Wednesday, 6 May 2020

आध्यात्मिक साधना के लिए हठयोग की आधारभूत आवश्यकता :----

आध्यात्मिक साधना के लिए हठयोग की आधारभूत आवश्यकता :----
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आध्यात्मिक साधना के लिए हम हठयोग की उपेक्षा नहीं कर सकते| हठयोग के कुछ साधन हैं जिन के बिना हमें योगमार्ग में सफलता बिल्कुल नहीं मिल सकती| मैं तीन मूलभूत आवश्यकताओं की चर्चा कर रहा हूँ जिनकी सिद्धि हठयोग से ही संभव है .....
(१) साधनाकाल में हमारी कमर सदा सीधी रहे .....
साधनाकाल में मेरुदंड का उन्नत रहना अत्यंत आवश्यक है| जिनकी कमर झुक गई है, उन्हें सिद्धि नहीं मिल सकती, क्योंकि सुषुम्ना नाड़ी में उनका प्राण-प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है| किसी सिद्ध पुरुष की कमर झुक जाए तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, पर कमर के झुकते ही साधक की साधना अवरुद्ध हो जाती है| उसे पुनर्जन्म लेना ही पड़ता है| हठयोग के कई आसन हैं जिनके नियमित अभ्यास से कमर कभी नहीं झुकती|
(२) दोनों नासिकाओं से सांस चलती रहे .....
जब तक दोनों नासिकाओं से सांस नहीं चलती, ध्यान में सफलता नहीं मिलती| ध्यान होता ही तभी है जब दोनों नासिकाओं से सांस चल रही हो| हठयोग में कई क्रियाएँ हैं जिनसे नासिकायें अवरुद्ध नहीं होती| यदि फिर भी कोई समस्या हो तो किसी अच्छे ई.एन.टी.सर्जन से सर्जरी द्वारा उपचार कराना पड़ता है| मेरी नासिकाओं में दो आंतरिक दोष थे जिनसे मुझे सांस लेने में बड़ी कठिनाई होती थी| वर्षों पहिले दो बार नाक की सर्जरी करानी पड़ी थी, फिर कभी कोई कठिनाई नहीं हुई|
(३) आसन में स्थिरता हो .....
किसी एक आसन में स्थिर होकर सुख से दीर्घ काल तक बैठ सकें, यह बहुत बड़ी आवश्यकता है जो हठयोग के अभ्यास से ही संभव है| फिर कुछ प्राणायाम हैं जिनकी सिद्धि हुए बिना भी आसन में स्थिरता नहीं आती|
और भी कई बातें हैं, पर ये तीन मूलभूत आवश्यकताएँ हैं जिनकी सिद्धि हठयोग से ही संभव है|
सभी को नमन | ॐ तत्सत् ||
कृपा शंकर
१३ मार्च २०२०

गुरुकृपा फलीभूत हो ..........

