हमारा सारा कार्य भगवान की चेतना में हो, हम निरंतर उन की चेतना में रहें ---
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कर्ता भाव से मुक्त होकर, यदि मैं इस सम्पूर्ण सृष्टि को भी नष्ट कर दूँ, तो भी किसी भी प्रकार के पाप का मैं भागी नहीं हो सकता। भगवान कहते हैं --
"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१८:१७॥"
अर्थात् - जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है॥
He who has no pride, and whose intellect is unalloyed by attachment, even though he kill these people, yet he does not kill them, and his act does not bind him.
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पुरुषोत्तम भगवान विष्णु या शिव का ध्यान करते करते जिस ज्योतिर्मय सूर्यमण्डल का आभास होता है उसे निरंतर अपनी चेतना में रखें। वह परमज्योति ही हमारा कवच है जिसने हमें हर समय घेर रखा है। उसकी उपस्थिति भगवान की उपस्थिति है, जो हर समय हमारे साथ हैं। उसे कभी न भूलें और जब भी अवसर मिले उसमें से निःसृत हो रही प्रणव की ध्वनि को सुनते रहें।
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सहस्त्रारचक्र से ऊपर अनंताकाश से भी परे एक सूर्यमंडल है जो ध्यान में दृष्टिगोचर होता है। हर समय उसे अपनी चेतना में रखें। अभ्यास करते करते वह प्रत्यक्ष हो जाएगा। सारी सृष्टि भगवान के आधीन है, वे सब नियमों से ऊपर हैं, यानि सारे नियमों के नियंता वे ही हैं। वे भूतकाल को भविष्यकाल, और भविष्यकाल को भूतकाल में भी बदल सकते हैं। हमें भी हर समय भक्ति यानि परमप्रेमपूर्वक भगवान को ही समर्पित होकर रहना चाहिए।
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संसार में हम भगवान को व्यक्त करते हैं, अतः उनके अतिरिक्त किसी अन्य के आधीन नहीं हैं। भगवान को ही समर्पित होकर रहें व उन्हें अपने माध्यम से सारा कार्य करने दें। किसी भी तरह की आकांक्षा यानि कामना का जन्म न हो। क्योंकि कामना ही कर्म-बंधन है। हर समय उनका स्मरण रखें, यह भगवान का ही आदेश है --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे।।
Therefore meditate always on Me, and fight; if thy mind and thy reason be fixed on Me, to Me shalt thou surely come.
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जिधर भी हमारी दृष्टि जाए उधर भगवान ही दृष्टिगत हों । भगवान कहते हैं --
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् - जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता।।
He who sees Me in everything and everything in Me, him shall I never forsake, nor shall he lose Me.
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और कुछ भी लिखने में असमर्थ हूँ। समस्त सृष्टि में व्यक्त हो रहे परमात्मा को नमन !!
ॐ तत्सत् !!
१७ फरवरी २०२३
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