Saturday, 31 March 2018

यज्ञ का अवशिष्ट भोजन क्या है ? उसका आहार कैसे करें ? .....

यज्ञ का अवशिष्ट भोजन क्या है ? उसका आहार कैसे करें ? .....
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यह समझने में थोड़ा जटिल विषय है पर इसे समझना अति आवश्यक है| गीता में भगवान कहते हैं ... "यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः| भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् || ३:१३||" अर्थात् "यज्ञ के अवशिष्ट अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं किन्तु जो लोग केवल स्वयं के लिये ही पकाते हैं वे तो पापों को ही खाते हैं|" अब इस विषय को ठीक से समझा जाए ताकि हम पाप के भागी न बनें|
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विस्तार में न जाकर संक्षेप में कहना चाहूँगा कि हमारे शास्त्रों के अनुसार रसोईघर में भोजन बनाने की प्रक्रिया में प्रमादवश अनायास ही कुछ अशुद्धियाँ और पाँच प्रकार के पाप सब से ही होते हैं| उन के परिमार्जन के लिए पञ्च महायज्ञ करते हैं, जिन से वे दोष दूर हो जाते हैं| ये पञ्च महायज्ञ वेदोक्त है जिनको करने का आदेश यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण में है, और मनु महाराज ने भी मनुस्मृति में इनको करने का आदेश दिया है|
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भोजन बनाकर देवताओं को भी उनका भाग दें, गाय, कुत्ते व पक्षियों को भी दें, अतिथि को भी भोजन कराएँ, माता-पिता जीवित हैं तो पहले उनको भोजन कराएँ|
फिर गीता के चौथे अध्याय के चौबीसवें मन्त्र ....
"ॐ ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना" द्वारा भगवान को निवेदित करने के पश्चात् गीता के पन्द्रहवें अध्याय के चौदहवें मन्त्र ....
"ॐ अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्" के अर्थ को मानसिक रूप से समझते हुए ही भोजन करें| भोजन से पूर्व आचमन करें और पहले ग्रास के साथ "ॐ प्राणाय स्वाहा" मन्त्र अवश्य मानसिक रूप से बोलें|
उपरोक्त तो कम से कम अनिवार्य से अनिवार्य आवश्यकता है| विस्तार करने के लिए अन्नपूर्णा के मन्त्र का भी पाठ कर सकते हैं, पञ्च प्राणों का कवल भी प्रथम पांच ग्रासों के साथ कर सकते हैं|
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जहाँ तक मैं समझता हूँ उपरोक्त विधि से भोजन करने से कोई दोष नहीं लगता| उपरोक्त विधि ही वह यज्ञ है जिसको करने का आदेश भगवान दे रहे हैं| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ मार्च २०१८

हिन्दू स्वयं को बहुसंख्यक मानने के झूठे भ्रम में न रहें, वास्तव में वे अल्पसंख्यक ही हैं .....

हिन्दू स्वयं को बहुसंख्यक मानने के झूठे भ्रम में न रहें, वास्तव में वे अल्पसंख्यक ही हैं .....
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वर्त्तमान सांविधानिक व्यवस्था में बहुसंख्यक होने से हानि ही हानि है और अल्पसंख्यक होने से लाभ ही लाभ| जो घोषित अल्पसंख्यक हैं वे अपनी शिक्षण संस्थाओं में अपनी धार्मिक शिक्षा दे सकते हैं, और अपने ही वर्ग के शत प्रतिशत विद्यार्थियों को प्रवेश दे सकते हैं, उन्हें मान्यता भी प्राप्त है|

गुरुकुलों की शिक्षा को मान्यता प्राप्त नहीं है जब कि मदरसों की शिक्षा को मान्यता प्राप्त है| ईसाई शिक्षण संस्थानों में सब को ईसाई धर्म की शिक्षा दी जा सकती है पर हिन्दू अपने धर्म की शिक्षा नहीं दे सकते|

