Monday, 19 December 2016

परमात्मा की अनंतता हमारी भी अनंतता है .......

परमात्मा की अनंतता हमारी भी अनंतता है .......
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"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम् , 
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम् |
एकं नित्यं विमलं अचलं सर्वधी साक्षिभूतम् ,
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गगुरुं तं नमामि ||"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लङ्घयते गिरिं | यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम् ||"
ॐ ॐ ॐ
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जिस तरह आकाश में विचरण करते हुए पक्षियों का कोई पदचिह्न या सुनिश्चित पथ नहीं होता, वे जहाँ पर भी हैं वहीँ से अपने लक्ष्य की ओर निकल पड़ते हैं वैसे ही भगवान के भक्त जहाँ पर भी हैं, वहीँ से अपने लक्ष्य परमात्मा की ओर चल पड़ते हैं| उनकी कोई शर्त नहीं होती| उन्हें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मार्गदर्शन स्वयं परमात्मा से ही प्राप्त होता है| उनका समर्पण सिर्फ और सिर्फ परमात्मा के प्रति होता है| उन्हें आवश्यकता है सिर्फ प्रभु के प्रति अहैतुकी परम प्रेम, गहन अभीप्सा और समर्पण भाव की जो उन्हें प्रभु की अनंतता में प्रवेश करा ही देता है| जब प्रभु के प्रति परम प्रेम होगा तो यम-नियमादी सारे गुण स्वतः ही अपने आप खिंचे चले आते हैं|
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अपनी साधना से पूर्व अपने गुरु और गुरु परम्परा को प्रणाम करें| मेरुदंड उन्नत रहे यानि सीधे बैठें, शिवनेत्र होकर भ्रूमध्य में एक प्रकाश की कल्पना करें और उस प्रकाश को सम्पूर्ण ब्रह्मांड में फैला दें| चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश है, कहीं भी अन्धकार नहीं है| जीभ को भी ऊपर की ओर पीछे मोड़ कर तालू से सटा दें| बिलकुल तनाव मुक्त हो जाएँ| अब यह भाव करें की वह समस्त सर्वव्यापी प्रकाश आप स्वयं ही हैं| सृष्टि में दूर से दूर भी जो प्रकाश है वह भी आप हैं| कुछ नक्षत्र ऐसे भी हैं जिनका प्रकाश लाखों वर्ष पूर्व चला था जिसे पृथ्वी पर पहुँचने में अभी लाखों वर्ष और लग जायेंगे, उनका प्रकाश भी आप ही हैं| दृष्टि बिना तनाव के भ्रूमध्य में ही रहे| बीच में एक-दो बार देह को देख लें और दृढ़ता से यह संकल्प करें कि आप यह देह नहीं हैं| आप परमात्मा की अनंतता हैं, और वह अनंत आकाश ही आपका घर है| सारी सृष्टि आपके अस्तित्व में समाहित है और आप सारी सृष्टि में व्याप्त हैं|
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हर सांस के साथ यह भाव करें कि आप वह सर्वव्यापी प्रकाश हैं| वह प्रकाश ही प्रभु का प्रेम है| आप स्वयं ही वह प्रेम हैं| जब सांस अन्दर जाए तो मानसिक रूप से दीर्घ "सोSSSSS" और सांस बाहर आये तब दीर्घ "हं....." का मानसिक रूप से जप करें| इससे विपरीत भी कर सकते हैं| यह अजपा-जप कहलाता है| जब भी समय मिले और जब भी दोनों नासिकाओं से सांस चल रही हो, इसका अभ्यास करें| यह भाव सदा रखने का अभ्यास करते रहें कि आप वह अनंत आकाश हैं और यथासंभव खूब अजपा-जप का अभ्यास करें|
{अगर नाक में कोई समस्या हो जैसे DNS या Allergy की तो उसका उपचार किसी अच्छे ENT सर्जन से करवा लें| हठयोग में भी नाक से सम्बंधित अनेक क्रियाएँ हैं जो नासिका मार्ग का शोधन करती हैं|}
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गुरुरूप ब्रह्म की परम कृपा से जिनकी कुण्डलिनी जागृत है, वे मेरुदंडस्थ सुषुम्ना नाड़ी में गुरु प्रदत्त बीजमंत्रों के साथ घनीभूत प्राणऊर्जा का मूलाधार से आज्ञाचक्र के मध्य अपनी गुरु परम्परानुसार सचेतन विचरण करें| आज्ञाचक्र योगियों का ह्रदय है| अपनी चेतना को प्रयासपूर्वक सदा आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य उत्तरासुषुम्ना में रखने का अभ्यास करें| वहीँ कूटस्थ में ध्यान करें| जब भ्रूमध्य में कूटस्थ ज्योति के दर्शन होने लगें तब शनेः शनेः उसे भी सहस्त्रार में अपनी चेतना के साथ ले जाएँ| आपकी चेतना आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य में ही रहनी चाहिए| जब नाद की ध्वनी सुने उसे भी सहस्त्रार में ले जाइए| गुरुकृपा से जिनकी उत्तरा सुषुम्ना का द्वार खुल गया है वे उत्तरा सुषुम्ना में ही ध्यान करें|
