Tuesday, 31 December 2024

आध्यात्मिक साधना क्या होती है ?

 आध्यात्मिक साधना क्या होती है ?

आध्यात्मिक साधना का अर्थ है आत्म-साधना यानि स्वयं की अपनी आत्मा को जानना और अपनी सर्वोच्च क्षमताओं का विकास करना| मनुष्य के जब पापकर्मफल क्षीण होने लगते हैं और पुण्यकर्मफलों का उदय होता है तब परमात्मा को जानने की एक अभीप्सा जागृत होती है और करुणा व प्रेमवश परमात्मा स्वयं एक सद्गुरु के रूप में मार्गदर्शन करने आ जाते हैं| स्वयं के अंतर में इस सत्य का बोध तुरंत हो जाता है|

साधक को उसकी पात्रतानुसार ही मार्गदर्शन प्राप्त होता है जिसका अतिक्रमण नहीं हो सकता| ये पंक्तियाँ लिखने का मेरा उद्देश्य यही है कि साधना के मार्ग में किसी भी प्रकार का लालच व अहंकार .... पतन का कारण हो जाता है| परमात्मा के सिवाय अन्य किसी भी लाभ की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए, अन्यथा पतन सुनिश्चित है|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ जनवरी २०१९

जनवरी के महीने को "जनवरी" क्यों कहते है ?

 जनवरी के महीने को "जनवरी" क्यों कहते है?

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पूरे विश्व में भगवान श्रीगणेश की पूजा हुआ करती थी। रोम साम्राज्य में भगवान श्रीगणेश को "जेनस" कहते थे। वे सबसे बड़े रोमन देवता थे। अपने देवता जेनस के नाम पर रोमन साम्राज्य ने वर्ष के प्रथम माह का नाम "जनवरी" रखा। किसी भी शुभ कार्य के आरंभ से पूर्व बुद्धि के देवता "जेनस" की पूजा होती थी।
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जेनस से ही अंग्रेजी का "Genius" शब्द बना है।
आंग्ल कलेंडर में पहले १० महीने हुआ करते थे और वर्ष का आरंभ मार्च से होता था। भारतीयों की नकल कर के रोमन साम्राज्य ने दो माह और जोड़ दिए। जेनस देवता के नाम पर जनवरी, और फेबुआ देवता के नाम पर फरवरी नाम के दो महीने और जोड़कर आंग्ल वर्ष को १२ माह का कर दिया।
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अंग्रेजों की सबसे बड़ी संस्कृति है -- "धूर्तता"। उनसे बड़ा कोई अन्य धूर्त नहीं है। उन्होंने भी इसी कलेंडर को अपनाया और बड़ी धूर्तता और क्रूरता से भारत में और पूरे विश्व में अपना कलेंडर थोप दिया। परिस्थितियों के वश हम ग्रेगोरी नाम के पोप (Pope Gregory XIII) द्वारा बनाए हुए इस ईसाई ग्रेगोरियन कलेंडर को मानने को बाध्य हैं।
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१ जनवरी २०२३
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पुनश्च :-- ग्रेगोरियन कलेंडर से पूर्व जूलियन कलेंडर हुआ करता था। अक्टूबर १५८२ में पोप ग्रेगोरी XIII ने इसे लागू कराया।

भगवान ने हमारी रचना क्यों की? वे हम से क्या चाहते हैं? यह सारा प्रपंच क्यों?

 भगवान ने हमारी रचना क्यों की? वे हम से क्या चाहते हैं? यह सारा प्रपंच क्यों?

