों का सार और भक्ति की पराकाष्ठा है| इसमें शरणागत भक्त को अपने लिये कुछ भी करना शेष नहीं रहता; जैसे पतिव्रता स्त्री का अपना कोई काम नहीं रहता। वह अपने शरीर की सार-सँभाल भी पति के लिये ही करती है। वह घर, कुटुम्ब, वस्तु, पुत्र-पुत्री और अपने कहलाने वाले शरीर को भी अपना नहीं मानती, प्रत्युत पतिदेव का मानती है, उसी प्रकार शरणागत भक्त भी अपने मन,बुद्धि और देह आदि को भगवान् के चरणों में समर्पित करके निश्चिन्त, निर्भय, निःशोक और निःशंक हो जाता है।
जब हमें उनके श्री चरणों में आश्रय मिल जाए तो फिर और चाहिए भी क्या?
देवाधिदेव भगवान शिव भी झोली फैलाकर नारायण से माँग रहे हैं कि हे मेरे श्रीरंग अर्थात् श्री के साथ रमण करने वाले मुझे यह भिक्षा दो कि आपके चरणों की शरणागति कभी न छूटे|
"बार बार बर माँगऊ हरषिदेइ श्रीरंग |
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सत्संग ||"
अनपायनी शब्द का अर्थ है- शरणागति !
ऐसी ही शरणागति की महिमा | हम अधिक से अधिक भगवान का ध्यान करें और उनके श्रीचरणों में समर्पित होकर शरणागत हों|
भगवान श्रीकृष्ण हमारे चैतन्य में निरंतर अवतरित हों, एक क्षण के लिए भी उनकी विस्मृति ना हो| उनसे पृथक हमारा कोई अस्तित्व ना रहे|
.
हे प्रभो ! आपकी सृष्टि में कोई दुःख, भय और ताप ना हो, धर्म की पुनर्स्थापना हो और सब प्राणी सुखी हों|
"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने | प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः ||"
सभी को शुभ कामनाएँ और सादर सप्रेम अभिनन्दन !
ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर

वास्तविक स्वतन्त्रता .... परमात्मा यानि आत्मज्ञान में है ........

वास्तविक स्वतन्त्रता .... परमात्मा यानि आत्मज्ञान में है ........
------------------------------------------------------------
हमारा "स्व" परमात्मा है, और "तंत्र" उसकी व्यवस्था है|
सब तरह के मायावी बंधनों ..... आवरण व विक्षेप, और सब तरह के पाशों से मुक्त होकर, ही हम स्वतंत्र हो सकते हैं| स्वतन्त्रता भीतर है, बाहर नहीं|
हम स्वतंत्र हों, हम स्वतंत्र हों, हम स्वतंत्र हों ..... इस संकल्प के साथ सभी को शुभ कामनाएँ |
.
परमात्मा को कभी न भूलो| यह संसार हमारे बिना भी चलता रहेगा| हमारे जीवन का उद्देश्य परमात्मा को उपलब्ध होना है, न कि उसकी रचना को| हमारे प्रभु किस बात से प्रसन्न होते हैं, वही महत्वपूर्ण है, न कि अन्यों की|

ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

!! ॐ अहं भारतोऽस्मि ॐ ॐ ॐ !! मेरी देह भारतवर्ष है |

!! ॐ अहं भारतोऽस्मि ॐ ॐ ॐ !! मेरी देह भारतवर्ष है |
मैं ही भारतवर्ष हूँ और समस्त सृष्टि मेरा ही विस्तार है| ॐ ॐ ॐ ||
-------------------------------------------------------------------------
"मैं भारतवर्ष, समस्त भारतवर्ष हूँ, भारत-भूमि मेरा अपना शरीर है। कन्याकुमारी मेरा पाँव है, हिमालय मेरा सिर है, मेरे बालों में श्रीगंगा जी बहती हैं, मेरे सिर से सिन्धु और ब्रह्मपुत्र निकलती हैं, विन्ध्याचल मेरा कमरबन्द है, कुरुमण्डल मेरी दाहिनी और मालाबार मेरी बाईं जंघाएँ है। मैं समस्त भारतवर्ष हूँ, इसकी पूर्व और पश्चिम दिशाएँ मेरी भुजाएँ हैं, और मनुष्य जाति को आलिंगन करने के लिए मैं उन भुजाओं को सीधा फैलाता हूँ। आहा ! मेरे शरीर का ऐसा ढाँचा है ! यह सीधा खड़ा है और अनन्त आकाश की ओर दृष्टि दौड़ा रहा है। परन्तु मेरी वास्तविक आत्मा सारे भारतवर्ष की आत्मा है। जब मैं चलता हूँ तो अनुभव करता हूँ कि सारा भारतवर्ष चल रहा है। जब मैं बोलता हूँ तो मैं भान करता हूँ कि यह भारतवर्ष बोल रहा है। जब मैं श्वास लेता हूँ, तो अनुभव करता हूँ कि भारतवर्ष श्वास ले रहा है। मैं भारतवर्ष हूँ, मैं शंकर हूँ, मैं शिव हूँ और मैं सत्य हूँ|" --- स्वामी रामतीर्थ ---
-------------------------

