Wednesday, 29 July 2026

विराट पुरुष का ध्यान ---

विराट पुरुष का ध्यान : -- समस्त सृष्टि की, और उस से भी परे की, यह विराट अनंतता -- हमारा शरीर है। ये सारी आकाश-गंगाएँ, अपने ग्रहों-उपग्रहों सहित सारे नक्षत्र, हमारी ही विराट देह के भाग हैं। हम यह विराट-पुरुष हैं, कोई भौतिक देह नहीं। उसी विराट-पुरुष का सदा गुरु प्रदत्त विधि से ध्यान करो, उसी की उपासना करो, और उसी में स्थित रहो।

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हंसः योग (अजपा-जप) करते रहो। कुंभक की अवधि में विराट-पुरुष का और भी गहरा ध्यान करो। फिर अनाहत नाद के रूप में प्रणव की ध्वनि के साथ निदिध्यासन करते रहो। अपनी चेतना को भौतिक देह से जितने अधिक समय तक हो सके बाहर ही रखो। बीच बीच में अपने भौतिक शरीर को भी देख लो और यह भाव करो की में यह भौतिक शरीर नहीं, विराट पुरुष हूँ।
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घनीभूत प्राण-ऊर्जा (कुंडलिनी) जागृत हो जाये तो उसे बार-बार परमशिव को अर्पित करते रहो। इस विराटता से परे का अस्तित्व "परमशिव" है। पूर्ण रूपेण परमशिव को समर्पित होकर उनसे एकाकार होना ही हमारी उपासना का लक्ष्य है। साधनाकाल में ब्रह्मचर्य (ब्रह्म जैसे आचार-विचार) अपेक्षित हैं।
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"ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शन्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च॥ ॐ नमः शिवाय !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
३० जुलाई २०२२

आने वाली हरियाली तीज की समस्त श्रद्धालु हिन्दू मातृशक्ति को मंगलमय शुभ कामनाएँ और अभिनंदन ---

 आने वाली हरियाली तीज की समस्त श्रद्धालु हिन्दू मातृशक्ति को मंगलमय शुभ कामनाएँ और अभिनंदन ---

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श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया, तदानुसार रविवार ३१ जुलाई २०२२ को हरियाली तीज का पर्व है जो पूरे राजस्थान और आसपास के क्षेत्रों में, और पूरे भारत में आप्रवासी राजस्थानी महिलाओं द्वारा बहुत श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है। कल द्वितीया यानि ३० जुलाई २०२२ के दिन सिंजारा है। इन पर्वों पर भारत की समस्त मातृशक्ति को हार्दिक अभिनन्दन और शुभ कामनाएँ।
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सभी माताएँ, बहिनें और बेटियाँ मेंहदी अवश्य मंडवाएँ। यदि घर के आसपास सुविधा हो तो झूला भी खूब झूलें। किसी नीम के पेड़ की मोटी डाल पर मोटी मजबूत रस्सी से झूला बंधवायें, और झूले पर बैठने के लिए खाती (बढ़ई) से लकड़ी का एक पाटा बनवा लें। उस पर बैठकर या खड़े होकर अकेले या जोड़े से खूब झूला झूलें -- इसे मारवाड़ी भाषा में पील मचकाना बोलते हैं। घर पर महिलाएं ही मिलकर सामूहिक नृत्य भी खूब करें। नवविवाहित महिलाएँ अपने मायके जाकर यह त्योहार मनाएँ।
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जिन लड़कियों की सगाई हो जाती है, उन्हें अपने होने वाले सास-ससुर से दूज के दिन सिंजारा मिलता है। इसमें मेहँदी, लाख की चूड़ियाँ, कपड़े (लहरिया), मिठाई - विशेषकर घेवर शामिल होता है।
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विवाहित महिलाओं को भी अपने पति, रिश्तेदारों एवं सास-ससुर से उपहार मिलते हैं। पुरुषों को चाहिए कि वे घर की महिलाओं को उनकी मनपसंद मिठाई आदि अवश्य खिलाएँ।
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महिलाओं के मुँह से सामूहिक मंगल गीत बहुत मधुर लगते हैं। राजस्थान में तीज के त्यौहार का विशेष महत्व है। जयपुर में तो यह त्यौहार बड़ी ही धूम-धाम से मनाया जाता है व राजस्थान के सभी नगरों में तीज की सवारी निकाली जाती है। हर स्थान पर एक सांस्कृतिक वातावरण हो जाता है। अपनी संस्कृति और गौरव को ना भूलें।
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मान्यता है कि भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने बहुत कठोर तप किया था। जब भगवान शिव ने देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया, तभी से इस व्रत का आरंभ हुआ। तीज माता के रूप में पार्वती की आराधना होती है।
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जय सनातन भारतीय संस्कृति, जय सनातन धर्म, जय माँ भारती॥
कृपा शंकर
२९ जुलाई २०२२

