हमारी सूक्ष्म देह में सुषुम्ना नाड़ी प्रत्यक्ष सरस्वती है| सुषुम्ना चैतन्य होती है तब कुंडलिनी महाशक्ति जागृत होती है| मेरुदंड के सभी चक्रों को जागृत करती हुई जब कुंडलिनी सहस्त्रार में प्रवेश करती है, तब वहाँ इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना -- इन तीनों प्राण-प्रवाहों का संगम होता है| वही ज्ञान-क्षेत्र है, जहाँ से परमात्मा का ज्ञान होना आरंभ होता है| सहस्त्रार में स्थितप्रज्ञ होकर पारब्रह्म परमशिव की उपासना करें| बाकी चिंताओं को छोड़ दें| जो चिंता करनी है वह स्वयं भगवती करेंगी| चिंता करना भगवती का काम है, हमारा नहीं| चेतना को निरंतर आज्ञाचक्र से ऊपर रखें, और सहस्त्रार में तेलधारा की तरह जो मंत्र गूंज रहा है, उसे ही सुनते रहें| सुषुम्ना नाड़ी में क्रियायोग -- सरस्वती पूजन है| आज वसंत पंचमी है और आज सरस्वती माता की पूजाका खास महत्व है|
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