मेरी एक अदम्य वासना ---
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यदि चेतन/अवचेतन मन में कोई अति गहन अदम्य वासना हो तो उसे व्यक्त करने में कोई बुराई नहीं है। हो सकता है कि व्यक्त करने से उस वासना का वेग कम हो जाए, चाहे वह विषय-वासना हो या वेदान्त-वासना। वासना और अभीप्सा में अंतर इतना ही है कि वासना का जन्म मन में होता है और अभीप्सा का जन्म आत्मा में। लेकिन जब कोई वासना मन के साथ-साथ आत्मा में भी हो तब वह अदम्य हो जाती है।
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इस छल-कपट और असत्य से भरे विश्व में अब और अधिक जीने की इच्छा नहीं रही है। वासना यही है कि जब यह शरीर शांत हो, उस समय निर्विकल्प समाधि की अवस्था हो, और कहीं भी किसी भी लोक में पुनर्जन्म हो तो एक जीवन-मुक्त के रूप में हो जिसमें जन्म से ही ज्ञान, भक्ति व वैराग्य की पूर्णता हो। इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी वासना नहीं है।
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किसी को उलाहना भी नहीं दे सकते और, शिकायत भी नहीं कर सकते, क्योंकि सारा विश्व तो विष्णु ही है। भगवान विष्णु ही स्वयं को ही इस विश्व के रूप में व्यक्त कर रहे हैं। सारी वासनाएं और अभीप्सा व अभीष्ट भी वे ही हैं। उनसे प्रेम तो है, लेकिन कोई अपेक्षा नहीं है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२२
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