एकमात्र कर्ता भगवान स्वयं हैं।

 साधना में कर्ताभाव कभी भी नहीं आना चाहिए ---

एकमात्र कर्ता भगवान स्वयं हैं। हम तो एक साक्षी निमित्त मात्र हैं। अपनी साधना वे स्वयं कर रहे हैं। हमारे माध्यम से साँसें भी वे ही ले रहे हैं। हमारी हर गतिविधि के पीछे वे स्वयं हैं। हर समय उनका स्मरण रहे। गीता में भगवान कहते हैं --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् - इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
ॐ तत्सत् !!
२९ सितंबर २०२३

जब तक मैं इस देह की चेतना में हूँ, तब तक एक विदेशी भूमि में अजनबी हूँ ---

 जब तक मैं इस देह की चेतना में हूँ, तब तक एक विदेशी भूमि में अजनबी हूँ। मेरा वास्तविक निवास परमात्मा की सर्वव्यापकता है। मैं यह शरीर नहीं, शाश्वत आत्मा हूँ, जिसने अपने कर्मफलों को भोगने के लिए यह जन्म लिया है। जिस दिन ये प्रारब्ध कर्म कट जाएँगे, उस दिन यह शरीर भी अपने आप ही छूट जाएगा। इस भव-सागर में अमृत और विष दोनों साथ-साथ हैं। मंथन का अधिकार प्रभु ने हम को ही दिया है। हम विषपान करें या अमृतपान -- यह हमारी ही स्वतंत्र इच्छा पर निर्भर है। प्रकृति हमें उसी के अनुसार फल देती है। प्रभु ने हमें विवेक दिया है, ताकि हम उचित निर्णय ले सकें।

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मेरे जीवन का लक्ष्य परमशिव (ब्रह्म) को व्यक्त करना है। यही मेरा स्वधर्म है। हर कार्य के कर्ता और भोक्ता -- भगवान स्वयं हैं। मैं तो एक निमित्त-मात्र, उनकी पूर्णता, परमप्रेम, व आनंद हूँ। मेरे आदर्श भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण हैं। वेदवाक्य ही मेरे लिए अंतिम प्रमाण हैं। लौकिक रूप से मैं सनातनी हिन्दू ब्राह्मण हूँ। विधिवत रूप से मेरा शास्त्रों का कोई अध्ययन नहीं है, लेकिन जितना आवश्यक है, उतने का ज्ञान भगवान की कृपा से है।
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प्रातःकाल मैं जब उठता हूँ, तब भगवान श्रीकृष्ण की चेतना में ही उठता हूँ। उठते ही उनका ध्यान करना पड़ता है। पूरे दिन उनकी स्मृति बनी रहती है। ऐसा लगता है कि वे निरंतर मेरे साथ हैं। एक क्षण के लिए भी वे दूर नहीं होते। हृदय प्रेम से भरा रहता है। रात्री को भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान किये बिना नींद नहीं आती। उनका ध्यान करना ही पड़ता है। भगवान ही यह जीवन जी रहे हैं, मैं नहीं। जब भगवान स्वयं ही यह जीवन हैं, तब किसी से कुछ भी अपेक्षा नहीं है।
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ जुलाई २०२३

