Monday, 29 December 2025

३१ दिसंबर की रात्रि "निशाचर रात्रि" होती है। निशाचर लोग अभिसारिकाओं की खोज में रहते हैं, और अभिसारिकायें निशाचरों की खोज में ---

 ३१ दिसंबर की रात्रि "निशाचर रात्रि" होती है। निशाचर लोग अभिसारिकाओं की खोज में रहते हैं, और अभिसारिकायें निशाचरों की खोज में। वहाँ धोखा ही धोखा है। मद्यपान, नाचगाना और हो-हुल्लड़ के सिवाय और कुछ भी नहीं होता। जिस रात भगवान का भजन नहीं होता वह राक्षस-रात्रि है, और जिस रात भगवान का भजन हो जाए वह देव-रात्रि है। मेरी बात की लोग हंसी उड़ायेंगे, लेकिन मुझ पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं वही कहूँगा जिससे आपका कल्याण हो।

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काम वही करें जिससे आत्म-शक्ति में वृद्धि हो। सर्वश्रेष्ठ कार्य है -- "ज्योतिर्मय पारब्रह्म/पुरुषोत्तम/परमशिव का ध्यान और जपयज्ञ"। इससे असत्य और अंधकार की शक्तियाँ क्षीण होंगी। अपनी बुद्धिमत्ता और ओजस्विता को मत लुटायें। परमशिव की आसक्ति का आलम्बन करें। ईश्वर और संतपुरुषों के अनुग्रह के लिए प्रार्थना करें, ताकि राष्ट्र शक्तिशाली हो, और हम वीर्यवान बनें।
ॐ तत्सत् !! महादेव महादेव महादेव !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ दिसंबर २०२५

परमात्मा ही मेरा वास्तविक स्वरूप है ---

 परमात्मा ही मेरा वास्तविक स्वरूप है ---

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योग के साथ भोग की कामना -- जीवन का सबसे बड़ा भटकाव है। "राम" और "काम" कभी साथ-साथ नहीं रह सकते, वैसे ही जैसे प्रकाश और अंधकार। आत्म-साक्षात्कार -- हमारे इस मनुष्य जीवन का प्रथम, अंतिम, और एकमात्र उद्देश्य है। हमारा लक्ष्य भगवत्-प्राप्ति है, उस से कम कुछ भी नहीं। इस मार्ग में कोई भी नीति, नियम या सिद्धांत यदि बाधक हो तो उसका उसी क्षण परित्याग कर दो। कोई भी नीति, नियम या सिद्धांत -- परमात्मा से बड़ा नहीं है।
धर्म और अधर्म से भी ऊपर हमें उठना होगा। अंततः ये भी बंधन हैं। परमात्मा सब तरह के धर्म और अधर्म से परे है।
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भगवान ने गीता में जिस ब्राह्मी-स्थिति की बात की है, उस ब्राह्मी स्थिति में हम सब प्रकार के बंधनों से ऊपर होते हैं। कूटस्थ-चैतन्य में रहने का अभ्यास करते करते हमें ब्राह्मी-स्थिति प्राप्त हो जाती है। गीता में भगवान कहते हैं --
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२:७२॥"
अर्थात् - हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है॥
(O Arjuna! This is the state of the Self, the Supreme Spirit, to which if a man once attains, it shall never be taken from him. Even at the time of leaving the body, he will remain firmly enthroned there, and will become one with the Eternal.)
कूटस्थ सूर्यमंडल में पुरुषोत्तम/परमशिव का ध्यान मेरे विचारों व आचरण को निरंतर परमात्मा की चेतना में रखता है। यही मेरी साधना और ब्रह्मविद्या का सार है।
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एक बड़े से बड़ा ब्रह्मज्ञान -- कृष्ण यजुर्वेद में श्वेताश्वतर उपनिषद के छठे अध्याय के पंद्रहवें -- इस महाचिन्मय हंसवती ऋक मंत्र में है। इस की एक विधि है जिसका संधान गुरु प्रदत्त विधि से उन्हीं के आदेशानुसार करना पड़ता है। "हंस" शब्द का अर्थ परमात्मा के लिए व्यवहृत हुआ है। परमात्मा को अपना स्वरूप जानने पर ही जीव -- मृत्यु का अतिक्रम कर पाता है। इसका अन्य कोई उपाय नहीं है।
"एको हंसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्निः सलिले संनिविष्टः।
तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥" (श्वेताश्वतरोपनिषद्-६/१५)
इस सम्पूर्ण विश्व के अन्तर में 'एक' 'हंसस्वरूपी आत्मसत्ता' है एवं 'वह' अग्निस्वरूप' है जो जल की अतल गहराई में स्थित है। 'उसका' ज्ञान प्राप्त करके व्यक्ति मृत्यु की पकड़ से परे चला जाता है तथा इस महद्-गति के लिए दूसरा कोई मार्ग नहीं है। (अस्य भुवनस्य मध्ये एकः हंसः। सः एव सलिले संनिविष्टः अग्निः। तम् एव विदित्वा मृत्युम् अत्येति अयनाय अन्यः पन्थाः न विद्यते॥)
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यह ब्रह्मविद्या का सार है। यह व्यावहारिक रूप से स्वयं पर हरिःकृपा से ही अवतृत होता है ।
हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ दिसंबर २०२५

