Friday, 26 June 2026

आपसे दिल लगाकर देख लिया। अब देखने को और कुछ भी नहीं बचा है।

 आपसे दिल लगाकर देख लिया। अब देखने को और कुछ भी नहीं बचा है।

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मेरे जीवन में अंधकार है, तो इसका एकमात्र कारण मेरा तमोगुण है। मेरे जीवन में प्रकाश है, तो वह सतोगुण से है। और मेरे जीवन में यदि कर्मठता है, तो वह रजोगुण से है। मुझे निमित्त बनाकर सब कुछ जब परमात्मा स्वयं कर रहे हैं, तो मेरे लिए उन को समर्पित होने से अतिरिक्त अन्य कुछ भी करने योग्य नहीं है।
उनके त्रिगुणात्मक संसार से मैंने दिल लगाकर देख लिया है, जिससे निराशा, छल-कपट और धोखा ही धोखा मिला। अब देखने को और कुछ भी नहीं बचा है।
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भगवान हमें सतोगुण, रजोगुण, और तमोगुण, इन तीनों गुणों से परे जाने को कहते हैं --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥२:४५॥"
अर्थात् -- हे अर्जुन, वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है, तुम त्रिगुणातीत, निर्द्वन्द्व, नित्य सत्त्व (शुद्धता) में स्थित, योगक्षेम से रहित, और आत्मवान् बनो॥
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भगवान हमें "निस्त्रेगुण्य" (त्रिगुणातीत) होने को कहते हैं, लेकिन यह भी बता रहे हैं कि उसके लिये पहले हमें "निर्द्वन्द्व" "नित्यसत्त्वस्थ" "निर्योगक्षेम" और "आत्मवान्' होना होगा।
आचार्य शंकर ने अपने भाष्य में इनका अर्थ इस तरह किया है --
(१) निर्द्वंद्व -- सुख-दुःखके हेतु जो परस्पर विरोधी (युग्म) पदार्थ हैं उनका नाम द्वन्द्व है, उनसे रहित होना होगा।
(२) नित्यसत्त्वस्थ -- का अर्थ है कि सदा सत्त्वगुण के आश्रित हों।
(३) निर्योगक्षेम -- अप्राप्त वस्तु को प्राप्त करने का नाम योग है, और प्राप्त वस्तु के रक्षण का नाम क्षेम है। योगक्षेम को प्रधान मानने वाले की कल्याण मार्ग में प्रवृत्ति होनी अत्यन्त कठिन है, अतः तू योगक्षेम को न चाहने वाला हो।
(४) आत्मवान् — अर्थात् (आत्मविषयों में) प्रमादरहित हो। तुझ स्वधर्मानुष्ठान में लगे हुए के लिए यह उपदेश है।
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भगवान आगे कहते हैं --
"योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥२:४८॥"
अर्थात् -- हे धनंजय, आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव होकर योग में स्थित हुये तुम कर्म करो। यह समभाव ही योग कहलाता है॥
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आचार्य शंकर ने इस मंत्र की बहुत सुंदर व्याख्या की है। उन्हीं के शब्दों का प्रयोग कर रहा हूँ --
यदि कर्मफल से प्रेरित होकर कर्म नहीं करने चाहियें, तो फिर किस प्रकार करने चाहियें? इस पर भगवान यहाँ प्रकाश डालते हैं -- "ईश्वर मुझ पर प्रसन्न हों", -- इस आशारूप आसक्ति को भी छोड़कर कर कर्म कर। हे धनंजय, योग में स्थित होकर केवल ईश्वर के लिय ही कर्म कर। फलतृष्णारहित पुरुष द्वारा कर्म किये जानेपर अन्तःकरण की शुद्धि से उत्पन्न होनेवाली ज्ञानप्राप्ति तो सिद्धि है, और उससे विपरीत (ज्ञानप्राप्तिका न होना) असिद्धि है। ऐसी सिद्धि और असिद्धि में भी सम होकर अर्थात् दोनोंको तुल्य समझकर कर्म कर।
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वह कौन सा योग है जिसमें स्थित होकर कर्म करने के लिये भगवान ने कहा है --
यही जो सिद्धि और असिद्धि में समत्व है इसीको योग कहते हैं। गीता में कर्म, भक्ति, और ज्ञान -- सिर्फ इन तीन विषयों पर ही भगवान ने उपदेश दिये हैं। इन तीनों विषयों में ही उन्होंने सारे सनातन धर्म को लपेट लिया है। योग का सार है --"समत्व"। इस परिप्रेक्ष्य में समत्व ही योग है, और यह "समत्व" ही गीता का सार है। समत्व में स्थित होकर ही हम निष्त्रैगुण्य यानि त्रिगुणातीत हो सकते हैं। यही जीवन का सार है। भगवान श्रीकृष्ण को "वासुदेव" इसीलिए कहते हैं कि वे सर्वत्र समभाव में स्थित हैं।
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मुझे जैसा समझ में आया, वैसा ही मैंने यहाँ लिख दिया। भगवान की कृपा के अतिरिक्त मुझ में कोई अन्य क्षमता नहीं है। उनकी कृपा पर ही आश्रित हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
२३ जून २०२६
(संशोधित व पुनःप्रस्तुत)

