Wednesday, 9 June 2021

बिना भक्ति के भगवान नहीं मिल सकते ---

बिना भक्ति के भगवान नहीं मिल सकते। अन्य साधन भी तभी सफल होते हैं, जब ह्रदय में भक्ति होती है। "मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा, किएँ जोग तप ग्यान बिरागा।" जीवन का हर अभाव एक रिक्त स्थान है, जिसकी पूर्ति भगवान की भक्ति से ही हो सकती है। भक्ति-सूत्रों में भक्ति को परमप्रेम कहा गया है। प्रेम हमारा स्वभाव है। अतः भक्ति हमारा स्वभाव है।

निरंतर समष्टि के कल्याण की कामना, ऊर्ध्वगामी चेतना, और हृदय में परमात्मा के प्रति कूट कूट कर भरा हुआ प्रेम -- ये ही भक्त होने के लक्षण हैं।

जैसे सारी नदियाँ महासागर में गिरती हैं, वैसे ही हमारे सारे विचार भगवान तक पहुँचते हैं। हमारा हर विचार हमारा कर्म है, जिसका फल मिले बिना नहीं रहता।
भगवान् से प्रेम करेंगे तो उनकी सृष्टि भी हमसे प्रेम करेगी। जैसा हम सोचेंगे, वैसा ही वही कई गुणा बढ़कर हमें मिलेगा।
सब में सब के प्रति प्रेमभाव हो, यही मेरी प्रार्थना भगवान से है।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
८ जून २०२१

एक अनुभवजन्य पुरानी स्मृति --- (हनुमान का अर्थ)

हनुमान का अर्थ -- अपने मान को नष्ट करना है। जिस ने अपने अहं यानि अभिमान को नष्ट कर दिया है, वही हनुमान है। भक्ति और सेवा के क्षेत्र में हनुमान जी हम सब के आदर्श हैं। भक्ति और सेवाभाव हो तो हनुमान जी जैसा हो। एक बार ध्यान करते-करते बड़ा आनंददायक अनुभव हुआ जिसमें लगा कि मेरा सारा शरीर जल कर भस्म हो गया है, सिर्फ मेरुदंड ही बचा है, और कुछ भी नहीं है। मेरुदंड में भी सिर्फ सुषुम्ना नाड़ी ही बची थी। अचानक हनुमान जी का स्मरण हुआ और वे मूलाधार चक्र में प्रकट हुये और बड़ी शान से सभी चक्रों को पार करते-करते सहस्त्रार तक पहुँच गए। वहाँ कुछ देर रुक कर भगवान को प्रणाम कर के सुषुम्ना मार्ग से बापस नीचे आये और बिना रुके फिर बापस ऊपर चले गए। पाँच-छः बार उन्होने इस तरह की परिक्रमा की और अचानक ही बचा-खुचा सब कुछ जलाकर भस्म कर दिया, और चले गए। अब न तो मेरा शरीर था, न मेरुदंड, सहस्त्रार भी नहीं। कुछ भी नहीं बचा था। सब कुछ जलकर भस्म हो गया था।

सिर्फ एक परम ज्योतिर्मय अनंत आलोक बचा था और कुछ भी नहीं। यह अनुभव दुबारा तो कभी नहीं हुआ, और होगा भी नहीं। लेकिन इसने एक बहुत बड़ा पाठ पढ़ा दिया, जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता। ॐ ॐ ॐ !!
७ जून २०२१

