भगवान की चेतना में समर्पित होकर हरेक कार्य राष्ट्रहित में करें। हम सत्य-धर्मनिष्ठ हों। हमारी हर क्रिया में भगवान की अनुभूति/अभिव्यक्ति हो।
Tuesday, 18 March 2025
भगवान की चेतना में समर्पित होकर हरेक कार्य राष्ट्रहित में करें ---
गुरु का स्वयं में विलय ही गुरु-पूजा है ---
गुरु का स्वयं में विलय ही गुरु-पूजा है ---
.गुरु की देह तो प्रतीकात्मक है, यह शरीर तो गुरु को मिला हुआ एक वाहन है जो उसे लोक-यात्रा के लिये मिला है, उसकी देह तो एक माध्यम है, स्वयं में गुरु नहीं| गुरु तत्व को हम भौतिक रूप से व्यक्त करने के लिए गुरु के शरीर का चित्र लगा देते हैं, पर उसका यह शरीर गुरु नहीं है|
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गुरु का स्वयं में विलय ही गुरु-पूजा है| गुरु के वेदानुकूल उपदेशों को स्वयं के आचरण में लाना और उन वेद-वाक्यों के प्रति समर्पण ही गुरु-भक्ति है, गुरु के शरीर की पूजा नहीं| हाँ, साधना से पूर्व मानसिक रूप से गुरु की अनुमति और आदेश अवश्य ले लेना चाहिए| गुरु का चित्र तो एक प्रतीक है, गुरु नहीं| .
कृपा शंकर
मार्च १६, २०१९
जो शास्त्रीय मर्यादा में जी रहे हैं उन्हें कोरोना वायरस तो क्या, किसी भी तरह की अकाल मृत्यु की आशंका नहीं है ---
जो शास्त्रीय मर्यादा में जी रहे हैं उन्हें कोरोना वायरस तो क्या, किसी भी तरह की अकाल मृत्यु की आशंका नहीं है| "चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः|"
किसी से घृणा कर के, या किसी का गला काट कर, कोई व्यक्ति भगवान को प्रसन्न नहीं कर सकता ---
किसी से घृणा कर के, या किसी का गला काट कर, कोई व्यक्ति भगवान को प्रसन्न नहीं कर सकता| दूसरों के सिर काटने, या हानि पहुँचाने से कोई बड़ा नहीं होता| दूसरों के घर में अंधकार कर के, कोई स्वयं के घर में प्रकाश नहीं कर सकता|
भारत का भविष्य सम्पूर्ण सृष्टि का भविष्य है ---
भारत का भविष्य सम्पूर्ण सृष्टि का भविष्य है, इसलिए भारत का पुनरोत्थान, निश्चित रूप से, एक महान आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा, एक दिव्य चेतना के अवतरण से होगा| भारत की प्राचीन कृषि, शिक्षा, राजनीति, व सामाजिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना होगी, आसुरी शक्तियों का उन्मूलन होगा, और सत्य का प्रकाश भारत में छाये असत्य के अन्धकार को मिटा देगा| सनातन धर्म ही भारत का प्राण, राजनीति, और भविष्य है| सनातन धर्म ही नहीं रहा तो यह सृष्टि निश्चित रूप से नष्ट हो जाएगी|
जीवन में ईश्वर के बिना जो जीवन मैंने जीया है, वह वास्तव में नारकीय था ---
जीवन में ईश्वर के बिना जो जीवन मैंने जीया है, वह वास्तव में नारकीय था| धन्य हैं वे लोग, जिन्होने सांसारिक आकर्षणों और वासनाओं पर विजय पाकर, अपने जीवन की दिशा को परमात्मा की ओर मोड़कर, निज जीवन में परमात्मा को पूर्णतः व्यक्त किया है| जीवन एक अंतहीन सतत् प्रक्रिया है| मेरी रुचि किसी भी तरह के मोक्ष या मुक्ति में नहीं है| ईश्वर से यही प्रार्थना है कि भविष्य में जो भी जीवन मिलें, उनमें जन्म से ही पूर्ण वैराग्य, भक्ति, ज्ञान और ईश्वर की अभिव्यक्ति हो|
वेदों को समझने के लिए --
वेदों को समझने के लिए --