वर्षों पूर्व रामकृष्ण मिशन और आर्यसमाज ने स्वयं को इसीलिये अल्पसंख्यक घोषित कर के सरकारी मान्यता की माँग की थी जो उन्हें नहीं दी गयी|

यह अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की अवधारणा किसी शातिर और धूर्त दिमाग की उपज थी जिस का उद्देश्य शनैः शनैः हिन्दू धर्म को नष्ट करना था| हिन्दू मुर्ख बना ही दिए गए| हिन्दू इसी झूठी भ्रान्ति में जीते रहे कि वे बहुसंख्यक हैं| वास्तव में हिन्दू अल्पसंख्यक ही हैं|

अल्पसंख्यक कहलाने से हिन्दुओं को कोई हानि नहीं है| मेरे विचार से हिन्दू धर्म के हर सम्प्रदाय को स्वयं को अल्पसंख्यक घोषित करवाने की माँग करनी चाहिए ताकि कम से कम वे अपनी शिक्षण संस्थाओं में हिन्दू धर्म की शिक्षा तो दे सकें|

वर्षों पूर्व भारत में जब "हम दो हमारे दो" का नारा लगाया गया और सरकारी नौकरों पर दो बच्चे ही पैदा करने की पाबंदी लागू की गयी थी तो यह सिर्फ हिन्दुओं पर ही थी| बाकी सब को चाहे जितने बच्चे पैदा करने की छूट थी|

अतः हिन्दू अल्पसंख्यक ही हैं, यह वास्तविकता उन्हें स्वीकार कर लेनी चाहिए और स्वयं को अल्पसंख्यकों को दी जाने वाली सारी सुविधाओं की माँग करनी चाहिए| धन्यवाद !

३० मार्च २०१८

घृणा व द्वेष क्यों ? घृणा व द्वेष फैलाने वाले सारे मत और विचार ..... असत्य और अन्धकार फैलाते हैं .....

घृणा व द्वेष क्यों ? घृणा व द्वेष फैलाने वाले सारे मत और विचार ..... असत्य और अन्धकार फैलाते हैं .....
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क्या हमें दूसरों से घृणा सिर्फ इसीलिए करनी चाहिए कि दूसरे हमारे विचारों को नहीं मानते, या दूसरे हमारे मत, पंथ या मज़हब के नहीं है? यदि हमारे मन में किसी के भी प्रति ज़रा सी भी घृणा या द्वेष है तो हम स्वयं के लिए अंधकारमय लोकों की यानि घोर नर्क की सृष्टि कर रहे हैं|
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जब भगवान सर्वत्र हैं और सब में हैं, तो किसी से भी घृणा क्यों? क्या हम भगवान से घृणा कर सकते हैं? गीता में भगवान कहते हैं .....
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति| तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति|| ६:३०||"
अर्थात जो सब में मुझ को देखता है और सबको मुझमें देखता है उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता|
कितना बड़ा आश्वासन दिया है भगवान ने !
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घृणा और द्वेष अत्यंत दुर्बल भाव है जो स्वयं की शांति तो भंग करते ही हैं, चारों ओर एक भयावह विनाश भी लाते हैं| भारत में ऐसा विनाश बहुत अधिक हुआ है| विश्व की अनेक संस्कृतियाँ इस घृणा और द्वेष के कारण नष्ट कर दी गईं, सैंकड़ों करोड़ मनुष्यों की हत्या इसी घृणा व द्वेष के कारण की गयी हैं| कुछ लोग तो दूसरों को पीड़ा पहुँचाने की ही प्रार्थना करते हैं, धिक्कार है ऐसे लोगों पर|
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जिनकी बात उन के अनुयायियों ने ही प्रायः नहीं मानी उन ईसा मसीह ने बाइबिल में कहा है ... “Love your enemies and pray for those who persecute you” (Matthew 5:44). उन्होंने यह भी कहा .... “Do good to those who hate you, bless those who curse you, pray for those who abuse you” (Luke 6:27–28).
महान तमिल संत तिरुवल्लुवर ने अपने साहित्य में घृणा के विरुद्ध बहुत अधिक लिखा है| गीता में भी भगवान कहते हैं ....
"उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् | आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ||६:५||"
इसका भावार्थ है कि हम स्वयं ही अपने शत्रु, मित्र और बन्धु हैं, कोई अन्य नहीं|
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घृणा करने वाले द्वेषी और क्रूर लोगों की गति बहुत बुरी होती है| भगवान कहते हैं ....
"तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् | क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ||१६:१९||"
अर्थात् ऐसे उन द्वेष करने वाले क्रूरकर्मी और नराधमों को मैं संसार में बारम्बार आसुरी योनियों में ही गिराता हूँ अर्थात् उत्पन्न करता हूँ|
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आसुरी योनी में जन्म लेकर क्या होता है ? भगवान कहते हैं ....
"असुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि| मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्||१६:२०||"
अर्थात अविवेकीजन प्रत्येक जन्म में आसुरी योनि को पाते हुए जिनमें तमोगुणकी बहुलता है ऐसी योनियों में जन्मते हुए नीचे गिरते गिरते मुझ ईश्वरको न पाकर उन पूर्वप्राप्त योनियोंकी अपेक्षा और भी अधिक अधम गति को प्राप्त होते हैं|
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अतः किसी से घृणा व द्वेष न करें और क्रूरता पर विजय पायें| भगवान से खूब प्रेम करें|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३० मार्च २०१८

