Wednesday, 12 July 2017

एक विचार ..... (समाज और राष्ट्र की अवधारणा)

एक विचार ..... (समाज और राष्ट्र की अवधारणा)
-------------
भारत में समाज और राष्ट्र की अवधारणा दुर्भाग्य से लगभग चौदह-पंद्रह सौ वर्षों पूर्व क्षीण हो गयी थी| वह एक घोर अज्ञान व अन्धकार का युग था इसीलिए हमें पिछले एक हज़ार वर्षों में पराजित और विदेशी लुटेरों का शिकार होना पडा| इसका दोष हम दूसरों पर नहीं डाल सकते| यदि पर्वत शिखर से बहता हुआ जल नीचे खड्डों में आता है तो खड्डे पहाड़ से क्या शिकायत कर सकते है? स्वयं की रक्षा के लिए खड्डे को ही शिखर बनना पडेगा| निर्बल को सब सताते हैं| संगठित और सशक्त राष्ट्र की ओर आँख उठाकर देखने का साहस किसी में नहीं होता|
>
भारत में जब तक राष्ट और समाज हित की अवधारणा थी, तब तक किसी का साहस नहीं हुआ भारत की ओर आँख उठाकर देखने का| बिना किसी पूर्वाग्रह के यदि हम इतिहास का अध्ययन और विश्लेषण करें तो पायेंगे कि हमारी ही कमी थी जिसके कारण हम गुलाम हुए| वे कारण अब भी अस्तित्व में हैं पर कुछ कुछ चेतना अब धीरे धीरे समाज में आ रही है|
>
आप चाहे कितनी भी सद्भावना सब के लिए रखो पर हिंसक और दुष्ट प्राणियों के साथ नही रह सकते| ऐसे ही हमारे सारे कार्य यदि राष्ट्रहित में हों तो हमें प्रगति के शिखर पर जाने से कोई नहीं रोक सकता| इस बिंदु पर सब को स्वयं मंथन करना पड़ेगा|
>
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में सब राष्ट्र अपना निज हित देखते हैं| कोई किसी का स्थायी शत्रु और मित्र नहीं होता| जो भावुकता में निर्णय लिए जाते हैं वे आत्म घातक होते हैं| वैसे ही यदि हम अपने लोभ लालच, जातिवाद और प्रांतवाद से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में कार्य करें तो हमें विकसित होने से कोई नहीं रोक सकता|
>
भारत का वेदान्त दर्शन समष्टि के हित की बात करता है| यदि पूरा विश्व ही समष्टि के हित की सोचे तो यह सृष्टि ही स्वर्ग बन जाएगी पर ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि यह सृष्टि विपरीत गुणों से बनी है| सारा भौतिक जगत ही सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा से निर्मित है| बुराई और भलाई दोनों ही विद्यमान रहेगी| हमें ही इस द्वंद्व से ऊपर उठना पडेगा|
>
सभी निजात्मगण को नमन| सब का कल्याण हो|
>
ॐ तत्सत ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
जुलाई ०८, २०१६

अंतःकरण शुद्ध कैसे हो ? .....

अंतःकरण शुद्ध कैसे हो ? .....
--------------------------
निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा|
परमात्मा की कृपा प्राप्त हो इसके लिए अंतःकरण की शुद्धि प्रथम आवश्यकता है| यही चित्त-वृत्तियों का निरोध और मन चंगा करने की बात का भावार्थ है|
.
मन ही हम मनुष्यों के बंधन और मोक्ष का कारण है| घर में कोई अतिथि आने वाला हो तो हम घर की साफ़-सफाई करते हैं, यहाँ तो हम साक्षात् परमात्मा को निमंत्रित कर रहे हैं| भगवान तो सर्वत्र हैं , फिर भी दिखाई नहीं देते| इसका कारण हमारे मन रूपी अंतःकरण की मलिनता है| और कुछ भी नहीं|
.
अंतःकरण में परमात्मा की निरंतर उपस्थिति ही हमारे अंतकरण को शुद्ध कर सकती है, अन्य कोई उपाय नहीं है| लौकिक चेतना में हमारे समस्त कर्म हमारी कामनाओं द्वारा ही संचालित होते हैं, और हमारी कामनाओं का कारण हमारा अज्ञान है| हमें सच्चिदानंद और अपनी आनंदरूपता का बोध न होना ही हमारा अज्ञान है| जब तक अंतःकरण की शुद्धि नहीं होगी तब तक अज्ञान दूर नहीं हो सकता| यह अज्ञान ही हमारे सब बंधनों का कारण है|
पर अंतःकरण शुद्ध कैसे हो?