सृष्टिकर्ता को हम कैसे जान सकते हैं? क्या यह संभव है? कर्ता हम हैं या प्रकृति?
ये दुःख/सुख, अभाव/प्रचूरता, घृणा/प्रेम, राग/द्वेष, और भय/लोभ/अहंकार आदि क्यों? इस जीवन का क्या उद्देश्य है?
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उपरोक्त सारे प्रश्न शाश्वत हैं? इन पर भारत में जितनी चर्चा हुई है, उतनी तो अन्यत्र कहीं भी नहीं हुई हैं। उपनिषदों में इन सब के उत्तर मिल भी सकते हैं, और नहीं भी। आज हम इस संसार में हैं, कुछ समय पश्चात चले जाएँगे। संसारी व्यक्तियों से प्रश्न करो तो सबका उत्तर रटा-रटाया होता है, किसी का मौलिक उत्तर नहीं होता।
कोई कहता है गुरु करो। गुरु ही सब बात बताएगा। कोई कहता है हमारी विचारधारा में आ जाओ, तो ठीक है, तुम्हें ये ये लाभ मिलेंगे, अन्यथा नर्क की शाश्वत अग्नि मिलेगी। यहाँ यह भी भय पर आधारित एक व्यापार है।
श्रीमद्भगवद्गीता में और अन्य शास्त्रों में जिसे तमोगुण बताया है, लगता है वह तमोगुण ही इस संसार को चला रहा है। कहीं कहीं रजोगुण है। सतोगुण तो कहीं दिखाई ही नहीं देता।
फिर श्रीमद्भगवद्गीता के सांख्य योग में भगवान हमें तीनों गुणों से परे जाने को क्यों कहते हैं? --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥२:४५॥"
यहाँ भगवान हमें निस्त्रेगुण्य होने को कहते हैं, लेकिन साथ में चार शर्तें भी लगा देते हैं कि पहले निर्द्वंद्व, नित्यसत्वस्थ, निर्योगक्षेम, और आत्मवान बनो। फिर आगे की बात करो।
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ये सब बातें एक सामान्य मनुष्य के वश की बात नहीं है। यह संसार ऐसे ही चलता रहेगा, जैसा अब तक चलता आया है। थक-हार कर हम आत्म-संतुष्टि के लिए तरह तरह की बातें कहते हैं, जैसे --
"उमा दारु जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं॥"
यह कोई उत्तर नहीं है। प्रश्न यहाँ बना रहता है कि "क्यों?"
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१ जनवरी २०२४

हे अनंत, हे विराट, हे परमात्मा, तुम अब और अधिक छिप नहीं सकते ---

 हे अनंत, हे विराट, हे परमात्मा, तुम अब और अधिक छिप नहीं सकते ---

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तुम्हें इसी क्षण प्रकट होना ही पड़ेगा| तुमने हमें जहाँ भी रखा है वहीं तुम्हें आना ही पड़ेगा| अब शीघ्रातिशीघ्र स्वयं को प्रकट करो| तुम्हारे बिना अब और अधिक जीना संभव नहीं है| हमें प्रत्यक्ष साक्षात्कार चाहिए, कोई दार्शनिक अवधारणा या ज्ञान नहीं| अपनी माया के आवरण से बाहर आओ और विक्षेप उत्पन्न मत करो| अंततः हो तो तुम भक्त-वत्सल ही| अपनी संतानों की करुण पुकार सुनकर तुम को आना ही पड़ेगा|
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तुम्हीं साधक हो, तुम्हीं साधना हो और तुम्ही साध्य हो| तुम ही तुम हो, मैं नहीं| हे सच्चिदानंद, तुम्हें प्रणाम ! अब विलंब मत करो|
अन्यथा शरणं नास्ति, त्वमेव शरणं मम| तस्मात्कारुण्यभावेन, रक्षस्व परमेश्वर||
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ब्रह्मानंदं परम सुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं| द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम्||
एकं नित्यं विमलंचलं सर्वधीसाक्षीभूतम्| भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि||
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वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्क: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वंसर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥
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बाहर चाहे कितना भी अंधकार हो, मेरी चेतना में तो परम ज्योतिर्मय परमात्मा ही स्वयं हैं| आज की पूरी रात्रि ही नहीं, अवशिष्ट जीवन का हर पल उन्हीं को समर्पित है| उनके सिवाय अन्य कोई है ही नहीं, मैं भी नहीं|
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति| तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति||६:३०||
अर्थात् "जो पुरुष, मुझे सर्वत्र देखता है, और सब को मुझ में देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता, और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता||"
सारा जड़ और चेतन वे ही हैं| उनके सिवाय कोई अन्य है ही नहीं| यह मैं और मेरापन -- एक मिथ्या अहंकार है|
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! हरिः ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !! .
हम जहाँ हैं, वहीं भगवान हैं, वहीं सारे तीर्थ हैं, वहीं सारे संत-महात्मा हैं, कहीं भी किसी के भी पीछे-पीछे नहीं भागना है| भगवान हैं, यहीं हैं, इसी समय हैं, और सर्वदा हैं| वे ही इन नासिकाओं से सांस ले रहे हैं, वे ही इस हृदय में धड़क रहे हैं, वे ही इन आँखों से देख रहे हैं, और इस शरीर-महाराज और मन, बुद्धि व चित्त के सारे कार्य वे ही संपादित कर रहे हैं| उनके सिवाय अन्य किसी का कोई अस्तित्व नहीं है| बाहर की भागदौड़ एक मृगतृष्णा है, बाहर कुछ भी नहीं मिलने वाला| परमात्मा की अनुभूति निज कूटस्थ-चैतन्य में ही होगी|
बाहर बहुत भयंकर ठंड का प्रकोप चल रहा है| विगत रात्री में तापमान -४ डिग्री सेल्सियस तक गिर गया था| अभी भी बर्फीली हवायें चल रही हैं| ऐसे मौसम में न तो कहीं जाना है और न किसी से मिलना-जुलना है| घर पर ही कुछ व्यायाम करेंगे और भगवान का यथासंभव अधिकाधिक ध्यान करेंगे| सभी को शुभ कामनायें व नमन !
हम चाहे कितने भी ग्रन्थ पढ़ लें, कितने भी प्रवचन और उपदेश सुन लें, कितने भी साधुओं का संग करते रहें, कितना भी दान-पुण्य करें; इनसे परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती| इनसे हम पुण्यवान तो होंगे, कुछ अच्छे कर्म भी हमारे खाते में जुड़ेंगे; और कुछ नहीं|

