Friday, 26 June 2026

परमात्मा की एक शक्ति है जिसने इस सम्पूर्ण सृष्टि को धारण कर रखा है, प्राण रूप में समस्त चैतन्य वे स्वयं हैं, उपासना उन्हीं की करें ---

परमात्मा की एक शक्ति है जिसने इस सम्पूर्ण सृष्टि को धारण कर रखा है, प्राण रूप में समस्त चैतन्य वे स्वयं हैं। उपासना उन्हीं की करें। ऐसे ही परमात्मा का एक परम ज्योतिर्मय रूप है जो हमारे भीतर के तमस को दूर करता है, उसी का ध्यान करें, और उसी को जीवन में अवतरित करें। परमात्मा से कुछ भी नहीं मांगें, अपितु अपना सम्पूर्ण अस्तित्व उन्हें समर्पित कर दें।
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मेरे पास बहुत सारे व्हाट्सऐप आये हुए हैं। सभी को बिना पढ़े ही डिलीट कर रहा हूँ। मुझे आपसे कोई अन्य अपेक्षा नहीं है। एक ही प्रार्थना है जो ऊपर लिख चुका हूँ। दुबारा लिख रहा हूँ कि "उसी शक्ति की उपासना करें, जिसने इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड को धारण कर चैतन्य बना रखा है। परमात्मा के उसी परम ज्योतिर्मय रूप का ध्यान करें जो आपके गहन तमस को दूर कर रहा है।"
आप निश्चिंत रहें, मैं आपसे कभी कुछ भी नहीं माँगूँगा, मैं कोई मांगतोड़ा मंगता-भिखारी नहीं, परमात्मा का अमृतपुत्र हूँ, जो अपनी चेतना में परमात्मा के साथ एक है।
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ॐ शिव॥
कृपा शंकर
१८ जून २०२६
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"मांगतोड़ा" शब्द का अर्थ -- राजस्थान में मांगतोड़ा या मांगतोड़ उस व्यक्ति को कहते हैं जो दूसरों से हमेशा कुछ-न-कुछ मांगने की आदत रखता है। जब कोई व्यक्ति बार-बार लोगों से कुछ न कुछ मांगता रहता है, उसे मांगतोड़ा या मांगतोड़ कहा जाता है। ऐसे ही परमात्मा का एक परम ज्योतिर्मय रूप है जो हमारे भीतर के तमस को दूर करता है, उसी का ध्यान करें, और उसी को जीवन में अवतरित करें। परमात्मा से कुछ भी नहीं मांगें, अपितु अपना सम्पूर्ण अस्तित्व उन्हें समर्पित कर दें।

ईश्वर को प्रसन्न करने का एकमात्र मार्ग ---

 ईश्वर को प्रसन्न करने का एकमात्र मार्ग ---

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हमारा हर विचार श्रेष्ठ और पवित्र हो, क्योंकि हमारे विचार ही हमारे कर्म हैं, जिनका फल मिले बिना नहीं रहता। इससे अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है। जैसा हम सोचेंगे, वैसा ही वही कई गुणा बढ़कर हमें मिलेगा। हमारे विचार सदा पवित्र हों। यह बात मैं चुनौती देकर डंके की चोट कह रहा हूँ। यह सृष्टि का अटल नियम और परम सत्य है।
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर / १९ जून २०२६
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पुनश्च: एक महात्मा जी और एक वेश्या -- दोनों पड़ोसी थे। महात्मा जी दिन-रात उस वेश्या के बारे सोचते थे, और वह वेश्या दिन-रात परमात्मा का चिंतन करती थी। संयोग से दोनों की मृत्यु एक साथ हुई। मरणोपरांत उस वेश्या को स्वर्ग की ओर ले जाया जाने लगा, और महात्मा जी को नर्क की ओर। महात्मा जी ने बहुत विरोध किया और यमदूतों को यहाँ तक कह दिया कि तुम लोग इधर का माल उधर, और उधर का माल इधर कर रहे हो। यमदूतों ने कहा कि हम लोग कोई भूल नहीं करते।
हम लोग कितना भी दान-पुण्य और तप कर लें, लेकिन यदि हमारे विचार सही नहीं है, तो हमारी तपस्या निष्फल है।

नित्य नियमित ध्यान-साधना बहुत अधिक आवश्यक है ---

 नित्य नियमित ध्यान-साधना बहुत अधिक आवश्यक है ---

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श्रीमद्भगवद्गीता का स्वाध्याय हमें सिखाता है कि हमारा निर्माण हमारे विचारों से ही होता है। हमारे विचार हर समय सकारात्मक, शांत, कर्तव्यनिष्ठ, और अनासक्त होने चाहिए। हमारा मन ही हमारे बंधन और मुक्ति का कारण है। हमारे विचारों में स्थिरता, समभाव और ईश्वर में अटूट विश्वास का होना अत्यंत आवश्यक है। हमारे विचार ऐसे हों जो सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय में सदा संतुलित और स्थिर रहें। चंचल मन को साधना बहुत आवश्यक है। अनुशासित मन सबसे बड़ा मित्र होता है, जबकि अनियंत्रित मन सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है। समभाव में स्थिति का अर्थ है सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय जैसी विपरीत परिस्थितियों में मन को स्थिर और शांत रखना। यह सब तभी संभव है जब हम नित्य नियमित रूप से परमात्मा का ध्यान करें।
२० जून २०२६

२१ जून को ही भारत में योग-दिवस क्यों मनाया जाता है ?

 २१ जून को ही भारत में योग-दिवस क्यों मनाया जाता है ?