"भारतभूमि .... आसेतु हिमालय पर्यन्त एक 'सिद्ध कन्या' ही नहीं साक्षात माता है|"
मूलाधार चक्र कन्याकुमारी' है, जहाँ का त्रिकोण शक्ति का स्त्रोत है|
इसी मूलाधार से इड़ा पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियाँ प्रस्फुटित होती हैं| कैलाश पर्वत सहस्त्रार है|
----------------------------
भारतवर्ष स्वयं में है| इसे स्वयं में पहचानो|
ॐ अहं भारतोऽस्मि ॐ ॐ ॐ !! मैं ही भारतवर्ष हूँ और समस्त सृष्टि मेरा ही विस्तार है| ॐ ॐ ॐ ||

भारत को परम वैभव पर पहुँचाने की दो सीढ़ियाँ ........

भारत को परम वैभव पर पहुँचाने की दो सीढ़ियाँ ........
>
जब मैं भारत की सोचता हूँ तो पाता हूँ कि भारत का अर्थ है सनातन धर्म| मेरे लिए श्री अरविन्द के शब्दों में सनातन धर्म ही भारत है और भारत ही सनातन धर्म है| दोनों कभी पृथक नहीं हो सकते| सनातन धर्म का विस्तार ही भारत का विस्तार है और सनातन धर्म का उत्थान ही भारत का उत्थान है|
भारत एक ऊर्ध्वमुखी चेतना है| भारत एक ऐसे लोगों का समूह है जो जीवन में जो श्रेष्ठतम और उच्चतम है उसे पाने का प्रयास करते है, अपनी चेतना को विस्तृत कर समष्टि से जुड़ना चाहते हैं, और नर में नारायण को साकार करते हैं|
कालखंड में एक अल्प समय ऐसा आता है जब अज्ञान, दू:ख, दुर्बलता, स्वार्थपरता और तामसिकता में विश्व डूब जाता है और भारत भी दुर्बलता और अवनति के गड्ढे में गिर जाता है ताकि वह आत्मसंवरण कर ले| इस काल खंड में भारत के योगी और तपस्वी गण भी संसार से अलग होकर केवल अपनी मुक्ति या आनन्द या अपने शिष्यों की मुक्ति के लिए ही प्रयासरत हो जाते है| जन सामान्य को भी अपने भौतिक सुख के आगे कुछ और दिखाई नहीं देता|
पर अब वह समय निकल चूका है| अब ईश्वर की इच्छा है की भारत फिर ऊपर उठे| भारत के अभ्युदय को अब कोई नहीं रोक सकता| साक्षात् भगवती चेतना ने अब भारत को शने: शने: ऊपर उठाने का कार्य अपने हाथ में ले लिया है| ज्ञान की गति भी पुन: प्रसारित होने लगी है और भारत की आत्मा का भी प्रसार होने लगा है| भारत भूमि में दिव्य चेतना से युक्त महान आत्माओं का अवतरण हो रहा है और वह दिन अधिक दूर नहीं है जब तामसिक और जड़ बुद्धि के लोगों का भारत से सम्पूर्ण विनाश होगा|
भौतिक स्तर पर भारत को सिर्फ दो कार्य करने होंगे फिर सब अपने आप सही हो जाएगा|
सर्वप्रथम भारत को अपनी प्राचीन शिक्षा व्यवस्था और कृषि व्यवस्था को पुनर्स्थापित करना होगा|
फिर सब कुछ सही होने लगेगा|
आध्यात्मिक स्तर पर हमें जीवन का केंद्रबिंदु परमात्मा को बनाना होगा|
फिर भारत के अभ्युदय को कोई नहीं रोक सकता|
मैंने यहाँ जो भी लिखा है वह अब तक के मेरे अनुभव और अंतर्प्रज्ञा से है| मुझे न तो किसी का सहयोग चाहिए और न समर्थन| "निराश्रयम् मां जगदीश रक्ष:|"
जो मेरे विचारों से सहमत नहीं हैं वे मुझे अपनी मित्रता सूचि से बाहर कर दें| किसी मंच को मेरे विचार अच्छे नहीं लगते तो मुझे वहां से भी निष्कासित कर सकते हैं|
मेरे आश्रय सिर्फ जगदीश हैं| अन्य किसी का आश्रय मुझे नहीं चाहिए|
एक व्यक्ति का संकल्प भी समस्त सृष्टि को बदल सकता है| हो सकता है कि वह व्यक्ति आप ही हों| ॐ|

क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं ????? .....

