Sunday, 5 July 2026

परमात्मा के साथ एकत्व का बोध और द्वैत की निवृत्ति ---

 परमात्मा के साथ एकत्व का बोध और द्वैत की निवृत्ति

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यह स्वभाविक है। जैसे जैसे हमारे साधन की गहनता बढ़ती जाती है, वैसे वैसे हम स्वयं को अद्वैत वेदान्त में स्थित हुआ पाते हैं। ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम अपने ज्येष्ठ मानसपुत्र अथर्व ऋषि को ब्रह्मज्ञान दिया। अथर्व ऋषि ने अङ्गी ऋषि को, अङ्गी ऋषि ने भारद्वाज सत्यवह ऋषि को, सत्यवह ऋषि ने अङ्गिरा ऋषि को, अङ्गिरा ऋषि ने शौनक ऋषि को ब्रह्मज्ञान दिया। शौनक ऋषि ने ब्रह्मज्ञान अपने हजारों शिष्यों को दिया। वहीं से गुरु परंपरा आरंभ हुई। परा और अपरा विद्याओं का भेद भी तभी से सभी शिष्यों को बताया गया।
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शौनक ऋषि ने अङ्गिरा ऋषि से पूछा कि वह क्या है जिसे जानने से सब कुछ जान लिया जाता है। अङ्गिरा ऋषि का उत्तर था कि परमात्मा को जानने से सब कुछ जान लिया जाता है। वहीं से परब्रह्म पुरुषोत्तम की साधना का आरंभ होता है। उस की विधि भी उन्होने बताई ---
"प्रणव रूपी धनुष पर आत्मा रूपी बाण को चढ़ाकर परब्रह्म परमेश्वर को लक्ष्य बनाया जाता है। यह प्रमादरहित मनुष्य द्वारा ही बेधे जाने योग्य है। अतः उसे बेधकर बाण की तरह उस लक्ष्य में तन्मय हो जाना चाहिए।"
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आगे की बातें बड़ी गूढ़ है जिनकी चर्चा मुमुक्षुओं में ही की जाती हैं। यदि आपकी रुचि है तो आगे इस चर्चा को अति सीमित लोगों में जारी रखेंगे। अन्यथा बंद कर देंगे।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ जून २०२६

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