"आनंद" की अनुभूति का एकमात्र स्त्रोत "परमप्रेम" (भक्ति) है ---
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यह भक्ति ही हमें तृप्त और मुक्त करती है। अन्य सभी आभासीय अनुभूतियाँ हमें दुःख और पीड़ा देती हैं। "ख़ुशी" और "आनंद" में बहुत अंतर है। "ख़ुशी" वह है जो हमें किसी बाहरी वस्तु को प्राप्त करने से होती है। अंततः यह दुःखदायी होती है। "आनंद" तो हम स्वयं हैं। यह हमारा स्वभाव है। भगवान को सच्चिदानंद कहा गया है। भगवान की चरम अनुभूति हमें सच्चिदानंद के रूप में होती है। इसे कोई भी हम से नहीं छीन सकता।
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इस विषय को समझने के लिए हमें कृष्ण यजुर्वेद के तैत्तिरीयोपनिषद का स्वाध्याय करना होगा। अनेक स्वनामधन्य आचार्यों के भाष्य इस पर उपलब्ध हैं। इस उपनिषद के स्वाध्याय और कृष्ण यजुर्वेद में बताई गई साधना विधियों के अभ्यास से सच्चिदानंद परमात्मा की प्राप्ति निश्चित रूप से की जा सकती है।
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१६ फरवरी २०२३
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