मेरे द्वारा सबसे बड़ी सेवा क्या हो सकती है ??

 मेरे द्वारा सबसे बड़ी सेवा क्या हो सकती है ??

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प्रकृति ने अपने नियमानुसार जहाँ भी मुझे रखा है, उससे मुझे कोई शिकायत नहीं है। पूर्वजन्मों के कर्मानुसार मेरा यह जीवन निर्मित हुआ। भविष्य की कोई कामना नहीं है। हृदय में यह गहनतम और अति अति प्रबल अभीप्सा अवश्य है कि यदि पुनर्जन्म हो तो मैं इस योग्य तो हो सकूँ कि भगवान को पूर्णरूपेण समर्पित होकर, उनकी अनन्य-अव्यभिचारिणी-भक्ति सभी के हृदयों में जागृत कर सकूँ। भगवान की पूर्ण अभिव्यक्ति मुझ में हो। किसी भी कामना का जन्म न हो।
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विवक्तदेशसेवित्वरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ दिसंबर २०२३

Friday, 26 December 2025

चित्त वृत्ति निरोध ------

 जब ह्रदय शांत और और आज्ञा चक्र जागृत होने लगता है तभी चित्त की वृत्तियों का निरोध होना आरम्भ होने लगता है|

चित्त स्वयं को दो रूपों ------ श्वास-प्रश्वास और वासनाओं के रूप में व्यक्त करता है|
वासनाएँ तो अति सूक्ष्म हैं जो पकड़ में नहीं आतीं, अतः ध्यान साधना का आरम्भ श्वास-प्रश्वास से होता है| श्वास-प्रश्वास पर ध्यान करते करते प्राण भी स्थिर होने लगते हैं और मन की वासनाएँ शांत होने लगती हैं क्योंकि चंचल प्राण ही मन है| भौतिक देह और मन के बीच की कड़ी भी प्राण ही है|
यह मार्ग सिर्फ उन पथिकों के लिए है जिन्हें प्रभु से परम प्रेम हैं और जिनके ह्रदय में एक गहन अभीप्सा है उन्हें उपलब्ध होने की| ऐसे पथिक ही टिक पते हैं इस मार्ग पर, अन्य सब भटक जाते हैं| जब ह्रदय में एक अभीप्सा यानि तड़फ होती है प्रभु को पाने की तो प्रभु एक सद्गुरु के रूप में स्वयं ही आ जाते हैं|
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार और धारणा ये सब साथ साथ चलते हैं| प्रभु के प्रति तड़फ यदि बहुत गहरी हो अपने आप ही ये सब पीछे पीछे चलने लगते हैं|
प्रभु के प्रति प्रेम बहुत अधिक गहन हो तो ध्यान भी स्वयं होने लगता है| तब प्रभु ही आपको अपना उपकरण बना कर सब कुछ स्वयं करने लगते हैं| तब आप कर्ता नहीं रहते|
प्रथम अंतिम और एकमात्र आवश्यकता है प्रभु प्रेम की| बाकि सब गौण है|
आप में हृदयस्थ भगवान नारायण को नमन करते मैं आप सब के प्रति अपना अहैतुकी प्रेम और शुभ कामनाएँ व्यक्त करता हूँ| आप सब को मेरा प्रणाम| ॐ तत्सत्|
जयतु वैदिकीसंस्कृतिः जयतु भारतम् |
२७ दिसंबर २०१३

