"जाति हमारी ब्रह्म है, माता-पिता हैं राम | गृह हमारा शून्य में, अनहद में विश्राम ||"
Friday, 16 January 2026
जाति हमारी ब्रह्म है, माता-पिता हैं राम | गृह हमारा शून्य में, अनहद में विश्राम ---
जो जाति परमात्मा की है, वह जाति ही मेरी है| जैसे विवाह के बाद स्त्री का वर्ण, गौत्र और जाति वही हो जाती है जो उसके पति की होती है, वैसे ही परमात्मा को समर्पित हो जाने के बाद मेरा वर्ण, गौत्र और जाति वह ही है जो सर्वव्यापी परमात्मा की है| मैं 'अच्युत' हूँ|
जातिवाद सबसे बड़ा धोखा है| मैं किसी भी जाति, सम्प्रदाय, या उनकी किसी संस्था से सम्बद्ध नहीं हूँ| सब संस्थाएँ, सब सम्प्रदाय व सब जातियाँ मेरे लिए हैं, मैं उन के लिए नहीं| मैं असम्बद्ध, अनिर्लिप्त, असंग, असीम, शाश्वत आत्मा हूँ जो इस देह रूपी वाहन पर यह लोकयात्रा कर रहा हूँ| मेरा ऐकमात्र शाश्वत सम्बन्ध सिर्फ परमात्मा से है जो सदा रहेगा| जिस नाम से मेरे इस शरीर की पहिचान है, उस शरीर का नाम इस जन्म में कृपा शंकर है| पता नहीं कितने जन्म लिए हैं और पता नहीं कब कितने नाम तत्कालीन घर वालों ने रखे होंगे|
यथार्थ में परमात्मा के सिवाय न मेरी कोई माता है, और न कोई पिता है, और परमात्मा के सिवाय मेरी कोई जाति नहीं है| परमात्मा की अनंतता में जहाँ अनाहत नाद गूंज रहा है, वहीं मेरा घर है, वहीं मुझे विश्राम मिलता है| वहीं मैं हूँ| ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
१६ जनवरी २०२०
Thursday, 15 January 2026
हम सब का जीवन उत्तरायण, धर्मपरायण और राममय बने ---
ज्योतिषियों के अनुसार इस बार मकर-संक्रांति १५ जनवरी २०२४ को है। हम सभी को मकर संक्रान्ति, लोहिड़ी और पोंगल की अनंत मंगलमय शुभ कामनाएँ॥ हम सब का जीवन उत्तरायण, धर्मपरायण और राममय बने।
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आप आज चाहे इस पृथ्वी के किसी भी स्थान पर हों, देवाधिदेव महादेव भगवान शिव का ध्यान करेंगे, और घर बैठे बैठे गंगा-स्नान का पुण्य लाभ भी प्राप्त करेंगे। मकर संक्रांति पर सूर्य उत्तरायण होता है, इसलिए इस समय किए गए ध्यान, जप, पुण्य और दान का फल अनंत होता है।
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भगवान श्रीकृष्ण की पवित्र अमर वाणी से इस लेख का आरंभ कर रहा हूँ, जो आपका मंगल ही मंगल करेगी और आपके जीवन को धन्य भी कर देगी ---
"यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये॥
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्युक्तस्य योगिनः॥"
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मकर संक्रांति के दिन गंगा-स्नान का बहुत महत्व है। आज अभी इसी समय हम गंगा जी में स्नान करेंगे। उसकी विधि बताता हूँ ---
"ज्ञान संकलिनी तन्त्र" के अनुसार इड़ा भगवती गंगा है, पिंगला यमुना नदी है, और उनके मध्य में सुषुम्ना सरस्वती है। इस त्रिवेणी का संगम तीर्थराज है जहाँ स्नान करने से सर्व पापों से मुक्ति मिलती है।
> वह तीर्थराज त्रिवेणी प्रयाग का संगम कहाँ है ?
