Sunday, 21 November 2021

"धर्म" कभी नष्ट नहीं होता ---

"धर्म" कभी नष्ट नहीं होता। उसे समझने की मानवी शक्ति ही घटती-बढ़ती रहती है। सारी सृष्टि ही अपने धर्म का पालन कर रही है।
असीम काम वासनाओं की पूर्ति के प्रलोभन, लोभ और भय के वशीभूत होकर चलने वाले पंथ --- असत्य और अंधकार की शक्तियाँ व अधर्म हैं।
सब सत्य-धर्मनिष्ठों की रक्षा हो। धर्म एक सत्य-सनातन-धर्म ही है, जिस की रचना सृष्टि के साथ हुई है। अन्य सब पंथ, रिलीजन, या मज़हब हैं।
परमात्मा की प्रकृति अपने धर्म का पालन बड़ी तत्परता और कठोरता से करती है। प्रकृति के नियमों को न समझना हमारा अज्ञान है।
कई बड़े गूढ रहस्य की बातें हैं जिन्हें अच्छी तरह समझते हुए, और चाहते हुए भी मैं व्यक्त नहीं कर पाता। व्यक्त करने का प्रयास करता हूँ तो कोई न कोई विक्षेप आ ही जाता है। संभवतः प्रकृति का यही नियम होगा।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
२३ नवंबर २०२१

 

जब से भगवान से प्रेम हुआ है ---

 

जब से भगवान से प्रेम हुआ है, तब से मुक्ति और मोक्ष - दोनों ही महत्वहीन हो गए हैं। सारे बंधन भगवान ने तोड़ दिये हैं। आत्मा नित्यमुक्त है।
.
यहाँ तो राधा और गोविंद दोनों ही प्रकृति और पुरुष के रूप में नृत्य कर रहे हैं, जिससे यह सृष्टि गतिशील है। जिसने इस समस्त सृष्टि को धारण कर रखा है, वे श्रीराधा जी हैं। वे भगवान से प्रेम की उच्चतम अभिव्यक्ति हैं। वे स्वयं ही परमप्रेम हैं। यहाँ तो पुरुष और प्रकृति दोनों ही साथ साथ नृत्य कर रहे हैं। उनके नृत्य का मैं साक्षी मात्र हूँ।
राधे गोविंद जय राधे राधे, राधे गोविंद जय राधे राधे
राधे गोविंद जय राधे राधे, राधे गोविंद जय राधे राधे
पुरुष और प्रकृति नाचे साथ साथ
राधे गोविंद जय राधे राधे, राधे गोविंद जय राधे राधे
राधे गोविंद जय राधे राधे, राधे गोविंद जय राधे राधे
.
२१ नवंबर २०२१

अपवर्ग किसे कहते हैं? ---

 

अपवर्ग किसे कहते हैं? ---
"तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥"
अर्थात् - हे तात! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाए, तो भी वे सब मिलकर (दूसरे पलड़े पर रखे हुए) उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण) मात्र के सत्संग से होता है॥
.
शब्द 'अपवर्ग' का शाब्दिक अर्थ है -- मोक्ष या मुक्ति। निवृत्ति ही अपवर्ग है, यानि दुःख की उत्पत्ति के कारण का अभाव ही आत्यंतिक दु:खनिवृत्ति है।
अपवर्ग होते हैं -- प, फ, ब, भ, म.
प - पतन, फ- फल आशा, ब- बंधन, भ - भय, म - मृत्यु.
जहाँ पतन, फल आशा, बंधन, भय, मृत्यु नहीं है, वही अपवर्ग सुख है, जो शिवकृपा का फल है। 
 .
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
२० नवंबर २०२१

Saturday, 20 November 2021

हम क्या बनें ? ...

 हम क्या बनें ? ...

