(प्रश्न १) भवसागर क्या है? (प्रश्न 2) भवसागर को कैसे पार करें? --- .
Monday, 13 July 2026
(प्रश्न १) भवसागर क्या है? (प्रश्न 2) भवसागर को कैसे पार करें? ---
(उत्तर १) भवसागर क्या है? :-- भव-सागर को इस उदाहरण से समझ सकते हैं -- हम खाते क्यों हैं? -- कमाने के लिए, और कमाते क्यों हैं? -- खाने के लिए। यह चक्र कभी समाप्त नहीं होता। यही भवसागर का एक छोटा सा रूप है। इस संसार से सुख की आशा ही हमें इस भवसागर में फँसाए रखती है, जो कभी किसी को नहीं मिलता। यह एक मृगतृष्णा है। हमारी कामनाएँ और वासनाएँ ही इस तृष्णा रूपी भवसागर का निर्माण करती हैं।
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कामनाओं ओर वासनाओं से मुक्त होना ही भवसागर को पार करना है। और भी स्पष्ट शब्दों में संसार की निःसारता को समझ कर, विषय-वासनाओं को त्याग कर परमात्मा के प्रेम में मग्न हो जाना ही -- भवसागर को पार करना है।
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(उत्तर २) भवसागर को कैसे पार करें? :-- श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में संत तुलसीदास जी ने भवसागर को पार करने की जो विधि भगवान श्रीराम के मुख से कहलवाई है, वह समझने में सबसे अधिक सरल है --
चौपाई :--
"नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।।
करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।।"
दोहा/सोरठा :--
"जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ।
सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ॥"
इसका सार यह कि यह मनुष्य शरीर इस भवसागर को पार करने के लिए भगवान द्वारा दी हुई एक नौका है। सन्मुख वायु -- भगवान का अनुग्रह है। इस नौका के कर्णधार सदगुरु हैं। जो इस नौका को पाकर भी भवसागर को न तरे, उस से बड़ा अभागा अन्य कोई नहीं है।
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भवसागर पार करने का एक पंक्ति का सूत्र -- "सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो"।
गुरु तो स्वयं भगवान हैं, उन्हें कर्ता बनाओ, और सन्मुख मरुत यानि सामने जो ये सांसें चल रही हैं, उनसे निरंतर अजपा-जप करो। अजपा-जप क्या है? --
"सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥
आत्म अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥"
भावार्थ - 'सोऽहमस्मि' (वह ब्रह्म मैं हूँ) यह जो अखंड (तैलधारावत कभी न टूटने वाली) वृत्ति है, वही (उस ज्ञानदीपक की) परम प्रचंड दीपशिखा (लौ) है। (इस प्रकार) जब आत्मानुभव के सुख का सुंदर प्रकाश फैलता है, तब संसार के मूल भेद रूपी भ्रम का नाश हो जाता है,॥
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सार की बात -- अपने परमात्व-तत्व में स्थिति ही भवसागर को पार करना है। यदि मेरी बात समझ में नहीं आई है तो किसी उच्च कोटि के संत-महात्मा के समक्ष बैठकर बड़ी विनम्रता से उनसे ज्ञान प्राप्त करें।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२१
मेरी एक अदम्य वासना ---
मेरी एक अदम्य वासना ---
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यदि चेतन/अवचेतन मन में कोई अति गहन अदम्य वासना हो तो उसे व्यक्त करने में कोई बुराई नहीं है। हो सकता है कि व्यक्त करने से उस वासना का वेग कम हो जाए, चाहे वह विषय-वासना हो या वेदान्त-वासना। वासना और अभीप्सा में अंतर इतना ही है कि वासना का जन्म मन में होता है और अभीप्सा का जन्म आत्मा में। लेकिन जब कोई वासना मन के साथ-साथ आत्मा में भी हो तब वह अदम्य हो जाती है।
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इस छल-कपट और असत्य से भरे विश्व में अब और अधिक जीने की इच्छा नहीं रही है। वासना यही है कि जब यह शरीर शांत हो, उस समय निर्विकल्प समाधि की अवस्था हो, और कहीं भी किसी भी लोक में पुनर्जन्म हो तो एक जीवन-मुक्त के रूप में हो जिसमें जन्म से ही ज्ञान, भक्ति व वैराग्य की पूर्णता हो। इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी वासना नहीं है।
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किसी को उलाहना भी नहीं दे सकते और, शिकायत भी नहीं कर सकते, क्योंकि सारा विश्व तो विष्णु ही है। भगवान विष्णु ही स्वयं को ही इस विश्व के रूप में व्यक्त कर रहे हैं। सारी वासनाएं और अभीप्सा व अभीष्ट भी वे ही हैं। उनसे प्रेम तो है, लेकिन कोई अपेक्षा नहीं है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२२