गुरुकृपा फलीभूत हो ..........
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परम गुरुकृपा से आज प्रातः उठते ही मुझे लगा कि सारा ब्रह्मांड टूट कर बिखर गया है, सारी सृष्टि नष्ट हो गई है, कहीं पर कुछ भी और कोई भी नहीं बचा है| मैं स्वयं को जो यह शरीर समझता था, वह शरीर भस्म होकर मेरे सामने पड़ा था| मैंने अपनी स्वयं की मृत देह को स्वयं के सामने भस्म होते हुए देखा| मेरे सिवाय वहाँ अन्य कोई नहीं था| मुझे कोई घबराहट या कोई चिंता नहीं हुई| स्मृति में दो मंत्र आए जिनसे मन आनंद से भर गया|
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पहले तो मार्कन्डेय ऋषि कृत भगवान शिव के आराधना स्तोत्र की यह पंक्ति स्मृति में सामने आई ....
"चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः|"
अर्थात जब भगवान चन्द्रशेखर का आश्रय लिया है तब मृत्यु यानि यमराज मेरा क्या बिगाड़ लेगा? गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने जिस 'कूटस्थ' शब्द का प्रयोग किया है, वह कूटस्थ ही भगवान चन्द्रशेखर हैं| कूटस्थ-चैतन्य यानि गीता में बताई हुई ब्राह्मी-स्थिति ही भगवान चन्द्रशेखर में आश्रय है| ब्राह्मी-स्थिति जब प्राप्त हो आए तब आत्मा की अमरता यानि शाश्वतता का पता चलता है| उस स्थिति में कोई हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता, या बिगड़ सकता चाहे समस्त सृष्टि ही टूट कर बिखर जाये| इसी की महिमा में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है .... "यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः|"
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फिर ईशावास्योपनिषद् का १७ वां मन्त्र सामने आया ..... "वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम् | ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर" ||"
"ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर" ..... यह श्रुति-भगवती का आदेश है जो चेतना की गहराई में उतर जाये तो मृत्यु हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती| मेरे सामने मेरा यह शरीर भस्म होकर पड़ा था, जिस से मेरा इसके भस्म होने तक ही संबंध था| अब श्रुति भगवती का यह आदेश सुनाई दे रहा था ... "ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर" ... जिसका पालन ही मेरी आगे की गति तय करेगा| इस मंत्र का अर्थ थोड़ा गूढ़ है जिसे ध्यान से समझना पड़ेगा|
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गीता के नौवें अध्याय के सौलहवें मंत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को क्रतु और यज्ञ भी बताया है (अहं क्रतुरहं यज्ञः)|
ॐ परमात्मा का नाम है .... "तस्य वाचकः प्रणवः" .. ||योगसूत्र.१:२७||
श्रुति भगवती के आदेशानुसार प्रणवरूपी धनुष पर आत्मा रूपी बाण चढाकर ब्रह्मरूपी लक्ष्य को प्रमादरहित होकर भेदना चाहिए .....
"प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते| अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् || (मुण्डक.२:२:४)"
बाण का जैसे एक लक्ष्य होता है वैसे ही हम सबका लक्ष्य परमात्मा ही होना चाहिए| हमें प्रणव का आश्रय लेकर प्रभु का ध्यान करते हुए स्वयं को उन तक पहुँचाना है|
"ॐ क्रतो स्मर" का अर्थ यही समझ में आता है कि प्रणव के द्वारा निरंतर यज्ञरूप में हम भगवान का स्मरण करें| हमारी सुषुम्ना नाड़ी में प्राणों का प्रवाह सोम और अग्नि के रूप में चलता रहता है, यह भी एक यज्ञ है| कूटस्थ में ज्योति-दर्शन और नाद-श्रवण भी एक यज्ञ है| हम स्वयं को परमात्मा में समर्पित करते हैं, यह भी एक यज्ञ है| हमारा समर्पित होना ही हमारा कृत है| परमात्मा में समर्पित होकर यानि देह-भाव से मुक्त होकर परमात्म-भाव द्वारा (स्वयं द्वारा स्वयं का) परमात्मा का स्मरण "कृतं स्मर" हो सकता है| मुझे तो यही समझ में आ रहा है|
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भगवान हमें अंतकाल में भ्रूमध्य में ओंकार का स्मरण करने को कहते हैं ....
"प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव| भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्||८:१०||"
"यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः| यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये||८:११||"
"सर्वद्वाराणि संयम्यमनो हृदि निरुध्य च| मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्||८:१२||"
"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्| यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्||८:१३||"
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शरीर तो हमारा भस्म हो जाएगा, उसके साथ हमारा कोई संबंध नहीं रहेगा| अतः अनुग्रह कर के भगवान स्वयं ही हमारा स्मरण करेंगे| हमारा कोई पृथक अस्तित्व नहीं रहेगा, कोई भेद नहीं होगा| हम परमात्मा के साथ एक होंगे|
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किसी भी तरह की चिंता की कोई बात नहीं है| भगवान का स्पष्ट आश्वासन है.....
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते| तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्||९:२२||"
"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्| साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः||९:३०||"
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि| अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि||१८:५८||"
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अंतकाल की भावना ही हमारे अगले देह की प्राप्ति का कारण होती है| ओंकार का ध्यान ही चिदाकाश, दहराकाश, महाकाश, पराकाश और सूर्याकाश इत्यादि लोकों से पार करा कर मह:, जन:, तप: और सत्यलोक से भी परे ले जाकर ब्रह्ममय बना देता है| इसका कभी क्षय नहीं होता अतः यह अक्षर या अक्षय है| ओंकार के ध्यान से हमारे अन्तःकरण की अधोगामी गति ऊर्ध्वगामी हो जाती हैं| यह साक्षात ब्रह्म साधना है जिसकी घोषणा सभी उपनिषद् और भगवद्गीता करती है| इसकी विधि किसी ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य से सीखें| पर यह याद रखें .... "ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर|"
ॐ श्रीगुरवे नमः | ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
१० मार्च २०२०

