Tuesday, 26 October 2021

भगवान के प्रति अहैतुकी परमप्रेम, समर्पण और ध्यान साधना -- हिन्दू धर्म का प्राण है ---

 सनातन हिन्दू धर्म क़ा प्राण है ... भगवान के प्रति अहैतुकी पूर्ण-परम-प्रेम, समर्पण और ध्यान साधना|

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भारत का सबसे बड़ा अहित किया है अधर्मसापेक्ष यानि धर्मनिरपेक्ष अधर्मी सेकुलरवाद, मार्क्सवाद और मैकाले की शिक्षा व्यवस्था ने|
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हमारे जीवन का केंद्रबिंदु परमात्मा हों, और हम उन्हें शरणागति द्वारा समर्पित हों ... यही सर्वश्रेष्ठ कार्य है जिसे हम इस जीवन में कर सकते हैं|
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पूरी सृष्टि ओंकार का, यानि राम नाम का जप कर रही है| हमें उसे निरंतर सुनना और उसी में लीन हो जाना चाहिए| अतः पढो कम, और ध्यान अधिक करो| उतना ही पढो जिससे प्रेरणा और शक्ति मिलती हो| पढने का उद्देश्य ही प्रेरणा और शक्ति प्राप्त करना है|
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साथ भी उन्हीं लोगों का करो जो हमारी साधना में सहायक हों, यही सत्संग है| साधना भी वही है, जो हमें निरंतर परमात्मा का बोध कराये|
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सृष्टि निरंतर गतिशील है, कहीं भी जड़ता नहीं है| जड़ता का आभास, माया का आवरण है| यह भौतिक विश्व जिन अणुओं से बना है उनका निरंतर विखंडन और नवसृजन हो रहा है| यह विखंडन और नवसृजन की प्रक्रिया ही नटराज भगवान शिव का नृत्य है|
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वह परम चेतना जिससे समस्त ऊर्जा और सृष्टि निर्मित हुई है वे शिव हैं| सारी आकाश गंगाएँ, सारे नक्षत्र अपने ग्रहों और उपग्रहों के साथ अत्यधिक तीब्र गति से परिक्रमा कर रहे हैं| सृष्टि का कहीं ना कहीं तो कोई केंद्र है, वही विष्णु नाभि है और जिसने समस्त सृष्टि को धारण कर रखा है वे विष्णु हैं|
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उस गति की, उस प्रवाह की, और नटराज के नृत्य की भी एक ध्वनी हो रही है जिसकी आवृति हमारे कानों की सीमा से परे है| वह ध्वनी ही ओंकार रूप में परम सत्य 'राम' का नाम है| उसे सुनना और उसमें लीन हो जाना ही उच्चतम साधना है| समाधिस्थ योगी जिसकी ध्वनी और प्रकाश में लीन हैं, और सारे भक्त साधक जिस की साधना कर रहे हैं, वह 'राम' का नाम ही है जिसे सुनने वालों का मन उसी में मग्न हो जाता है|
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आप सब में हृदयस्थ परमात्मा को नमन ! ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२६ अक्टूबर २०२०

Monday, 25 October 2021

भगवान श्रीराम की उपासना हमें निर्भीक व शक्तिशाली बनाती है ---

 

विजयदशमी का दिव्य-तेजस्वी पर्व धनुर्धारी भगवान श्रीराम को अपने हृदय में रखते हुए उन सब आध्यात्मिक सीमाओं के उल्लंघन का पर्व है जिन्होने हमें सीमित बना रखा है| जो भी अस्त्र-शस्त्र-आयुध हमारे पास हैं, उनका पूजन करें| हमारा सबसे बड़ा शस्त्र तो हमारी हर आती-जाती साँस और हमारा मन है| सब सीमाओं का उल्लंघन कर भगवान श्रीराम का कूटस्थ में ध्यान करें और उन्हें समर्पित हों|