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मेरे लिए गुरु-रूप परमात्मा की उपासना का उद्देश्य ---
मेरे लिए गुरु-रूप परमात्मा की उपासना का उद्देश्य ---
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"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं,
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम्,
भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि ||" (गुरुगीता, स्कंदपुराण)
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मुझे लोक-परंपरानुसार गुरु पूजा करने में कठिनाई होती है, इसलिए अपना एकांत ही मुझे प्रिय है, कोई समूह नहीं। मेरे द्वारा प्रतीकात्मक रूप से गुरु-पादुकाओं की ही पूजा हो सकती है, उनके देह की नहीं। गुरु कोई देह नहीं थे, वे तो तत्व थे। अतः उनके देह रूपी चित्र की पूजा मुझसे नहीं होती। उनके चित्र या मूर्ति को श्रद्धा-सुमन ही अर्पित कर सकता हूँ, पूजा तो उनकी पादुकाओं (खड़ाऊ) की ही कर सकता हूँ, अन्यथा नहीं। इसीलिए मेरी किसी समूह से बनती नहीं है।
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मैं गुरु और ईश्वर में कोई भेद नहीं करता। साधनाकाल के आरंभ में भी यही भाव रहता था कि मैं तो निमित्त मात्र हूँ, सारी साधना गुरु महाराज ही कर रहे हैं। फिर गुरु महाराज से भी कोई भेद नहीं रहा। अब तो यह भाव रहता है कि सारी साधना स्वयं परमात्मा ही कर रहे हैं, मैं तो एक निमित्त मात्र हूँ। गुरु और परमात्मा एक हैं, उनमें कोई भेद नहीं है।
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ध्यान की गहनता में -- मुझमें, गुरु में, और परमात्मा में भी कोई भेद नहीं रहता। न तो मैं कहीं पर होता हूँ, न गुरु रहते हैं, सिर्फ परमात्मा ही रहते हैं। परमात्मा अपनी उपासना स्वयं ही करते हैं। परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी का भी अस्तित्व नहीं रहता है।
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ध्यान के समय उत्तरा-सुषुम्ना (आज्ञाचक्र व सहस्त्रार के मध्य) में एक विराट श्वेत ज्योति के दर्शन होते थे, वही मेरे लिए उपास्य होती थी। फिर उसका स्थान बदलने लगा। वह ज्योति इस शरीर से बाहर निकल कर अनंत की विराटता के साथ एक हो गई, तो निज चेतना भी उस विराटता के साथ एक होने लगी। अब तो वह अनंत विराटता ही मेरा शरीर बन गई है। परमात्मा तो उससे भी परे परमज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में आभासित होते हैं। उन ज्योतिर्मय ब्रह्म के साथ एकत्व ही उपासना का उद्देश्य रह गया है। अन्य कोई उद्देश्य नहीं है। उनका आकर्षण बड़ा प्रबल है।
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एक बार यह जानने की इच्छा हुई कि जब मैं हूँ ही नहीं तो यहाँ कौन है? आगे जो अनुभव हुआ वह तो निषेधात्मक कारणों से नहीं बता सकता, लेकिन यह स्पष्ट हो गया कि एकमात्र अस्तित्व भगवान वासुदेव का है --
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
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गुरुगीता के अनुसार सद्गुरु कौन है --
"सर्वसन्देहसन्दोहनिर्मूलनविचक्षणः।
जन्ममृत्युभयघ्नो यः स गुरुः परमो मतः" (गुरुगीता श्लोक संख्या १७०)
अर्थात् - सर्व प्रकार के सन्देहों का जड़ से नाश करने में जो चतुर हैं, जन्म, मृत्यु तथा भय का जो विनाश करते हैं वे परमगुरु (सदगुरु) कहलाते हैं।
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पुनश्च मैं भगवान वासुदेव को नमन करता हूँ जो गुरु रूप में आए और मुझ अकिंचन का उद्धार किया। आध्यात्मिक दृष्टि से एकमात्र अस्तित्व उन्हीं का है। उनके सिवाय कोई अन्य नहीं है, मैं भी नहीं --
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥११:३९॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
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"बंदऊं गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥१॥
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥२॥
श्री गुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियं होती॥
दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के॥
सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहं जो जेहि खानिक॥
बंदउं गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥" (रामचरितमानस)
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ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२२
हम किसका व कैसे ध्यान करें?
हम किसका व कैसे ध्यान करें?