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गुरुकृपा से ब्रह्मरंध्र में ओंकार का ध्यान करते करते सर्वव्यापकता और भगवान शिव की अनुभूतियाँ होंगी| वहाँ जो ध्वनी सुनती है उसे सुनते रहो और ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ का मानसिक जाप करते रहो| उस ध्वनि की लय से एकाकार हो जाओ|
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जब गुरुकृपा से विस्तार की अनुभूतियाँ होने लगें तब अभ्यास करते करते एक दिन गुरु का स्मरण कर सहस्त्रार से भी ऊपर उठ जाओ और अनंत आकाश में लाखों करोड़ों कोसों ऊपर चले जाओ| फिर लाखों करोड़ों कोसों दूर तक दायें और बाएं हर ओर दशों दिशाओं में फ़ैल जाओ| और धारणा करो कि यह अनंतता आप स्वयं हो| सारी सृष्टि आप में है और आप समस्त सृष्टि में हो| इस अनंतता की सीमा कहीं भी नहीं है पर केंद्र सर्वत्र है, और वह केंद्र स्वयं आप हो| यह गगन मंडल ही आपका घर है और आप स्वयं यह गगन मंडल हैं|
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कभी कभी अजपा-जाप करो, पर अधिकतः शिवस्वरूप ओंकार का ही ध्यान करो| शिव स्वरुप में अपनी स्वयं की आहुति दे दो यानि अपना सर्वस्व उन्हें समर्पित कर दें| अपना कुछ भी न हो, कोइ पृथकता न हो| यह भाव रखो की आप तो हो ही नहीं, सिर्फ भगवान शिव हैं, वे ही साधना कर रहे हैं| इस शिवभाव में दृढ़ता से रहो| साधक साध्य और साधन सब भगवान शिव हैं|
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जब गगन मंडल से मन भर जाए तब बापस अपने ह्रदय यानि आज्ञाचक्र में आ जाओ, और कभी भी बापस अपने घर उस गगन मंडल में चले जाओ| निरंतर शिवरूप गुरु ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ का मानसिक जप करते रहो| भगवान शिव और सारे गुरु आपकी सदा रक्षा और मार्गदर्शन करेंगे|
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जाति, वर्ण, कुल, आदि की चेतना से ऊपर उठो| जैसे विवाह के बाद एक विवाहिता स्त्री की जाति, वर्ण और गौत्र अपने पति का हो जाता है, वैसे ही आपकी जाति, वर्ण और गौत्र वो ही है जो परमात्मा का है| आप परमात्मा के हैं और परमात्मा आपके हैं जो सदा आपके साथ हैं|
ॐ ॐ ॐ |
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लगभग चालीस वर्ष पूर्व गणेशपुरी के स्वामी मुक्तानंद जी की पुस्तक 'चित्तशक्तिविलास' पढी थी जिसमें उन्होंने अपने स्वयं के परलोकगमन आदि के अनुभव लिखे थे, एक नीले नक्षत्र के दर्शन के बारे में भी लिखा था| नीले और श्वेत नक्षत्रों के दर्शन के बारे में अनेक योगियों ने भी लिखा है| स्वामी राम ने भी अनेक दिव्य अनुभव लिखें हैं| एक श्री 'M' ने भी अनेक दिव्य अनुभवों को लिखा है| परमहंस योगानंद ने भी अनेक दिव्य अनुभवों और चमत्कारों के बारे में लिखा है|
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इस बारे में मेरा यह निवेदन है कि हमें अपनी चेतना में इस तरह के अनुभवों की अपेक्षा ही नहीं करनी चाहिए क्योंकि हमारा लक्ष्य परमात्मा है, ये अनुभव नहीं| अपने अनुभव अपने गुरु या गुरुपरंपरा के किसी उन्नत संत के अतिरिक्त अन्य किसी से भी साझा नहीं करने चाहियें|
वैसे सभी उन्नत साधकों को अनेक चमत्कार और दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं पर उनकी परवाह नहीं करनी चाहिए| नीले और सफ़ेद सूक्ष्म लोकों के प्रकाश और पंचकोणीय श्वेत नक्षत्र के दर्शन सभी उन्नत साधकों को होते हैं| ये एक तरह के मील के पत्थर हैं और कुछ नहीं| अपनी चेतना को इनसे भी परे सिर्फ परमात्मा में ले जाना है|
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कहीं भी मत देखो, कुछ भी मत देखो, सिर्फ अपना लक्ष्य परमात्मा सदा दृष्टिपथ में रहे|
गुरुकृपा ही केवलं | ॐ गुरु ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ गुरु ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ |
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ॐ नमः शिवाय | शिवोहं शिवोहं शिवोहं अयमात्मा ब्रह्म | ॐ ॐ ॐ ||
कृपाशंकर
19/12/2015

