Monday, 4 February 2019

हम अकेले भी हैं और नहीं भी हैं .....


हम अकेले भी हैं और नहीं भी हैं .....
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द्वैत-अद्वैत, साकार-निराकार .... ये सब अनुभूतियाँ हैं जो हमें हमारी तत्कालीन मनःस्थितियों के अनुसार होती हैं| इन सब से ऊपर उठ कर इन सब का आनंद लें, इन की चर्चा और विवेचना से कोई लाभ नहीं है|
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दीर्घ और गहन ध्यान साधना में हमें परमात्मा की अनुभूति प्राण और आकाश तत्व के रूप में होती है,जिन्हें शब्दों में व्यक्त करना प्रायः असंभव है| इन की अनुभूतियों का आनंद लें| सामने मिठाई रखी हो तो मजा उसको खाने में है, न कि उसकी विवेचना करने में| परमात्मा एक रस है जिसको चखो, खाओ, पीओ, अपने भीतर प्रवाहित होने दो और उसमें डूब जाओ|
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परमात्मा की परम कृपा है कि मैं अकेला भी हूँ और नहीं भी हूँ| मैं सिर्फ परमात्मा के प्रेम की ही बातें करता हूँ इसलिए कोई मिलने-जुलने या सामाजिकता वाले लोग मेरे पास नहीं आते| किसी से वेदान्त की चर्चा करता हूँ तो वह लौट कर फिर कभी बापस नहीं आता| इसलिए परमात्मा के ध्यान का खूब समय मिल जाता है| यह परमात्मा की कृपा है| दो-चार परमात्मा के प्रेमियों से ही संपर्क रहता है, अन्य किसी से नहीं है| अकेला इसलिए नहीं हूँ कि परमात्मा सदा मेरे साथ हैं| वास्तव में मेरे होने का एक भ्रम ही है| मैं तो हूँ ही नहीं, जो कुछ भी है वे स्वयं परमात्मा ही हैं|
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अब आज की अंतिम बात .... परमात्मा माता है या पिता?
यह भी साधक की मनःस्थिति पर निर्भर है| जब हृदय प्रेम से भर जाता है तब परमात्मा का मातृरूप सामने आता है, और जब विवेक की प्रधानता होती है तब पितृरूप|
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आप सभी को शुभ कामनाएँ और मेरे ह्रदय का पूर्ण प्रेम आप सब को समर्पित है| ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ फरवरी २०१९

माँ की मुस्कान .....

माँ भगवती के चहरे की जो मनमोहक मधुर मुस्कान है, उस से अधिक सुन्दर इस सृष्टि में अन्य कुछ भी नहीं है| यदि माँ सारे वरदान भी देना चाहे तब भी हम माँ की उस मोहक मुस्कान के समक्ष उन से कुछ भी नहीं माँग पाएँगे| माँ की वह मधुर मुस्कान ही इस सृष्टि का सब से बड़ा वरदान है| एक बार उस मधुर मुस्कान को देख लोगे तो जीवन तृप्त और निहाल हो जाएगा, सारी कामनाएँ नष्ट हो जायेंगी| माँ का यह सौम्यतम रूप सदा हमारे समक्ष रहे, अन्य कुछ भी नहीं चाहिए|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
३ फरवरी २०१९ 

क्या भगवान पर मेरा एकाधिकार है ?

क्या भगवान पर मेरा एकाधिकार है ?
जी हाँ ! निश्चित रूप से, भगवान पर मेरा एकाधिकार ही नहीं पूर्णाधिकार है| भगवान मेरे हृदय में ही हैं, अन्यत्र कहीं भी नहीं है| यह शत-प्रतिशत सत्य है| मैंने उन्हें सात-सात तालों के भीतर बंदी बना रखा है| उनको बाहर निकलने का कोई अन्य मार्ग नहीं है| बाहर वे अब आ ही नहीं सकते|
सारी सृष्टि ही मेरा हृदय है, सभी के हृदय मेरे ही हृदय हैं| जो कुछ भी परमात्मा का है वह मेरा भी है| यह मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है|
ॐ तत्सत्ॐ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ फरवरी २०१९

Saturday, 2 February 2019

हम स्वयं को कैसे सुधारें ?