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(उत्तर) : हमें ऐसे ही व्यक्तियों के साथ सत्संग करना चाहिए जो दिन में २४ घंटे, सप्ताह में सातों दिन, निरंतर भगवान की चेतना में रहते हों। भारत के योगी परंपरागत रूप से भगवान शिव या भगवान विष्णु की अनंतता का ध्यान करते है। तत्व रूप में शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है, दोनों एक हैं। इनकी सिर्फ अभिव्यक्तियाँ ही पृथक पृथक हैं, जैसे एक सिक्के के दो पहलू होते हैं।
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ध्यान साधना से पूर्व हठयोग के कुछ व्यायाम कर लें, जो अनेक योगियों ने बताए हैं। परमहंस योगानन्द द्वारा सिखाये गए ऊर्जादायी व्यायाम मेरे लिए तो सर्वश्रेष्ठ हैं। "शिव संहिता" में सिखाई गई "महामुद्रा", और "घेरण्ड-संहिता" में सिखाये गए "त्रिबंध" और "पश्चिमोत्तानासन" ध्यान साधना में बहुत अधिक सहायक हैं। पश्चिमोत्तानासन के नियमित अभ्यास से कमर लचीली रहती है, और मरते दम तक कभी झुकती नहीं है। पश्चिमोत्तानासन के सही अभ्यास से ही महामुद्रा सिद्ध होती है। महामुद्रा का अभ्यास दिन में दो बार सायं-प्रातः किया जाता है। जब भी आलस्य आ रहा हो तब कभी भी कर सकते हैं। इस से आलस्य दूर होता है, और साधना में बड़ी सहायक है। नाक से सांस चलती रहे, नाक बंद न हो, इसके लिए हठयोग में नेति आदि की दो-तीन क्रियाएँ सिखाई गयी हैं। योगियों के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है --"खेचरी मुद्रा"। पद्मासन में खेचरी मुद्रा लगाकर भ्रूमध्य में ध्यान करने को "शांभवी मुद्रा" कहते हैं। ध्यान साधना के लिए शांभवी मुद्रा ही सर्वश्रेष्ठ है। यह भगवान शिव की मुद्रा है, भगवान शिव इसी में ध्यान करते हैं। खेचरी सिद्ध करने के लिए योगिराज श्रीश्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय ने तालव्य-क्रिया बताई है लेकिन उसका अभ्यास युवावस्था के आरंभ से ही करना पड़ता है। प्रोढ़ावस्था में वह सिद्ध नहीं होती। प्रोढ़ लोगों के लिए या उनके लिए जो खेचरी नहीं कर सकते हैं, वे अपना ध्यान नभो-मुद्रा में करें। जीभ को ऊपर की ओर मोड़कर तालू से सटाकर रखने को नभो-मुद्रा कहते हैं। इसका भी अभ्यास करना पड़ता है। ध्यान के लिए पद्मासन या सिद्धासन में बैठें। यदि इनमें नहीं बैठ सकते तो सुखासन में बैठें। सुखासन में भी नहीं बैठ सकते तो बिना हत्थे की एक लकड़ी की कुर्सी पर बैठ जाएँ, लेकिन कुर्सी के नीचे एक कंबल बिछा लें। कमर हर परिस्थिति में सीधी रहे, इसके लिए नितंबों के नीचे एक पतली गद्दी लगा लें। जिनकी कमर झुक गई है उनको इस जन्म में सिद्धि नहीं मिल सकती, उन्हें दुबारा जन्म लेना पड़ेगा। पहले योगी अपनी साधना स्वाभाविक रूप से मरे हुए हिरण या बाघ की खाल पर बैठ कर करते थे। लेकिन आजकल हिरण या बाघ की खाल को घर में रखना भी कानूनी अपराध है। इसमें गिरफ्तारी भी हो सकती है।
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ध्यान के लिए हठयोग के अनुलोम-विलोम के साथ साथ उज्जायी प्राणायाम का अभ्यास होना बहुत आवश्यक है। उज्जायी का महत्व अभी समझ में नहीं आयेगा, लेकिन कुछ समय के बाद पता चलेगा कि यह कितना महत्वपूर्ण है।
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ध्यान साधना का आरंभ कूटस्थ में ध्यान करते हुए अजपा-जप से होता है। यह एक वैदिक साधना है जिसे हंसःयोग और हंसवतिऋक भी कहते हैं। आठ खंडों की "तपोभूमि नर्मदा" नामक पुस्तक के पांचवे खंड में इसके बारे में वेदों और उपनिषदों के प्रमाण देकर बहुत विस्तार से बताया गया है।
गुरु-प्रदत्त बीजमंत्र का श्रवण करते करते उसी में स्वयं का विलय हो जाता है। ध्यान की गहराई में स्वयं का कोई पृथक बोध नहीं रहता। हम उपास्य के साथ एक हो जाते हैं। ध्यान अपने उपास्य का ही किया जाता है।