Saturday, 17 December 2016

शांत होकर निरंतर गुरु-चरणों का सहस्त्रार में ध्यान करो .....

हे मेरे अशांत चंचल मन, मैं तुम्हे आदेश दे रहा हूँ ..... "शांत होकर निरंतर गुरु-चरणों का सहस्त्रार में ध्यान करो, कहीं भी इधर-उधर मत भागो | यही तुम्हारी सीमा है | मेरा आदेश परमात्मा का आदेश है जिसे मानने को तुम विवश हो |"
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परमात्मा की अनंत शक्ति का प्रवाह मुझमें हो रहा है | 
मैं परमात्मा का पूर्ण अमृत पुत्र हूँ | जहां भी मैं हूँ वहीं मेरे प्रियतम परमात्मा भी हैं | जहाँ भी मेरे प्रियतम परमात्मा हैं वहाँ कोई अज्ञान, अन्धकार और असत्य नहीं ठहर सकता | मैं उनकी पूर्णता और प्रेम हूँ, कहीं कोई भेद नहीं है |
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परमात्मा की शक्ति असीम है | वे सदा मेरे साथ हैं, अतः उनकी शक्ति के समक्ष मेरी सब बाधाएँ नष्ट हो रही हैं | उनकी सृजनात्मक शक्ति सदा मेरे साथ है जो निरंतर मेरा मार्गदर्शन कर रही है |
परमात्मा की सारी समृद्धि मेरी समृद्धि है | कोई किसी भी तरह का कहीं अभाव नहीं है | जो कुछ भी परमात्मा का है, वह मेरा भी है |
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हे मेरे मन, मेरा आदेश अब दुबारा सुन | तूँ कहीं नहीं भागेगा, निरंतर मेरे प्रियतम का ध्यान कर |
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

भगवान को हम दे ही क्या सकते हैं? सब कुछ तो उनका ही दिया हुआ है .....

भगवान को हम दे ही क्या सकते हैं? सब कुछ तो उनका ही दिया हुआ है .....
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भगवान को हम दे ही क्या सकते हैं? सब कुछ तो उनका ही दिया हुआ है| हाँ, पर एक चीज ऐसी भी है जो सिर्फ हमारे ही पास है और भगवान भी उसे हमसे बापस पाना चाहते हैं| उस के अतिरिक्त अन्य कुछ भी हमारे पास अपना कहने को नहीं है| वह सिर्फ हम ही उन्हें दे सकते हैं, कोई अन्य नहीं| और वह है ..... हमारा अहैतुकी परम प्रेम||
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इस समस्त सृष्टि का उद्भव परमात्मा के संकल्प से हुआ है और वे ही है जो सब रूपों में स्वयं को व्यक्त कर रहे है| कर्ता भी वे है और भोक्ता भी वे ही है|
वे स्वयं ही अपनी सृष्टि के उद्भव, स्थिति और संहार के कर्ता है| जीवों की रचना भी उन्हीं के संकल्प से हुई है| सारे कर्मों के कर्ता भी वे ही है और भोक्ता भी वे ही है| सृष्टि का उद्देष्य ही यह है कि हम अपनी सर्वश्रेष्ठ सम्भावना को व्यक्त कर पुनश्चः उन्हीं की चेतना में जा मिलें| यह उन्हीं की माया है जो अहंकार का सृजन कर हमें उन से पृथक कर रही है| इस संसार के सारे दु:ख और कष्ट इसी लिए हैं कि हम परमात्मा से अहंकारवश पृथक हैं, और इनसे मुक्ति भी परमात्मा में पूर्ण समर्पण कर के ही मिल सकती है| वे भी सोचते हैं कि कभी न कभी तो कोई उनकी संतान उनको प्रेम अवश्य करेगी| वे भी हमारे प्रेम के बिना दु:खी हैं चाहे वे स्वयं सच्चिदानंद हों|
भगवान हम से प्रसन्न तभी होंगे जब हम अपना पूर्ण अहैतुकी परम प्रेम उन्हें समर्पित कर दें| अन्य कोई मार्ग नहीं है उन को प्रसन्न करने का|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ ||