हम स्वयं को कैसे सुधारें ?
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हम अपने से बाहर इतनी बुराइयाँ देखते हैं, जिनके कारण बड़ी ग्लानि होती है| हमारे शास्त्र तो कहते हैं कि बाहर की बुराइयों का कारण हमारे भीतर की बुराई है| यदि हम अपने भीतर की बुराई को सुधार लें तो बाहर की बुराई भी समाप्त हो जायेगी| इसका एकमात्र उपाय जो मुझे दिखाई देता है वह तो यह है कि हम अच्छे साहित्य को पढ़ें, अच्छे लोगों के साथ रहें, और भगवान का ध्यान करें| गीता में भगवान कहते हैं .....
"इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च| जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्"||१३:९||
अर्थात् इन्द्रियों के विषय के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, जन्म-मृत्यु, वृद्धावस्था, व्याधि और दुख में दोष दर्शन करें|
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मेरी सोच तो यह है कि स्वयं को सुधारने के लिये हम प्रेमपूर्वक नित्य शान्ति पाठ करें, भगवान का ध्यान करें, उनके नाम का अधिकाधिक जप करें, और जीवन का हर कार्य भगवान की प्रसन्नता के लिए ही करें| स्वयं को सुधारने के लिए हमें अपने जीवन का केंद्रबिंदु भगवान को बनाना पडेगा| अन्य कोई उपाय नहीं है|
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जीवन में मैं अनेक अच्छे से अच्छे और बुरे से बुरे अनुभवों से निकला हूँ, उन्हीं के आधार पर यह सब लिख रहा हूँ| विश्व के अनेक देशों की यात्राएँ की हैं| जब साम्यवाद अपने चरम शिखर पर था ऐसे समय में मैं घोर नास्तिक देश रूस में लगभग दो वर्ष रहा हूँ| घोरतम नास्तिक देश उत्तरी कोरिया में बीस दिन रहा हूँ, नास्तिक देश चीन की चार बार यात्रा की है, और नास्तिक देशों ... युक्रेन, रोमानिया और लाटविया का भी तत्कालीन जीवन देखा है| बोल्शेविक क्रांति की पचास वीं और इक्यावन वीं वर्षगाँठ मनाते हुए साम्यवादी रूस को भी देखा है और कोरयाई युद्ध की तीसवीं वर्षगाँठ मनाते उत्तरी कोरिया को भी| ईश्वर के बिना मनुष्य के मन की कैसी वेदना होती है, इसको देखा भी है और प्रत्यक्ष अनुभव भी किया है| उन्हीं अनुभवों के आधार पर कह रहा हूँ कि जीवन में ईश्वर को लाये बिना कोई सुधार नहीं हो सकता| हमारा प्रथम, अंतिम और एकमात्र उद्देश्य है जीवन में ईश्वर की प्राप्ति| ईश्वर को तो एक न एक दिन प्राप्त करना ही होगा, तब तक यह जीवन-मृत्यु का यह चक्र चलता रहेगा| सभी को शुभ कामनाएँ और नमन!
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ॐ तत्सत ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ फरवरी २०१९

"वैचारिक प्रदूषण" आज की सबसे बड़ी समस्या है .....

