यदि पृथ्वी पर पूरा सतोगुण व्याप्त हो जाये तो पृथ्वी उसी क्षण नष्ट हो जायेगी। ऐसे ही यदि इस पृथ्वी पर पूरा तमोगुण आ जाये तो भी पृथ्वी तत्क्षण नष्ट हो जाएगी। तीनों गुणों में परिवर्तनशील आनुपातिक संतुलन आवश्यक है। भगवान श्रीकृष्ण गीता में हमें निःस्त्रेगुण्य होने को कहते हैं --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥२:४५॥"
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ऐसे ही अहंकार से मुक्त कोई व्यक्ति ईश्वर की चेतना में यदि इस सम्पूर्ण सृष्टि का विनाश भी कर दे तो उसे कोई पाप नहीं लगता ---
"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते |
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ||१८:१७॥"
जिस पुरुष के अंतःकरण में 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा अहंकार नहीं है और जिसकी बुद्धि (सांसारिक कर्मों या उनके फलों में) लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन समस्त लोकों को मारकर (युद्ध में नाश करके) भी न तो मारता है और न ही (कर्मों के बंधन से) बँधता है। ॐ तत् सत् ॥
कृपा शंकर
३ जुलाई २०२६
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