Friday, 16 December 2016

ध्यान साधना के बारे में कुछ सुझाव .....

जो लोग ध्यान साधना करते हैं उनको मैं मेरे लंबे अनुभव से एक सुझाव देना चाहता हूँ| आप चाहे किसी भी गुरु परम्परा का अनुसरण करते हों पर नीचे लिखी कुछ बातें आपकी साधना में बहुत सहायक होंगी|
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ध्यान से पूर्व सूर्य-नमस्कार, अनुलोम-विलोम प्राणायाम और पश्चिमोत्तानासन का अभ्यास बहुत सहायक होता है| प्रार्थना करके पूर्व या उत्तर की ओर मुँह कर के ऊनी कम्बल पर पद्मासन या सिद्धासन में बैठें और आतंरिक प्राणायाम, अजपा-जप और ओंकार पर ध्यान करें|
थोड़े थोड़े अभ्यास से आपका ध्यान बहुत गहरा होने लगेगा| खेचरी मुद्रा भी किसी योग्य योगाचार्य से सीखें और अभ्यास करें| ध्यान में पूर्णता खेचरी मुद्रा की सिद्धि के उपरांत ही आएगी|
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एक ही आसन पर बैठे बैठे यदि थक जाएँ तो फिर दो-तीन बार पश्चिमोत्तानासन आदि कुछ योगासनों का फिर से अभ्यास करें और गहरी साँसें लें| थकान दूर हो जायेगी| यदि आपकी कमर और गर्दन में तकलीफ है तो डॉक्टर को पूछे बिना कोई भी योगासन ना करें|
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ध्यान के बाद योनी-मुद्रा आदि का अभ्यास करें जिसे किसी योगाचार्य से सीख सकते हैं| जब भी पर्याप्त समय मिले, लंबे समय तक ओंकार पर ध्यान करें और गुरुप्रदत्त मंत्र का यथासंभव अधिकाधिक जाप करें| ध्यान का समापन सर्वस्व के प्रति प्रार्थना कर के ही करें|
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रात्रि को सोने से पूर्व खूब खूब गहरा ध्यान कर के निश्चिन्त होकर जगन्माता की गोद में सो जाएँ| प्रातःकाल परमात्मा का चिंतन करते हुए ही उठें| दिन का प्रारम्भ परमात्मा के ध्यान से ही करें|
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पूरे दिन परमात्मा का अनुस्मरण करते रहें| कुसंग का सर्वदा त्याग, सत्संग और प्रेरणास्पद सद्साहित्य का स्वाध्याय करते रहें|
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अपने विचारों का ध्यान रखें| हम जो कुछ भी हैं वह अपने अतीत के विचारों से हैं| हम भविष्य में वही होंगे जैसे वर्त्तमान में हमारे विचार हैं|
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सभी को शुभ कामनाएँ | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||

भक्ति का दिखावा, भक्ति का अहंकार , और साधना का समर्पण ......