"वैचारिक प्रदूषण" आज की सबसे बड़ी समस्या है .....
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"वैचारिक प्रदूषण" आज की सबसे बड़ी समस्या है| यह पर्यावरणीय प्रदूषण से भी अधिक खतरनाक है| व्यक्ति के आचरण से भी अधिक महत्व उसके विचारों का है| यदि किसी के विचार समाज के लिए घातक हैं तो उसके अच्छे आचरण का कोई महत्व नहीं है| सन १९६० और १९७० के दशक में कुछ समय तक नक्सलवादी आन्दोलन अपने चरम पर था| यह विचारधारा अति घातक थी पर इसका नेतृत्व उस समय जिन लोगों के हाथों में था वे बहुत ही उच्च शिक्षा प्राप्त त्यागी-तपस्वी विचारशील युवा व्यक्ति थे| उनकी गतिविधियाँ अति घातक थीं पर विचार बड़े आकर्षक थे| समाज पर उस समय उनका अच्छा प्रभाव था| उनकी हिंसक गतिविधियों से त्रस्त होकर सरकार को भी हिंसा का सहारा लेना पडा था| तत्कालीन अनेक नक्सली युवा तो पुलिस की गोली से मारे गए, अधिकाँश ने सरकार से समझौता कर लिया और समाज की मुख्य धारा में लौट आये| ऐसे युवकों में से अनेक तो बड़े बड़े प्रशासनिक अधिकारी भी बने| यह आन्दोलन पूरी तरह समाप्त हो गया था| अब वर्तमान में तो तथाकथित नक्सली हैं, वे चोर-डाकू से अधिक कुछ भी नहीं हैं|
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एक उदाहरण मैं कानू सान्याल का दूँगा जो इस नक्सली आन्दोलन का जनक था| वह दार्जीलिंग के कलिम्पोंग में एक सरकारी राजस्व विभाग में क्लर्क था| समाज में व्याप्त अन्याय के विरोध में कानू सान्याल ने बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री को काले झंडे दिखाए थे| एक सरकारी कर्मचारी द्वारा ऐसा करने पर पुलिस ने उसे जेल में डाल दिया जहाँ उसकी भेंट अपने ही विचारों के दूसरे युवा चारु मजूमदार से हुई| जेल से बाहर आकर वे दोनों भारतीय कमुनिष्ट पार्टी के सदस्य बने और सन १९६७ में दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी गाँव से एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत और अगुवाई की| कानू सान्याल का जीवन एक त्यागी-तपस्वी का था| एक झौंपडी में रहता था जहाँ उसकी निजी संपत्ति में मात्र दो प्लास्टिक की कुर्सियाँ, एक चटाई, कुछ खाना बनाने के बर्तन, दो-चार पहिनने के कपड़े और कुछ पुस्तकें थीं| कोई अतिथि आता उसको कुर्सी पर बैठा कर स्वयं भूमि पर चटाई बिछाकर बैठ जाता| अपने जीवन के १४ वर्ष जेल में बिताने के बाद भाकपा (माले) का महासचिव बन कर वह नक्सलबाड़ी के पास के एक गाँव हाथीघिसा में रहने लगा| जीवन के अंतिम पड़ाव में उसे लगा कि उसकी विचारधारा समाज के लिए अति घातक थी, इसी कुंठा में २३ मार्च २०१० को फांसी पर लटक कर उसने आत्महत्या कर ली| निजी जीवन में वह एक बहुत ही ईमानदार और आदर्शवादी था| पर उसकी ईमानदारी, त्याग-तपस्या और आदर्शवाद का क्या लाभ हुआ, जब उसके विचार ही समाज के लिए घातक थे?
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हमें किसी भी व्यक्ति के विचारों को जानकर ही उसके बारे में अपनी धारणा बनानी चाहिए, न कि उसका बाहरी आचरण मात्र देखकर| बाहरी आचरण एक दिखावा भी हो सकता है, पर उसके विचार नहीं| मैं तो अब तक इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि वैचारिक प्रदूषण ही वर्त्तमान की अधिकाँश समस्याओं का कारण है|
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दुर्भाग्य से आजकल के लोगों में वैचारिक प्रदूषण तो है ही पर साथ साथ उनका आचरण भी बहुत खराब हो गया है| वैचारिक प्रदूषण को दूर कैसे किया जाए इसका चिंतन और उपाय भी समाज के कर्णधारों को करना चाहिए|
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ फरवरी २०१९

Friday, 1 February 2019

हमारा सारा जीवन "राम" और "काम" के मध्य की परम द्वन्द्वमय अंतर्यात्रा है .....