Thursday, 29 March 2018

महावीर जयंती की शुभ कामनाएँ .....

जैन धर्म के २४ वें तीर्थंकर भगवान महावीर की जयंती पर मैं उनके सभी अनुयायियों का और जैन मतावलम्बी अपने सभी मित्रों का अभिनन्दन करता हूँ|
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जहाँ तक मैं समझा हूँ, "जैन" शब्द का अर्थ है .... जीतने वाला .... यानि जिसने अपने मन को, इन्द्रियों को, वाणी को और काया को जीत लिया है, वह जैन है|
जैन धर्म का उद्देश्य है ... "वीतरागता", यानि एक ऐसी अवस्था को प्राप्त करना जो राग, द्वेष और अहंकार से परे हो|
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भगवान महावीर के अनेकान्तवाद और स्यादवाद के दर्शन ने वर्षों पूर्व मुझे अपनी ओर आकर्षित किया था इस लिए मैंने उनका अध्ययन भी किया| भगवान महावीर ने "कैवल्य" शब्द का भी प्रयोग किया है| उन की "कैवल्य" की क्या अवधारणा थी, यह तो वे ही बता सकते हैं| जहाँ तक मैं समझता हूँ, "कैवल्य" .... निर्लिप्त, असम्बद्ध और निःसंग होने की अवस्था का नाम है| इसका अर्थ कई लोग मोक्ष या मुक्ति भी लगाते हैं, जिस से मैं सहमत नहीं हूँ| कैवल्य का अर्थ निःसंग, असम्बद्ध और निर्लिप्त ही हो सकता है| शायद "कैवल्य" और "वीतरागता" एक ही अवस्था का नाम हो, कुछ कह नहीं सकता|
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यह एक नास्तिक धर्म है जो वेदों को अपौरुषेय नहीं मानता| इसमें ईश्वर की परिकल्पना नहीं है, सिर्फ तीर्थंकर, मुनि, आचार्य और उपाध्याय ही हैं| भारत की नास्तिक परम्परा में दो मुख्य धर्म हैं ..... जैन धर्म और बौद्ध धर्म, जो दोनों ही नास्तिक हैं, जिन्होंने जीवन में ईश्वर की आवश्यकता नहीं मानी| आत्मा की शाश्वतता, पुनर्जन्म और कर्मफलों का सिद्धांत .... ये तो भारत में जन्में सभी आस्तिक व नास्तिक धर्मों में है|
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इस धर्म में अनेक बड़े बड़े विद्वान् और दार्शनिक हुए हैं| आधुनिक युग में भी हमारे ही झुंझुनू जिले के टमकोर गाँव में जन्में आचार्य महाप्रज्ञ थे, जो अत्यंत प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी, परम विद्वान् और बहुत प्रसिद्ध तपस्वी संत थे| उन्हीं के उत्तराधिकारी चुरू जिले के सरदारशहर गाँव में जन्में विद्वान् आचार्य महाश्रमण हैं जो वर्तमान में जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सम्प्रदाय के आचार्य हैं|
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पुनश्चः सभी को शुभ कामनाएँ और नमन !
कृपा शंकर
२९ मार्च २०१८

