Tuesday, 18 March 2025

भगवान की चेतना में समर्पित होकर हरेक कार्य राष्ट्रहित में करें ---

 भगवान की चेतना में समर्पित होकर हरेक कार्य राष्ट्रहित में करें। हम सत्य-धर्मनिष्ठ हों। हमारी हर क्रिया में भगवान की अनुभूति/अभिव्यक्ति हो।

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हम भगवान के उपकरण मात्र ही नहीं, उनकी सम्पूर्ण सृष्टि, अनंतता, और सारे प्राणियों के साथ एक हैं। हमें निमित्त बनाकर हमारे माध्यम से भगवान स्वयं अपनी साधना कर रहे हैं। भगवान की ज्योति का विस्तार चारों ओर है। हमारा अज्ञान ही असत्य का अंधकार है। श्रीमद्भगवद्गीता और उपनिषदों में सारा मार्गदर्शन है, जिनका स्वाध्याय, चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान तो हमें ही करना होगा।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ मार्च २०२४

गुरु का स्वयं में विलय ही गुरु-पूजा है ---

 गुरु का स्वयं में विलय ही गुरु-पूजा है ---

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गुरु की देह तो प्रतीकात्मक है, यह शरीर तो गुरु को मिला हुआ एक वाहन है जो उसे लोक-यात्रा के लिये मिला है, उसकी देह तो एक माध्यम है, स्वयं में गुरु नहीं| गुरु तत्व को हम भौतिक रूप से व्यक्त करने के लिए गुरु के शरीर का चित्र लगा देते हैं, पर उसका यह शरीर गुरु नहीं है|
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गुरु का स्वयं में विलय ही गुरु-पूजा है| गुरु के वेदानुकूल उपदेशों को स्वयं के आचरण में लाना और उन वेद-वाक्यों के प्रति समर्पण ही गुरु-भक्ति है, गुरु के शरीर की पूजा नहीं| हाँ, साधना से पूर्व मानसिक रूप से गुरु की अनुमति और आदेश अवश्य ले लेना चाहिए| गुरु का चित्र तो एक प्रतीक है, गुरु नहीं| .
गुरु में कोई दोष या विकृति है तो क्या हम उसे अपना लेंगे ? फिर हमारा गुरु के प्रति दृष्टिकोण क्या हो ?
उत्तर :-- यदि गुरु में कोई दोष है, तो उसका फल वह स्वयं भुगतेगा, हम इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं| हमारा समर्पण तो गुरु के वेदानुकूल वचनों/उपदेशों के प्रति है, उस की देह के प्रति नहीं| हमारा समर्पण ही हमें इस संसार-सागर / माया-मोह से पार करेगा, गुरु की देह नहीं| पूजा तो गुरु-पादुका की होती है, गुरु के देह की नहीं| गुरु तो तत्व है देह नहीं| मेरा तो यह मानना है कि गुरु का स्वयं में विलय ही गुरु-पूजा है| गुरु के देह की पूजा तो गुरु की ह्त्या के बराबर है|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
मार्च १६, २०१९

जो शास्त्रीय मर्यादा में जी रहे हैं उन्हें कोरोना वायरस तो क्या, किसी भी तरह की अकाल मृत्यु की आशंका नहीं है ---

 जो शास्त्रीय मर्यादा में जी रहे हैं उन्हें कोरोना वायरस तो क्या, किसी भी तरह की अकाल मृत्यु की आशंका नहीं है| "चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः|"

इस शरीर-महाराज रूपी विमान के चालक ही नहीं, यह विमान भी वे स्वयं ही हैं ..... जीवन और मृत्यु जिन का एक विचार मात्र है| उन्हीं का आश्रय है|
आज के इस चुनौती भरे समय में हम परमात्मा में प्रतिष्ठित होकर उनके प्रकाश का विस्तार करें| हमारी हर क्रिया में उनकी अभिव्यक्ति हो| यही हमारा स्वधर्म / परमधर्म है| हमारे जन्म का उद्देश्य ही यही है| हमारा जन्म इसीलिए हुआ है कि हम इस स्वधर्म का पालन करते-करते ही संसार में रहें और इस का पालन करते करते ही संसार से विदा लें| यदि हम स्वधर्म का पालन नहीं कर रहे हैं तो इस पृथ्वी पर एक भार ही हैं| ॐ तत्सत्|
कृपा शंकर
१८ मार्च २०२०

किसी से घृणा कर के, या किसी का गला काट कर, कोई व्यक्ति भगवान को प्रसन्न नहीं कर सकता ---

 किसी से घृणा कर के, या किसी का गला काट कर, कोई व्यक्ति भगवान को प्रसन्न नहीं कर सकता| दूसरों के सिर काटने, या हानि पहुँचाने से कोई बड़ा नहीं होता| दूसरों के घर में अंधकार कर के, कोई स्वयं के घर में प्रकाश नहीं कर सकता|

