Tuesday, 4 November 2025

हमारे मन में छिपी विषयासक्ति ही हमारे सारे संतापों का कारण है ---

हमारे मन में छिपी विषयासक्ति ही हमारे सारे संतापों का कारण है। इसके निवारण के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में दो उपाय बतलाए हैं -- अभ्यास और वैराग्य। विवेक विचार से उत्पन्न हुआ स्वभाविक वैराग्य हमें परमात्मा की ओर ले जाता है, और निराशा व दुःख से उत्पन्न हुआ वैराग्य हमें बापस संसार में ले आता है। अतः अभ्यास करते रहें। दुःख से उत्पन्न हुए वैराग्य की ओर ध्यान न दें। अपना मन केवल भगवान में ही लगायें। आगे के सारे द्वार खुल जायेंगे। निःस्पृह होना भी वैराग्य है।

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वैराग्य उत्पन्न हो तो किसी भी तरह का दिखावा न करें और न बिना सोच विचार के कोई निर्णय लें। भावुकता एक धोखा है, भावुकता से बचें। अपने पास क्या साधन हैं, और हम उनका क्या सदुपयोग कर सकते हैं इस पर विचार अवश्य करें। ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
१४ अक्तूबर २०२५

"हारिये न हिम्मत, बिसारिये न हरिः नाम !!" ---

 "हारिये न हिम्मत, बिसारिये न हरिः नाम !!" ---

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उथल-पुथल भरे इस वर्तमान समय की सबसे बड़ी व्यक्तिगत समस्या भगवान के प्रति परम प्रेम को बनाये रखना है। सारा वातावरण ही विपरीत है, लेकिन इसमें हिम्मत नहीं हारनी है। कुछ दिन एकांत में ही रहना पड़े तो भी स्वीकार है।
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हमारे जीवन का मुख्य लक्ष्य भगवत्-प्राप्ति यानि परमात्मा का साक्षात्कार करना है। ध्यान-मुद्रा में ध्यान के आसन पर बैठकर दृष्टिपथ भ्रूमध्य में स्थिर कर के प्रत्येक आती हुई सांस के साथ अपनी ज्योतिर्मय चेतना का विस्तार सम्पूर्ण सृष्टि के अनंत विस्तार में करते रहें। सारी सृष्टि आप में, और आप सारी सृष्टि में है। वास्तव में आप नहीं, स्वयं भगवान श्रीहरिः ही यह साधना कर रहे हैं। आप को तो उनमें पूर्णतः समर्पित होना है। एकमात्र अस्तित्व उन्हीं का है। अपने भौतिक शरीर को भूल जाइये। ध्यान केवल सर्वव्यापी भगवान श्रीहरिः का ही हो। आप यह भौतिक शरीर नहीं, भगवान श्रीहरिः के साथ एक हैं, जो यह सारी सृष्टि बन गये हैं। पूर्ण या अर्ध खेचरी मुद्रा में बैठकर श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय में बताई हुई विधि से मूर्धा में प्रणव का जप करते रहें। जिस दिन भगवान की परम कृपा से श्रीमद्भगवद्गीता का पंद्रहवाँ अध्याय पुरुषोत्तम योग समझ में आ जायेगा (यह निज बुद्धि से कभी भी समझ में नहीं आयेगा) उस दिन यह मान लेना कि आप सही मार्ग पर अग्रसर हैं। तब जैसे पृथ्वी चंद्रमा को लेकर सूर्य की परिक्रमा करती है, वैसे ही आप भी सभी को साथ लेकर परमात्मा के मार्ग पर अग्रसर होंगे। आप यह भौतिक शरीर नहीं, स्वयं परमात्मा की अनंत चेतना हैं। मंगलमय शुभ कामनाएँ। आपका जीवन कृतार्थ और कृतकृत्य हो। हरिः ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
१५ अक्तूबर २०२५