--------------
यह प्रश्न पूरी सत्यनिष्ठा व श्रद्धा और विश्वास से स्वयं से पूछें, हमारा हृदय अपने आप ही उत्तर दे देगा| हम स्वयं वह बनें जो हम दूसरों से अपेक्षा करते हैं| हम दूसरों को वही दे सकते हैं, जो हमारे पास है| जो हमारे पास नहीं है, वह हम दूसरों को नहीं दे सकते| हमारी चेतना में 'राम' हों, तभी हम दूसरों को राम नाम जपने को कह सकते हैं| हम समष्टि को तब तक प्रेम नहीं दे सकते जब तक हम स्वयं प्रेममय नहीं हो जाते| जब तक हम स्वयं अशांत हैं, समाज में शांति नहीं ला सकते| सबसे बड़ी भेंट अपनी स्वयं की ही दे सकते हैं| सत्य-सनातन-धर्म की चेतना हम समाज में तभी जागृत कर सकते हैं, जब वह स्वयं अपने में हो| हम स्वयं क्या हैं, यही सबसे बड़ी भेंट है जो हम किसी को दे सकते हैं| हम धर्म का आचरण करेंगे तभी धर्म भी हमारी रक्षा करेगा| तब धर्म ही नहीं, स्वयं भगवान भी हमारी रक्षा करेंगे| "जो दृढ़ राखे धर्म को, तिही राखे करतार|"
.
हम क्या बनें? इस विषय पर गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने दूसरे अध्याय के ४५वें श्लोक में पाँच आदेश/उपदेश एक साथ दिये हैं| वे हमें ... "निस्त्रैगुण्य", "निर्द्वन्द्व", "नित्यसत्त्वस्थ", "निर्योगक्षेम", व "आत्मवान्" बनने का आदेश देते हैं| ये सभी एक -दूसरे के पूरक हैं|
कैसे बनें ? इस पर विचार स्वयं करें| बनना तो पडेगा ही क्योंकि यह भगवान का आदेश है ...
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्" ||२.४५||
अर्थात् हे अर्जुन वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है तुम त्रिगुणातीत, निर्द्वन्द्व, नित्य सत्त्व (शुद्धता) में स्थित, योगक्षेम से रहित और आत्मवान् बनो||
.
भाष्यकार भगवान आचार्य शंकर अपने भाष्य में कहते हैं कि जो विवेक-बुद्धि से रहित हैं, उन कामपरायण पुरुषों के लिए वेद त्रैगुण्यविषयक हैं, अर्थात् तीनों गुणों के कार्यरूप संसार को ही प्रकाशित करनेवाले हैं| परंतु हे अर्जुन, तू असंसारी हो निष्कामी हो; तथा निर्द्वन्द्व हो| सुख-दुःखके हेतु जो परस्पर विरोधी (युग्म) पदार्थ हैं, उनका नाम द्वन्द्व है, उनसे रहित हो, और नित्य सत्त्वस्थ अर्थात् सदा सत्त्वगुण के आश्रित व निर्योगक्षेम हो| अप्राप्त वस्तुको प्राप्त करनेका नाम योग है, और प्राप्त वस्तुके रक्षण का नाम क्षेम है, योगक्षेम को प्रधान मानने वाले की कल्याणमार्ग में प्रवृत्ति होनी अत्यन्त कठिन है, अतः तू योगक्षेमको न चाहनेवाला, तथा आत्मवान् हो, अर्थात् (आत्मविषयों में) प्रमादरहित हो। तुझ स्वधर्मानुष्ठान में लगे हुएके लिये यह उपदेश है|
.
इसको समझना और व्यवहार रूप में उपलब्ध करना असम्भव तो नहीं पर कठिन अवश्य है | इसको समझने के लिए अर्जुन जैसे शिष्य बनें, जिन के गुरु स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं, या देवर्षि नारद जैसे शिष्य बनें जिनके गुरु स्वयं भगवान सनत्कुमार हैं| तभी हम समस्त समष्टि का कल्याण कर सकते हैं| हमारे में पात्रता हो, बस यही आवश्यक है, फिर सब काम हो जाएगा|
.
भगवान यह भी कहते हैं ...
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते|
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्||९:२२||"
अर्थात् अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ||
.
प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठें| शौचादि से निवृत होकर एक ऊनी आसन पर
कमर सीधी रखते हुए, पूर्व या उत्तर दिशा में मुंह कर के शांति से बैठ जाएँ| अपनी गुरु-परंपरानुसार साधना करें, जिसमें हम दीक्षित हैं| यदि हमने कोई दीक्षा नहीं ली है तो भगवान श्रीकृष्ण या हनुमान जी को गुरु मानकर नाम-स्मरण या उनके बीजमंत्र का जप करें| निश्चित रूप से कल्याण होगा|
.
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ नवम्बर २०२०