२९ मार्च १९१४ को श्रीमाँ और श्रीअरविंद की भेंट .....

२९ मार्च १९१४ को श्रीमाँ ने पोंडिचेरी आकर श्री अरविन्द से भेंट की| यह एक महान ऐतिहासिक घटना थी जिसका पूरे विश्व की आध्यात्मिक चेतना पर प्रभाव पड़ा| भारत की स्वतंत्रता पर भी इसका प्रभाव पडा और भारत की स्वतंत्रता सुनिश्चित हुई|

श्री अरविन्द ने आश्रम का व सम्बन्धित सारा कार्य श्रीमाँ को सौंप दिया व स्वयं गहन साधना में चले गए| बाहर की दुनियाँ से उनका संपर्क सिर्फ श्रीमाँ के माध्यम से ही रहा| उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात्कार किया और भारत की स्वतंत्रता का वरदान माँगा| भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि तुम्हारे जन्मदिवस (15 अगस्त) को ही भारत स्वतंत्र होगा| उनका उत्तरपाड़ा में दिया भाषण एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है जिसे प्रत्येक भारतीय को पढना चाहिए|

भारत के भविष्य की रूपरेखा भी वे बना कर चले गए| यह कब होगा इसका समय तो उन्होंने नहीं बताया पर यह सुनिश्चित कर के चले गए कि एक अतिमानुषी चेतना का अवतरण होगा जो भारत का रूपान्तरण कर देगी| भारत की अखण्डता की भी भविष्यवाणी उन्होंने की है|

वे इतनी गहन साधना कर सके और इतना महान साहित्य रचा जिसमें अंग्रेजी भाषा का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य -- सावित्री -- भी है, श्रीमाँ के सक्रिय सहयोग के बिना सम्भव नहीं हो सकता था|

श्रीमाँ की उससे अगले दिन की डायरी का यह लेखन है ----
“It matters little that there are thousands of beings plunged in the densest ignorance, He whom we saw yesterday is on earth; his presence is enough to prove that a day will come when darkness shall be transformed into light, and Thy reign shall be indeed established upon earth.”
- The Mother
30 March 1914.

धर्म उसी की रक्षा करेगा जो धर्म की रक्षा करेंगे .....