हमारा सारा जीवन "राम" और "काम" के मध्य की परम द्वन्द्वमय अंतर्यात्रा है| "राम" और "काम" दोनों के प्रबल आकर्षण हैं| एक शक्ति हमें राम की ओर यानि परमात्मा की ओर खींच रही है, वहीँ दूसरी शक्ति हमें काम की ओर यानि सान्सारिक भोग-विलास की ओर खींच रही है| हम दोंनो को एक साथ नहीं पा सकते| हम को दोनों में से एक का ही चयन करना होगा|

अन्धकार और प्रकाश एक साथ नहीं रह सकते| सूर्य और रात्री भी एक साथ नहीं रह सकते| भूमध्य रेखा से हम उत्तरी ध्रुव की ओर जाएँ तो दक्षिणी ध्रुव उतनी ही दूर हो जाएगा, और दक्षिणी ध्रुव की ओर जाएँ तो उत्तरी ध्रुव उतनी ही दूर हो जाएगा| दोनों स्थानों पर साथ साथ नहीं जा सकते|

ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
१ फरवरी २०१९

हम जिस चौराहे पर खड़े हैं, वहाँ से किधर जाएँ? .....

हम जिस चौराहे पर खड़े हैं, वहाँ से किधर जाएँ? इस चौराहे पर खड़े होना भी एक पीड़ा है जहाँ शुन्य क्षितिज से अपनी ही प्रतिध्वनि लौट आती है और एक भयंकर शीतल ज्वाला भीतर ही भीतर जलती रहती है जिसे हर सांस और भी अधिक प्रज्ज्वलित कर देती है| इस चौराहे से चार मार्ग चारों ओर की चार अलग अलग दिशाओं में जा रहे हैं .....
(१) एक मार्ग तो सांसारिक भोग-विलास और इन्द्रीय वासनाओं की तृप्ति का है जिस पर हम कई जन्मों तक चले| पर अंततः हर जन्म में कष्ट ही कष्ट पाए| अनेक जन्मों तक कष्ट पा कर बापस इसी चौराहे पर आ गए हैं|
(२) दूसरा मार्ग सांसारिक उपलब्धियों का है| इस मार्ग पर भी अनेक जन्मों तक चले पर कहीं भी कोई तृप्ति, संतोष और आनंद नहीं मिला| लौट कर बापस उसी चौराहे पर आ गए हैं|
(३) तीसरा मार्ग ज्ञान-विज्ञान का है जिस पर भी कई जन्मों तक चले तो अवश्य पर तृप्ति नहीं मिली| आगे अवरोध ही अवरोध थे जिन्हें कभी पार नहीं कर पाए और बापस ही लौट आये|
(४) अब चौथा मार्ग भगवान की भक्ति और साधना का है जिस पर चलने के सिवाय अब अन्य कुछ भी विकल्प नहीं है| इस मार्ग को जहाँ तक पार किया है उस से पूर्व के सभी पुलों को स्वयं ने ही नष्ट कर दिया है| अब पीछे तो लौट ही नहीं सकते, पीछे के सारे मार्ग स्वयं ने ही बंद कर दिए हैं| अब आगे ही आगे चलना होगा| पीछे सिर्फ मृत्यु है जिस की ओर देखने की भी मनाही है| सारे अवरोधों पर भगवान स्वयं खड़े मिलते हैं जो सारे अवरोधों को हटा देते हैं| यही आनंद का मार्ग है जिस पर तृप्ति और संतोष मिल रहा है| अन्य कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है| यही हमारा सही मार्ग है|
ॐ तत्सत् | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ जनवरी २०१९