Tuesday, 5 May 2020

होली का आध्यात्मिक महत्व और रहस्य :-----

होली का आध्यात्मिक महत्व और रहस्य :-----
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आध्यात्मिक साधना और मंत्र सिद्धि के लिए चार रात्रियों का बड़ा महत्त्व है| ये हैं .... (१)कालरात्रि (दीपावली), (२)महारात्रि (महाशिवरात्रि), (३)मोहरात्रि (जन्माष्टमी). और (४)दारुण रात्रि (होली)| इन रात्रियों को किया गया ध्यान, जप-तप, भजन ... कई गुणा अधिक फलदायी होता है| इस अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए| होली की कथा का ज्ञान तो सभी को होना चाहिए| हमारे समय तो पाठ्य पुस्तकों में होली का इतिहास पढ़ाया जाता था| पर उसे हिन्दू-द्रोह के कारण धर्म-निरपेक्षता के नाम पर अब हटा दिया गया है|
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हृदय में परमात्मा के प्रति परमप्रेम जागृत कर त्याग और तपस्या के द्वारा निज जीवन में भौतिक देह की चेतना से ऊपर उठने की साधना तो हमें नित्य करनी ही चाहिए| पर होली के अवसर पर अपने बुरे-अच्छे सारे कर्म और उनके फलों की आहुति कूटस्थ में जल रही परमात्मा की विवेकाग्नि में एक विशेष विधि से अर्पित कर देनी चाहिए, जिसके बारे में कभी लिखूंगा|
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हिरण्य का अर्थ है स्वर्ण यानि Gold, तथा कशिपु का अर्थ है मुलायम बिस्तर| यह हिरण्यकशिपु नाम का असुर स्वर्ण के पलंग पर मुलायम बिस्तरों में सोता था और सारी पृथ्वी का स्वर्ण इसने एकत्र कर रखा था| इसकी रुचि सिर्फ स्वर्ण और सुंदर स्त्रियों में थी| अमर होकर यह धूर्त इन्हीं का भोग करना चाहता था| इसने इस हेतु बड़ी कठोर तपस्या की और ब्रह्मा जी से अमरता का वरदान मांगा| ब्रह्मा जी ने अमरता का वरदान देने में अपनी असमर्थता बताई तो हिरण्यकशिपु ने उनसे प्रार्थना की कि मैं किसी भी मनुष्य, पशु, देवता या ८४ लाख योनियों के अंतर्गत किसी भी जीव द्वारा न मारा जाऊँ| उसने यह प्रार्थना की कि मैं न तो पृथ्वी पर, न जल में, न ही किसी शस्त्र-अस्त्र से मरुँ| इस प्रकार मूर्खतावश हिरण्यकशिपु ने सोचा कि इन प्रबंधों द्वारा वह मृत्यु से बच जायेगा| उसके पुत्र प्रहलाद में इससे विपरीत गुण थे| वह भगवान का परम भक्त था| हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रहलाद को भगवान से विमुख करने के लिए कठोरतम यातनायें दीं| पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा| उसकी एक होलिका नामक बहिन थी जिसे अग्नि में न जलने की सिद्धि थी| हिरण्यकशिपु के आदेश से होलिका प्रहलाद को गोद में लेकर प्रज्ज्वलित अग्नि में प्रवेश कर गई| आश्चर्य! होलिका तो अग्नि में जल कर भस्म हो गई पर प्रहलाद का बाल भी बांका न हुआ| हिरण्यकशिपु ने पूछा कि क्या तुम्हारा भगवान इस अग्नि से गर्म हुए लौह-स्तंभ में भी है? प्रहलाद के हाँ कहने पर हिरण्यकशिपु ने उस लौह-स्तंभ पर अपनी गदा से प्रहार किया| उसे समय उस लौह स्तम्भ को फाड़कर नृसिह प्रकट हुए, उनका आधा शरीर सिंह का था और आधा मनुष्य का| बड़ी भयानक गर्जना उन्होनें की और हिरण्यकशिपु को बलात अपनी गोद में लिटाकर अपने नाखूनों से उसका वक्षस्थल विदीर्ण कर उसे मृत्यु प्रदान की|