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आज २१ जून का दिन हमारी पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध (जहाँ भारत स्थित है) का सबसे लंबा यानी बड़ा दिन है, वहीं दक्षिणी गोलार्ध का सबसे छोटा दिन है। उत्तरी गोलार्ध में इसे ग्रीष्म संक्रांति (Summer Solstice) कहा जाता है। आने वाले कल से दिन क्रमशः छोटे होते जायेंगे। इसीलिए भारत सरकार ने आज के दिन को विश्व योग दिवस मनाने की परंपरा आरंभ की है। उत्तरी गोलार्ध में आज के दिन सूर्य की किरणें पृथ्वी पर सबसे अधिक समय तक पड़ती हैं, जिससे दिन की अवधि लगभग १३ से १४ घंटों तक की होती है। इसके विपरीत, २१ दिसंबर को वर्ष का सबसे छोटा दिन, और सबसे बड़ी रात होगी।
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झुंझुनूं नगर में जहाँ मैं रहता हूँ, आज प्रातः ६.३० बजे से स्वर्ण-जयंती स्टेडियम में सार्वजनिक योग अभ्यास का बड़ा भव्य कार्यक्रम जिला प्रशासन की ओर से हुआ। योगाचार्य पवन सैनी के नेतृत्व में हजारों लोगों ने योगाभ्यास भारत सरकार के प्रोटोकॉल के अनुसार किया। बड़ा भव्य कार्यक्रम था, कोई कमी नहीं थी।

अति निकट भविष्य में भारत एक सतोगुण प्रधान अति पराक्रमी देश होगा, जहाँ असत्य के अंधकार का कोई अवशेष नहीं रहेगा।

 अति निकट भविष्य में भारत एक सतोगुण प्रधान अति पराक्रमी देश होगा, जहाँ असत्य के अंधकार का कोई अवशेष नहीं रहेगा। ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति सभी के जीवन में होगी। हमारी सारी आध्यात्मिक साधना इसी उद्देश्य के लिए है। हमारा उच्चतम दायित्व परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण है। सबसे बड़ी सेवा जो हम समाज, राष्ट्र और दूसरों के लिए कर सकते हैं, वह है परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण। जिस प्रकार एक इंजन अपने ड्राइवर के हाथों में सब कुछ सौंप देता है, एक विमान अपने पायलट के हाथों में सब कुछ सौंप देता है वैसे ही हम चाहते हैं कि हमारी अपनी सम्पूर्ण सत्ता परमात्मा के हाथों में हो। ॐ तत् सत् !!

कृपा शंकर २१ जून २०२६

भगवान के वास्तविक भक्त केवल वर्तमान में जीते हैं। उनका भूतकाल से कोई संबंध नहीं होता।

 भगवान के वास्तविक भक्त केवल वर्तमान में जीते हैं। उनका भूतकाल से कोई संबंध नहीं होता।

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अनेक हिन्दू ग्रन्थों का स्वाध्याय करने के उपरांत जो मुझे समझ में आया, उसे सार रूप में यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ --- "चिंतन पुरुषार्थ का करो, न कि विगत कर्मों का। पुरुषार्थ करो, तप करो, जीवन में पवित्रता लाओ, एकाग्रता और ध्यान का अभ्यास करो। भूतकाल से तुम्हारा कोई संबंध नहीं है। तुम वही हो जो वर्तमान में हो। भाग्यवादी मत बनो। जड़ता का परित्याग करो। निर्भय रहो, और प्रणव का निरंतर जप करो। लोभ और अहंकार ही हमारे पतन का एकमात्र कारण हैं। सब तरह की आकांक्षाओं से हमें मुक्त होना ही पड़ेगा।"
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ऊपर जो अपने अनुभवों का सार लिखा है, वह सत्य है। अनेक गोपनीय रहस्य मेरे समक्ष अनावृत हुए हैं, जो व्यक्तिगत हैं, किसी अन्य को बताए नहीं जा सकते। जब तक संतुष्टि न मिले, तब तक भगवान का खूब ध्यान करें। उन्हें अपनी स्मृति में हर समय रखें। जब भी समय मिले भगवान का स्मरण, चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करें। गीता में भगवान कहते हैं --
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् -- जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् -- इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
अर्थात् -- हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥
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प्रार्थना ---
"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥११:३८॥"
"वायुर्यमोग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च
नमो नमस्तेस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोपि नमो नमस्ते॥११:३९॥"
"नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥" (गीता)
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ जून २०२६

ईश्वर से ईश्वर के अतिरिक्त हमें कुछ अन्य चाहिए ही नहीं ---

 ईश्वर से ईश्वर के अतिरिक्त हमें कुछ अन्य चाहिए ही नहीं ---

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जिस समय हम परमात्मा का चिंतन करते हैं, उस समय हमारा कोई पृथक अस्तित्व नहीं रहता। जहाँ कोई अन्य है ही नहीं, वहाँ कैसा एकांत? जब तक स्वयं का पृथक अस्तित्व है, तब तक वहाँ ईश्वर नहीं है। भगवान हमें अनन्य भाव से भक्ति करने को कहते हैं। जहाँ कोई अन्य नहीं है, वहीं अनन्य भक्ति है। यह अनन्य भाव ही कैवल्य है। स्वयं की पृथकता के बोध को भी मिटाना पड़ता है, ईश्वर से पृथक किसी भी अन्य कामना को गीता में भगवान ने "व्यभिचार" की संज्ञा दी है। वे हमसे अव्यभिचारिणी भक्ति मांगते हैं।
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जब तक हम स्वयं को यह भौतिक शरीर यानि देह मानते हैं,और इसी के सुख के लिए सब कुछ करते हैं, तब तक हम भगवान से दूर हैं। यह शरीर एक साधन मात्र है, और कुछ भी नहीं।
ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
२२ जून २०२६