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भगवान की जब भी कृपा होगी वे किसी श्रौत्रीय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु के रूप में हमारे पास आ जाते हैं। उस समय हमें पता चल जाता है। सदगुरु का एकमात्र कार्य अपने शिष्य को ईश्वर की प्राप्ति करना होता है। अन्य बातों में कोई रुचि उनकी नहीं होती। किसी भी साधक में यदि सत्यनिष्ठा, श्रद्धा और विश्वास है तो ईश्वर प्राप्ति से उसे कोई नहीं रोक सकता।
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सभी को शुभ कामनाएँ और नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२३
लोभ और अहंकार के वासनात्मक विचार सारी आध्यात्मिक प्रगति को अवरुद्ध कर देते हैं ---
जब से मेरे विचारों में आमूलचूल परिवर्तन हुआ है, जीवन में सुख-शांति है। किसी भी तरह की कोई समस्या नहीं है। चेतना ईश्वर में ही निरंतर तल्लीन रहती है।
किसी भी साधक के जीवन में जब लोभ और अहंकार के वासनात्मक विचार आ जाते हैं, तब वे सारी आध्यात्मिक प्रगति को अवरुद्ध कर देते हैं।
हमारा योग-क्षेम भगवान की चिंता है, अतः निश्चिंत रहिए। भगवान ने गीता में कहा है --
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् -- अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥
But if a man will meditate on Me and Me alone, and will worship Me always and everywhere, I will take upon Myself the fulfillment of his aspiration, and I will safeguard whatsoever he shall attain.
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२४
Sunday, 12 July 2026
गुरु-पूर्णिमा पर गुरु रूप में "कूटस्थ-ब्रहम" परमात्मा को नमन !!
गुरु-पूर्णिमा पर गुरु रूप में "कूटस्थ-ब्रहम" परमात्मा को नमन !! वे ही गुरु-रूप में हमारे समक्ष आते हैं। ध्यान साधना में भगवान स्वयं को "ज्योतिषांज्योति कूटस्थ अक्षर ब्रह्म" के रूप में प्रकट करते हैं। वे ही गुरु रूप में मेरे समक्ष आए। वे ही गुरु हैं, और वे ही शिष्य हैं। स्वयं उन्हीं की उपासना, उन्हीं के द्वारा, मुझे निमित्त बनाकर होती है।
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भगवान वेदव्यास का जन्म आषाढ़-पूर्णिमा को हुआ था। वे भगवान नारायण के रूप, विश्वगुरु हैं। उन्हीं के जन्मदिवस को गुरु-पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।
भगवान वेदव्यास ने भगवान श्रीकृष्ण के लिए -- "कृष्णं वंदे जगदगुरुम्" लिखा है। श्रीमद्भगवद्गीता भी महाभारत के भीष्म पर्व में वेदव्यास द्वारा लिखी गई है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को "कूटस्थ" बताया है।
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"कूटस्थ" एक अनुभूति है जिसमें साधक को ज्योतिर्मय-ब्रह्म के दर्शन और नाद-श्रवण -- आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य में होते हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
१२ जुलाई २०२२
आध्यात्मिक दृष्टि से मैं सभी के साथ एक हूँ| सारी सृष्टि मेरा हृदय है जिसका केंद्र सर्वत्र है और परिधि कहीं भी नहीं|
आध्यात्मिक दृष्टि से मैं सभी के साथ एक हूँ| सारी सृष्टि मेरा हृदय है जिसका केंद्र सर्वत्र है और परिधि कहीं भी नहीं|
मेरा एक ही मित्र है जो सर्वत्र और शाश्वत है| इस जन्म से पूर्व भी वह मेरे साथ था, मृत्यु के उपरांत भी मेरे साथ रहेगा, और अभी भी मेरे साथ है| उस शाश्वत मित्र से पूर्ण संतुष्टि है, और कुछ भी नहीं चाहिए| जो उस मित्र से प्रेम करते हैं, दिन-रात उस का चिंतन करते हैं, वे स्वभाविक रूप से मेरे मित्र हैं|
सांसारिकता में मैं आजकल न तो कहीं आता-जाता हूँ, और न किसी से मिलता हूँ| मेरा संपर्क बाहरी विश्व से नहीं के बराबर है| बाहरी संपर्क और बढ़ाने की कोई कामना भी नहीं है| मैं पूर्णतः प्रसन्न, संतुष्ट, तृप्त और सुखी हूँ|
सभी को मेरी शुभ कामनाएँ, प्यार और नमन !!
१२ जुलाई २०२०
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