Friday, 25 August 2017

शैतान है और हर समय हमारे पीछे पड़ा रहता है ....

शैतान है और हर समय हमारे पीछे पड़ा रहता है .....
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शैतान की परिकल्पना झूठी नहीं है | शैतान एक सत्य है जो हर समय हमारे पीछे पीछे रहता है | उससे बचना हमारा दायित्व है | शैतान एक सर्वव्यापी सचेतन आसुरी शक्ति है जो हमें सत्य से दूर रखती है |

शैतान हमें अधोमुखी और निरंतर पतन की और धकेलने वाली शक्ति है जो सर्वप्रथम काम वासना के रूप में, फिर लोभ के रूप में, फिर राग-द्वेष और अहंकार के रूप में स्वयं को व्यक्त करती है |
अब हम उसे समझें या न समझें यह हमारी स्वयं की समस्या है |

ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ ||

हर हिन्दू परिवार प्रमुख का दायित्व .....

हर हिन्दू परिवार प्रमुख का दायित्व
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हरेक हिन्दू सनातन धर्मावलम्बी परिवार प्रमुख का यह दायित्व है कि वह अपने परिवार में एक भयमुक्त प्रेममय वातावरण का निर्माण करे | अपने बालक बालिकाओं में इतना साहस विकसित करें कि वे अपनी कोई भी समस्या या कोई भी उलझन बिना किसी भय और झिझक के अपने माता/पिता व अन्य सम्बन्धियों को बता सकें | बच्चों की समस्याओं को ध्यान से सुनें, उन्हें डांटें नहीं, उनके प्रश्नों का उसी समय तुरंत उत्तर दें | इससे generation gap की समस्या नहीं होगी | बच्चे भी माँ-बाप व बड़े-बूढों का सम्मान करेंगे | हम अपने बालकों की उपेक्षा करते हैं, उन्हें डराते-धमकाते हैं, इसीलिए बच्चे भी बड़े होकर माँ-बाप का सम्मान नहीं करते |
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परिवार के सभी सदस्य दिन में कम से कम एक बार साथ साथ बैठकर पूजा-पाठ/ ध्यान आदि करें, और कम से कम दिन में एक बार साथ साथ बैठकर प्रेम से भोजन करें | इस से परिवार में एकता बनी रहेगी |
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बच्चों में परमात्मा के प्रति प्रेम विकसित करें, उन्हें प्रचूर मात्रा में सद बाल साहित्य उपलब्ध करवाएँ और उनकी संगती पर निगाह रखें | माँ-बाप स्वयं अपना सर्वश्रेष्ठ सदाचारी आचरण का आदर्श अपने बच्चों के समक्ष रखें |
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इस से पीढ़ियों में अंतर (generation gap) की समस्या नहीं रहेगी और बच्चे बड़े होकर हमारे से दूर नहीं भागेंगे | लड़कियाँ भी घर-परिवार से भागकर लव ज़िहाद का शिकार नहीं होंगी |

ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

२० अगस्त २०१७

अपने समय के एक-एक क्षणका सदुपयोग करें ....

अपने समय के एक-एक क्षणका सदुपयोग करें  ....
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जिस भौतिक विश्व में हम रहते हैं, उससे भी बहुत अधिक बड़ा एक सूक्ष्म जगत हमारे चारों ओर है, जिसमें नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह की सत्ताएँ हैं| जितना हम अपनी दिव्यता की ओर बढ़ते हैं, ये नकारात्मक शक्तियां उतनी ही प्रबलता से हम पर अधिकार करने का प्रयास करती हैं| सबसे पहिले वे हमारा मनोबल क्षीण करती हैं| इनका उपकरण बनने से बचने के लिए निरंतर प्रयास करना पड़ता है| इसके लिए निरंतर हरि स्मरण, सत्संग, स्वाध्याय और कुसंग-त्याग व सात्विक भोजन ये ही उपाय हैं| अपने विचारों और भावों पर सदा ध्यान रखें और अच्छे संकल्प करें|
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अपने समय के एक-एक क्षणका सदुपयोग करें और ईश्वर प्रदत्त विवेक के प्रकाश में सारे कार्य करें| हमें अपने समय के एक एक क्षण का सदुपयोग करना होगा अन्यथा हम स्वयं को क्षमा नहीं कर पाएंगे | आग लगने पर कुआँ नहीं खोदा जा सकता, कुएँ को तो पहिले से ही खोद कर रखना पड़ता है|
भगवान सबकी रक्षा करें| हमारा समर्पण पूर्ण हो|
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ॐ गुरु ! जय गुरु !ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||


२० अगस्त २०१७

बालक/बालिकाओं के माता-पिताओं से एक प्रार्थना .....