भगवान से परमप्रेम और उन की उपासना ही हमारा स्वधर्म है ---

 भगवान से परमप्रेम और उन की उपासना ही हमारा स्वधर्म है ---

.
गीता में भगवान कहते हैं .....
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्| स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः||३:५५||"
अर्थात् अच्छी तरह आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्म से गुणों की कमी वाला अपना धर्म श्रेष्ठ है| अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भयको देनेवाला है||"
.
जहाँ तक मुझे समझ में आया है ... भगवान की भक्ति (परमप्रेम) और उन की उपासना (समीप बैठना) ही हमारा स्वभाविक धर्म है, वैसे ही जैसे नदियों का धर्म महासागर में मिल जाना है| कोई भी नदी जब तक महासागर में नहीं मिलती तब तक चंचल और बेचैन रहती है| समुद्र में मिलते ही नदी समुद्र के साथ एक हो जाती है| उपासना विकास की प्रक्रिया है, जो शरणागति और समर्पण द्वारा मनुष्य को परमात्मा से एकाकार कर देती है| एक बार परमात्मा से परम प्रेम हो जाए फिर आगे का मार्ग स्वतः ही प्रशस्त हो जाता है| राग-द्वेष युक्त मनुष्य तो शास्त्र के अर्थ को भी उलटा मान लेता है, और परधर्म को भी धर्म होने के नाते अनुष्ठान करने योग्य मान बैठता है| परंतु उसका ऐसा मानना भूल है|
.
सत्यनिष्ठा का अभाव, व लोभ और अहंकार, हमें स्वधर्म से दूर करते हैं| स्वधर्म में स्थिर होने के लिए भगवान की भक्ति और उन का यथासंभव खूब ध्यान करें|
.
आप सब महान आत्माओं, महापुरुषों को सादर नमन ! ॐ तत्सत् !
कृपा शंकर
२० नवंबर २०२०

Friday, 19 November 2021

आत्माराम हो जाना ही भगवत्-प्राप्ति है ---

 आत्माराम हो जाना ही भगवत्-प्राप्ति है ---

------------------------------------
भगवान ही एकमात्र सत्य हैं। वे ही हमारी आत्मा हैं। जो अपनी आत्मा में निरंतर रमण करते हैं, यानि जो सदा सर्वत्र भगवान को ही देखते हैं, उनके लिए "मैं" शब्द का कोई अस्तित्व नहीं होता। उन्हें सर्वत्र और स्वयं में भी भगवान ही दिखाई देते हैं। शरणागत होकर पूर्ण प्रेम (भक्ति) से भगवान को समर्पित होने का निरंतर प्रयास ही साधना है। भगवत्-प्राप्ति हो गई तो सब कुछ प्राप्त हो गया। भगवान के अतिरिक्त हमें कुछ भी अन्य नहीं चाहिए। हमारा समर्पण सिर्फ भगवान के प्रति हो, किसी भी तरह की अन्य कोई कामना आये तो उसे विष के सामान त्याग देना चाहिए। भगवान की इच्छा ही हमारी इच्छा है, और उनकी कामना ही हमारी कामना है। साधना में कोई भी कठिनाई आये तो उसके निराकरण के लिए भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए। भगवान का चिंतन और ध्यान इतना गहन हो कि भगवान ही हमारी चिंता करें, हमारी चिंता सिर्फ भगवान की ही हो। साधना इतनी गहन हो कि साध्य, साधन और साधक एक हो जाएँ। कहीं भी कोई भेद ना रहे।
.
"यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति स्तब्धो भवति आत्मारामो भवति।" यह "नारद भक्ति सूत्र" के प्रथम अध्याय का छठा सूत्र है, जो एक भक्त की तीन अवस्थाओं के बारे में बताता है। उस परम प्रेम रूपी परमात्मा को जानकर यानि पाकर भक्त प्रेमी पहिले तो मत्त हो जाता है, फिर स्तब्ध हो जाता है और अंत में आत्माराम हो जाता है, यानि आत्मा में रमण करने लगता है।
शाण्डिल्य सूत्रों के अनुसार आत्म-तत्व की ओर ले जाने वाले विषयों में अनुराग ही भक्ति है। भक्त का आत्माराम हो जाना निश्चित है। यह आत्माराम हो जाना ही भगवत्-प्राप्ति है।
.
मंगलमय शुभ कामनाएँ और नमन !! ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ ॥
कृपा शंकर
१९ नवंबर २०२१