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रावण की चिंता न करें| रावण कभी मरने वाला नहीं है| रावण है हमारा लोभ व अहंकार, जो निरंतर पराये धन व पराई स्त्री/पुरुष की कामना करता है|
महिषासुर भी हमारा तमोगुण, प्रमाद व दीर्घसूत्रता है| यह भी कभी नहीं मरता|
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भगवान जब हमारे हृदय में प्रतिष्ठित होंगे, तभी ये तमोगुण रूपी असुर भागेंगे| भगवान श्रीराम की उपासना हमें निर्भीक व शक्तिशाली बनाती है|
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भगवान श्रीराम जब रावण से युद्ध करने गए तब उनके पास न तो रथ था, न उन के पैरों में जूते, और न ही उनकी सेना के पास कोई अस्त्र-शस्त्र| उनकी ओर से लड़ रहे वानर और रीछ, वृक्षों और पत्थरों को ही अस्त्र-शस्त्र बनाकर लड़ रहे थे| रावण को रथ पर और श्री रघुवीर को बिना रथ के देखकर विभीषण अधीर हो गए| प्रेम अधिक होने से उनके मन में सन्देह हो गया कि वे बिना रथ के रावण को कैसे जीत सकेंगे|
श्रीराम जी के चरणों की वंदना करके वे स्नेह पूर्वक कहने लगे ... हे नाथ! आपके न रथ है, न तन की रक्षा करने वाला कवच है और न जूते ही हैं| वह बलवान्‌ वीर रावण किस प्रकार जीता जाएगा?
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कृपानिधान श्री रामजी ने कहा ... हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है ... शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिए हैं| सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं| बल, विवेक, दम (इंद्रियों का वश में होना) और परोपकार ... ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं|
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ईश्वर का भजन ही (उस रथ को चलाने वाला) चतुर सारथी है, वैराग्य ढाल है, और संतोष तलवार है| दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है|
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निर्मल (पापरहित) और अचल (स्थिर) मन तरकस के समान है| शम (मन का वश में होना), (अहिंसादि) यम और (शौचादि) नियम- ये बहुत से बाण हैं| ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है| इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है|
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हे धीरबुद्धि वाले सखा! सुनो, जिसके पास ऐसा धर्ममय दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार (जन्म-मृत्यु) रूपी महान्‌ दुर्जय शत्रु को भी जीत सकता है (रावण की तो बात ही क्या है)|
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रावनु रथी बिरथ रघुबीरा| देखि बिभीषन भयउ अधीरा||
अधिक प्रीति मन भा संदेहा| बंदि चरन कह सहित सनेहा||१||
नाथ न रथ नहि तन पद त्राना| केहि बिधि जितब बीर बलवाना||
सुनहु सखा कह कृपानिधाना| जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना||२||
सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे| छमा कृपा समता रजु जोरे||३||
ईस भजनु सारथी सुजाना| बिरति चर्म संतोष कृपाना||
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा| बर बिग्यान कठिन कोदंडा||४||
अमल अचल मन त्रोन समाना| सम जम नियम सिलीमुख नाना||
कवच अभेद बिप्र गुर पूजा| एहि सम बिजय उपाय न दूजा||५||
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आप सब महान दिव्य आत्माओं को नमन !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ अक्टूबर २०२०

श्रीकृष्ण समर्पण ---

 श्रीकृष्ण समर्पण ...

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आजकल पिछले कुछ दिनों से एक विचित्र सी स्थिति हो गई है| इस से एक परम शांति भी मिल रही है और भगवान से एक दिव्य आश्वासन भी|
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अपने चारों ओर ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में हो रहे घटनाक्रम के प्रति मैं बहुत अधिक संवेदनशील हूँ| पूरी पृथ्वी का और पृथ्वी के हर भाग का मानचित्र मेरे मानस में है| इतना ही नहीं, पृथ्वी के हर भाग की जलवायू, और विश्व की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं आदि का भी काफी कुछ ज्ञान है| विश्व के बहुत सारे देशों का भ्रमण भी किया है, सभी महासागरों को जलयान से पार किया है, पृथ्वी की परिक्रमा भी की है, व प्रकृति का सौम्य और विकराल रूप भी देखा है| अपने निज जीवन के भूतकाल की अनेक बुरी-अच्छी स्मृतियाँ आती हैं| बहुत अधिक विचित्र अनुभव हैं, कई बातों की पीड़ा भी होती है| भारत और सनातन धर्म की वर्तमान दुःखद स्थिति की भी पीड़ा होती है|
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पर अब परिदृश्य परिवर्तित हो गया है| अच्छी-बुरी जो भी स्मृति आती है, वे सब अब भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित हो जाती हैं| जीवन का हरेक अच्छा-बुरा पक्ष, हर अनुभव, सब कुछ, पूरा जीवन ही श्रीकृष्ण को समर्पित है| बस एक यही भाव है जो जीवन के हर अभाव और कष्ट को दूर करता है| सारे अभाव व कष्ट, सारी अपूर्णता-पूर्णता, सारा अस्तित्व ... श्रीकृष्ण को समर्पित है| कुछ भी अपने लिए नहीं रखा है, सब कुछ भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है|
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गीता का यह चरम श्लोक बार-बार स्मृति में आमने आता है ...
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज| अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः||१८:६६||"
अब भगवान वासुदेव ही सर्वस्व हैं|
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते| वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः||७:१९||"
सारा जीवन उन्हें समर्पित है| मेरा कहने को कुछ भी नहीं है|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ अक्तूबर २०२०