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यह हिरण्यकशिपु ही फिर रावण और कंस के रूप में आया| वास्तव में वह हिरण्यकशिपु कभी मरा ही नहीं, आज भी लोभ और अहंकार के रूप में हम सब के भीतर बैठा हुआ है| उसको अपनी भक्ति द्वारा हटाना हमारा कार्य है| प्रह्लाद शब्द का अर्थ है आह्लाद, प्रसन्नता, और आनंद| हृदय में भक्ति होगी तो आनंद की प्राप्ति होगी|
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हम यह देह नहीं, शाश्वत आत्मा हैं| आत्म-विस्मृति सब दुःखों का कारण है| इन रात्रियों को अपने आत्म-स्वरुप यानि सर्वव्यापी परमात्मा का ध्यान यथासंभव अधिकाधिक करें| इन रात्रियों में सुषुम्ना नाड़ी में प्राण-प्रवाह अति प्रबल रहता है अतः निष्ठा और भक्ति से की गई साधना निश्चित रूप से सफल होती है| इस सुअवसर का सदुपयोग करें और समय इधर उधर नष्ट करने की बजाय आत्मज्ञान ही नहीं बल्कि धर्म और राष्ट्र के अभ्युदय के लिए भी साधना करें| धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए एक विराट आध्यात्मिक ब्रह्मशक्ति के जागरण की हमें आवश्यकता है| यह कार्य हमें ही करना पड़ेगा| अन्य कोई विकल्प नहीं है|
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कर्मफलों से मुक्त कैसे हों? .....
जब तक लोभ और अहंकार का एक अणुमात्र भी हमारे अंतःकरण में है तब तक कर्मफलों से मुक्ति असंभव है| कर्म फलों को भस्म ही करना है तो अच्छे और बुरे दोनों को ही एक साथ करना होगा| प्राण-तत्व से जुड़ी हुई एक विधि है जिसका ज्ञान निष्ठावान साधकों को भगवान स्वयं करा देते हैं| सर्वप्रथम गीता में बताई हुई अव्यभिचारिणी अनन्य भक्ति को जागृत करें, तब आगे का कार्य भगवान स्वयं करेंगे|
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इस त्योहार को प्राचीन काल में नवान्नेष्टि पर्व के नाम से मनाया जाता था| यह नए अन्न का यज्ञ है| इस पर्व पर लोग विशाल सामूहिक यज्ञों का आयोजन किया करते थे| इस पर्व पर नया अन्न तैयार हो जाता है और नये कच्चे अन्न की बालों को भूनकर खाने से कफ-पित्त (जो इन दिनों में ज्यादा बढ़े होते हैं) जैसे रोग शांत होते हैं| चरकऋषि ने इस प्रकार के कच्चे अन्न को भूनकर खाने को ‘होलक’ कहा है जिसे आजकल होला कहते हैं| भारत अपने इस पर्व की ऐतिहासिकता, प्राचीनता, पावनता और वैज्ञानिकता को विश्व के समक्ष सही स्वरूप में स्थापित करने में असफल रहा है|
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इस अवसर पर एक बार गीता के आत्मसंयमयोग नाम के छठे अध्याय का स्वाध्याय करना चाहिए और कूटस्थ में भगवान का ध्यान करना चाहिए|
आप सब को नमन! होली की हार्दिक शुभ कामनाएँ!
ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ मार्च २०२०

स्त्री और पुरुष दोनों एक ही गाडी के दो पहिये होते हैं .....