मेरी साधना ---

 साधना --- मेरा लक्ष्य केवल आत्म-साक्षात्कार यानि भगवत्-प्राप्ति है। जो भी कार्य मेरे माध्यम से हो रहा है, वह केवल परमात्मा ही कर रहे हैं। मेरा हरेक विचार व हरेक भाव केवल उन्हीं का है। ध्यान-साधना से अनुभूतिजन्य प्राप्त ज्ञान ही मेरा वास्तविक ज्ञान है, अन्य सब परमात्मा से प्राप्त मार्गदर्शन है। मेरी भक्ति (परमप्रेम और अनुराग) केवल परमात्मा के लिये है। जो भी साधना मेरे माध्यम से होती है, उसके कर्ता स्वयं परमात्मा हैं। जब मैं एकांत में होता हूँ तब मुझे केवल उन्हीं का प्रकाश दिखायी देता है, और उन्हीं की पवित्र ध्वनि सुनायी देती है। यही मेरी साधना है और यही मेरा जीवन है।

. जिस भी क्षण अपनी गहनतम चेतना में परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति हो, साधना के लिये वही सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त है। साधना का एकमात्र उद्देश्य पूर्ण समर्पण के द्वारा परमात्मा के प्रति परम-अनुराग यानि परम-प्रेम को व्यक्त करना है, अन्य कुछ भी नहीं। इस समय मेरी अंतःचेतना में केवल परमात्मा हैं, उनके अतिरिक्त मुझे कुछ भी नहीं पता। मुझे अपने जीवन में बहुत कम लोग ऐसे मिले हैं, जिन्हें परमात्मा से परमप्रेम है, अन्य सब तो परमात्मा के साथ व्यापार ही कर रहे हैं। अब तो मुझे सभी में परमात्मा के दर्शन होते हैं, अतः कोई अंतर नहीं पड़ता।

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यह मेरे इस जीवन का संध्याकाल है, अतः मेरे पास किसी के लिए भी समय बिल्कुल नहीं है। सारा अवशिष्ट जीवन और समय परमात्मा को पूर्णतः समर्पित है। हरिः ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
१७ अक्तूबर २०२५

एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाय ---

 एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाय ---

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एक समय में हमें परमात्मा के एक ही आयाम की साधना करनी चाहिए, नहीं तो हमारी साधना एक गोरखधंधा बन जाती है। अंततः लौटकर बापस हमें एक पर ही आना पड़ेगा। ओशो के साहित्य में कहीं पढ़ा है कि हिन्दी भाषा का एक शब्द "गोरखधंधा" इसलिए पड़ा क्योंकि गुरु गोरखनाथ एक के बाद एक सिद्धियों के पीछे पड़े रहे और सृष्टि की सारी सिद्धियाँ उन्होने प्राप्त कर लीं। जब कुछ प्राप्त करने को बचा ही नहीं तब अपने शिवभाव में स्थित होकर उन्होंने सब सिद्धियाँ गंगाजी में विसर्जित कर दीं, और स्वयं शिव हो गये। तंत्र और योग में हमें जो भी ज्ञान उपलब्ध है वह सब उनके या उनकी परंपरा के सिद्ध योगियों से प्राप्त है।
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गुरु गोरखनाथ का जन्म आचार्य शंकर से भी बहुत पहले हुआ था। आचार्य शंकर का जन्म ईसा मसीह से ५०९ वर्ष पूर्व हुआ था। अंग्रेज़ इतिहासकारों ने हिंदुओं को नीचा दिखाने के लिये आचार्य शंकर का जन्म आठवीं सदी में और गोरखनाथ का जन्म ग्यारहवीं सदी में बताया है। मुझे एक बहुत बड़े महात्मा ने बताया है कि आचार्य शंकर के समक्ष गुरु गोरखनाथ स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने आचार्य शंकर को श्रीविद्या (श्रीललितामहात्रिपुरसुंदरी) की दीक्षा दी। मैं अपनी अंतर्प्रज्ञा से भी यह बात सत्य मानता हूँ।
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मेरे एक घनिष्ठ मित्र हैं जो बड़े अच्छे और रहस्यमय साधक हैं, कई बार मैं उनसे आध्यात्मिक विषयों पर परामर्श भी करता हूँ। शिक्षा से वे एक इंजीनियर हैं, लेकिन उनकी बहुत गहरी दखल तंत्र-मंत्र में है, योग में भी है, और आयुर्वेद में भी। कई दुर्लभ औषधियों की उन्होने खोज की है और कुछ अप्रचलित चिकित्सा पद्धतियों की भी। तंत्र-मंत्र के अनेक प्रयोग उन्होंने स्वयं पर ही सफलतापूर्वक किये हैं। योग-साधना में भी बहुत गहराई है उनमें। मैं उनसे भी एक ही बात कहता हूँ कि एक ही दिशा में डटे रहो, लेकिन उनका स्वभाव कुछ अलग ही है।
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मुझे गर्व है कि पूरे भारत में मेरे बहुत अच्छे आध्यात्मिक मित्र हैं। मुझे उन पर गर्व है।
२२ अक्तूबर २०२५

