Sunday, 5 July 2026

सुख के स्वप्न और मधुर कल्पनायें भी हमें बंधनों में बांधती हैं ---

 सुख के स्वप्न और मधुर कल्पनायें भी हमें बंधनों में बांधते हैं। कामनाएं, वासनाएं, और संसार के साथ स्वीकार किये हुए सारे संबंध ही बंधन हैं; इनका त्याग ही मुक्ति है। वास्तव में हमारा एकमात्र संबंध परमात्मा से है।

आत्मा तो सदा साक्षात् है, अतः आत्म-साक्षात्कार कैसा? भगवान तो सदा प्राप्त हैं, अतः भगवत्-प्राप्ति कैसी? जब हम यह शरीर नहीं, प्रत्यगात्मा हैं, तब हमारे गुरु केवल दक्षिणामूर्ति शिव ही हो सकते हैं।
सहस्त्रारचक्र उत्तर दिशा है, मूलाधारचक्र दक्षिण दिशा, भ्रूमध्य पूर्व दिशा है तो मेरुशीर्ष पश्चिम दिशा। परमशिव की अनुभूति इस शरीर से बाहर सहस्त्रारचक्र से बहुत ऊपर अनंताकाश से भी परे परमज्योतिर्मय रूप में होती है। उनका मुख दक्षिण दिशा में यानि हमारी ओर है, इसलिए वे दक्षिणामूर्ति हैं। सारे ज्ञान के वे स्त्रोत हैं। जो परमशिव हैं, वे ही पुरुषोत्तम हैं। दोनों की अनुभूतियाँ एक ही हैं। जो शिव हैं, वे ही विष्णु हैं, और जो विष्णु हैं, वे ही शिव हैं। हरिः और हर में कोई भेद नहीं है।
"ॐ नमःशिवाय विष्णुरूपाय शिवरूपाय विष्णवे।
शिवस्य हृदयं विष्णुं विष्णोश्च हृदयं शिवः॥" (स्कन्दपुराण)
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ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ जुलाई २०२६

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