हमारी कोई आयु नहीं हो सकती। हमारा जन्म ही नहीं हुआ तो आयु कैसे हो सकती है?

 वह परिवर्तन हम स्वयं हैं जो विश्व में होते हुए देखना चाहते हैं। अन्धकार का सकारात्मक प्रतिकार निरंतर होते रहना चाहिये। पूरे विश्व में उथल-पुथल हो जाये, या सारा ब्रह्मांड टूट कर बिखर जाये, हमारे ह्रदय में शान्ति बनी रहनी चाहिये। यह तभी संभव है जब हम निरंतर कूटस्थ-चैतन्य यानि ब्राह्मी स्थिति में रहें। परमात्मा की शक्ति -- सृष्टि की धारा को बदलने में पूर्णतः सक्षम है। कमी हमीं में है। हम उनका स्मरण नहीं करते, उनके प्रति समर्पित होकर नहीं रहते।

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हमारी कोई आयु नहीं हो सकती। हमारा जन्म ही नहीं हुआ तो आयु कैसे हो सकती है? जन्म तो इस शरीर का हुआ था। हमारा कभी जन्म ही नहीं हुआ।"
"न मे मृत्युशंका न में जातिभेदः
पिता नैव मे नैव माता न जन्मः।
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
अपनी आस्था को अडिग रहने दें। ॐ तत् सत्। ॐ शिव। ॐ स्वस्ति॥
कृपा शंकर
२३ जून २०२६

"अहं ब्रह्मास्मि" यानि मैं ब्रह्म हूँ, या "शिवोहं" यानि मैं शिव हूँ; यह कहना अहंकार नहीं है। अहंकार है स्वयं को यह देह, मन, और बुद्धि समझ लेना।

 "अहं ब्रह्मास्मि" यानि मैं ब्रह्म हूँ, या "शिवोहं" यानि मैं शिव हूँ; यह कहना अहंकार नहीं है। अहंकार है स्वयं को यह देह, मन, और बुद्धि समझ लेना।

अहंकार व ब्रह्मभाव में बहुत अंतर है। सांसारिक बुद्धि के तमोगुण प्रधान लोग, ब्रह्मभाव को अहंकार मानते हैं। ब्राह्मी चेतना से युक्त जब कोई योग साधक "शिवोSहम् शिवोSहम्" या "अहम् ब्रह्मास्मि" कहता है तब यह उसकी अहंकार की यात्रा यानि कोई ego trip नहीं है। यह उसका वास्तविक अंतर्भाव है। आत्मा का धर्म है -- परमात्मा के प्रति अभीप्सा और परम प्रेम। यही हमारा सही धर्म है। और भी आगे बढ़ें तो परमात्मा की सर्वव्यापकता के साथ एक होकर हम कह सकते हैं -- "शिवोंहं शिवोहं" या "अहं ब्रह्मास्मि|"
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शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि को निज स्वरुप समझना ही अहंकार है| वास्तव में 'अहं' केवल सर्वव्यापि आत्म-तत्व का नाम है जिसे हम नहीं समझते इसलिए अपने शरीर, मन और बुद्धि आदि को ही हम स्वयं मान लेते हैं| यही अहंकार है| हम परमात्मा के अंश हैं, परमात्मा के अमृतपुत्र हैं, और सच्चिदानंद के साथ एक हैं| यह होते हुए भी स्वयं को शरीर समझते हैं, यह अहंकार है|
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शरीर के धर्म हैं -- भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी आदि| प्राणों का धर्म है बल आदि| मन का धर्म है राग-द्वेष, मद यानि घमंड आदि| चित्त का धर्म है वासनाएँ आदि| इन सब को अपना समझना अहंकार है|
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आत्मा का धर्म है -- परमात्मा के प्रति अभीप्सा और परम प्रेम| यही हमारा सही धर्म है| और भी आगे बढ़ें तो परमात्मा की सर्वव्यापकता के साथ एक होकर हम कह सकते हैं -- "शिवोंहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि|"
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यह अनुभूति का विषय है, बुद्धि का नहीं, अतः इस विषय पर और अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है| आप सब निजात्माओं में व्यक्त परमात्मा को मेरा नमन|
गुरु ॐ | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | अयमात्मा ब्रह्म |
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् || ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२३ जून २०२१

