Monday, 13 July 2026

मेरे लिए गुरु-रूप परमात्मा की उपासना का उद्देश्य ---

 मेरे लिए गुरु-रूप परमात्मा की उपासना का उद्देश्य ---

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"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं,
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम्,
भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि ||" (गुरुगीता, स्कंदपुराण)
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मुझे लोक-परंपरानुसार गुरु पूजा करने में कठिनाई होती है, इसलिए अपना एकांत ही मुझे प्रिय है, कोई समूह नहीं। मेरे द्वारा प्रतीकात्मक रूप से गुरु-पादुकाओं की ही पूजा हो सकती है, उनके देह की नहीं। गुरु कोई देह नहीं थे, वे तो तत्व थे। अतः उनके देह रूपी चित्र की पूजा मुझसे नहीं होती। उनके चित्र या मूर्ति को श्रद्धा-सुमन ही अर्पित कर सकता हूँ, पूजा तो उनकी पादुकाओं (खड़ाऊ) की ही कर सकता हूँ, अन्यथा नहीं। इसीलिए मेरी किसी समूह से बनती नहीं है।
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मैं गुरु और ईश्वर में कोई भेद नहीं करता। साधनाकाल के आरंभ में भी यही भाव रहता था कि मैं तो निमित्त मात्र हूँ, सारी साधना गुरु महाराज ही कर रहे हैं। फिर गुरु महाराज से भी कोई भेद नहीं रहा। अब तो यह भाव रहता है कि सारी साधना स्वयं परमात्मा ही कर रहे हैं, मैं तो एक निमित्त मात्र हूँ। गुरु और परमात्मा एक हैं, उनमें कोई भेद नहीं है।
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ध्यान की गहनता में -- मुझमें, गुरु में, और परमात्मा में भी कोई भेद नहीं रहता। न तो मैं कहीं पर होता हूँ, न गुरु रहते हैं, सिर्फ परमात्मा ही रहते हैं। परमात्मा अपनी उपासना स्वयं ही करते हैं। परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी का भी अस्तित्व नहीं रहता है।
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ध्यान के समय उत्तरा-सुषुम्ना (आज्ञाचक्र व सहस्त्रार के मध्य) में एक विराट श्वेत ज्योति के दर्शन होते थे, वही मेरे लिए उपास्य होती थी। फिर उसका स्थान बदलने लगा। वह ज्योति इस शरीर से बाहर निकल कर अनंत की विराटता के साथ एक हो गई, तो निज चेतना भी उस विराटता के साथ एक होने लगी। अब तो वह अनंत विराटता ही मेरा शरीर बन गई है। परमात्मा तो उससे भी परे परमज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में आभासित होते हैं। उन ज्योतिर्मय ब्रह्म के साथ एकत्व ही उपासना का उद्देश्य रह गया है। अन्य कोई उद्देश्य नहीं है। उनका आकर्षण बड़ा प्रबल है।
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एक बार यह जानने की इच्छा हुई कि जब मैं हूँ ही नहीं तो यहाँ कौन है? आगे जो अनुभव हुआ वह तो निषेधात्मक कारणों से नहीं बता सकता, लेकिन यह स्पष्ट हो गया कि एकमात्र अस्तित्व भगवान वासुदेव का है --
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
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गुरुगीता के अनुसार सद्गुरु कौन है --
"सर्वसन्देहसन्दोहनिर्मूलनविचक्षणः।
जन्ममृत्युभयघ्नो यः स गुरुः परमो मतः" (गुरुगीता श्लोक संख्या १७०)
अर्थात् - सर्व प्रकार के सन्देहों का जड़ से नाश करने में जो चतुर हैं, जन्म, मृत्यु तथा भय का जो विनाश करते हैं वे परमगुरु (सदगुरु) कहलाते हैं।
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पुनश्च मैं भगवान वासुदेव को नमन करता हूँ जो गुरु रूप में आए और मुझ अकिंचन का उद्धार किया। आध्यात्मिक दृष्टि से एकमात्र अस्तित्व उन्हीं का है। उनके सिवाय कोई अन्य नहीं है, मैं भी नहीं --
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥११:३९॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
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"बंदऊं गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥१॥
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥२॥
श्री गुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियं होती॥
दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के॥
सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहं जो जेहि खानिक॥
बंदउं गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥" (रामचरितमानस)
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ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२२

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