Sunday, 23 February 2025

पता नहीं, मेरा कल्याण कब होगा ---

 भगवान ने सुपात्रों की जो पात्रता बताई है, उनमें से एक भी मुझ में नहीं है। पता नहीं, मेरा कल्याण कब होगा। भगवान कहते हैं --

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"विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥१८:५२॥"
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥१८:५३॥"
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥१८:५४॥"
अर्थात् --
"विविक्त सेवी, लघ्वाशी (मिताहारी) जिसने अपने शरीर, वाणी और मन को संयत किया है, ध्यानयोग के अभ्यास में सदैव तत्पर तथा वैराग्य पर समाश्रित॥"
"अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह को त्याग कर ममत्वभाव से रहित और शान्त पुरुष ब्रह्म प्राप्ति के योग्य बन जाता है॥
"ब्रह्मभूत (जो साधक ब्रह्म बन गया है), प्रसन्न मन वाला पुरुष न इच्छा करता है और न शोक, समस्त भूतों के प्रति सम होकर वह मेरी परा भक्ति को प्राप्त करता है॥"
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२३ जून २०२४

जिन के हृदय में इन्द्रीय सुखों की कामना भरी पडी है वे आध्यात्म के क्षेत्र में न आयें ---

जिन के हृदय में इन्द्रीय सुखों की कामना भरी पडी है वे आध्यात्म के क्षेत्र में न आयें, उन्हें लाभ की बजाय हानि ही होगी| साधना में विक्षेप ही सब से बड़ी बाधा है| विक्षेप उन्हीं को होता है जिनके विचार वासनात्मक होते हैं| जिनके हृदय में वासनात्मक विचार भरे पड़े हैं उन्हें किसी भी तरह की ध्यान साधना नहीं करनी चाहिए अन्यथा लाभ की बजाय हानि ही होगी| वासनात्मक विचारों से भरा ध्यान साधक निश्चित रूप से आसुरी शक्तियों का उपकरण बन जाता है| इसीलिए पतंजलि ने यम-नियमों पर इतना जोर दिया है| गुरु गोरखनाथ तो अपने शिष्यों के लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य की पात्रता अनिवार्य रखते थे| स्वामी विवेकानंद ने भी ध्यान साधना से पूर्व ब्रह्मचर्य को अनिवार्य बताया है| जिन लोगों का मन वासनाओं से भरा पडा है वे बाहर ही रहें, उन्हें भीतर आने की आवश्यकता नहीं है|
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर

१८ फरवरी २०१९ 

आध्यात्म की गूढ बातें, गुरुकृपा से अनुभूतियों द्वारा ही समझ में आती हैं ---

पिछले कई वर्षों से मैं फेसबुक पर आध्यात्म और हिन्दू राष्ट्रवाद के छोटे-मोटे लेख लिखता आया हूँ। स्वयं के भावों को व्यक्त करने की अदम्य उत्कंठा ही लिखने को बाध्य करती थी। अब हृदय पूरी तरह तृप्त है। अवशिष्ट जीवन परमात्मा को समर्पित है। किसी भी तरह की कोई चाहत नहीं है, पूरा मार्गदर्शन भगवान से प्राप्त है, और किसी भी तरह का कोई संशय नहीं है।
आध्यात्म की गूढ बातें -- गुरुकृपा से अनुभूतियों द्वारा ही समझ में आती हैं, अतः सार्वजनिक मंच पर उन की चर्चा करना व्यर्थ है।
एक सामान्य व्यक्ति के लिए तो धीरे-धीरे मानसिक रूप से निरंतर राम नाम का जप ही सर्वश्रेष्ठ साधना है।
जहाँ तक आध्यात्म की बात है, कोई ऐसा प्रश्न, संशय, शंका या जिज्ञासा मेरे समक्ष नहीं है, जिसका समाधान अभी तक मुझे नहीं हुआ हो। सारा मार्ग पूर्णतः स्पष्ट है। अतः अब और कुछ लिखने को कुछ बचा ही नहीं है। भगवान स्वयं सामने आकर बैठ गए हैं, और इधर-उधर कहीं भी नहीं देखने दे रहे हैं। उनको छोड़कर अन्यत्र कहीं दृष्टि कर भी नहीं सकता। आप सब महान आत्माओं को नमन !! ॐ तत्सत् !!