निर्जला एकादशी, भगवान विष्णु की अनंतता, व ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान --- .

 निर्जला एकादशी, भगवान विष्णु की अनंतता, व ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान ---

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दिनांक २५ जून २०२६ को निर्जला एकादशी है। मेरे लिए तो यह भगवान की निष्काम भक्ति का एक बहाना है। इसके बारे में सारी जानकारी अंतर्जाल, समाचार पत्रों और धार्मिक पुस्तकों में उपलब्ध है। कोई भी संशय हो तो उसका निवारण अपने यहाँ के स्थानीय कर्मकांडी विद्वान पंडित जी से करें। हमारे समाज में तो महिलाओं को सब पता होता है, अतः किसी से कुछ पूछना नहीं पड़ता, सारा काम सहज रूप से समाज की माताओं के निर्देशन में स्वतः ही हो जाता है।
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जब भी आत्म-प्रेरणा मिले नारायण की ज्योतिर्मय अनंतता का ध्यान करते हुए उनमें अपनी चेतना का पूर्ण समर्पण कर दें। ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान आदि से निवृत होकर पूर्व या उत्तर दिशा में मुंह रखते हुए, एक ऊनी आसन पर बैठें। मेरुदण्ड उन्नत, ठुड्डी भूमि के समानान्तर, और दृष्टिपथ भ्रूमध्य की ओर। आवश्यक हो तो नितंबों के नीचे एक पतली गद्दी लगा लें। कुछ देर तक प्राणायाम करें, शरीर को दो-तीन बार तनावग्रस्त और शिथिल करें। एक ज्योति की कल्पना करें जो आपके आज्ञाचक्र से निकलकर सारे ब्रह्मांड में व्याप्त हो गई है। वह ज्योति सम्पूर्ण ब्रह्मांड में है, और सम्पूर्ण ब्रह्मांड उस ज्योति में है। वह ज्योति ही ज्योतिर्मय ब्रह्म है। कुछ महीनों के साधना के पश्चात वह ब्रह्मज्योति स्वतः ही ध्यान में प्रकट होगी। भगवान विष्णु ही यह सम्पूर्ण विश्व बन गए हैं। यह समस्त सृष्टि भगवान विष्णु का अनंत रूप है। सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान भगवान विष्णु की अनंतता का ध्यान है। ध्यान करते करते एक समय ऐसा आएगा जब आपके सहस्त्रारचक्र से ऊपर का आवरण हट जाएगा। उस समय इस शरीर से बाहर निकल जाएँ। भगवान की अनंतता बड़ी आकर्षक है, उस ओर ध्यान न देकर ऊपर उठते ही जाएँ, उठते ही जाएँ, उठते ही जाएँ। ऊपर ही ऊपर एक परम ज्योतिर्मय लोक है, जिसके बारे में गीता के पुरुषोत्तम-योग में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥" (१५:६)
इससे मिलते जुलते मंत्र कठोपनिषद और श्वेताश्वतरोपनिषद में भी हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम-योग का ऊर्ध्वमूल भी यही है।
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जब तक आपकी चेतना यहाँ है, आपकी भौतिक मृत्यु नहीं होगी क्योंकि जब तक प्रारब्ध है, तब तक यह जीवन रहेगा। एक बहुत पतली सी सफेद रंग की डोर के साथ आप अपनी भौतिक देह से भी जुड़े रहोगे।
अपनी साधना का आरंभ अजपा-जप से करें। यह एक वैदिक साधना है जिसे वेदों में हंसवती ऋक कहा गया है। इसे हंस:योग भी कहते हैं। रामचरितमानस में इसके बारे में लिखा है --
"सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥"
(‘वह ब्रह्म मैं हूँ’ यह जो अखंड वृत्ति है, वही ज्ञान दीपक की प्रचंड दीपशिखा है।जब आत्मानुभव के सुख का सुंदर प्रकाश फैलता है, तब संसार के मूल भेद रूपी भ्रम का नाश हो जाता है।)
गुरु की आज्ञा से "सोहं" के स्थान पर "हंसः" मंत्र का जप भी किया जा सकता है। फल उतना ही प्राप्त होता है। गुरु की आज्ञा से श्वास के साथ मैं भी सोहं के स्थान हंसः मंत्र का जप ही करता हूँ।
अजपा जप के पश्चात गीता के आठवें अध्याय में बताई हुई विधि से प्रणव का ध्यान करें। साधना का समापन जपयोग करते हुए करें। तत्पश्चात विश्वशांति और सर्वस्व के कल्याण की प्रार्थना करें। तभी साधना फलीभूत होगी।
ॐ तत् सत् !! ॐ शिव !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२४ जून २०२६
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पुनश्च :--- आज का दिन दान-पुण्य का है। अपनी सीमा में रहते हुए अपनी क्षमतानुसार दान-पुण्य करें।