Tuesday, 28 July 2026

भगवान की उपासना ---

 भगवान की उपासना ---

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भगवान की "उपासना" पूर्ण भक्तिपूर्वक "जपयोग" से आरंभ करनी चाहिए। "जप" करते-करते "निदिध्यासन" अपने आप होने लगता है। "निदिध्यासन" करते-करते "ध्यान" भी अपने आप ही लग जाता है। "ध्यान" के लिए अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता। सीधे ही जब "ध्यान" करने का प्रयास करते हैं, तब "विक्षेप" आये बिना नहीं रहता। माया के दो ही अस्त्र हैं -- "आवरण" और "विक्षेप", जिनसे वह संसार को भटकाती है। आवरण है "अज्ञान", और विक्षेप है "भटकाव"।
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एक सामान्य साधक के हृदय में जब भगवान के प्रति "परमप्रेम" (भक्ति) जागृत हो, तब उसे भगवान के भौतिक या मानसिक साकार विग्रह के समक्ष खूब नाम "जप" करना चाहिए। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है --
"महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥१०::२५॥"
अर्थात् -- " मैं महर्षियों में भृगु और वाणी (शब्दों) में एकाक्षर ओंकार हूँ। मैं यज्ञों में जपयज्ञ और स्थावरों (अचलों) में हिमालय हूँ॥"
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नाम "जप" करते-करते "निदिध्यासन" होने लगता है, जो "उपासना" का सबसे अधिक प्रभावशाली अंग है जिसके बिना "भक्ति" क्षीण होने लगती है। जब एक बर्तन से दूसरे बर्तन में तेल डालते हैं, तब तेल की धार खंडित नहीं होती। उसी तेल की धार की तरह अखंड अविछिन्न रूप से भगवान के स्मरण, चिंतन, मनन और श्रवण को "निदिध्यासन" कहते हैं।
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"भक्ति" शब्द का एकमात्र अर्थ -- "भगवान से परम प्रेम" है। कोई दूसरा अर्थ नहीं है। भक्ति में कोई शर्त या माँग नहीं होती, सिर्फ समर्पण होता है। भगवान एक अनुभूति है, जिन्हें शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। विष्णु-पुराण में ही एक स्थान पर "भगवान" को परिभाषित किया गया है, जिसकी व्याख्या अनेक स्वनामधान्य महान आचार्यों ने की है। जब भगवान से प्रेम होता है, तब सारे सिद्धांत गौण हो जाते हैं। भगवान सब सिद्धांतों से ऊपर हैं, और किसी भी सिद्धांत के बंधन में नहीं हैं। परमात्मा को पाने का मार्ग बताकर उनकी अनुभूति करा देना सद्गुरु का काम है। शिष्य को भी शिष्यत्व की पात्रता विकसित करनी पड़ती है, अन्यथा सद्गुरु भी कोई सहायता नहीं कर सकता।
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भगवान के समीप बैठना, उनकी "उपासना" है। स्वयं की पृथकता के बोध को भूलकर सिर्फ परमात्मा की चेतना में स्थिति "ध्यान" है। गीता में बताई हुई समत्व में स्थिति का नाम "समाधि" है। भगवान से जब परमप्रेम होता है, तब सारे द्वार स्वतः ही खुल जाते है, कहीं कोई अंधकार नहीं रहता, सारे दीप अपने आप जल जाते हैं। सारा "ज्ञान" भी स्वतः ही प्राप्त हो जाता है, और सारे गुण भी पीछे-पीछे चलने लगते हैं।
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हो सकता है कि आध्यात्मिक साधना पर यह मेरा अंतिम लेख हो। अब मेरे इस शरीर-महाराज की क्षमता बहुत कम हो गई है, और निरंतर कम होती जा रही है। इससे अधिक लिखना अब संभव नहीं होगा। इस शरीर महाराज को धन्यवाद देता हूँ, कि इस जीवन की लोकयात्रा में इसने मेरा बहुत अच्छा साथ दिया है। इस संसार में मेरा परिचय इस शरीर-महाराज के रूप में ही है। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं एक नित्य-मुक्त-शाश्वत् आत्मा हूँ, जिसका एकमात्र शाश्वत संबंध सिर्फ परमात्मा से है।
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इस छल-कपट और झूठ से भरे संसार में रहने की अब और जरा सी भी रुचि नहीं रही है। इससे अधिक लिखना अब संभव नहीं होगा। मैं अकेला हूँ, कोई सहायक साथी भी नहीं है; और स्वयं साक्षात् परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी का कोई सहारा/आश्रय नहीं है। भगवान की परम कृपा है कि वे हर समय मेरे साथ रहते हैं, एक क्षण के लिए भी साथ नहीं छोड़ते। उन्हें भी मुझसे प्रेम हो गया है।
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आप सभी महान आत्माओं को नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२८ जुलाई २०२२

भगवान के बिना भी हमारा काम चल रहा है। हमें भगवान की क्या व क्यों आवश्यकता है? .

 भगवान के बिना भी हमारा काम चल रहा है। हमें भगवान की क्या व क्यों आवश्यकता है?