आध्यात्मिक साधना परमात्मा से "कुछ प्राप्ति" के लिए नहीं, परमात्मा को अपने सर्वस्व के पूर्ण समर्पण, और परमात्मा के साथ एक होने हेतु होती है --- .

आध्यात्मिक साधना परमात्मा से "कुछ प्राप्ति" के लिए नहीं, परमात्मा को अपने सर्वस्व के पूर्ण समर्पण, और परमात्मा के साथ एक होने हेतु होती है ---

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हमें "पूर्णता" का ही चिंतन, मनन और ध्यान करना चाहिये। कुछ पाने की आकांक्षा हमारा अज्ञान है। केवल परमात्मा में ही मोक्ष, मुक्ति और स्वतन्त्रता है। एक क्षण के लिए भी परमात्मा को न भूलें, निरंतर उनका अनुस्मरण (Recollection) करते रहें। गीता में भगवान कहते हैं --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
(तस्मात् सर्वेषु कालेषु माम् अनुस्मर युध्य च। मयि अर्पित मन बुद्धि: माम् एव एष्यसि असंशय॥)
अर्थात् -- इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहर्न्मानुस्मरण।
यः प्रयति त्यजन्देहं स याति परमं गतिम्॥८:१३॥"
(ॐ इत्येकक्षरं ब्रह्म व्याहारं मम अनुस्मरण। यः प्रयाति त्यजं देहं स याति परमं गतिम्॥)
अर्थात् -- जो पुरुष ओऽम् इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है॥
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ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः॥
और कुछ भी अन्य इस समय लिखने योग्य नहीं है। भगवान का अनुस्मरण (Recollection) हर समय करते रहें। यही पूर्णता का द्वार है। पूर्णता केवल परमात्मा में हैं, केवल परमात्मा ही पूर्ण हैं। जैसे मिठाई खाने से मुँह मीठा होता है वैसे ही परमात्मा का स्मरण करने से जीवन आनंदित रहता है। जीवन उद्देश्यहीन न हो। एकमात्र उद्देश्य है जीवन में परमात्मा का अवतरण। अन्य सब बातें व्यर्थ और समय की बर्बादी है। जिस की आज्ञा से यह सारी सृष्टि चल रही है, उसके साथ एक होकर ही हम असत्य और अंधकार की शक्तियों को पराभूत कर सकते हैं। बीच में कोई कामना नहीं आनी चाहिए।
ॐ तत्सत् ॥ ॐ ॐ ॐ ॥
कृपा शंकर
२३ अक्तूबर २०२५

परमात्मा को अपनी पूर्ण निष्ठा से वचन दें कि हम उन्हें प्राप्त करना चाहते हैं ---

 परमात्मा को अपनी पूर्ण निष्ठा से वचन दें कि हम उन्हें प्राप्त करना चाहते हैं ---

हमारे जीवन का लक्ष्य भगवत्-प्राप्ति यानि आत्म-साक्षात्कार है। यदि सच में हम उन्हें प्राप्त करना चाहते हैं तो नित्य एक डायरी में लिखें कि हमने आज के दिन कितनी देर तक परमात्मा का ध्यान, जप और भजन आदि किया। हमारा आज का ध्यान बीते हुए कल से अधिक गहन और दीर्घ होना चाहिए।
यह एक प्रतिबद्धता है जो हमारे और परमात्मा के मध्य में है। यह हमारे श्रद्धा और विश्वास की परीक्षा है। हर महीने जांच करें कि हमने कितनी प्रगति की है। यदि हम नित्य नियमित साधना नहीं करते हैं तो आज से और इसी क्षण से आरंभ कर दीजिए। यदि हम नित्य साधना करते है तो उसकी गहनता और गुणवत्ता को बढ़ाने का प्रयास करते रहें। एक बात याद रखें कि हम भगवान को धोखा नहीं दे सकते, क्योंकि वे हमारे भीतर ही बिराजमान हैं।
मेरे इस लेख में कोई कमी कभी दिखायी देगी तो मैं उसका संशोधन करता रहूँगा। आप सभी महान आत्माओं को नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२४ अक्तूबर २०२५