स्त्री और पुरुष दोनों एक ही गाडी के दो पहिये होते हैं| दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं| न तो स्त्री के बिना पुरुष रह सकता है और न पुरुष के बिना स्त्री| स्त्री जहाँ भाव प्रधान है, वहीं पुरुष विवेक प्रधान| मूल रूप से दोनों आत्मा हैं, आत्मा के कोई लिंग नहीं होता| भारत में स्त्रियों की स्थिति विदेशी आक्रमणों से पूर्व तक विश्व में सर्वाधिक सम्माननीय थी| भारत की नारियाँ विद्वान् और वीरांगणा होती थीं| भारत पर विदेशी आक्रमणकारी, पुरुषों को मार कर उनकी स्त्रियों का बलात् अपहरण कर लेते थे| आतताइयों द्वारा उन पर बहुत अधिक अत्याचार होता था| या तो वे बेच दी जाती या उन्हें घर में रखैल की तरह रख लिया जाता| इस कारण पर्दाप्रथा और बालविवाह का आरम्भ हुआ| जौहर की प्रथा क्षत्रानियों ने अपने मान सम्मान की रक्षा के लिए आरम्भ कीं|
अंग्रेजों ने अपनी सैनिक छावनियों के आसपास वैश्यालय स्थापित किये जहाँ वे भारतीय विधवाओं को बलात् अपहरण कर उन्हें वैश्या बना देते थे ताकि उनके अँगरेज़ सिपाही बापस अपने देश जाने की जल्दी न करें| इस कारण विधवा-दहन यानि सतीप्रथा का आरम्भ हुआ| जहाँ जहाँ अंग्रेजों की छावनियाँ थीं उनके आसपास के क्षेत्रों में ही विधवाएँ आत्मदाह कर लेती थी या उन्हें आत्मदाह के लिए बाध्य कर दिया जाता था| वहीं से सतीप्रथा का आरम्भ हुआ|
स्त्रियों पर अबसे अधिक अत्याचार यूरोप में ही हुए जहाँ डायन होने के संदेह में करोड़ों महिलाओं की ह्त्या कर दी जाती थी| भारत में स्त्रियों की दुर्दशा विदेशी आक्रमणकारियों के कारण ही हुई| पर अब भारत का पुनर्जागरण हो रहा है| पुरुषों के साथ साथ महिलाएँ भी प्रबुद्ध होंगी|
महिला उत्थान के नाम पर आज जहाँ स्त्री-पुरुष दोनों को एक-दूसरे के विरुद्ध खडा किया जा रहा है उसका मैं विरोध करता हूँ| दोनों मिलकर सहयोग और प्रेम से रहें और दोनों मिलकर अपने जीवन के परम लक्ष्य परमात्मा को प्राप्त करें| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
८ मार्च २०२०

भक्ति करने का कर्ताभाव एक धोखा है ....

