स्वयं परमात्मा ही मेरे अस्तित्व हैं| मैं इस हाड़-मांस के पुतले शरीर का वंदी नहीं हूँ| मैं मेरे इष्टदेव के साथ एक हूँ, कहीं कोई भेद नहीं है|
भगवान कहते हैं :---
"अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते|
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः||१०:८||
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्|
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च||१०:९||
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्|
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते||१०:१०||
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः|
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता||१०:११||"
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मेरी आस्था अब सिर्फ परमात्मा पर ही रह गई है, स्वयं की बुद्धि, विवेक और बल पर तो बिलकुल भी नहीं| मैं परमात्मा को ब्रह्म, परमशिव, वासुदेब या अन्य किसी भी नाम से कहूँ, चेतना में उनकी अवधारणा स्पष्ट है| किसी भी तरह का कोई संशय नहीं है|
ध्यान-साधना का विषय -- परमात्मा स्वयं ज्योतिर्मय आकाश-तत्व के रूप में, व उस से भी परे हैं, और कर्ता -- प्राण-तत्व के रूप में भी वे स्वयं ही हैं|
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सत्य-असत्य क्या है? यह जानने की मेरी क्षमता नहीं है, लेकिन अंतर्चेतना कहती है -- "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः|" वे ही सत्य हैं, और वे ही मेरे जीवन हैं| उनसे अन्य कुछ भी नहीं है।
कृपा शंकर
१६ फरवरी २०२१
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