धर्म उसी की रक्षा करेगा जो धर्म की रक्षा करेंगे .....
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"आध्यात्मिक साधना" और "धर्माचरण" से ही हमारे धर्म की रक्षा हुई है और भविष्य में भी इन्हीं से होगी| जो धर्मरक्षा की बाते करते हैं वे सर्वप्रथम तो अपने निज जीवन में अपने नित्य कर्मों का पालन करें जो उनका धर्म है, फिर धर्मरक्षा की बातें करें| धर्म ही हमारी रक्षा करेगा|
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मनु महाराज का कथन है ....
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः| तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्|| (म.स्म.८:१५)
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गीता में भी भगवान ने कहा है ....
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते| स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्|| (२:४०)
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कणाद ऋषि ने वैशेषिक सूत्रों में धर्म को इस प्रकार परिभाषित किया है .... "यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धि: स धर्म:|" (वै.सू.१:१:२)
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मनु महाराज ने धर्म के दस लक्षण बताएँ हैं .....
धृति: क्षमा दमोऽस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:| धीर्विद्या सत्‍यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌|| (म.स्‍म.६:९२)
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पद्मपुराण में कहा गया है .....
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्| आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्|| (पद्म.पु.शृष्टि.१९:३५७-३५८)
पद्मपुराण में ही धर्म की रक्षा के उपाय बताये गए हैं ....
ब्रह्मचर्येण सत्येन तपसा च प्रवर्तते| दानेन नियमेनापि क्षमा शौचेन वल्लभ||
अहिंसया सुशांत्या च अस्तेयेनापि वर्तते| एतैर्दशभिरगैस्तु धर्ममेव सुसूचयेत||
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याज्ञवल्क्य ऋषि ने धर्म के नौ साधन बताये है .....
अहिंसा सत्‍यमस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:| दानं दमो दया शान्‍ति: सर्वेषां धर्मसाधनम्‌||
महाभारत में महात्मा विदुर ने इज्या (यज्ञ-याग, पूजा आदि), अध्ययन, दान, तप, सत्य, दया, क्षमा और अलोभ को धर्म बताया है|
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श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कन्ध में धर्म के तीस लक्षण बतलाये हैं और वे बड़े ही महत्त्व के हैं|
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रामचरितमानस के लंका काण्ड में भी संत तुलसीदास जी ने धर्म क्या है इसको स्पष्ट किया है|
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धर्म सदा हम सब भारतीयों के जीवन का केंद्र बिंदु रहा है और धर्म ही भारत का प्राण है| अतः हमारा आचरण धर्ममय हो, यह धर्म ही हमारी रक्षा करेगा| भगवान से हमारी प्रार्थना है कि हमारा आचरण धर्ममय हो और धर्म सदा हमारी सदा रक्षा करे| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!

कृपा शंकर
२९ मार्च २०१८

Wednesday, 28 March 2018

क्या हम अपनी इस सृष्टि का रूपांतरण कर सकते हैं ? .....