भगवान की भक्ति करने का कर्ताभाव एक धोखा है, भक्ति भी वे हैं, और भक्त भी वे स्वयं ही हैं, कहीं कोई भेद नहीं है .....
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एक प्रेमी के लिए प्रेम करने का भाव एक मायावी धोखा है| प्रेम के पात्र तो सिर्फ भगवान हैं, अन्य कोई नहीं| प्रेम भी वे है, और प्रेमी भी वे ही हैं| करुणावश वे स्वयं ही स्वयं को प्रेम कर रहे हैं| प्रेम का ही दूसरा नाम भक्ति है| यह भक्ति करने और भक्त होने का भ्रम अंततः एक धोखा ही है| हम तो हैं ही नहीं| जो कुछ भी है, वह वे भगवान स्वयं ही हैं| वे स्वयं ही स्वयं को याद करते हैं| वे स्वयं ही यह "मैं" बन गए हैं| हम तो एक निमित्त मात्र हैं| इस देह के अंत समय में भी हे भगवन, तुम स्वयं ही स्वयं को याद कर लेना| यह तुम्हारा ही वचन है ...
"अहं स्मरामि मद्भक्तं नयामि परमां गतिम्|"
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हे मेरे उपास्य आराध्य देव, मैं तुम्हारा स्मरण/मनन/चिंतन/ध्यान करने में असमर्थ हूँ| तुम्हारी माया से पार पाना संभव नहीं है| तुम स्वयं ही यह जीवात्मा हो, अब तुम स्वयं ही इस जीवात्मा का उद्धार करो| मैं शाश्वत जीवात्मा, यह देह नहीं, फिर भी इसी की सुख-सुविधा और विलास में डूबा हुआ हूँ| इस की चेतना से निकलने में असमर्थ हूँ| अब तुम ही अनुग्रह करो| मैं तुम्हारी शरणागत हूँ| यह सर्वस्व बापस तुम्हें ही समर्पित कर रहा हूँ| मेरा लक्ष्य और गति तुम स्वयं हो| मैं इस मायावी विक्षेप और आवरण से जकड़ा हुआ हूँ, अब मेरी रक्षा करो| ये तुम्हारे ही वचन हैं ....
"सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते| अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम||"
"सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं| जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं||"
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते| तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्||"
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्|
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्||"
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हे रामा पुरुषोत्तमा नरहरे नारायण केशवा| गोविन्द गरुड़ध्वजा गुणनिधे दामोदर माधवा||
हे कृष्ण कमलापते यदुपते सीतापते श्रीपते| बैकुण्ठाधिपते चराचरपते लक्ष्मीपते पाहिमाम्||"
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"कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा| बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतिस्वभावात्| करोमि यद्यत् सकलं परस्मै| नारायणायेति समर्पयामि||"
Whatever I perform with my body, speech, mind, limbs, intellect, or my inner self either intentionally or unintentionally, I dedicate it all to Thee.
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
८ मार्च २०२०

संक्षेप में नादानुसंधान .....