> वह स्थान -- तीर्थराज त्रिवेणी का संगम हमारे भ्रूमध्य में है।
अपनी चेतना को भ्रूमध्य में और उससे ऊपर रखना ही त्रिवेणी संगम में स्नान करना है।
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भूमि पर एक ऊनी कंबल का आसन बिछा कर मेरुदण्ड को उन्नत रखते हुए पूर्व या उत्तर दिशा में मुख रखते हुए पद्मासन या सिद्धासन में बैठ जाएँ। किसी भी परिस्थिति में कमर सीधी हो अन्यथा कोई लाभ नहीं होगा। जिनकी कमर झुक गई है उन्हें दुबारा जन्म लेना होगा, इस जन्म में उन्हें सिद्धि नहीं मिल सकती। वे पूर्ण भक्ति से भगवान का नाम जप करें,। कमर सीधी रखने में यदि कोई कठिनाई है तो नितंबों के नीचे एक पतली गद्दी लगा लें। जो भूमि पर नहीं बैठ सकते, वे भूमि पर ऊनी कंबल बिछा कर उस पर एक बिना हत्थे की कुर्सी रखकर उस पर बैठें। कमर किसी भी परिस्थिति में सीधी हो।
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अजपा-जप (हंसःयोग/हंसवतिऋक) द्वारा सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में देवाधिदेव महादेव भगवान शिव का ध्यान भ्रूमध्य में करें। मानसिक रूप से मूर्धा में प्रणव का मानसिक जप व श्रवण करें। यह आपका पवित्र गंगा जी में स्नान है। आपको पवित्र गंगा जी में स्नान का पुण्य लाभ हो रहा है।
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नित्य रात्रि को सोने से पूर्व भगवान का ध्यान कर के निश्चिन्त होकर जगन्माता की गोद में सो जाएँ।
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दिन का प्रारम्भ परमात्मा के प्रेम रूप पर ध्यान से करें।
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पूरे दिन परमात्मा को अपनी स्मृति में रखें। यदि भूल जाएँ तो याद आते ही पुनश्चः मानसिक स्मरण प्रारम्भ कर दें। उन्हें ही अपने जीवन का केंद्र-बिन्दु और कर्ता बनाएँ। स्वयं एक निमित्त मात्र होकर साक्षी भाव में जीयें।
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आज मकर-संक्रांति का दिन सम्पूर्ण समष्टि के लिए कल्याणकारी और ,मंगलमय हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ जनवरी २०२४
Monday, 12 January 2026
सभी मित्रों से एक प्रश्न .....
सभी मित्रों से एक प्रश्न .....
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जब अच्छे कर्मों का फल मिलता है तब तो हम कहते हैं कि भगवान की कृपा से ऐसा हुआ| पर जब बुरे कर्मों का फल मिलता है तब हम इसे भगवान की कृपा क्यों नहीं मानते ? तब हम इसे अपना दुर्भाग्य क्यों मानते हैं?
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उपरोक्त प्रश्न का उत्तर मेरी बुद्धि से तो यही हो सकता है कि हमारी बुद्धि और मन दोनों ही परमात्मा को अर्पित नहीं हैं, तभी ऐसा विचार मन में आया| यदि हम अपने मन और बुद्धि दोनों को ही परमात्मा को समर्पित कर दें तब ऐसा प्रश्न ही नहीं उठेगा| भगवान को प्रिय भी वही व्यक्ति है जिसने अपना मन और बुद्धि दोनों ही भगवान को अर्पित कर दिए हैं|
भगवान कहते हैं ....
"सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः |
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ||१२.१४||
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इससे पहले भगवान कह चुके हैं ........
"यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः |
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते" ||६.२२||
परमात्मा को प्राप्त करके योगस्थ व्यक्ति परमानंद को प्राप्त होकर इससे अधिक अन्य कोई सुख नहीं मानता हुआ भारी से भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता है|
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हम परमात्मा को प्राप्त नहीं हुए इसी लिए दुःखों से विचलित हैं| अन्यथा दुःख और सुख दोनों ही भगवान के प्रसाद हैं| अभ्यास द्वारा हम ऐसी आनंदमय स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं जो सुख और दुःख दोनों से परे है|
भगवान कहते हैं .....
"अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना |
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्" ||८.८||
इसका अति गहन अर्थ जो मुझे समझ में आया है वह है ......