क्या हम अपनी इस सृष्टि का रूपांतरण कर सकते हैं ? .....
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चारों ओर की सृष्टि जो हमें जैसी भी दिखाई दे रही है वह हम सब के विचारों का ही घनीभूत रूप है| हम सब परमात्मा के अंश हैं, अतः हम जैसी भी कल्पना करते हैं, जैसी भी कामना करते हैं, व जैसे भी विचार रखते हैं, वे ही धीरे धीरे घनीभूत होते हैं, और वैसी ही सृष्टि का निर्माण होने लगता है| किसी के विचार अधिक शक्तिशाली होते हैं, किसी के कम| जिस के विचार अधिक शक्तिशाली होते हैं, वे इस सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया में अपना अधिक योगदान देते हैं|
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हम अपने चारों ओर के घटनाक्रमों, वातावरण और परिस्थितियों से प्रसन्न नहीं हैं और उनका रूपांतरण करना चाहते हैं तो निश्चित रूप से अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देने का प्रयास करें| आध्यात्मिक रूप से यह सृष्टि प्रकाश और अन्धकार का खेल है, वैसे ही जैसे सिनेमा के पर्दे पर जो दृश्य दिखाई देते हैं वे प्रकाश और अन्धकार के खेल हैं| अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान हम उस प्रकाश में वृद्धि द्वारा ही कर सकते हैं|
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जब भी जैसा भी समय मिले, एकांत में परमात्मा के सर्वाधिक कल्याणकारी, मंगलमय और प्रियतम रूप का खूब लम्बे समय तक गहनतम ध्यान करें| परमात्मा सर्वव्यापी और अनंत हैं, अतः हम उनकी सर्वव्यापी अनंतता पर ध्यान करें| हम यह नश्वर भौतिक देह नहीं हैं, हम परमात्मा की सर्वव्यापकता और अनंतता हैं| अपनी चेतना का विस्तार करें और उसे परमात्मा की चेतना के साथ संयुक्त कर दें| परमात्मा स्वयं अनिर्वचनीय नित्यनवीन, नित्यासजग, और शाश्वत आनंद हैं| आनंद का मार्ग प्रेम है| हम स्वयं परमप्रेममय बन जाएँ व हमारी चेतना सर्वव्यापी और अनंत हो जाए| यह सबसे बड़ा योगदान है जो हम इस सृष्टि के रूपांतरण के लिए कर सकते हैं|
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फिर समष्टि के कल्याण की प्रार्थना भी करें| समष्टि के कल्याण की कामना स्वयं के कल्याण की ही कामना है| सम्पूर्ण समष्टि ही हमारी देह है, यह नश्वर भौतिक देह नहीं|
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अनेक व्यक्ति एक निश्चित समय पर, अपने दोनों हाथ ऊपर कर के, भ्रूमध्य को अपने दृष्टिपथ में रखते हुए, यदि लोक-कल्याण के लिए प्रार्थना करते हैं तो वह प्रार्थना निश्चित रूप से फलीभूत होती है|
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इस भौतिक देह के अनाहत-चक्र और आज्ञा-चक्र के मध्य में विशुद्धि-चक्र के सामने का स्थान एक अति सूक्ष्म दैवीय गहन चुम्बकीय क्षेत्र है| अपने दोनों हाथ जोड़कर, भ्रूमध्य को दृष्टिपथ में रखते हुए, उस चुम्बकीय क्षेत्र में अपनी हथेलियों का तीव्र घर्षण करने से हमारी अँगुलियों में एक दैवीय ऊर्जा उत्पन्न होती है| उस दैवीय ऊर्जा को अपनी अँगुलियों में एकत्र कर, अपने दोनों हाथ ऊपर की ओर उठाकर, ॐ का उच्चारण करते हुए उस ऊर्जा को सम्पूर्ण ब्रह्मांड में विस्तृत करते हुए छोड़ दें| वह ऊर्जा समष्टि का निश्चित रूप से कल्याण करती है| समष्टि का कल्याण ही हमारा कल्याण है क्योंकि यह समष्टि ही हमारी वास्तविक देह है|
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अपने विचारों को पवित्र और शुद्ध रखें| हमारे सारे संकल्प शिव-संकल्प हों| किसी के अनिष्ट की कामना न करें| किसी के अनिष्ट की कामना से हमारा स्वयं का ही अनिष्ट होता है|
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अपनी चेतना को निरंतर आज्ञा-चक्र और सहस्त्रार के मध्य में रखने की साधना करें| रात्री को सोने से पूर्व परमात्मा का गहनतम ध्यान कर के सोयें, और दिन का प्रारम्भ भी परमात्मा के ध्यान से करें| सारे दिन परमात्मा की स्मृति बनाए रखें| कोई क्या कहता है और क्या सोचता है इसकी चिंता न करें क्योंकि महत्त्व इसी का है कि परमात्मा की दृष्टि में हम क्या हैं|
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इस संसार में हम एक देवता की तरह रहें, नश्वर मनुष्य की तरह नहीं| हम जहाँ भी जाएँ, वहीं हमारे माध्यम से परमात्मा भी प्रत्यक्ष रूप से जायेंगे| हमारा अस्तित्व परमात्मा का अस्तित्व हो, हम परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति बनें| निश्चित रूप से हम स्वयं परमात्मा के साथ एक होकर उनकी इस सृष्टि के रूपांतरण में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दे सकते हैं| सब कुछ संभव है| हम अपने संकल्प से समय की धारा को भी बदल सकते हैं| हमारा संकल्प परमात्मा का संकल्प है| हमारे विचारों के पीछे परमात्मा की अनंत अथाह शक्ति है|
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सभी को शुभ कामनाएँ और नमन ! ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ मार्च २०१८