सूक्ष्म जगत इस भौतिक जगत से बहुत अधिक विशाल है। जैसे इस अथाह भौतिक जगत की कोई थाह नहीं है, वैसे ही अति-अथाह सूक्ष्म जगत की भी कोई थाह नहीं है। कोई सिद्ध महात्मा ही उसे जान सकता है। सूक्ष्म जगत से आगे के भी कई लोक हैं जिनके बारे में हम कल्पना भी नहीं कर सकते। हरेक निष्ठावान भक्त साधक को सूक्ष्म जगत की अनुभूतियाँ अवश्य होती हैं, लेकिन इसकी चर्चा का निषेध है इसलिए वे इस विषय पर कुछ नहीं बोलते।
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गुरु की आज्ञा से हम भ्रूमध्य पर ध्यान करते हैं, जहाँ गहराई से दीर्घ समय तक ध्यान करते करते प्रणव से लिपटी हुई एक ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होती है। इसे कूटस्थ कहा जाता है। इस की चेतना को कूटस्थ चैतन्य कहते हैं।
ध्यान उस ब्रह्मज्योति का ही किया जाता है जिसे "ज्योतिर्मय ब्रह्म" भी कहते हैं। ध्यान में आँखों का दृष्टि-पथ तो भ्रूमध्य ही रहता है, लेकिन समर्पण ज्योतिर्मय-ब्रह्म यानि कूटस्थ को ही होता है।
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कुंडलिनी-जागरण कोई बड़ी बात नहीं है, यह एक सामान्य सी घटना है जो सभी साधकों के साथ होती है। कुंडलिनी जागरण से हमारी आध्यात्मिक समझ बढ़ जाती है, परमात्मा की अनुभूतियाँ होने लगती हैं, और हमारा दृष्टिकोण बदल जाता है। इससे अधिक कुछ भी नहीं है। जब हमारी इंद्रियों की बहिर्मुखी प्राण-ऊर्जा ध्यान की शक्ति से घनीभूत होकर अंतर्मुखी हो जाती है, तब वह घनीभूत प्राण-ऊर्जा मूलाधारचक्र से सुषुम्ना में विचरण करने लगती है। यही कुंडलिनी जागरण है। यह भी एक गोपनीय विषय है जिस पर इससे अधिक सार्वजनिक चर्चा नहीं की जा सकती। यहाँ वही लिखेंगे जिसकी हमें अनुमति है।
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जिस ज्योतिर्मय ब्रह्म का हम ध्यान करते हैं, वह ज्योति जब सहस्त्रारचक्र में प्रकट होती है तब उसके ध्यान को श्रीगुरुचरणों का ध्यान कहते हैं। सहस्त्रार में स्थिति ही श्रीगुरुचरणों में आश्रय है। सहस्त्रार में श्रीगुरुचरण रूपी ज्योति का ध्यान करते करते एक दिन हमें अनंतता की अनुभूति होने लगती है। तब से हमें अनंतता के विस्तार का ही ध्यान करना चाहिए। हम स्वयं वह अनंतता हैं, यह भौतिक शरीर नहीं। उस अनंतता का ध्यान करते करते एक दिन हम पाएंगे कि हम ब्रह्मरंध्र के मार्ग से इस भौतिक शरीर से बाहर आ गए हैं। यह हमारा सूक्ष्म जगत में प्रवेश है।
स्वयं को इस शरीर से बाहर जब पायें तब ध्यान कूटस्थ ज्योति पर ही रहे। कूटस्थ ज्योति तब अनंताकाश से भी बहुत ऊपर यानि अनंतता से भी बहुत परे दिखाई देगी। स्वयं की पृथकता के बोध को उसमें समर्पित करें। उसका आलोक अपने लौकिक सूर्य से भी अधिक होगा। अपने सूर्य का आलोक बहुत उष्ण है जबकी कूटस्थ सूर्य का आलोक बहुत सुहावना होता है।
वहाँ के बारे में अब इस समय अधिक नहीं लिखूँगा क्योंकि मैं एक अकिंचन साधक मात्र हूँ, कोई सिद्ध नहीं। सूक्ष्म जगत की मुझे बहुत अनुभूतियाँ हैं, लेकिन इस समय लिखने की अनुमति नहीं है। जब भी कभी अनुमति होगी तब लिखूँगा।
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मेरा समर्पण परमशिव को है। उन से मैं प्रार्थना करता हूँ कि वे मुझे अपने साथ एक बनाकर ही रखें। कहीं कोई पृथकता नहीं हो। यह सारा जीवन परमशिव की उपासना में ही व्यतीत हो जाए। अभी तो कोई अभिलाषा नहीं है, भविष्य में भी कभी किसी आकांक्षा का जन्म न हो। सभी का मंगल हो। ॐ स्वस्ति !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ फरवरी २०२३
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