Thursday, 21 October 2021

श्रीमद्भगवद्गीता का सार जैसा मुझे भगवान की कृपा से समझ में आया है ---

 श्रीमद्भगवद्गीता का सार जैसा मुझे भगवान की कृपा से समझ में आया है ---

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जिसमें जैसे गुण होते हैं, वैसी ही गीता उसे समझ में आती है। जिसमें सतोगुण प्रधान है, उसे ज्ञान और भक्ति की बातें ही समझ में आयेंगी। जिसमें रजोगुण प्रधान है, उसे कर्मयोग ही समझ में आयेगा। जिसमें तमोगुण प्रधान है, उसे कुछ भी समझ में नहीं आयेगा। गीता, सनातन-धर्म के सभी ग्रन्थों का सार है| इसे भगवान श्रीकृष्ण की परम कृपा से ही समझ सकते हैं| अब इसमें भी यदि हम सार की बात करें, तो मुझे अपनी अल्प और सीमित बुद्धि से चार ही बातें समझ में आई हैं| ये चारों बिन्दु सनातन धर्म के स्तम्भ हैं, जिन्हें मैं अति संक्षेप में लिखने का दुःसाहस कर रहा हूँ| भूल-चूक क्षमा करें|
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(१) आत्मा शाश्वत है, इसे कोई नष्ट नहीं कर सकता| हम यह भौतिक देह नहीं, सनातन, शाश्वत, अमर आत्मा हैं, और परमात्मा के अंश हैं|
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(२) हर आत्मा, कर्म करने को स्वतंत्र है| हमारे विचार और भाव ही हमारे कर्म हैं| हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, अतः हम अपने कर्मों का फल भोगने को भी बाध्य हैं| कर्ताभाव से मुक्त होकर परमात्मा की चेतना में किये हुये निष्काम कर्म ही हमें बंधन में नहीं बाँधते|
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(३) कर्मफल भोगने के लिए पुनर्जन्म भी लेना पड़ता है| विगत कर्मों के अनुसार ही हमें दुःख-सुख भोगने पड़ते हैं|
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(४) सब तरह के दुःखों और कष्टों से मुक्ति का एकमात्र उपाय 'भक्ति' और 'समर्पण' है| भगवान हमें अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति, शरणागति, व समर्पण का उपदेश देते हैं| सारे योग, सारी साधनायें व ज्ञान की बातें ... भक्ति में ही समाहित हैं| समत्व में स्थिति को ही भगवान ने ज्ञान बताया है| अंत समय में जैसी हमारी मति होती है, वैसी ही गति होती है| अपने हृदय का पूर्ण प्रेम हम परमात्मा को दें|
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एक ही वाक्य में कहें तो .... परमप्रेम, शरणागति द्वारा समर्पण, व समभाव ही गीता का सार है| गीता के ज्ञान को हम सीमाओं में नहीं बाँध सकते| हमारी बुद्धि ही अत्यल्प और अति सीमित है|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ अक्टूबर २०२०