अनन्य-योग व अव्यभिचारिणी-भक्ति ---

 अनन्य-योग व अव्यभिचारिणी-भक्ति ---

----------------------------------
सिर्फ भगवान की ही सुनो, अन्य किसी की भी नहीं। सद्गुरु के रूप में भी भगवान ही आते हैं। वे उसी मंत्र की, और उसी देव की साधना आपको बताएँगे जो आपके लिए परम कल्याणकारी हो। दीक्षा से पूर्व वे आपके अन्तर्मन में झांक कर देखते हैं। कई बार आपके अनेक पूर्वजन्मों में भी जाकर देखते हैं। उसी के अनुसार वे सही और अनुकूल समय में सही दीक्षा देते हैं, और साधना करवाते हैं। एक ही साधना सभी के अनुकूल नहीं हो सकती। जिस साधक को जो साधना अनुकूल होती है, वही बताई जाती है। सिद्ध गुरु शक्तिपात कर के दीक्षा देते हैं।
.
मैं भक्ति, समर्पण और वेदान्त की बातें करता हूँ क्योंकि ये मेरे स्वभाव के अनुकूल हैं। जिनमें थोड़ी सी भी वेदान्त-वासना नहीं होगी, उनको मैं कभी भी, और कुछ भी नहीं समझा सकूँगा। गीता में दो बातें बड़ी महत्वपूर्ण हैं, जो यदि समझ में और व्यवहार में आ जायें तो भक्त का तुरंत उसी समय कल्याण हो जावे, यानि भगवान की प्राप्ति में फिर विलंब नहीं होता।
.
गीता में भगवान ने "अनन्य" शब्द का कई बार, और "अव्यभिचारिणी भक्ति" शब्द का एक बार उल्लेख किया है। भगवान कहते हैं --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विवक्तदेशसेवित्वरतिर्जनसंसदि॥१३:१०॥"
अर्थात् - “मुझ परमेश्वर में अनन्य योग के द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति तथा एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना (यह ज्ञान है)।”
.
अनन्य-भक्ति और अव्यभिचारिणी-भक्ति अगर भगवान में हो जाय, तो भगवत्प्राप्ति बिलकुल भी कठिन नहीं है। जिसको भगवत्प्राप्ति के सिवाय और कोई सार वस्तु नहीं दिखती, ऐसा जिसका विवेक जाग गया है, उसके लिए भगवत्प्राप्ति सुगम हो जाती है। वास्तव में, भगवत्प्राप्ति ही सार है। भगवान को यदि प्राप्त करना है तो उन्हें अपना १००% प्रेम देना होगा। ९९.९९% भी नहीं चलेगा। उन के सिवाय अन्य कुछ भी हमें अच्छा न लगे। यदि अवचेतन मन में भी भगवान के सिवाय, अन्य कुछ भी प्रिय है तो वे नहीं आते। यही मन की निर्मलता है, जिसके बारे में रामचरितमानस में भगवान कहते हैं --
"निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥"
भगवान के सिवाय अन्य कुछ भी हमें यदि काम्य है तो यह भक्ति में व्यभिचार है। भगवान की प्राप्ति हमें अव्यभिचारिणी भक्ति से ही होती है। हम हर विषय में, हर वस्तु में भगवान की ही भावना करें, और उसे भगवान की तरह ही प्यार करें। सारा जगत ब्रह्ममय हो जाये। ब्रह्म से पृथक कुछ भी न हो। गीता में भगवान कहते हैं --
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
अर्थात् - बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि 'यह सब वासुदेव है' ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है; ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है॥
इस स्थिति को हम ब्राह्मी स्थिति भी कह सकते हैं, जिसके बारे में भगवान कहते हैं --
"विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति॥२;७१॥"
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२:७२॥"
अर्थात् -- जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर, स्पृहा-रहित, ममभाव-रहित, और निरहंकार हुआ विचरण करता है, वह शान्ति प्राप्त करता है॥
हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है॥
.
जब भगवान की परम कृपा से हमारी घनीभूत प्राण-चेतना कुंडलिनी महाशक्ति जागृत होकर आज्ञाचक्र का भेदन कर सहस्त्रार में प्रवेश कर जाती है, तब लगता है कि अज्ञान क्षेत्र से निकल कर ज्ञान क्षेत्र में हम आ गए हैं। सहस्त्रार से भी परे ब्रह्मरंध्र का भेदन करने पर अन्य उच्चतर लोकों की, और उनसे भी परे परमशिव की अनुभूतियाँ होती हैं। फिर ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय -- एक ही हो जाते हैं। उस स्थिति में ही हम कह सकते हैं -- "शिवोहम् शिवोहम् अहं ब्रह्मास्मि"।
फिर कोई अन्य नहीं रह जाता और हम स्वयं ही अनन्य हो जाते हैं। यही अनन्य-योग या अनन्य-भक्ति कहलाती है।
किसी ब्रहमनिष्ठ श्रौत्रीय सिद्ध महात्मा के मार्ग-दर्शन और सान्निध्य में साधना करें। निश्चित रूप से इसी जीवन में हम भगवान को प्राप्त कर सकेंगे।
.
भगवान की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब महान आत्माओं को मैं नमन करता हूँ।
ॐ तत्सत् ॥ ॐ स्वस्ति॥
कृपा शंकर
१९ नवंबर २०२१