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उपरोक्त विषय पर मैं आप के विचार जानना चाहता हूँ। विश्व के घोर नास्तिक मार्क्सवादियों के विचार मैंने पढ़े हैं।
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भारत में कुछ वर्ष पहिले तक हिन्दी भाषा में "सरिता" नामक एक पाक्षिक पत्रिका निकलती थी जिसके सम्पादकीय और मुख्य लेख सनातन हिन्दू धर्म के घोर विरोध में लिखे जाते थे। उस पत्रिका को खोलते ही मुख्य लेख वेदों की निंदा, रामचरितमानस की निंदा, और सारे सनातनी हिन्दू रीति-रिवाजों की निंदा से भरे होते थे। कुछ रोचक कहानियाँ, और अन्य रोचक सामग्री भी होती थी। आश्चर्य की बात यह है की उस पत्रिका के पाठक भी सब हिन्दू ही होते थे। उस पत्रिका ने हिन्दू धर्म की बहुत अधिक हानि की। बहुत बड़ी संख्या में असंख्य हिन्दू उसे पढ़कर नास्तिक और धर्मद्रोही हो गए थे।
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जब मार्क्सवाद अपने चरम शिखर पर था, उस काल में और उसके बाद में भी मैंने कई मार्क्सवादी देशों का भ्रमण किया है, जहाँ ईश्वर की आराधना की सजा मृत्युदंड थी। वहाँ के लोगों का खोखला जीवन भी देखा है। अनेक मुस्लिम और ईसाई देशों का भ्रमण भी मैंने किया है और उनका खोखला जीवन भी देखा है।
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इन सब अनुभवों के पश्चात मेरे निजी व्यक्तिगत जीवन का केन्द्रबिन्दु तो भगवान हो गए हैं। सोशियल मीडिया पर मैं भगवान के बारे में कुछ लिख देता हूँ, और बहुत सीमित संख्या में बहुत कम ऐसे मित्र हैं जिन से आध्यात्मिक विषयों पर कुछ चर्चा हो जाती है। लेकिन भारत में ही आम आदमी से भगवान की चर्चा करना बड़ा खतरनाक है। किसी से भगवान की बात कर लो तो वह व्यक्ति बड़ा आक्रामक हो जाता है, और खाने को आता है।
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कहने को तो भारत एक धर्म-प्रधान देश है लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से ऐसा कुछ नहीं है। वर्तमान शिक्षा पद्धति के कारण ईसाई मूल्यों का प्रभाव बहुत अधिक है। भगवान के साथ व्यापार अधिक है और भक्ति बहुत कम है। धन्य हैं अनेक हिन्दू धर्म-प्रचारक जो हर तरह के असहयोग के पश्चात भी अपने धर्म पर अडिग हैं।
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कृपया अपने विचार बताने की कृपा करें की हमें भगवान की क्या व क्यों आवश्यकता है? क्या भगवान के बिना हमारा काम नहीं चल सकता?
धन्यवाद और मंगलमय शुभ कामनाएँ।
२८ जुलाई २०२३

"कोई भी कामना हमारी अभिलाषा का विषय न हो" >>>

 जब मैं स्वयं के व्यक्तित्व का अवलोकन करता हूँ तब स्वयं में अपूर्णता ही अपूर्णता पाता हूँ। पूर्णता सिर्फ परमात्मा में है। उस पूर्णता को पाने के लिए ही हमें परमात्मा की आवश्यकता है। अपूर्णता बड़ी दुःखदायी है। इसे दूर करने का जो उपाय भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के छठे अध्याय में बताया है वह देखने में तो बड़ा कठिन है, लेकिन उसका कोई विकल्प नहीं है। भगवान हमें सब कामनाओं से निःस्पृह होकर अपने ही स्वरूप में स्थित होने को कहते हैं --

"यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥६:१८॥"
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हमें बाह्य चिन्तन को छोड़कर केवल आत्मा में ही स्थित रहने का आदेश भगवान देते हैं। आत्मा में स्थित होने की पात्रता तभी आती है जब हम सब भोगों की लालसा से निःस्पृह यानि निष्काम हों। तृष्णाओं के नष्ट होने पर ही चित्त निष्काम होकर आत्मा में स्थिर होता है। फिर कोई विक्षेप नहीं आता। भगवान "सर्वकामेभ्यो निःस्पृहः" होने को कहते हैं, अर्थात् कोई भी कामना हमारी अभिलाषा का विषय न हो।
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भगवान आगे कहते हैं --
"यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥६:१९॥"
इसका भावार्थ होगा कि जैसे वायुरहित स्थान में रखे हुये दीपक की लौ विचलित नहीं होती, वैसी ही हमारे चित्त की गति हो।
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हे प्रभु, आपकी जय हो। मैं कभी तत्व से विचलित न होऊँ, सदा निरंतर आप में स्थित रहूँ, और विषय-वासनाओं का चिंतन भूल से भी न हो।
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"नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये,
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा |
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे,
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ||"
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !!
कृपा शंकर
२८ जुलाई २०२३