बालक/बालिकाओं के माता-पिताओं से एक प्रार्थना .....
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आजकल धर्मनिरपेक्ष सेकुलर शिक्षा पद्धति, और घरों में सात्विक वातावरण के अभाव के कारण लव जिहाद की बहुत सारी घटनाएँ घट रही हैं| माता-पिताओं को चाहिए कि वे सदाचार का पालन करें और अपने बच्चों के समक्ष अपना स्वयं का उच्चतम आदर्श प्रस्तुत करें|
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परिवार में एक भयमुक्त प्रेममय वातावरण हो| बालक/बालिकाओं में इतना साहस विकसित करें कि वे अपनी कोई भी समस्या/उलझन बिना किसी झिझक और भय के अपने माता/पिता व अन्य सम्बन्धियों को बता सकें|
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परिवार के सभी सदस्य दिन में एक बार साथ साथ बैठकर पूजा-पाठ/ ध्यान आदि करें, और कम से कम दिन में एक बार साथ साथ बैठकर भोजन करें|
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बालकों को संघ की शाखाओं में भेजो| बालिकाओं को "राष्ट्र सेवा समिति" और "दुर्गा वाहिनी" से जुड़ने की प्रेरणा दें| उनके विकास और उनकी संगती पर निगाह रखें|
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आपके बच्चे कभी नहीं बिगड़ेंगे और बालिकाएँ कभी भी लव जिहाद का शिकार नहीं होंगी|

ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

१९ अगस्त २०१७

अपने लक्ष्य परमात्मा को सदा सामने रखो.....

अपने लक्ष्य परमात्मा को सदा सामने रखो
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जब भी भगवान की याद आये वह क्षण सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त है|
जिस समय दोनों नासिकाओं से साँस चल रही हो वह ध्यान करने का सर्वश्रेष्ठ समय है|

कोई कुछ भी कहे, कितना भी बुरा-भला कहे, चाहे कितने भी अच्छे-बुरे सुझाव दे, उस पर ध्यान मत दो | ध्यान दो सिर्फ अपने हृदयस्थ परमात्मा से मिल रही प्रेरणा पर | संसार क्या सोचता है, क्या कहता है, इसका कोई महत्त्व नहीं है | महत्त्व सिर्फ एक ही बात का है कि हम परमात्मा की दृष्टी में क्या हैं |

अपने लक्ष्य परमात्मा को सदा सामने रखो और इधर-उधर किधर भी ध्यान मत दो |


ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||



१८ अगस्त २०१७

जिज्ञासु होकर रुकना नहीं चाहिए ......

जिज्ञासु होकर रुकना नहीं चाहिए ......
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जिज्ञासु होकर रुकना नहीं चाहिए , प्रयत्न पूर्वक साधना करते रहना चाहिए | मन लगे या न लगे अपना साधन नहीं छोड़ना चाहिए | अगर दिन में तीन घंटे नाम जप या ध्यान करना है तो करना ही है | उसे छोड़ने का कोई बहाना नहीं होना चाहिए | मन नहीं लगे तो भी बैठे रहो, पर साधन छूटना नहीं चाहिए | मार्ग में बाधाएँ तो बहुत आती हैं, असुर ही नहीं, देवता भी नहीं चाहते कि किसी साधक की साधना सफल हो, वे भी मार्ग में बाधाएँ उत्पन्न करते रहते हैं | इस मार्ग में सिर्फ सद् गुरु की कृपा ही काम आती है | गुरु चूंकि परमात्मा के साथ एक हैं, और उनसे बड़ा हितकारी अन्य कोई नहीं है, अतः उन्हीं की कृपा साधक की रक्षा करती है |
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पुण्य से उत्तम गति प्राप्त होती है पर जन्म-मरण से छुटकारा नहीं मिलता | जन्म-मरण का कारण कामनाएँ हैं जिनसे मुक्ति गहन ध्यान साधना से ही मिलती है | मेरी दृष्टी में अन्य कोई उपाय नहीं है | गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है .....

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिः |
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ||
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सूक्ष्म प्राणायाम द्वारा पाप नष्ट होते हैं | इनकी विधि सिद्ध गुरु ही शिष्य को बता सकता है | ये सूक्ष्म प्राणायाम ही प्रत्याहार कहलाते हैं | सदगुरु की कृपा से कहीं कोई अन्धकार नहीं रहता | गुरु सेवा का अर्थ है गुरु प्रदत्त साधना का अनवरत नियमित अभ्यास | जिन परमात्मा का ध्यान करना है, उनका आभास भी गुरु कृपा से ही होता है |
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सभी को शुभ कामनाएँ और नमन ! ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
१८ अगस्त २०१७

क्या परमात्मा उपयोगिता की एक वस्तु मात्र हैं .....