Thursday, 25 December 2025

मन में आ रहे फालतू और भटकाने वाले विचारों से ध्यान हटा कर भगवान में मन कैसे लगाएँ?

 (प्रश्न) : मन में आ रहे फालतू और भटकाने वाले विचारों से ध्यान हटा कर भगवान में मन कैसे लगाएँ?

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(उत्तर) : अपने चारों ओर की परिस्थितियों और वातावरण को हमें तुरंत बदलना पड़ेगा, अन्य कोई उपाय नहीं है। जो हम बनना चाहते हैं, उसी के अनुकूल परिस्थितियों और वातावरण का हमें निर्माण करना होगा, या वैसे ही वातावरण में जाकर रहना होगा। अच्छा साहित्य पढ़ें, अच्छे लोगों के साथ रहें, सात्विक भोजन लें और भोजन की मात्रा को कम करें।
नित्य नियमित ध्यान करें, और गीता का स्वाध्याय करें। श्रीमद्भगवद्गीता के अक्षरब्रह्मयोग (अध्याय ८) के स्वाध्याय और अभ्यास से बहुत लाभ होगा। बृहदारण्यकोपनिषद में याज्ञवल्क्य ऋषि ने गार्गी को भी इसका उपदेश दिया है।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२५ दिसंबर २०२३

Wednesday, 24 December 2025

भारत के लिए ये ५ जलडमरूमध्य स्वतंत्र और सुचारू अंतर्राष्ट्रीय-नौपरिवहन के लिए बहुत आवश्यक हैं-- मलक्का, बाब-अल-मंडेब, होरमुज, बास्फोरस और जिब्राल्टर। स्वेज़ और पनामा नहरों का चालू रहना भी बहुत अधिक आवश्यक है।

 भारत के लिए ये ५ जलडमरूमध्य स्वतंत्र और सुचारू अंतर्राष्ट्रीय-नौपरिवहन के लिए बहुत आवश्यक हैं-- मलक्का, बाब-अल-मंडेब, होरमुज, बास्फोरस और जिब्राल्टर। स्वेज़ और पनामा नहरों का चालू रहना भी बहुत अधिक आवश्यक है।