भारत की वर्तमान समस्याओं का समाधान ---

 भारत की वर्तमान समस्याओं का समाधान ---

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इस विषय पर बड़ी गंभीरता से मैंने चिंतन किया है, और मैं स्पष्ट रूप से इस निर्णय पर पहुंचा हूँ कि भारत की सभी समस्याओं का समाधान सत्य-सनातन-धर्म की दृढ़तापूर्वक पुनः प्रतिष्ठा से ही संभव है। जब तक हमारी आस्था -- पुनर्जन्म, कर्मफल, और आत्मा की शाश्वतता में नहीं होगी, तब तक हमारे राष्ट्रीय चरित्र में कोई सुधार नहीं आ सकता।
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हमारा मूल है सनातन-धर्म, जिसमें हमें दृढ़ता से बापस लौटना ही पड़ेगा। भारत में समाज को प्रेरणा और शक्ति मिलती थी — ब्राह्मणत्व से। भारतीय संस्कृति और दर्शन में ब्राह्मणत्व का अर्थ किसी जाति विशेष से नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के सर्वोच्च चरित्र, ज्ञान, और आध्यात्मिक अवस्था से है। "ब्रह्म" का ज्ञाता जो परम-सत्य परमात्मा को जानता है, ब्राह्मण है। "ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः"। सात्विक आचरण, लोभ, मोह, और अहंकार से मुक्त होकर ज्ञान, सत्य और सदाचार का पालन ही ब्राह्मणत्व है। त्याग, संयम, ज्ञानार्जन, जन-कल्याण और तपस्या को जीवन का मुख्य उद्देश्य मानना -- ब्राह्मणत्व है। उस ब्राह्मणत्व को जागृत किये बिना राष्ट्र प्रगति नहीं कर सकता। यह ब्राह्मणत्व ही समाज का नेतृत्व कर सकता है।
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हमें आवश्यकता है एक ब्रह्म-शक्ति की। ब्रह्म-शक्ति का अर्थ -- "परमब्रह्म परमात्मा की शक्ति" यानि आध्यात्मिक ऊर्जा है। यह इस सृष्टि की सर्वोच्च चेतना है, जो आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त करती है। इसके लिए अनेक साधकों को साधना यानि तपस्या करनी पड़ेगी। यह ब्राह्मणत्व ही भारत की रक्षा कर सकता है, अन्य कुछ भी नहीं। यही हमारी साधना हो।
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"नमस्ते लोकनाथाय नमस्ते सृष्टिकारिणे।
नमस्ते वेदरूपाय नमस्ते ब्रह्मणे नमः॥"
"ॐ वेदात्मने विद्महे, हिरण्यगर्भाय धीमहि, तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात्॥"
ॐ तत् सत्॥ ॐ स्वस्ति॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ जून २०२६
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पुनश्च: --- मैं अब तक लगभग ४५०० छोटे-बड़े आलेख लिख चुका हूँ। और कुछ भी लिखने की इच्छा अब नहीं रही है। बाकी बचा हुआ सारा जीवन परमब्रह्म की ध्यान साधना में ही बीत जाये। जीवन में खूब स्वाध्याय किया है, अब केवल परमात्मा का ध्यान करने की अभीप्सा ही बची है। कोई आकांक्षा नहीं रही है।