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विश्व के अनेक लोग स्वयं तो शान्ति से रहना नहीं जानते, पर अपनी शान्ति की खोज -- धर्म के नाम पर दूसरों के प्रति घृणा, दूसरों की सभ्यताओं के विनाश, और दूसरों के नरसंहार में ही ढूँढते रहे हैं| ऐसे लोग इस संसार को नष्ट करने के लिए सदा तत्पर हैं| आत्मा शाश्वत है, कर्मफलों से कोई बच नहीं सकता और कर्मफलानुसार पुनर्जन्म भी सुनिश्चित है| ऐसे लोग अपना कर्मफल भोगने के लिए अति कष्टमय परिस्थितियों में बापस इस संसार में आते हैं|
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शांति का मार्ग, जो भगवान् ने बताया है, वह है --
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति| तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति||६:३०||"
अर्थात् जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता||
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भगवान हम सब की आत्मा हैं, वे समान रूप से सर्वत्र व्याप्त हैं| उन्हें सर्वत्र, व सब में उन्हें देखने वाले के लिए वे कभी अदृश्य नहीं होते| भगवान ने हमें सर्वत्र उन्हीं को देखने को कहा है, और साथ-साथ आतताइयों से स्वयं की रक्षा और राष्ट्ररक्षा के लिए एकजुट होकर प्रतिरोध और युद्ध करने के धर्म के पालन करने को भी कहा है| हम अपना हर कार्य जिस भी परिस्थिति में हम हैं, उस परिस्थिति में ईश्वर-प्रदत्त निज-विवेक से निर्णय लेकर ही करें| जहाँ संशय हो वहाँ भगवान से मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना करें|
ॐ स्वस्ति !!
१८ मार्च २०२१

भारत का भविष्य सम्पूर्ण सृष्टि का भविष्य है ---

भारत का भविष्य सम्पूर्ण सृष्टि का भविष्य है, इसलिए भारत का पुनरोत्थान, निश्चित रूप से, एक महान आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा, एक दिव्य चेतना के अवतरण से होगा| भारत की प्राचीन कृषि, शिक्षा, राजनीति, व सामाजिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना होगी, आसुरी शक्तियों का उन्मूलन होगा, और सत्य का प्रकाश भारत में छाये असत्य के अन्धकार को मिटा देगा| सनातन धर्म ही भारत का प्राण, राजनीति, और भविष्य है| सनातन धर्म ही नहीं रहा तो यह सृष्टि निश्चित रूप से नष्ट हो जाएगी|

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सनातन धर्म है -- "परमात्मा के प्रति परमप्रेम, समर्पण, उन्हें जानने व पाने की अभीप्सा, और धर्माचरण|"
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हम सब का जन्म इसी लिए हुआ है कि हम -- इस संसार को परमात्मा के प्रकाश में पहुँचायें और श्रद्धा-विश्वास, प्रेम, व शांति से, परमात्मा को निज जीवन में व्यक्त कर इस धरा पर ले आयें| जहाँ परमात्मा स्वयं विराजते हैं, वहाँ किसी अन्य की आवश्यकता नहीं है|
ॐ तत्सत् | ॐ स्वस्ति ||
कृपा शंकर
१८ मार्च २०२१

जीवन में ईश्वर के बिना जो जीवन मैंने जीया है, वह वास्तव में नारकीय था ---

 जीवन में ईश्वर के बिना जो जीवन मैंने जीया है, वह वास्तव में नारकीय था| धन्य हैं वे लोग, जिन्होने सांसारिक आकर्षणों और वासनाओं पर विजय पाकर, अपने जीवन की दिशा को परमात्मा की ओर मोड़कर, निज जीवन में परमात्मा को पूर्णतः व्यक्त किया है| जीवन एक अंतहीन सतत् प्रक्रिया है| मेरी रुचि किसी भी तरह के मोक्ष या मुक्ति में नहीं है| ईश्वर से यही प्रार्थना है कि भविष्य में जो भी जीवन मिलें, उनमें जन्म से ही पूर्ण वैराग्य, भक्ति, ज्ञान और ईश्वर की अभिव्यक्ति हो|

इस जीवन में भी जो अल्प समय अवशिष्ट है, वह ईश्वर के ध्यान में ही बीत जाये| इसके अतिरिक्त अन्य कोई अभिलाषा नहीं है|
ॐ स्वस्ति !!
१८ मार्च २०२१
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वेदों को समझने के लिए --

 वेदों को समझने के लिए --

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"शिक्षा", "कल्प", "व्याकरण", "निरुक्त", "छंद", और "ज्योतिष" का ज्ञान अनिवार्य है। इनके बिना वेदों को समझना असंभव है। जिनको इन का ज्ञान नहीं है, वे वेदों को नहीं समझ पायेंगे। जिन्हें वेदों को समझने की जिज्ञासा है वे किसी ब्रहमनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य के पास जाकर पूर्ण श्रद्धा और विनम्रता से उनसे ज्ञान ग्रहण करें। सिर्फ अनुवाद पढ़ने से कुछ नहीं मिलेगा। जो इन वेदांगों की शिक्षा देते हैं, उन्हें 'उपाध्याय' कहते हैं। आजकल तो ब्राह्मणों का एक वर्ग स्वयं को 'उपाध्याय' लिखता है, लेकिन 'उपाध्याय' वह है जिसे वेदांगों का ज्ञान है।
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(१) वेदों के सही उच्चारण के ढंग को "शिक्षा" कहते हैं| वेदों के एक ही शब्द के दो प्रकार से उच्चारण से अलग अलग अर्थ निकलते है| इसलिये वेद को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि उच्चारण कैसे हो|
(२) जितने भी धार्मिक कर्म -- पूजा, हवन आदि है उन सब को करने का तरीका जिन ग्रंथों में है वे "कल्प" सूत्र है|
(३) "व्याकरण" वेद के पदों को कैसे समझा जाये यह बताता है|
(४) "निरुक्त" शब्दों के अर्थ लगाने का तरीका है|
(५) "छंद" अक्षर विन्यास के नियमों का ज्ञान कराता है|
(६) "ज्योतिष" से कर्म के लिये उचित समय निर्धारण का ज्ञान होता है|
१८ मार्च २०२३