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समुद्रों में जो मालवाहक जहाज चलते हैं, उनका एक अंतर्राष्ट्रीय नियम होता है कि वे जिस देश में पंजीकृत होते हैं, उसी देश का ध्वज उन पर फहराया जाता है, और वे चलते-फिरते उसी देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। किसी भी समुद्री मालवाहक जहाज पर आक्रमण उस देश पर आक्रमण माना जाता है जिस देश का ध्वज उस जहाज पर फहराया हुआ है। यदि भारत के ध्वज-वाहक किसी भी मालवाहक जहाज पर कहीं भी आक्रमण होता है तो वह भारत पर आक्रमण ही माना जायेगा। भारत के ध्वज-वाहक जहाजों की रक्षा के लिए ही भारतीय नौसेना के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित दो युद्धपोत हर समय अदन की खाड़ी में गश्त लगाते रहते हैं। वहाँ अब तक सबसे बड़ा खतरा सोमालिया के समुद्री डाकुओं से था, अब यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों से है। ये हूती विद्रोही शिया मुसलमान हैं, और उनका झगड़ा पिछले ५० वर्षों से वहाँ के सुन्नी मुसलमानों से चल रहा है। सोमालिया के समुद्री डाकू सब सुन्नी मुसलमान हैं, जिनका धंधा ही डकैती है। अभी दो दिन पहले ही भारत की आर्थिक सीमा (Exclusive Economic Zone) में भारत के ही एक Chemical Carrier (हजारों टन केमिकल रूपी माल के परिवाहक) जहाज पर आक्रमण एक बहुत ही गंभीर घटना है।
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आज से ६०-७० वर्षों पहले तक कोई जमाना था जब अदन (यमन की तत्कालीन राजधानी) के बाजार भारतीयों से भरे हुए थे। सारी बड़ी बड़ी दुकानें भारतीयों की थीं, और वहाँ का सारा व्यापार भारतीयों के हाथ में था। फिर एक दिन ऐसा आया जब वहाँ (इस्लामिक) क्रान्ति हुई और वहाँ के हिन्दू भारतीय व्यापारियों को अपना सब कुछ छोड़कर जो कपड़े वे पहिने हुये थे उन्हीं में प्राण बचाने के लिए भारत में भाग कर शरण लेनी पड़ी।
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जब हूती विद्रोहियों में और सऊदी अरब में युद्ध आरंभ हुआ था तब भारत सरकार वहाँ काम कर रहे सारे भारतियों को सुरक्षित रूप से बापस भारत ले आई थी। अब हूती विद्रोहियों ने बाब-अल-मंडेब से गुजर रहे सभी जहाजों पर आक्रमण आरंभ कर दिया है। यह विश्व-युद्ध की भूमिका है।
२४ दिसंबर २०२३

भविष्य में एक दिन ईसा मसीह के सारे अनुयायी -- सत्य-सनातन-धर्म को अपना लेंगे।

 आज रात्रि को मैं पूर्ण प्रयास करूंगा कि आज की पूरी रात्री परमात्मा के ध्यान में ही व्यतीत हो। मुझे पूर्ण विश्वास है कि भविष्य में एक दिन ईसा मसीह के सारे अनुयायी -- सत्य-सनातन-धर्म को अपना लेंगे। यह प्रक्रिया आरंभ भी हो गई है। भारत की सबसे अधिक हानि भी उन्हीं लोगों ने की है।

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मराठा सेनाओं ने मुगलों व अन्य सभी मुस्लिम शासकों को परास्त कर सारे भारत पर अधिकार कर हिन्दू पद पादशाही की स्थापना कर दी थी, लेकिन अंग्रेजों ने धोखे से उन्हें हराकर भारत की सत्ता पर अपना अधिकार कर लिया। भारत की सत्ता अंग्रेजों ने मराठों से ली थी, न कि मुस्लिम शासकों से। पंजाब में सिक्खों की रक्षा मराठा सेनापति रघुनाथ राव ने की थी। सन १७५८ में अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण के बाद सिखों की स्थिति अत्यंत कमजोर हो गई थी। मराठा सेना झांसी से बंगाल की ओर अपने विजय अभियान पर जा रही थी, लेकिन सिक्खों के मार्मिक अनुरोध के पश्चात पंजाब की ओर मुड़ गयीं और पंजाब पहुंच कर वहाँ के अफगान शासकों को हराया। रघुनाथ राव ने तैमूर शाह (अब्दाली के पुत्र) को पंजाब से बाहर खदेड़ा। उन्होंने स्वर्ण मंदिर (हरमंदिर साहिब) का पुनर्निर्माण करवाया, जो अफगानों द्वारा क्षतिग्रस्त हो गया था। इस अभियान से मराठों ने अटक तक अपना प्रभाव बढ़ाया।
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भारत को प्रेमपूर्वक हम "भारत माता" कहते हैं। अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ भारत माता -- अखंडता के सिंहासन पर बिराजमान होगी। सम्पूर्ण भारत से असत्य और अंधकार की शक्तियाँ पराभूत होंगी। हर हर महादेव !! महादेव महादेव महादेव !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ दिसंबर २०२५