जो उपासना परमप्रेम (भक्ति) जागृत कर, परमात्मा का बोध और परमात्मा में स्थिति कराती है, वही उपासना सार्थक है, अन्य सब भटकाव हैं।
हमारे हृदय में और दृष्टिपथ में परमात्मा नहीं है तो हम गलत मार्ग पर अग्रसर हैं। हर क्षण परमात्मा हमारे साथ हों, कभी भी उनसे दूरी न हो।
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दूसरों को दुःख और पीड़ा देने के विचार यदि हमारे मन में हैं तो अनजाने में हम स्वयं के लिए ही दुःख और पीड़ाओं के बीज बो रहे हैं। ये बीज ही वृक्ष बनकर हमारे संचित कर्मों में जुड़ जायेंगे जिनका फल भुगतने के लिए हम बाध्य होंगे।
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शाश्वत सनातन सत्य यह है कि भारत एक आध्यात्मिक सत्यनिष्ठ धर्मावलम्बी हिन्दू राष्ट्र है। हम सब निःस्वार्थ, निर्भीक, पवित्र और ईश्वरीय चेतना से युक्त हों। देवासुर संग्राम हर युग में सदा होते रहे हैं। निश्चित रूप से भारत विजयी होगा।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२ अगस्त २०२२
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पुनश्च :-- यहाँ उपासना का अर्थ है --- आराधना, प्रार्थना, अर्चना, कीर्तन, पूजन, वंदन, भजन, बंदगी, इबादत, आदि।
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