हम निश्चय कर के निरंतर प्रयास से परमात्मा को हर समय अपने ह्रदय में रखें, परमात्मा की ह्रदय में निरंतर उपस्थिति ही हमारे अंतकरण को शुद्ध कर सकती है, अन्य कोई उपाय नहीं है|

उस अवर्णनीय अनंत अगम्य अगोचर अलक्ष्य अपार प्रेमास्पद परमात्मा को नमन, जो मेरा अस्तित्व है, और मेरे ही नहीं, सभी के ह्रदयों में बिराजमान है|

ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

परमात्मा का निरंतर ध्यान ही हमारा वास्तविक Business है .....

परमात्मा का निरंतर ध्यान ही हमारा वास्तविक Business है .....
>
"Business" शब्द का सही अर्थ होता है .... "सरोकार", यानि वह कार्य जिसमें कोई स्वयं को व्यस्त रखता है| हिंदी में उसका अनुवाद .... "व्यापार" .... शब्द गलत है|
एक बार एक भारतीय साधू से किसी ने अमेरिका में पूछा .... Sir, What is your business ?
उस साधू का उत्तर था .... I have made it my business to find God.
हमारी व्यक्तिगत साधना हमारा सरोकार है, व्यापार नहीं| परमात्मा को पाने का सतत प्रयास ही हमारा वास्तविक Business है |
.
व्यवहारिक रूप से व्यापार तो कुछ लाभ पाने के लिए होता है| पर आध्यात्म में तो कुछ पाने के लिए हैं ही नहीं, यहाँ तो सब कुछ देना ही देना पड़ता है| यहाँ तो अपने अहंकार और राग-द्वेष को मिटाना यानि समर्पित करना पड़ता है| वास्तविक भक्ति अहैतुकी होती है| कुछ माँगना तो एक व्यापार है, प्रेम नहीं| परम प्रेम ही भक्ति है, भक्ति में कोई माँग नहीं होती, सिर्फ समर्पण होता है| जहाँ कोई माँग उत्पन्न हो गयी वहाँ तो व्यापार हो गया|
.
योग साधना में ..... सुषुम्ना में जागृत पराशक्ति विचरण करते हुए हमें ही जगाती है | सभी चक्रों को भेदते हुए सहस्त्रार में परमशिव तक जाकर बापस लौट आती है | इसके आरोहण और अवरोहण के साक्षी मात्र रहें, कर्ताभाव से मुक्त हों | गुरु प्रदत्त बीज मन्त्र का जप गुरुप्रदत्त विधि से निरंतर चलता रहे | चेतना को आज्ञाचक्र से ऊपर रखते हुए ही ध्यानस्थ हो जाएँ |
.
हे अगम्य, अगोचर, अलक्ष्य, अपार, सर्वव्यापी परमात्मा परम शिव, हे नारायण, यह सर्वव्यापी हृदय ही तुम्हारा घर है| तुम्हारी सर्वव्यापकता ही मेरा हृदय और मेरा अस्तित्व है| तुम अपरिभाष्य और अवर्णनीय हो| तुम्हे भी नमन, और स्वयं को भी नमन ! ॐ ॐ ॐ ||
.
ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ ||