पूर्वाञ्चल के लोग छठ पूजा अवश्य मनाते हैं ---

छठ पूजा -- पहिले केवल पूर्वाञ्चल (बिहार, झारखंड, और पूर्वी उत्तर-प्रदेश) के लोगों के साथ ही पहिचानी जाती थी, अब पूरे भारत में इसे लोग जानते हैं। इसका कारण है कि पूर्वाञ्चल के लोग पूरे भारत में कार्यरत हैं। वे अपनी सांस्कृतिक पहिचान के प्रति पूर्ण सजग हैं। वे कहीं भी हों, छठ महापर्व को अवश्य मनाते हैं।

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पूर्वाञ्चल की अब और उपेक्षा नहीं कर सकते क्योंकि इस समय वहाँ पढ़ाई-लिखाई सबसे अधिक हो रही है, सबसे अधिक IAS और IPS का चयन, और IITs और IIMs में सबसे अधिक चयन पूर्वाञ्चली (विशेष रूप से बिहारी) नवयुवक/नवयुवतियों का हो रहा है। वहाँ के नवयुवक और नवयुवतियाँ खूब परिश्रम कर रहे हैं।
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वास्तव में अंग्रेजों के समय से ही बिहार को जान-बूझकर पिछड़ा हुआ रखा गया क्योंकि अंग्रेजों का सबसे अधिक विरोध वहाँ हुआ था। अंग्रेजों ने वहाँ जनरल जेम्स जॉर्जस्मिथ नील नाम के एक अति क्रूर और भयानक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी को नियुक्त किया था जिसका उद्देश्य ही वहाँ के लोगों की हत्या करना और गाँवों को जला कर नष्ट करना था। लेकिन सन १८५७ के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के स्वतन्त्रता सेनानियों ने उसे लखनऊ व कानपुर में उलझा दिया और २५ सितंबर १८५७ को लखनऊ में उसे मार दिया। उसके व हेवलॉक और रोज जैसे क्रूर और भयानक जनरलों के सम्मान में अंग्रेजों ने अंडमान द्वीप समूह में कुछ द्वीपों के नाम रखे थे। उन नामों को वर्तमान केंद्र सरकार ने बदला है। इस नराधम नील और उसके साथी ब्रिटिश सैनिक अधिकारियों ने बिहार के सैंकड़ों गांवों को जला दिया और लाखों भारतियों की हत्या करवायी थी।
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आज़ादी के बाद भी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने बिहार को जानबूझ कर पिछड़ा हुआ रखा ताकि वहाँ से सस्ते मजदूर भारत के अन्य भागों को मिल सकें। यदि सेठ डालमिया जी (मूल रूप से चिड़ावा, जिला झुंझुनूं निवासी) आबाद रहते तो बिहार आज महाराष्ट्र जितना उन्नत होता। उन्हें नेहरू ने झूठे मामलों में फंसा कर बर्बाद कर दिया क्योंकि वे स्वामी करपात्री जी के शिष्य और एक कट्टर हिन्दू थे। उनके सारे उद्योग-धंधे बिहार में थे, और वे पूरे बिहार और उड़ीसा का पूर्ण औद्योगीकरण करने की क्षमता रखते थे।
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बात छठपूजा से चली थी, जिसका समापन भी छठपूजा पर चर्चा से ही कर रहा हूँ जिसका समापन आज प्रातः सूर्य को अर्घ्य देकर हो गया है। मेरे अनेक परिचित और मित्र भारत के पूर्वाञ्चल में हैं। सभी श्रद्धालुओं को नमन !! ॐ तत्सत् !! ॐ नमः शिवाय !!
कृपा शंकर
२८ अक्तूबर २०२५