कृपा शंकर
११ अप्रेल २०२२



जीवन में परमात्मा की निरंतर अभिव्यक्ति ही धर्म है ---

जीवन में हम धर्म और आध्यात्म की जो बड़ी बड़ी बातें और चर्चा करते हैं, वे सब मन को बहलाने का एक मनोरंजन मात्र ही है| उस से कुछ क्षणों के लिए मन में पवित्रता तो आती है पर उस से अधिक कुछ भी नहीं| धर्म की अभिव्यक्ति तो मनोनिग्रह से होती है, मनोरंजन से नहीं| धर्म तो अपनी चेतना में जीया जाता है, वह निज जीवन में निरंतर अभिव्यक्त हो|

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मेरी प्रत्यक्ष साधनाजन्य अनुभूति तो यह है कि निज "जीवन में परमात्मा की निरंतर अभिव्यक्ति ही धर्म है"| यह मेरी साधनाजन्य प्रत्यक्ष अनुभूति है अतः मेरे लिए यही सत्य है|
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किसी भी तरह के मायावी शब्दजाल रूपी घोर अरण्य में मैं अब और खोना नहीं चाहता| "परमात्मा एक अनुभूत सत्य है"| वास्तव में परमात्मा ही सत्य है और परमात्मा ही प्रकाश है| जहाँ परमात्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति नहीं है, वह असत्य, अंधकार और अधर्म है|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
७ नवंबर २०१९

सर्वाधिक दुर्लभ है परमात्मा के प्रति परमप्रेम, उन्हें पाने की अभीप्सा, सदगुरू, सत्संगति और ब्रह्मविचार --

जहाँ तक आध्यात्म का संबंध है, परमात्मा की परम कृपा से स्वयं के लिए किसी भी प्रकार का कण मात्र भी कोई संशय नहीं है, सारा परिदृश्य और मार्ग स्पष्ट है| मार्ग में कहीं भी अंधकार नहीं है|

"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्‌| यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्‌||"
"मूक होई वाचाल, पंगु चढ़ै गिरिवर गहन| जासु कृपा सु दयाल, द्रवहु सकल कलिमल दहन||"
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वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण, गुरु महाराज और सूक्ष्म जगत के उन सभी महात्माओं को मैं नमन करता हूँ, जिन्होनें समय समय पर मेरी रक्षा और मार्गदर्शन किया है| उनका मैं सदैव ऋणी हूँ| सारा जीवन उन्हीं को समर्पित है|
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च |
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ||
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व |
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ||"
"ब्रह्मानन्दं परम सुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं,
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् |
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षीभूतम्,
भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरूं तं नमामि ||"
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दुर्लभ क्या है? सर्वाधिक दुर्लभ है परमात्मा के प्रति परमप्रेम, उन्हें पाने की अभीप्सा, सदगुरू, सत्संगति और ब्रह्मविचार| ये मिल गए तो भवसागर पार है, फिर और कुछ नहीं चाहिए|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ नवम्बर २०१९

यह संपूर्णता व विराटता -- भूमा-वासना है, जो सदा बनी रहे

 जिन की अनुकंपा से हम चैतन्य हैं, और जिन के प्रकाश से हमें स्वयं के होने का बोध है, वे ही हमारे परमप्रिय परमात्मा हैं, जिन का प्रेम हमें निरंतर मिल रहा है। हम उन को अपने हृदय का सर्वश्रेष्ठ प्रेम दें, और उन की चेतना में आनंदमय रहें। परमप्रेम हमारा स्वभाव है, और आनंद उसकी परिणिती। मानसिक भावुकता से ऊपर उठें, और जब भी समय मिले, कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम का ध्यान करते हुए आध्यात्म की परावस्था में रहें। हमारी हर सांस उनके प्रति समर्पित हो।

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परमात्मा की अनंतता हमारी देह है, और समस्त सृष्टि हमारा परिवार। यह संपूर्णता व विराटता -- भूमा-वासना है, जो सदा बनी रहे।
जो हम ढूँढ़ रहे हैं या जो हम पाना चाहते हैं, वह तो हम स्वयं हैं, -- यह वेदान्त-वासना है।
हम अनन्य हैं, हमारे से अन्य कोई नहीं है। यह -- अनन्य-योग है।
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गहराई में जाने के लिए वेदान्त के दृष्टिकोण से विचार कीजिए। भगवान कहते हैं --
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।
"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥९:३०॥"
अर्थात् अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भजन करता है, तो उसको साधु ही मानना चाहिये। कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥"
अर्थात् हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है| तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता||
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परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब को नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
६ मई २०२१

किसी पर दोषारोपण मत करो। हम जो कुछ भी हैं, वह अपने कर्मों से हैं ---

आध्यात्म में किसी पर दोषारोपण मत करो। हम जो कुछ भी हैं, अपने कर्मों से हैं। अपने कर्मफलों को भोगने के लिए ही हमें यह जन्म मिला है। अपने विगत के कर्मफलों से मुक्त होने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में बहुत अच्छा और सरल मार्ग बताया है| स्वाध्याय और साधना तो स्वयं को ही करनी होगी|

यदि पर्वत का पानी तालाब में आता है तो पर्वत का क्या दोष? तालाब को स्वयं ही पर्वत से भी अधिक ऊँचा बनना होगा|
एड़ियाँ ऊँची कर के पंजों पर खड़े होने, या दूसरों के सिर काट कर हम बड़े नहीं हो सकते|
आध्यात्म में कुछ पाने या प्राप्ति की कामना एक मरीचिका है। जो कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है, वह तो हम स्वयं हैं।
कृपा शंकर १८ जनवरी २०१८