संक्षेप में नादानुसंधान .....
"नास्ति नादात परो मन्त्रो न देव: स्वात्मन: पर:| नानु सन्धात परा पूजा नहि तृप्ते: परम सुखं||"
There is no mantra superior to Nada and there is no other deity superior to Atma. No worship is superior to the worship of soul. स्थिर तन्मयता (Stable total identification) ही नादानुसंधान है|
मन्त्रयोग संहिता में आठ प्रमुख बीज मन्त्रों का उल्लेख है जो शब्दब्रह्म ओंकार की ही अभिव्यक्तियाँ हैं| लिंग पुराण के अनुसार ओंकार का प्लुत रूप नाद है| मन्त्र में पूर्णता "ह्रस्व", "दीर्घ" और "प्लुत" स्वरों के ज्ञान से ही आती है जिसके साथ पूरक मन्त्र की सहायता से विभिन्न सुप्त शक्तियों का जागरण होता है| वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक नाद, बिंदु और मुद्राओं व साधन क्रम का ज्ञान सद्गुरु ही करा सकता है|
बीजमंत्रों, अजपा-जप, षटचक्र साधना, योनी मुद्रा में ज्योति दर्शन, और नाद व ज्योति तन्मयता, खेचरी मुद्रा, साधन क्रम आदि का ज्ञान ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय सिद्ध गुरु की कृपा से ही हो सकता है| साधना में सफलता भी गुरु कृपा से ही होती है और ईश्वर लाभ भी गुरु कृपा से होता है| हम सब जीव से शिव बनें और परमात्मा में हमारी जागृति हो|
जब साधक को मेरुशीर्ष (खोपड़ी के पीछे का भाग) में प्रणव ध्वनि जिसे अनाहत नाद भी कहते हैं, सुननी आरम्भ हो जाए और ईश्वर लाभ के अतिरिक्त अन्य कोई कामना नहीं है तो अन्य बीज मन्त्रों के जाप की आवश्यकता नहीं है| फिर साधक इस ध्वनि को ही सुनता रहे और इसी का ही मानसिक जप करता रहे| इस ध्वनी को सम्पूर्ण सृष्टि में और उससे भी परे विस्तृत कर दे और अपने स्वयं के अस्तित्व को भी उसी में समर्पित कर दे| एक बार आँख खोलकर अपनी देह को देखो और यह भाव दृढ़ करो कि मैं यह शरीर नहीं हूँ, बल्कि मैं सम्पूर्ण अस्तित्व और उससे भी परे जो है वह सब मैं ही हूँ| अपने आप को उस पूर्णता में समर्पित कर दें| परमात्मा का परम प्रेम यह ओंकार की ध्वनि ही है और वह परम प्रेम जिससे यह सम्पूर्ण सृष्टि बनी है वह परम प्रेम मैं ही हूँ| जप करते हुए इस ध्वनी को सुनते रहें| मन में पूर्ण समर्पण का भाव हो यानि मैं यह देह नहीं बल्कि सर्व व्यापक ओंकार रूप परमात्मा का अमृत पुत्र हूँ, मै और मेरे प्रभु एक ही हैं| मैं उनसे पृथक नहीं हूँ|
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यह एक गुरुप्रदत्त ज्ञान है जो सदगुरु की कृपा से ही प्राप्त होता है| यहाँ जो लिखा है वह मात्र पाठक की रुचि जागृत करने के लिए है| भगवान से प्रेम होगा तो वे गुरुरूप में भी आयेंगे और ज्ञान प्रदान करेंगे| ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
६ मार्च २०२०

मंदिरों का महत्व .....

मंदिरों का महत्व .....
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मंदिरों के महत्व को नकारा नहीं जा सकता| उनकी पुनर्प्रतिष्ठा करनी ही पड़ेगी| मंदिर सामूहिक साधना के केंद्र हैं| जहाँ अनेक लोग साधना करते हैं वहाँ ऐसे स्पंदनों का निर्माण हो जाता है कि नवागंतुक की चेतना भी भक्ति से भर जाती है| उनकी स्थापत्य कला भी ऐसी होती है जहाँ सूक्ष्म दिव्य स्पंदनों का निर्माण और संरक्षण बहुत दीर्घकाल तक रहता है| मंदिरों में आरती व भजन पूजन, भक्तों के कल्याण के लिए होते है| विधिवत आरती के समय उपस्थित भक्तों के ह्रदय भक्ति से भर जाते हैं| ठाकुर जी कोे हमसे हमारे परमप्रेम के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं चाहिए| सारे कर्मकांड भक्ति जगाने के लिए हैं|
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मंदिरों में नियमित जाने से भक्तों का आपस में मिलना-जुलना होता है इससे उनमें पारस्परिक प्रेम बना रहता है| मंदिर का शिखर दूर से ही दिखाई देता है अतः इसे ढूँढने में कठिनाई नहीं होती| मंदिर के साथ धर्मशाला भी होती है ताकि आगंतुक वहां विश्राम कर सकें| प्रसाद के रूप में क्षुधा शांति की भी व्यवस्था होती है| अंग्रेजों के शासन से पूर्व मंदिरों के साथ साथ विद्यालय भी होते थे जहां नि:शुल्क शिक्षा दी जाती थी| अंग्रेजों ने ऐसे सभी विद्यालय नष्ट करवा दिए| मंदिरों के पुजारी व महंत धर्म-प्रचारक होते थे| हिन्दू साधू संतों के हाथ में ही मंदिरों की व्यवस्था होनी चाहिए| उन्हें फिर से धर्म-प्रचार के केन्द्रों के रूप में पुनर्प्रतिष्ठित करना ही पड़ेगा|
हरिः ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
६ मार्च २०२०