शैतान (Devil) और शैतानियत (Evil) क्या है? .....

 शैतान (Devil) और शैतानियत (Evil) क्या है? .....

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एक बात तो मैं पूरे आत्म-विश्वास से कह रहा हूँ कि इब्राहिमी मतों (Abrahamic religions) (इस्लाम, ईसाईयत और यहूदी) में जिसे "शैतान" कहा गया है, वह कोई व्यक्ति नहीं है| इसका किसी प्रेतलोक या पैशाचिक जगत से भी कोई संबंध नहीं है| यह एक विकृत विचार मात्र है जो दूसरों पर दोषारोपण करता है और हमें कामचोर व आलसी बनाता है| इसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी या कोई भी शैतान नहीं है|
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भारत में कभी भी "शैतान" की परिकल्पना नहीं की गई थी| यह विशुद्ध रूप से एक विजातीय शब्द है| इब्राहिमी मतों के अनुसार भगवान सही रास्ते पर ले जाता है पर शैतान गलत रास्ते पर भटका देता है| शैतान का अर्थ लोग लगाते हैं कि वह कोई राक्षस या बाहरी शक्ति है पर यह सत्य नहीं है|
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शैतान शब्द एक बहाना मात्र है .... स्वयं के दोष को छिपाने का और दूसरों पर दोष आरोपित करने का| शैतान एक अतृप्त वासना है जो क्रोध को जन्म देती है, क्रोध बुद्धि का विनाश कर देता है और मनुष्य का पतन हो जाता है| भगवान हमें इस शैतान से बचाए|
कृपा शंकर
२६ जून २०२०

सारी कामनाएँ, सारी अपेक्षाएँ, और सारे विचार -- परमात्मा को समर्पित हैं। हृदय में जब परमात्मा स्वयं बिराजमान हैं, तो उन्हें छोड़कर अन्यत्र कहाँ जाएँ? .

सारी कामनाएँ, सारी अपेक्षाएँ, और सारे विचार -- परमात्मा को समर्पित हैं। हृदय में जब परमात्मा स्वयं बिराजमान हैं, तो उन्हें छोड़कर अन्यत्र कहाँ जाएँ?
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"यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥१०:३९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् - हे अर्जुन ! जो समस्त भूतों की उत्पत्ति का बीज (कारण) है, वह भी में ही हूँ, क्योंकि ऐसा कोई चर और अचर भूत नहीं है, जो मुझसे रहित है॥
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जब सब कुछ परमात्मा ही है तो अब उनके अतिरिक्त अन्य किसी से कोई अपेक्षा भी नहीं रही है। अब किसी भी तरह के परिवाद, निंदा और आलोचना (Complain, Condemn, Criticize) का समय नहीं है। जो भी समय शेष है, उसमें सिर्फ हरिःचिंतन, अन्य कुछ भी नहीं।
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सारी कामनाएँ, सारी अपेक्षाएँ, और सारे विचार -- परमात्मा को समर्पित हैं। हृदय में जब परमात्मा स्वयं बिराजमान हैं, तो उन्हें छोड़कर अन्यत्र कहाँ जाएँ? जो भी बात कहनी है, प्रत्यक्ष परमात्मा से ही कहेंगे। अधिक समय हमारे पास नहीं है।
संसार को, और परमात्मा की समस्त रचना को धन्यवाद और नमस्ते !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ जून २०२४