(कल स्वतन्त्रता दिवस है|)
सभी को स्वतंत्रता दिवस की अग्रिम हार्दिक शुभ कामनाएँ ........
क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं ? यदि हैं तो किस दृष्टिकोण से ?
क्या इस यक्ष प्रश्न का कोई उत्तर किसी के पास है ?
.
जहाँ तक मेरी सोच है, हम किसी भी दृष्टी से स्वतंत्र नहीं हैं| हमारी स्वतन्त्रता ऐसी ही है जैसे एक अस्पताल में भर्ती मरीज लोग स्वास्थय दिवस मनाते थे| स्वस्थ होने का झंडा फहरा कर सब एक दुसरे को स्वस्थ होने की बधाई देते थे|
डॉक्टर उनका उपचार नहीं कर सकते थे क्योंकि डॉक्टर स्वयं बीमार थे और स्वस्थ होने व स्वस्थ करने का नाटक करते थे| मरीजों को बिना दवा दिए ही बोलते की तुम तो अब स्वस्थ हो, देखो अपना स्वस्थ होने का झंडा फहरा रहा है|
यही स्थिति अपने देश की है| क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं?????
.
हम न तो आध्यात्मिक दृष्टी से स्वतंत्र हैं, और न ही मानसिक दृष्टी से| आध्यात्मिक दृष्टी से हम अपनी वासनाओं के गुलाम हैं| मानसिक दृष्टी से हम अभी भी अंग्रेजियत के गुलाम हैं|
.
जो तथाकथित आज़ादी हमें मिली वह आजादी थी या सत्ता का हस्तांतरण?
जिसे हम स्वतन्त्रता कहते हैं वह क्या हमारी उच्शृन्खलता नहीं है? हमारे में नागरिक भावों की कमी है|
.
यह आज़ादी मिली भी तो किस कीमत पर? देश के दो टुकड़े करवा कर और लाखों लोगों की जघन्य हत्याएँ और लाखों महिलाओं व बच्चों के अपहरण, बलात्कार और बलात धर्मांतरण के पश्चात|
.
भारत की नष्ट हुई भव्य प्राचीन शिक्षा व कृषि व्यवस्था, सनातन धर्म और प्राचीन महानतम सभ्यता के ह्रास की पीड़ा असहाय होकर देखने को बाध्य हूँ| देश में आरक्षण के नाम पर योग्यता की ह्त्या, जातिवाद, ओछी राजनीति, और भ्रष्टाचार व अन्याय देखकर यह सोचने को बाध्य हूँ कि क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं|
.
हम अभी भी कॉमन वेल्थ के सदस्य क्यों हैं? हमारे संविधान में धारा 147 जैसी धाराएँ अभी भी अस्तित्व में क्यों हैं जो हमें हमें अभी भी अंग्रेजों का गुलाम ही मानती हैं?
.
हमारी स्थिति कामायनी के मनु जैसी ही है जो ...
"हिमगिरी के उत्तुंग शिखर पर,
बैठ शिला की शीतल छाँह |
एक व्यक्ति भीगे नयनों से,
देख रहा था प्रलय अथाह ||"
हम भी असहाय होकर उस अथाह प्रलय के साक्षी होने को बाध्य हैं|
.
मैं उन सभी शरणार्थियों को भी धन्यवाद देता हूँ जो विभाजन के पश्चात् अपना सब कुछ छोड़ कर भारत आ गए पर अपना धर्म नहीं छोड़ा| सनातन धर्म उन सब का सदा ऋणी रहेगा| उन सब को भी सद्गति प्राप्त हो जिन्होनें विधर्मियों के हाथों मरना स्वीकार किया पर अपना प्रिय सनातन धर्म नहीं छोड़ा|
.
प्रसाद जी के शब्दों में ....
जो घनीभूत पीड़ा थी, मस्तिष्क में स्मृति सी छाई |
दुर्दिन में आँसू बनकर वो आज बरसने आई ||"
.
मेरे विचार से तो असली स्वतंत्र वही है जो आध्यात्मिक दृष्टी से जीवनमुक्त है, जो त्रिगुणातीत है, जिसने तुरीयावस्था को प्राप्त कर लिया है| वही व्यक्ति कह सकता है ..... शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि|
.
आज़ाद हिन्द फौज का राष्ट्र गीत ...
-----------------------------------
शुभ सुख चैन की बरखा बरसे
भारत भाग्य है जागा
पंजाब सिंध गुजरात मराठा
द्राविड़ उत्कल बंगा
चंचल सागर विन्ध्य हिमालय,
नीला जमुना गंगा
तेरे नित गुण गायें
तुझसे जीवन पायें
हर तन पाए आशा
सूरज बन कर जग पर चमके
भारत नाम सुहागा
जय हे, जय हे, जय हे
जय जय जय जय हे
सबे के दिल में प्रीत बसाये,
तेरी मीठीं बाणी
हर सूबे के रहने वाले,
हर मज़हब के प्राणी
सब भेद और फर्क मिटा के
सब गोद में तेरी आके
गूंधे प्रेम की माला
सूरज बन कर जग पर चमके
भारत नाम सुहागा
जय हे, जय हे, जय हे
जय जय जय जय हे।
सुबह सवेरे पंख पखेरू
तेरे ही गुण गायें
बस भारी भरपूर हवाएं
जीवन में रुत लायें
सब मिलकर हिन्द पुकारे,
जय आजाद हिन्द के नारे /
प्यार देश हमारा
सूरज बन कर जग पर चमके
भारत नाम सुहागा
जय हे, जय हे, जय हे
जय जय जय जय हे।
.
भारत माता की जय ! वन्दे मातरं ! ॐ ॐ ॐ !!