मेरी ओर से सब निश्चिंत रहें। मेरी किसी से कोई अपेक्षा नहीं है। मैं न तो कभी आपसे कोई धन मांगूंगा, न ही अन्य कोई चीज। अतः शंका न करें। मेरी सिर्फ एक ही प्रार्थना है, कि सत्य-सनातन-धर्म और भारत के प्रति आपके हृदय में प्रेम और स्वाभिमान जागृत हो। और मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। इतने लेख मेरे माध्यम से इसलिए लिखे जाते हैं, क्योंकि भगवान लिखवाते हैं। मैं अपनी मर्जी से कुछ नहीं लिखता। .
भ्रूमध्य स्वर्ग का द्वार, व आज्ञाचक्र का भेदन स्वर्ग में प्रवेश है। अशांत मन सब बुराइयों की जड़ है। परमात्मा हमारे साथ एक हैं। यश और प्रसिद्धि की कामना -- एक सूक्ष्म अहंकार है जो बड़े बड़े साधकों को पथभ्रष्ट कर देता है। जब भी ऐसी कोई चाह जगे, तब सावधान हो जाओ। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।
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एक बार गहरे ध्यान में गुरु जी ने यह बात स्पष्ट रूप से चित्त में बैठा दी थी कि तुम जहाँ भी साधना में लोभ करोगे या तुम्हें साधना का अहंकार हो जाएगा, उसी क्षण तुम भटक जाओगे| उन की कृपा से पूरी बात समझ में आ गई| जैसे साँप-सीढ़ी के खेल में साँप के मुंह में आते ही पतन हो जाता है, वैसे ही लोभ और अहंकार पतन के गर्त में धकेल देते हैं|
लोभ और अहंकार से बचने का उपाय है --- स्वयं कर्ता मत बनो, भगवान को ही कर्ता बनाओ, और साधना का फल भी उन्हीं को तुरंत समर्पित कर दो। ॐ गुरु !! जय गुरु !!
कृपा शंकर
१६ फरवरी २०२१
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