"अभ्यासयोगयुक्त अनन्यगामी चित्तद्वारा दिव्य परम पुरुष का हम चिंतन करें"|
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Note: ---
विजातीय प्रतीतियों के व्यवधानसे रहित प्रतीतिकी आवृत्तिका नाम अभ्यास है|
वह अभ्यास ही योग है|
जहाँ अन्य कोई नहीं है, वहाँ मैं अनन्य हूँ|
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"उस अभ्यासरूप योगसे युक्त चित्त द्वारा परमात्मा का आश्रय लेकर, विषयान्तर में न जाकर, गुरु महाराज के उपदेशानुसार कूटस्थ सूर्यमण्डल में जो अनन्य दिव्य परम पुरुष हैं, उन्हीं का अखण्डवृत्ति द्वारा निरंतर ध्यान करते हुए हम उन्हीं को प्राप्त हों| अन्य कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं है| यही परमात्मा की प्राप्ति है|"
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मुझे तो मेरे गुरु महाराज का यही आदेश और उपदेश है| बाकी सब इसी का विस्तार है| सब विभूतियाँ परमात्मा की हैं, हमारी नहीं| हम परमात्मा को उपलब्ध हों| इधर उधर फालतू की गपशप में समय नष्ट न कर सदा भगवान का स्मरण करें| दुःख और सुख आयेंगे और चले भी जायेंगे, पर हम उन से विचलित न हों| भगवान में आस्था रखें| वे सदा हमारी रक्षा कर रहे हैं|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१२ जनवरी २०१८
Sunday, 11 January 2026
राम जन्मभूमि प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव -- (२२ जनवरी २०२४)
राम जन्मभूमि प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव -- (२२ जनवरी २०२४)
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धर्म/अधर्म के नाम पर विवाद करने वाले कुछ भी कहें, हम तो पौष शुक्ल द्वादशी विक्रम संवत २०८० (२२ जनवरी २०२४) को पूर्वाह्न ११ बजे से अपराह्न १ बजे तक अनेक संत-महात्माओं व भक्तों के साथ भजन-कीर्तन करेंगे, बड़ी LED स्क्रीन लगाकर अयोध्या के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह को देखेंगे, शंख-ध्वनि , घंटानाद , आरती और पौष-बड़ों का प्रसाद वितरित करेंगे। दो अलग अलग स्थानों से निमंत्रण आ चुके हैं, लेकिन हम वहीं जाएँगे जहाँ संत-महात्मा होंगे। सायंकाल दीपोत्सव भी मनाएंगे। रात्रि को भगवान श्रीराम का ध्यान भी करेंगे। पाँच-सौ वर्षों का कलंक दूर हो रहा है। पता नहीं हमारे पूर्वजों की कितनी पीढ़ियाँ इस दिन की प्रतीक्षा में गुजर गईं। वे जहाँ भी हैं, उन्हें आनंद होगा।
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सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति व सभ्यता का केंद्र अब अयोध्या होगी। अयोध्या की प्रतिष्ठा अब वही होगी जो वेटिकन और मक्का की है। पूरा विश्व "सनातन हिन्दू भारत" की प्रतीक्षा कर रहा है। भगवत्-प्राप्ति और निरंतर भगवत्-चेतना में स्थिति -- हमारा धर्म है। यह उत्सव हमारे धर्म का पुनरोत्थान करेगा।
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आज का दिन बहुत अधिक शुभ था। कई दिनों के पश्चात आज का मौसम बहुत अच्छा था। खूब धूप निकली, और सर्दी भी कम थी। आध्यात्मिक रूप से भी बहुत शुभ दिन था। जिस भी दिन भगवान की स्मृति बनी रहे वह दिन बहुत अधिक शुभ होता है।
"सीताराम चरण रति मोरे। अनुदिन बढ़ऊ अनुग्रह तोरे॥
जेहीं बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहू सो बेगि दास मैं तोरा॥"
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
११ जनवरी २०२४
Saturday, 10 January 2026
आत्मज्ञान (Self Realization) ही परम धर्म है। आत्मज्ञान (Self Realization) ही परम धर्म है। आत्मस्वरूप का चिंतन न करना बहुत बड़ी हिंसा, निजात्मा का तिरस्कार और आत्म-हत्या है।
आत्मज्ञान (Self Realization) ही परम धर्म है। आत्मस्वरूप का चिंतन न करना बहुत बड़ी हिंसा, निजात्मा का तिरस्कार और आत्म-हत्या है।
