Monday, 13 July 2026

हम किसका व कैसे ध्यान करें?

  हम किसका व कैसे ध्यान करें?

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(उत्तर) : हमें ऐसे ही व्यक्तियों के साथ सत्संग करना चाहिए जो दिन में २४ घंटे, सप्ताह में सातों दिन, निरंतर भगवान की चेतना में रहते हों। भारत के योगी परंपरागत रूप से भगवान शिव या भगवान विष्णु की अनंतता का ध्यान करते है। तत्व रूप में शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है, दोनों एक हैं। इनकी सिर्फ अभिव्यक्तियाँ ही पृथक पृथक हैं, जैसे एक सिक्के के दो पहलू होते हैं।
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ध्यान साधना से पूर्व हठयोग के कुछ व्यायाम कर लें, जो अनेक योगियों ने बताए हैं। परमहंस योगानन्द द्वारा सिखाये गए ऊर्जादायी व्यायाम मेरे लिए तो सर्वश्रेष्ठ हैं। "शिव संहिता" में सिखाई गई "महामुद्रा", और "घेरण्ड-संहिता" में सिखाये गए "त्रिबंध" और "पश्चिमोत्तानासन" ध्यान साधना में बहुत अधिक सहायक हैं। पश्चिमोत्तानासन के नियमित अभ्यास से कमर लचीली रहती है, और मरते दम तक कभी झुकती नहीं है। पश्चिमोत्तानासन के सही अभ्यास से ही महामुद्रा सिद्ध होती है। महामुद्रा का अभ्यास दिन में दो बार सायं-प्रातः किया जाता है। जब भी आलस्य आ रहा हो तब कभी भी कर सकते हैं। इस से आलस्य दूर होता है, और साधना में बड़ी सहायक है। नाक से सांस चलती रहे, नाक बंद न हो, इसके लिए हठयोग में नेति आदि की दो-तीन क्रियाएँ सिखाई गयी हैं। योगियों के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है --"खेचरी मुद्रा"। पद्मासन में खेचरी मुद्रा लगाकर भ्रूमध्य में ध्यान करने को "शांभवी मुद्रा" कहते हैं। ध्यान साधना के लिए शांभवी मुद्रा ही सर्वश्रेष्ठ है। यह भगवान शिव की मुद्रा है, भगवान शिव इसी में ध्यान करते हैं। खेचरी सिद्ध करने के लिए योगिराज श्रीश्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय ने तालव्य-क्रिया बताई है लेकिन उसका अभ्यास युवावस्था के आरंभ से ही करना पड़ता है। प्रोढ़ावस्था में वह सिद्ध नहीं होती। प्रोढ़ लोगों के लिए या उनके लिए जो खेचरी नहीं कर सकते हैं, वे अपना ध्यान नभो-मुद्रा में करें। जीभ को ऊपर की ओर मोड़कर तालू से सटाकर रखने को नभो-मुद्रा कहते हैं। इसका भी अभ्यास करना पड़ता है। ध्यान के लिए पद्मासन या सिद्धासन में बैठें। यदि इनमें नहीं बैठ सकते तो सुखासन में बैठें। सुखासन में भी नहीं बैठ सकते तो बिना हत्थे की एक लकड़ी की कुर्सी पर बैठ जाएँ, लेकिन कुर्सी के नीचे एक कंबल बिछा लें। कमर हर परिस्थिति में सीधी रहे, इसके लिए नितंबों के नीचे एक पतली गद्दी लगा लें। जिनकी कमर झुक गई है उनको इस जन्म में सिद्धि नहीं मिल सकती, उन्हें दुबारा जन्म लेना पड़ेगा। पहले योगी अपनी साधना स्वाभाविक रूप से मरे हुए हिरण या बाघ की खाल पर बैठ कर करते थे। लेकिन आजकल हिरण या बाघ की खाल को घर में रखना भी कानूनी अपराध है। इसमें गिरफ्तारी भी हो सकती है।
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ध्यान के लिए हठयोग के अनुलोम-विलोम के साथ साथ उज्जायी प्राणायाम का अभ्यास होना बहुत आवश्यक है। उज्जायी का महत्व अभी समझ में नहीं आयेगा, लेकिन कुछ समय के बाद पता चलेगा कि यह कितना महत्वपूर्ण है।
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ध्यान साधना का आरंभ कूटस्थ में ध्यान करते हुए अजपा-जप से होता है। यह एक वैदिक साधना है जिसे हंसःयोग और हंसवतिऋक भी कहते हैं। आठ खंडों की "तपोभूमि नर्मदा" नामक पुस्तक के पांचवे खंड में इसके बारे में वेदों और उपनिषदों के प्रमाण देकर बहुत विस्तार से बताया गया है।
गुरु-प्रदत्त बीजमंत्र का श्रवण करते करते उसी में स्वयं का विलय हो जाता है। ध्यान की गहराई में स्वयं का कोई पृथक बोध नहीं रहता। हम उपास्य के साथ एक हो जाते हैं। ध्यान अपने उपास्य का ही किया जाता है।
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भगवान की जब भी कृपा होगी वे किसी श्रौत्रीय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु के रूप में हमारे पास आ जाते हैं। उस समय हमें पता चल जाता है। सदगुरु का एकमात्र कार्य अपने शिष्य को ईश्वर की प्राप्ति करना होता है। अन्य बातों में कोई रुचि उनकी नहीं होती। किसी भी साधक में यदि सत्यनिष्ठा, श्रद्धा और विश्वास है तो ईश्वर प्राप्ति से उसे कोई नहीं रोक सकता।
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सभी को शुभ कामनाएँ और नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२३

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