भक्ति का दिखावा, भक्ति का अहंकार , और साधना का समर्पण ......
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किसी भी साधक के लिए सबसे बड़ी बाधा है .... भक्ति का दिखावा और भक्ति का अहंकार|
कई लोग सिर्फ दिखावे के लिए या अपने आप को प्रतिष्ठित कराने के लिए ही भक्ति का दिखावा करते हैं| वे लोग अन्य किसी को नहीं बल्कि अपने आप को ही ठग रहे हैं| जहाँ तक हो सके अपनी साधना को गोपनीय रखें|
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भक्त या साधक होने का अहंकार सबसे बड़ा अहंकार है| इसके दुष्परिणाम भी सबसे अधिक हैं|
इससे बचने का एक ही उपाय है ..... अपनी भक्ति और साधना का फल तुरंत भगवान को अर्पित कर दो, अपने पास बचाकार कुछ भी ना रखो, सब कुछ भगवान को अर्पित कर दो| अपने आप को भी परमात्मा को अर्पित कर दो| कर्ता भाव से मुक्त हो जाओ| हम भगवान के एक उपकरण या खिलौने के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं हैं|
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आप कोई साधना नहीं करते हैं, आपके गुरु महाराज या स्वयं भगवान ही आपके माध्यम से साधना कर रहे हैं ..... यह भाव रखने पर कहीं कोई त्रुटी भी होगी तो उसका शोधन गुरु महाराज या भगवान स्वयं कर देंगे| कर्ता भगवान को बनाइये, स्वयं को नहीं|
प्रभु के प्रेम के अतिरिक्त अन्य कोई भी कामना न रखें| उनके प्रेम पर तो आपका जन्मसिद्ध अधिकार है| अन्य कुछ भी आपका नहीं है|
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ॐ गुरु ॐ | गुरु ॐ | गुरु ॐ ||

विचारपूर्वक दृढ़ निश्चय से किया हुआ हर संकल्प पूर्ण होता है ........

विचारपूर्वक दृढ़ निश्चय से किया हुआ हर संकल्प पूर्ण होता है ........
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एक व्यक्ति का विचारपूर्वक किया हुआ दृढ़ संकल्प भी विश्व के घटना क्रम और विचारों को बदल सकता है| अनेक व्यक्तियों का शिव संकल्प राष्ट्र की नियति बदल सकता है|
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अपने संकल्प को ईश्वर के संकल्प से जोड़कर हम सनातन हिन्दू धर्म की पुनर्स्थापना कर भारतवर्ष को परम वैभव के साथ अध्यात्मिक अखंड हिन्दू राष्ट्र भी बना सकते हैं और रामराज्य की स्थापना भी कर सकते हैं|
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भारत की आत्मा आध्यात्मिक है| भारत का पुनरोत्थान एक प्रचंड आध्यात्मिक शक्ति से होगा| इसके लिए हम सब सब की सहभागिता अपेक्षित है| अब समय आ गया है|
यह कार्य आरम्भ हो चुका है| आप सब इस संकल्प से जुड़िये और परम वैभव युक्त आध्यात्मिक अखंड भारत का ध्यान अपनी चेतना में सदैव कीजिये|
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भारत पुनश्च अखंड होगा और धर्म की पुनर्स्थापना होगी| अज्ञान और असत्य का अन्धकार दूर होगा और भारत माँ अपने परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर विराजमान होगी|
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सत्य सनातन धर्म की जय हो| जयतु वैदिकीसंस्कृतिः जयतु भारतम् |
---जय श्रीराम---
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धी क्या हो सकती है ? .....


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कल पूरी रात खाँसी से त्रस्त था, रात को सो नहीं पाया, पूरी रात बहुत खाँसी आई| भोर में बहुत थोड़ी सी देर नींद आई| जब नींद खुली तब एक बड़ी दिव्य अनुभूति हुई| मन में यही प्रश्न उठा कि मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि क्या हो सकती है? अचानक दोनों नासिकाएँ खुल गईं, दोनों नासिकाओं से सांस चलने लगी, सुषुम्ना चैतन्य हो गयी, मैं कमर सीधी कर के बैठ गया और एक दिव्य अलौकिक चेतना में चला गया| पूरा ह्रदय प्रेम से भर उठा| प्रेम भी ऐसा जो अवर्णनीय है| पूरा अस्तित्व प्रेममय हो गया| प्रेमाश्रुओं से नयन भर गए| ऐसा लगा जैसे एक छोटा सा बालक जगन्माता की गोद में बैठा हो और माँ उसे खूब प्रेम कर रही हो| तब इस प्रश्न का उत्तर मिल गया कि जीवन की उच्चतम उपलब्धी क्या हो सकती है| जब प्रत्यक्ष परमात्मा का प्यार चाहे वह अति अल्प मात्रा में ही मिल जाए, तो उससे बड़ी अन्य क्या कोई उपलब्धी हो सकती है? हे जगन्माता, चाहे तुमने अपने प्यार का एक कण ही दिया हो, पर वह मेरे लिए अनमोल है| माँ, मुझे अपनी चेतना में रखो| तुम्हारा प्यार ही मेरे लिए सर्वोच्च उपलब्धी है| तुम्हारे प्रेम की चेतना में निरंतर सचेतन स्थित रहूँ| और कुछ भी नहीं चाहिए| ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||