वीतरागता यानि राग-द्वेष रूपी द्वन्द्वों और अहंकार से मुक्त होना हमारी पहली आवश्यकता है| इसके लिए भगवान कहते हैं

"संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः| योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति||५:६||"
अर्थात् हे महाबाहो ! योग के बिना संन्यास प्राप्त होना कठिन है; योगयुक्त मननशील पुरुष परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त होता है|| (Without concentration, O Mighty Man, renunciation is difficult. But the sage who is always meditating on the Divine, before long shall attain the Absolute..)

सत्यनिष्ठा से भक्ति, समर्पण और ध्यान-साधना तो स्वयं को ही करनी होगी| भूख लगने पर भोजन स्वयं को ही करना पड़ता है| आज व कल इन दो दिनों में गीता के पांचवें अध्याय का स्वाध्याय और भगवान का खूब ध्यान करें|

ॐ नमः शम्भवाय च, मयोभवाय च, नमः शंकराय च, मयस्कराय च, नमः शिवाय च, शिवतराय च|| ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||कृपा शंकर ३१ दिसंबर २०२०

देवता पुरुष डॉ.जीवनचंद जैन को श्रद्धांजलि !

८३ वर्ष की आयु में हमारे यहाँ के गरीबों के मसीहा और हर दृष्टि से मनुष्य देह में देवता, डॉ.जीवनचंद जैन नहीं रहे|
३१ दिसंबर २०१८ को उनके निधन पर शोक में आज हमारे यहाँ के और आसपास के सारे बाजार और सारे शिक्षण संस्थान स्वतः ही बंद हो गए हैं|
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गरीबों की जितनी सेवा और कल्याण के कार्य उनके स्वयं के द्वारा और उन की प्रेरणा से औरों के द्वारा हुए, वैसे मैंने अपने पूरे जीवन काल में अन्यत्र कहीं भी किसी अन्य के द्वारा होते हुए नहीं देखे| अपनी सारी आय को वे परोपकार में लगा देते थे| वे अपने आप में एक संस्था और राजस्थान के पूरे शेखावाटी क्षेत्र में किसी भी परिचय के मोहताज नहीं थे|
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उनका जन्म राजस्थान के करौली में हुआ था पर कर्मभूमि झुंझुनू ही थी| उनकी धर्मपत्नी स्व.डॉ.कुन्दनबाला जैन पिलानी के डॉ.नंदलाल ध्रुव की पुत्री थीं| वे भी अपने जीवनकाल में एक देवी थीं| पुनश्चः श्रद्धांजलि !

३१ दिसंबर २०१८ . डॉ.जैन मनुष्य देह में हर दृष्टी से एक देवता थे| उनके स्वयं के द्वारा और उनकी प्रेरणा से सैंकड़ों अन्य व्यक्तियों द्वारा जो सेवा कार्य मैनें होते हुए देखे हैं, उनकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता| उनकी धर्मपत्नी स्व.डॉ.कुंदनबाला जैन भी एक दैवीय व्यक्तित्व की धनी थीं| डॉ.जैन अपने समय के एक विख्यात मेडिकल सर्जन थे| उनसे गरीबों का दुःख देखा नहीं गया और अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर प्राइवेट प्रैक्टिस करने लगे| पहली बार कोई मरीज उनके पास आता तो वे मात्र दस रुपया फीस का लेते और बाद में सिर्फ पांच रुपया| किसी के पास में वह भी नहीं होता तो कोई बात नहीं, उसके निःशुल्क इलाज़ की व्यवस्था हो जाती| जटिल से जटिल ऑपरेशन भी सिर्फ लागत मूल्य पर ही कर देते| दवाइयाँ भी सिर्फ आवश्यक और कम से कम लिखते थे| बहुत सस्ते में इलाज करा देते थे| उनकी प्रेरणा से हर वर्ष सैंकड़ों गरीबों का निःशुल्क इलाज होता था| हर वर्ष गरीबों को सैंकड़ों कम्बल. रजाइयाँ, स्वेटर आदि दी जाती थीं| अनेक महिलाओं को सिलाई की मशीनें देकर स्वावलंबी बनाया गया| और भी अनगिनित सेवा कार्य उनकी प्रेरणा से हो रहे थे|
राजस्थान के झुंझुनू जिले की एक महान हस्ती अब इस दुनियाँ में नहीं रही| डॉ.जीवनचंद जैन साहब को नमन !