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इस भौतिक देह के भ्रूमध्य से एक ज्योति निकल कर सारी सृष्टि में फैल जाती है। वह ज्योति सारी सृष्टि में, और सारी सृष्टि उस ज्योति में होती है। उस ज्योति से ही प्रणव का एक मधुर नाद भी निःसृत होता रहता है। वह सर्वव्यापी ज्योति और वह नाद -- मैं स्वयं हूँ, यह नश्वर देह नहीं। उस चेतना में मैं सच्चिदानंद परमब्रह्म के साथ एक होकर रहता हूँ। हरेक सांस के साथ अजपा-जप (हंसवतीऋक/हंसःयोग) चलता रहता है। कुंभक के समय, और जब भी प्रेरणा मिले तब तेलधारा की तरह नादानुसंधान होता रहता है।
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श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय का उनत्तीसवाँ मंत्र एक बहुत ही गोपनीय साधना का संकेत करता है जिसे प्राणक्रिया कहते हैं --
"अपाने जुह्वति प्राण प्राणेऽपानं तथाऽपरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥४:२९॥
उपरोक्त विद्या एक गोपनीय विद्या है जिसे आचार्य अपने शिष्य की पात्रता देखकर उसे अपने सामने बैठाकर सिखाता है। यह आत्म-साधना आध्यात्मिक यज्ञ का एक रूप है, जिसे महावतार बाबाजी ने क्रिया-योग का नाम दिया है। यह भी इस जीवन की एक उपलब्धि है।
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आप सब मेरी ही निजात्मा और मेरे ही प्राण हो। आप सब को नमन॥ ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
१० जनवरी २०२६
ब्राह्मण की शक्ति का स्त्रोत है -- प्राणायाम, गायत्री मंत्र, और सविता देव की भर्गः ज्योति का विधिवत् ध्यान ---
ब्राह्मण की शक्ति का स्त्रोत है -- प्राणायाम, गायत्री मंत्र, और सविता देव की भर्गः ज्योति का विधिवत् ध्यान। इनके बिना ब्राह्मण शक्तिहीन है।
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जिन का उपनयन संस्कार हो चुका है उन को प्रातः कम से कम दस बार गायत्री मंत्र का मानसिक जप करना चाहिए। जो दिन में एक बार भी गायत्री मंत्र का जप नहीं करता वह ब्राह्मणत्व से च्युत हो जाता है, और उसे प्रायश्चित करना पड़ता है।
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गायत्री मंत्र के जो सविता देव हैं, वे ही वेदान्त के ब्रह्म हैं, श्रीमद्भगवद्गीता के कूटस्थ पुरुषोत्तम, व परमशिव और नारायण भी वे ही हैं। यह अनुभूति का विषय है जो बुद्धि से परे है। उन्हीं की हम उपासना और ध्यान करें।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
७ जनवरी २०२६
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पुनश्च: --- हम निरंतर ब्राह्मी-स्थिति / कूटस्थ-चैतन्य / कैवल्य-पद में रहें। यही ब्रह्म-तेज है, और यही ब्रह्म-शक्ति है जो साधना द्वारा स्वयं जागृत हो जाती है।
जो द्विज हैं, उन्हें प्रातःकाल उठते ही मौन रखते हुए कम से कम दस की संख्या में सहस्त्रार चक्र में गायत्री मंत्र का जप और परमात्मा की भर्गः ज्योति का ध्यान अवश्य करना चाहिए। तत्पश्चात् अपनी गुरु-परंपरानुसार सायं और प्रातः की संध्या और साधना कीजिये। साधना में प्राणायाम, परमात्मा की भर्गः ज्योति का ध्यान और गायत्री जप विप्रों के लिए अनिवार्य हैं। इन का कोई विकल्प नहीं है
इस संसार का मूल ऊर्ध्व में है, जहाँ अवधान से सच्चिदानंद ब्रह्म की अनुभूति होती है ---
इस संसार का मूल ऊर्ध्व में है, जहाँ अवधान से सच्चिदानंद ब्रह्म की अनुभूति होती है ---
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सत्यनिष्ठा से परमात्मा से परमप्रेम/अनुराग रखते हुए, हमारी चेतना निरन्तर ऊर्ध्वमूल कूटस्थ में रहे। यही हमारी साधना, और यही हमारा जीवन हो। वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण की परमकृपा से उनके पुरुषोत्तम रूप को हम यहीं पर समझ पायेंगे। वे ही विष्णु हैं, वे ही परमशिव हैं, और कुंडलिनी महाशक्ति भी उन्हीं का मातृरूप है। अपने रहस्य को अपने भक्तों के समक्ष वे स्वयं ही अनावृत कर सकते हैं। ध्यान साधना में उनकी परम कृपा से उनका रहस्य अब रहस्य नहीं रहता है। यह आश्चर्यजनक सृष्टि जो क्षणिक भी है और शाश्वत भी, -- वे स्वयं हैं जिन का मूल ऊर्ध्व में है।