Wednesday, 20 October 2021

वास्तविक स्वतंत्रता दिवस तो आज २१ अक्तूबर ही है ---

वास्तविक स्वतंत्रता दिवस तो आज ही है ---

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भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने २१ अक्तूबर १९४३ को 'आजाद हिन्द फौज' के सर्वोच्च सेनापति के नाते स्वतन्त्र भारत की प्रथम सरकार बनायी थी जिसे आठ देशों ... जर्मनी, जापान, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुरिया और आयरलैंड ने मान्यता प्रदान की थी।
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जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप समूह इस अस्थायी सरकार को दे दिये थे। सुभाष बोस उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया। अंडमान का नया नाम शहीद द्वीप तथा निकोबार का स्वराज्य द्वीप रखा गया। ३० दिसंबर १९४३ को पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान में पर स्वतन्त्र भारत का ध्वज भी फहरा दिया गया था।
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एक षडयंत्र द्वारा उन्हें देश से भगा दिया गया। आज़ाद हिन्द फौज के १६ हजार से अधिक सैनिक देश की स्वतन्त्रता के लिए लड़ते हुए मरे थे, जिन्हें मरणोपरांत सम्मान नहीं मिला। आजाद हिन्द के फौज के जीवित बचे सैनिकों को सेना में बापस नहीं लिया गया, और उन्हें वेतन और सेवानिवृति का कोई लाभ भी नहीं मिला।
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१५ अगस्त १९४७ तो भारत का विभाजन दिवस था, जिसमें लगभग ३० लाख लोगों की हत्या हुई, हजारों महिलाओं का बलात्कार हुआ, हजारों बच्चों और महिलाओं का अपहरण हुआ, और करोड़ों लोग विस्थापित हुए। इतनी कम अवधि में इतना भयानक नर-संहार विश्व के इतिहास में अन्यत्र कहीं भी नहीं हुआ। इस दिन लाशों से भरी हुई कई रेलगाडियाँ विभाजित भारत यानि पाकिस्तान से आयीं जिन पर खून से लिखा था -- "Gift to India from Pakistan."
१९७६ में छपी पुस्तक Freedom at midnight में उनके चित्र दिये दिये हुए थे। वह कलंक का दिन भारत का स्वतन्त्रता दिवस नहीं हो सकता। यह कैसा स्वतन्त्रता दिवस था जिसमें भारत माता की दोनों भुजाएँ और आधा सिर काट दिया गया। जवाहर लाल नेहरू तो भारत का अंग्रेजों द्वारा कूटनीति से बनाया गया दूसरा प्रधानमंत्री था।
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तेरा गौरव अमर रहे माँ हम दिन चार रहें न रहें| भारत माता की जय !
वन्दे मातरं ! जय हिन्द !
कृपा शंकर
२१ अक्तूबर २०२१

सर्वप्रथम धर्म की रक्षा हो तभी देश बचेगा ---

 

सर्वप्रथम सनातन धर्म व राष्ट्र की रक्षा हो, तभी भारत देश बचेगा; अन्यथा नामांतरण भी हो सकता है -- पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान।
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धर्म की रक्षा होती है - धर्माचरण से, जिसे आजकल कोई करना नहीं चाहता। समय ही खराब चल रहा है, किसी का दोष नहीं है। मेरी आस्था अब सब ओर से हट कर भगवान पर ही सिमट गई है। यह भगवान की सृष्टि है, अतः जो कुछ भी करना है, वह वे ही करेंगे। मैं तो निमित्तमात्र हूँ। मेरी भूमिका यज्ञ में एक यजमान की भूमिका से अधिक नहीं है। ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
१९ अक्तूबर २०२१

भगवान से उनके परमप्रेम के अतिरिक्त अन्य कुछ भी मत मांगो ---

 

भगवान से उनके परमप्रेम के अतिरिक्त अन्य कुछ भी मत मांगो। निरंतर उनका स्मरण ही सर्वश्रेष्ठ सत्संग और जपयज्ञ है। अपनी चेतना को सदा उत्तरा-सुषुम्ना (आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य) में रखो। कुसंग का सदा त्याग, और गीता का नित्य स्वाध्याय करो। यही सन्मार्ग है।
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"सोइ जानहि जेहि देहु जनाई, जानत तुमहिं तुमहि हुई जाई।"
"धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्।"
अपनी श्रद्धा, विश्वास और आस्था को विचलित न होने दें, क्योंकि श्रद्धावान को ही शांति मिलती है। भगवान कहते हैं --
"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥४:३९॥"
अर्थात - "श्रद्धावान् तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है॥"
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ तत्सत् !
कृपा शंकर
१९ अक्टूबर २०२१