एक क्षण के लिए भी परमात्मा की विस्मृति न हो ---

जीवन का आरंभ जहाँ से हुआ था उसे तो मैं नहीं बदल सकता, लेकिन जीवन के अंत को बदल सकता हूँ। वर्तमान का यह क्षण ही मेरी यात्रा है जिसका अंत सुखद हो। मेरे हृदय में किसी के प्रति घृणा या दुर्भावना न हो। शत्रुओं का संहार भी प्रेमपूर्वक बिना घृणा या बिना क्रोध के किया जाना चाहिए। कर्ता तो परमात्मा हैं, मैं तो निमित्त मात्र हूँ। मेरे माध्यम से हरेक कार्य परमात्मा द्वारा संपादित हो रहे हैं। यह भाव सदा बना रहे।

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मैं स्वयं ही स्वयं का शत्रु और स्वयं ही स्वयं का मित्र हूँ। भगवान को समय नहीं देना स्वयं के प्रति मेरी शत्रुता है, और भगवान का गहरा ध्यान स्वयं के साथ मित्रता है। शास्त्रों को सिर्फ पढ़कर, प्रवचनों को सिर्फ सुनकर, और सिर्फ परोपकार मात्र से किसी को भगवान नहीं मिलते। उनकी अनुभूति सिर्फ गहरे ध्यान में ही होती है। अतः मुझे ध्यान-साधना में गंभीरता से नित्य नियमित होना चाहिए।
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जीवन में मैं चाहे कितनी भी बार पराजित हुआ, लेकिन अब और पराजय मुझे अस्वीकार्य है। यदि मेरी निष्ठा, श्रद्धा और विश्वास सही है तो मैं कभी पराजित नहीं हो सकता। अहं इंद्रो न पराजिग्ये॥ मैं इन्द्र हूँ, जिसे कोई पराजित नहीं कर सकता॥
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मेरा अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) मेरी आज्ञा मानने के लिए बाध्य हैं, क्योंकि वे परमात्मा के आधीन हैं, जिनका नित्य निरंतर निवास मेरे हृदय में है।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ दिसंबर २०२२

मेरी चेतना इस समय परमशिव की अनंतता और सम्पूर्ण सृष्टि से भी परे है ---

 ॐ नमः शिवाय विष्णु रूपाय शिव रूपाय विष्णवे। शिवस्य हृदयं विष्णु विष्णोश्च हृदयं शिवः॥

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने, प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
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प्रिय निजात्मागण, मेरी चेतना इस समय परमशिव की अनंतता और सम्पूर्ण सृष्टि से भी परे है। यह भौतिक देहरूपी वाहन -- लोकयात्रा के लिए मिला था। संसार मुझे इस वाहन के रूप में ही जानता है जिस की क्षमता और स्वास्थ्य का अब ह्रास होने लगा है, अतः परमशिव मुझे लौकिक चेतना से शनैः शनैःअपनी अनंत शाश्वतता की ओर मोड़ रहे हैं।
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मेरा स्वभाव आध्यात्मिक है, अतः बचा-खुचा सारा लौकिक जीवन परमशिव के स्मरण, चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान में ही बीत जायेगा। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने जिस वीतरागता, स्थितप्रज्ञता, ब्राह्मी-स्थिति, अव्यभिचारिणी भक्ति, और समर्पण की बात की है, वही मेरा आदर्श है। इस समय परमशिव की कैवल्यावस्था की ओर अग्रसर हूँ।
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परमशिव स्वयं ही यह जीवन जी रहे हैं। इस जन्म से पूर्व भी वे ही मेरे साथ थे, इस जन्म के उपरांत भी वे ही मेरे साथ रहेंगे। वे ही माता-पिता, भाई-बहिन, सब संबंधियों, मित्रों और गुरु के रूप में आये। परमशिव रूप आप सब को नमन करता हूँ, जिन्होंने जीवन में मेरा साथ और अपना प्रेम दिया।
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ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ दिसंबर २०२४