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स्थायी रूप से अपना ध्यान सच्चिदानंद ब्रह्म परमात्मा में केन्द्रित करने से सुख-दुःख रूपी सभी अनुभूतियाँ नष्ट हो जाती हैं, और हम आनंद से भर जाते हैं। हम उन समस्त दुखों को समाप्त कर सकते हैं जो इस संसार में हमें अनुभूत होते हैं।
इस सृष्टि में जो कुछ भी हो रहा है, उस सब का कारण इस संसार रूपी वृक्ष का अत्यंत सूक्ष्म ऊर्ध्वमूल है। बहुत गहरे ध्यान में हम इसकी अनुभूति भी कर सकते हैं, और देख भी सकते हैं। यह नित्य और महान है। यह ऊर्ध्वमूल ही ब्रह्म है जो चिंतन व समझने का विषय है। एक बार इसकी अनुभूति हो जाये तो फिर वहीं उसी में रहना चाहिए, नीचे नहीं उतरना चाहिए।
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जिस प्रकार किसी भी वृक्ष को आधार तथा पोषण अपने ही मूल से प्राप्त होता है, उसी प्रकार जीव और जगत दोनों को अपना आधार और पोषण अनन्त ब्रह्म से ही प्राप्त होता है। अनंत ब्रह्म परमात्मा को ही यहाँ "ऊर्ध्व" कहा गया है। इसे समझाने के लिए ही अश्वत्थ वृक्ष की उपमा दी गई है। जो भी मुमुक्षु इस सत्य-स्वरूप ऊर्ध्वमूल को समझता है, वह वास्तव में वेदवित् है। ज्ञानी पुरुष वह है जो इस नश्वर संसार-वृक्ष तथा इसके शाश्वत ऊर्ध्वमूल परमात्मा को भी समझता है।
गीता में भगवान कहते हैं ---
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥"
"अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥१५:२॥"
"न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥१५:३॥"
"ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम् यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥१५:४॥"
अर्थात् -- श्री भगवान् ने कहा -- ज्ञानी पुरुष इस संसार वृक्ष को ऊर्ध्वमूल और अध:शाखा वाला अश्वत्थ और अव्यय कहते हैं, जिसके पर्ण छन्द - वेद हैं, ऐसे संसार वृक्ष को जो जानता है, वह वेदवित् है॥१५:१॥"
उस वृक्ष की शाखाएं गुणों से प्रवृद्ध हुईं नीचे और ऊपर फैली हुईं हैं; (पंच) विषय इसके अंकुर हैं; मनुष्य लोक में कर्मों का अनुसरण करने वाली इसकी अन्य जड़ें नीचे फैली हुईं हैं ॥१५:२॥"
इस (संसार वृक्ष) का स्वरूप जैसा कहा गया है वैसा यहाँ उपलब्ध नहीं होता है, क्योंकि इसका न आदि है और न अंत और न प्रतिष्ठा ही है। इस अति दृढ़ मूल वाले अश्वत्थ वृक्ष को दृढ़ असङ्ग शस्त्र से काटकर --- ॥१५:३॥"
--- उस पद का अन्वेषण करना चाहिए जिसको प्राप्त हुए पुरुष पुन: संसार में नहीं लौटते हैं। "मैं उस आदि पुरुष की शरण हूँ, जिससे यह पुरातन प्रवृत्ति प्रसृत हुई है"॥१५:४॥"
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भगवान श्रीकृष्ण का यह संदेश लक्षणात्मक शैली में है। भगवान् श्रीकृष्ण जब कहते हैं कि इस वृक्ष की शाखाएँ ऊपर और नीचे की ओर फैली हुईं हैं, इसका तात्पर्य - देवता, मनुष्य, पशु इत्यादि योनियों से है। "अध" और "ऊर्ध्व" इन दो शब्दों से इन्हीं दो दिशाओं की ओर निर्देश किया गया है।
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जीवों की ऊर्ध्व या अधोगामी प्रवृत्तियों का पोषण प्रकृति के सत्त्व, रज, और तम -- इन तीन गुणों के द्वारा किया जाता है। किसी भी वृक्ष की शाखाओं पर अंकुर या कोपलें होती हैं जहाँ से नई शाखाएं फूटकर निकलती हैं। यहाँ इस रूपक में इन्द्रियों के शब्दस्पर्शादि विषयों को प्रवाल यानि अंकुर कहा गया है।
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इस वृक्ष की गौण जड़ें नीचे फैली हुई हैं। परमात्मा तो इस संसार वृक्ष का अधिष्ठान होने से इसका ऊर्ध्वमूल है, किन्तु इसकी अन्य जड़ें भी हैं जो इस वृक्ष के अस्तित्व को बनाये रखती हैं। हमारे मन में नए नये संस्कार और वासनाएँ अंकित होती रहती हैं। ये वासनाएँ ही अन्य जड़ें हैं, जो मनुष्य को अपनी अभिव्यक्ति के लिये कर्मों में प्रेरित करती रहती हैं। शुभ और अशुभ कर्मों का कारण भी ये वासनाएँ ही हैं।
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यह जो संसारवृक्ष है --, इसका आदि, अंत और मध्य कहीं भी नहीं दिखाई देता। भगवान उसे असङ्गतारूप शस्त्र के द्वारा काटने का आदेश देते हैं। अभी समझना पड़ेगा कि असंगता क्या है?