>
"Business" शब्द का सही अर्थ होता है .... "सरोकार", यानि वह कार्य जिसमें कोई स्वयं को व्यस्त रखता है| हिंदी में उसका अनुवाद .... "व्यापार" .... शब्द गलत है|
एक बार एक भारतीय साधू से किसी ने अमेरिका में पूछा .... Sir, What is your business ?
उस साधू का उत्तर था .... I have made it my business to find God.
हमारी व्यक्तिगत साधना हमारा सरोकार है, व्यापार नहीं| परमात्मा को पाने का सतत प्रयास ही हमारा वास्तविक Business है |
.
व्यवहारिक रूप से व्यापार तो कुछ लाभ पाने के लिए होता है| पर आध्यात्म में तो कुछ पाने के लिए हैं ही नहीं, यहाँ तो सब कुछ देना ही देना पड़ता है| यहाँ तो अपने अहंकार और राग-द्वेष को मिटाना यानि समर्पित करना पड़ता है| वास्तविक भक्ति अहैतुकी होती है| कुछ माँगना तो एक व्यापार है, प्रेम नहीं| परम प्रेम ही भक्ति है, भक्ति में कोई माँग नहीं होती, सिर्फ समर्पण होता है| जहाँ कोई माँग उत्पन्न हो गयी वहाँ तो व्यापार हो गया|
.
योग साधना में ..... सुषुम्ना में जागृत पराशक्ति विचरण करते हुए हमें ही जगाती है | सभी चक्रों को भेदते हुए सहस्त्रार में परमशिव तक जाकर बापस लौट आती है | इसके आरोहण और अवरोहण के साक्षी मात्र रहें, कर्ताभाव से मुक्त हों | गुरु प्रदत्त बीज मन्त्र का जप गुरुप्रदत्त विधि से निरंतर चलता रहे | चेतना को आज्ञाचक्र से ऊपर रखते हुए ही ध्यानस्थ हो जाएँ |
.
हे अगम्य, अगोचर, अलक्ष्य, अपार, सर्वव्यापी परमात्मा परम शिव, हे नारायण, यह सर्वव्यापी हृदय ही तुम्हारा घर है| तुम्हारी सर्वव्यापकता ही मेरा हृदय और मेरा अस्तित्व है| तुम अपरिभाष्य और अवर्णनीय हो| तुम्हे भी नमन, और स्वयं को भी नमन ! ॐ ॐ ॐ ||
.
ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ ||

यहूदी मज़हब बदनाम क्यों हुआ ? .....

यहूदी मज़हब बदनाम क्यों हुआ ? .....
-----------------------------------
यहूदी, ईसाईयत और इस्लाम .... ये तीनों ही अब्राहमिक मत हैं| यहूदी एक व्यापारी कौम थी जिनका पश्चिमी एशिया, उत्तरी अफ्रीका और प्रायः सारे यूरोप में खूब बोलबाला था| अधिकाँश व्यापार इन लोगों के हाथ में ही था, और ये लोग जबरदस्त सूदखोर थे| ईसा मसीह स्वयं एक यहूदी थे पर उनको इन सूदखोर लोगों से इतनी घृणा थी कि उन्होंने सूदखोरी का सदा विरोध किया|
इनकी सूदखोरी के कारण ही इस्लाम ने भी सदा इनका विरोध किया| सूद बसूलने में ये यहूदी बड़े निर्दयी थे| यहूदियों ने सूदखोरी कर कर के लोगों को खूब लूटा, इसी कारण अन्य मतावलंबियों में इनके प्रति घृणा भर गयी|
.
अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक शेक्सपीयर ने अपना नाटक Merchant of Venice यहूदियों की सूदखोरी के विरुद्ध ही लिखा था| इनको अपने सूद यानी ब्याज की रकम से इतना अधिक प्यार था कि उसके समक्ष इनका राष्ट्रीय हित भी गौण था| इसीलिये जर्मनी में ईसाईयों को इनसे घृणा हो गयी थी|
.
इन्होनें अन्य सब मतों का सदा विरोध किया और उन्हें बदनाम करने का भी प्रयास किया| East India Company में भी अधिकाँश धन यहूदियों का ही था| वे इस कंपनी के लगभग मालिक ही थे| कार्ल मार्क्स भी एक यहूदी था| इतिहास में इनके धर्मगुरु भी सदा से ही सनातन धर्म के विरोधी रहे है
.
आज भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए इजराइल का साथ आवश्यक है| इसलिए मैं भारत-इजराइल मित्रता का समर्थक हूँ| पर हमें अधिक अपेक्षा उनसे नहीं रखनी चाहिए| जितनी हमें इजराइल की आवश्यकता है, उस से अधिक इजराइल को भारत की आवश्यकता है| हमें उन से सैन्य और कृषि तकनीक लेकर आत्मनिर्भर हो जाना चाहिए| अंततः यहूदी हैं तो असुर ही, पता नहीं उनका असुरत्व कब जागृत हो जाए| अन्य असुरों के विरुद्ध ही हमें उनकी सहायता चाहिए| पर लम्बे समय में ये हमारे मित्र और समर्थक नहीं रहेंगे|
.
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
५ जुलाई २०१७