क्या परमात्मा उपयोगिता की एक वस्तु मात्र हैं .....

क्या परमात्मा उपयोगिता की एक वस्तु मात्र है जिसकी उपयोगिता सिर्फ इतनी सी ही है कि वह अपनी पूजा-पाठ स्तुति आदि करवा कर, करने वाले को रुपया-पैसा, धन-संपत्ति, सुख-शांति प्रदान कर उसकी मनोकामनाओं की पूर्ती कर सकता है ? .....
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वर्त्तमान सभ्यता में जितने अधिक सभ्य हम होते जा रहे हैं, उस सभ्यता में सबसे अधिक सभ्य और सबसे अधिक सफल होने का एकमात्र मापदंड है ..... कितना रुपया-पैसा हमने बनाया है, और कितनी धन-संपत्ति हमने जोड़ी है| अगर हमने धन -संपत्ति नहीं जोड़ी है तो हम जीवन में अपने समाज द्वारा एक विफल व्यक्ति ही माने जाएँगे| समाज में हमारा कोई सम्मान नहीं होगा|
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समाज में यही देखता हूँ कि लोग अपने बूढ़े माँ-बाप की सेवा नहीं करते, उन्हें अपमानित और उपेक्षित करते हैं क्योंकि बूढ़े माँ-बाप के पास जो धन था वह वे अपनी संतानों को दे चुके हैं और अब वे अशक्त, निरीह और असहाय हैं|

बहुएँ सास की सेवा नहीं करतीं, बुढापे में उनका इलाज़ तक नहीं करवातीं क्योंकि सास अब रुग्ण रहती हैं और हाथ पैर नहीं चलने से किसी काम की नहीं रही हैं| बच्चों के पास माँ-बाप के लिए समय नहीं रहता है| जो देश जितने अधिक उन्नत हैं उनमें यह सभ्यता कुछ अधिक ही है|
जिन सज्जनों के बच्चे विदेशों में रहते हैं, वे सज्जन बुढ़ापे में बहुत दुःखी होकर यह पछताते पछताते मरते हैं कि हमने अपने बच्चों को इतना सभ्य और सफल बनाने के लिए अपने से दूर विदेश क्यों भेजा?
जो सज्जन अपने बच्चों के साथ विदेशों में रहते हैं उन्हें बुढ़ापे में यह पछतावा होता है कि हम यहाँ विदेश में किस से बातचीत करें, किसी को हमारे से बात करने की फुर्सत ही नहीं है| बूढ़े बूढ़े लोग अवकाश के समय बगीचों में एक -दूसरे से मिल लेते हैं और अपना दुःख-सुख बाँट लेते हैं| कई तो मृत्यु की प्रतीक्षा में बापस भारत आ जाते हैं|
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वर्त्तमान सभ्यता में उपयोगी चीज वही है जो धन को आकर्षित कर सके, कमा सके या उत्पन्न कर सके| यह भाव सभी व्यवसायों, धर्म, राजनीति, चिकित्सा, शिक्षा आदि सभी स्थानों में आ चुका है| रुपया, रुपया रुपया और अधिक से अधिक रुपया, बस रुपये के अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहिए, चाहे कितना भी अधर्म और बेईमानी करनी पड़े|
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व्यक्तिगत जीवन में फेसबुक को छोड़कर मैं कहीं भी परमात्मा की बात नहीं करता| कुछ सत्संगी इसके अपवाद हैं| अन्यत्र परमात्मा की बात करते ही लोग कहते हैं कि इससे कुछ फ़ायदा हो तो बात करो अन्यथा नहीं| तथाकथित धार्मिकों की दृष्टी दूसरों के धन पर ही रहती है| वर्त्तमान सभ्यता में भगवान की अहैतुकी अनन्य भक्ति समय की बर्बादी है| लोग सोचते हैं कि जब हाथ-पैर नहीं चलेंगे तभी बुढ़ापे में भक्ति करेंगे|
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समाज में वे लोग misfit हैं जो भक्ति, योग वा ज्ञान आदि की साधना करते हैं| समाज में उनका रहना एक मजबूरी है| भगवान भी अब इस सभ्यता में उपयोगिता की एक वास्तु मात्र होकर रह गए हैं|
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आप सब परमात्मा के सर्वश्रेष्ठ साकार रूप हैं | आप सब को नमन !

ॐ तत्सत् |ॐ ॐ ॐ ||

१६ अगस्त २०१६