आचार्य शंकर के अनुसार "पुत्रैषणा (पुत्र की कामना), वित्तैषणा (धन की कामना), और लोकैषणा (लोकों में प्रसिद्धि की कामना) से उपराम हो जाना ही असङ्ग है।"
ऐसे असङ्गशस्त्र से इस संसारवृक्ष को बीजसहित उखाड़कर फेंक देना है।
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लेकिन असंगत्व शब्द का एक दूसरा भी अर्थ मुझे समझ में आ रहा है। वैराग्य को भी हम असंगत्व कह सकते हैं। अनन्य-योग के द्वारा हम कैवल्य पद को प्राप्त कर सकते हैं, यह भी असंगत्व है।
उपासना के समय भगवान जैसी भी प्रेरणा दें, वैसा ही करना चाहिए। मुख्य बात है समर्पण और भक्ति। लेकिन इस संसार-वृक्ष को कैसे भी उखाड़कर फेंक देना है। यह अति गहन साधना द्वारा ही संभव है।
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यह संसार वृक्ष (अश्वत्थ वृक्ष) कोई लौकिक वृक्ष नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत का प्रतीक है। कोई भी पुरुष इस संसार वृक्ष का आदि, अन्त, या प्रतिष्ठा नहीं देख सकता। यह वृक्ष हमारे अज्ञान से उत्पन्न होता है, और इसका अस्तित्व वासनाओं के कारण है। आत्मा के अपरोक्ष ज्ञान से यह समूल नष्ट हो जाता है। इस संसार वृक्ष को काटने का एकमात्र शस्त्र "असंग" अर्थात् वैराग्य है। शरीर, मन और बुद्धि से परे जाकर, यानि इन से भी ऊपर उठ कर, यदि हम ध्यान करेंगे तो वैराग्य जागृत होगा। यह वैराग्य ही असंग अस्त्र है। वैराग्य का एक अर्थ -- राग से विमुखता भी है।
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भगवान हमें उस पद का अन्वेषण करने का उपदेश देते हैं, जिसे प्राप्त हुये पुरुष पुनः बापस लौटते नहीं है। साधक को अपना ध्यान ऊर्ध्वमूल परमात्मा में लगाना चाहिये, जहाँ से इस संसार की पुरातन प्रवृत्ति प्रसृत हुई है। हम इस उपदेश का पालन कैसे करें? इसका एकमात्र उपाय है शरणागति और प्रार्थना -- जिसका निर्देश चौथे श्लोक के अन्त में किया गया है कि -- मैं उस आदि पुरुष की शरण में हूँ, जहाँ से यह पुरातन प्रवृत्ति प्रसृत हुई है।
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अब अंतिम बात यह है कि हम "ऊर्ध्वमूल परमब्रह्म परमात्मा का ध्यान कैसे करें।" यह बात साधक को उसकी आध्यात्मिक स्थिति के अनुसार ही आचार्य द्वारा बताई जाती है। उस की सार्वजनिक चर्चा का निषेध है। फिर भी भगवान से आर्त प्रार्थना करने पर किसी न किसी माध्यम से भगवान इसे बता ही देते हैं। सुपात्र साधक को बताने में कोई दोष नहीं है। आचार्य शंकर के शब्दों में --
"सत्संगत्वे निस्संगत्वं निस्संगत्वे निर्मोहत्वम् ।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥"
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हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
९ जनवरी २०२६
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