मानसिक व्यभिचार से बचें .....

मानसिक व्यभिचार से बचें .....
>
मन में बुरी बुरी कल्पनाओं का आना, और उन कल्पनाओं में मन का लगना मानसिक व्यभिचार है| यह मानसिक व्यभिचार ही भौतिक व्यभिचार में बदल जाता है| यह मानसिक व्यभिचार आध्यात्म मार्ग की सबसे बड़ी बाधा तो है ही लौकिक रूप से भी समाज में दुराचार फैलाता है|
>
इससे कैसे बचें इसका निर्णय प्रत्येक व्यक्ति स्वयं ले| आजकल किसी को कुछ कहना भी अपना अपमान करवाना है| समाज का वातावरण बहुत अधिक खराब है| बड़े बड़े धर्मगुरु भी अपनी बात कहते हुए संकोच करते हैं|
फेसबुक पर तो अपनी वॉल पर यह बात लिख सकता हूँ, पर किसी को कुछ कहने का अर्थ है गालियाँ, तिरस्कार और अनेक अपमानजनक शब्दों को निमंत्रित करना| आज के युग में व्यक्ति स्वयं को बचाकर रखे, और उपदेश ही देना है तो अपने बच्चों को ही दे, और किसी को नहीं| आजकल तो स्वयं के बच्चे भी नहीं सुनते| इतना लिख दिया यही बहुत है|
>
"तेरे भावें कछु करे भलो बुरो संसार |
नारायण तून बैठ के अपनों भवन बुहार ||"
.
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

विरही को कहीं सुख नहीं है ...

विरही को कहीं सुख नहीं है ....
.
"कबीर बिछड्या राम सूँ , ना सुख धूप न छाँह" |
सुख सिर्फ राम में ही है, बाकी सब मृगतृष्णा है| विरही को कहीं सुख नहीं है|
.
नैनन की करि कोठरी पुतली पलंग विछाय | पलकों की चिक डारिकै पिय को लिया रिझाय ||
.
पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात | देखत ही छिप जाएगा ज्यों तारा परभात ||
.
ॐ ॐ ॐ ||

अंतमति सो गति, पर अंतमति कैसी होती है ......

अंतमति सो गति, पर अंतमति कैसी होती है ......
------------------------------------------------
भगवान का वचन है कि अंतकाल में जो मेरा स्मरण करते हुए मरते हैं वे मुझे ही प्राप्त होते हैं| अब प्रश्न यह है कि प्रयाणकाल में क्या भगवान सचमुच याद आते हैं ?
भगवान के वचन हैं ....
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् |
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ||
.
हम स्वयं को यह सोचकर मूर्ख न बनाएँ कि जीवन भर तो मौज-मस्ती करेंगे और जब हाथ-पैर नहीं चलेंगे तब अपना समय आयेगा और भगवान का नाम लेते लेते मर जायेंगे|
.
अंतिम समय बड़ा भयंकर होता है| मनुष्य शारीरिक या मानसिक कष्ट या मूर्छा में ही प्राण त्यागता है| उस समय भगवान तभी याद आते हैं यदि जीवन में दीर्घकाल तक उनका स्मरण चिंतन करते करते हम देहाभिमान से मुक्त हो गए हों, अन्यथा नहीं|

ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||