सीतां नतोहं रामवल्लभाम् ---

 सीतां नतोहं रामवल्लभाम् ---

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जगन्माता एक ही हैं, सभी रूप उन्हीं के हैं। अपने-अपने स्वभाव के अनुसार उनकी विभिन्न अभिव्यक्तियों में से कोई सी एक हमें प्रिय लगती हैं। महात्माओं के मुख से सुना है कि जब परमशिव परमात्मा ने संकल्प किया कि -- "एकोsहं बहुस्याम्", तब ऊर्जा और प्राण की उत्पत्ति हुई। ऊर्जा से जड़ पदार्थों का निर्माण हुआ, और प्राण से उनमें चैतन्यता आई। दोनों के ही पीछे परमशिव का संकल्प है। वे इन दोनों से ही परे हैं।
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प्राण-तत्व ही जगन्माता है। प्राण-तत्व ही माँ का रूप है, और प्राण-तत्व ही शक्ति है। प्राण के बिना सब निर्जीव हैं। तंत्र-मार्ग के बहुत बड़े एक ज्ञानी सिद्ध महात्मा के साथ मैं दो बार कुछ सीखने के उद्देश्य से कई दिनों तक रहा था। उनसे बहुत कुछ सीखा। उन्होने ही मुझे समझाया था कि पंचप्राणों के पाँच सौम्य, और पाँच उग्र रूप ही दस महाविद्यायें हैं; गणेश जी का विग्रह -- ओंकार का प्रतीक है; और गणेश जी स्वयं ओंकार हैं, जिनके गण -- ये पंचप्राण हैं।
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विद्वान लोग "योग" के बारे में कुछ भी कहें, लेकिन योगियों के अनुसार -- महाशक्ति कुंडलिनी का परमशिव के साथ मिलन ही योग है। महाशक्ति कुंडलिनी -- प्राण-तत्व का ही घनीभूत रूप है।
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लौकिक जगत में आराधना के लिए हमें जगन्माता के किसी न किसी विग्रह की आवश्यकता पड़ती ही है। इसकी आवश्यकता मैं स्वयं अनुभूत करता था। एक बार यही गहन चिंतन कर रहा था कि माता का कौन सा स्वरूप मेरे लिए सबसे अधिक उपयुक्त है। कुछ समझ में नहीं आया तो भगवान से प्रार्थना की। अचानक ही भगवती सीता जी का विग्रह मेरे समक्ष मानस में आया, और रामचरितमानस के आरंभ में गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखी उनकी यह वंदना भी याद आई --
"उद्भव स्थिति संहार कारिणीं क्लेश हारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं राम वल्लभाम्॥"
यह एक अति गोपनीय रहस्य की बात है जिसे मैंने आज तक किसी को नहीं बताया है कि भगवती सीता जी का विग्रह ही मेरे मानस में आता है जब भी जगन्माता की याद आती है।
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मैं योगमार्ग का एक निमित्तमात्र साधक हूँ। ध्यान में वेदान्त-वासना रहती है, अतः ध्यान तो कूटस्थ सूर्य-मण्डल में सर्वव्यापी पुरुषोत्तम परम-पुरुष का ही होता है। वे ही ज्योतिर्मय ब्रह्म है, वे ही विष्णु है, वे ही महेश्वर हैं, और वे ही परमशिव हैं। कर्ता तो साकार रूप में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं। मेरे लिए इस में कोई जटिलता नहीं है। किसी भी तरह का कोई संशय या भ्रम मुझे नहीं है।
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जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुणा निधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपा निर्मल मति पावउँ॥
पुनि मन वचन कर्म रघुनायक। चरण कमल बंदऊ सब लायक॥
राजिव नयन धरे धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुखदायक॥
सीताराम चरित अति पावन। मधुर सरिस अरू अति मन भावन॥
मंगल भुवन अमंगल हारि। द्रवऊँ सो दशरथ-अजिर बिहारी॥
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥
जय सियाराम जय जय सियाराम !!
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परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब निजात्मगण को सविनय सादर सप्रेम नमन !! आप सब की कीर्ति और यश अमर रहे। जय जय श्री सीताराम !!
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
६ जून २०२१

हमारा एकमात्र शाश्वत सम्बन्ध भगवान से है, अन्य किसी से भी नहीं ---

 हमारा एकमात्र शाश्वत सम्बन्ध भगवान से है, अन्य किसी से भी नहीं ---

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जब हमारा जन्म इस मनुष्य शरीर में हुआ था, तब जन्म से पूर्व, भगवान ही हमारे साथ थे। इस शरीर की मृत्यु के पश्चात भी भगवान ही हमारे साथ रहेंगे। जन्म लेने पर भगवान का ही प्रेम हमें माता-पिता के माध्यम से मिला। भाई-बहिन, सभी संबंधियों, और सभी मित्रों के माध्यम से जो भी प्रेम हमें मिला वह भगवान का ही प्रेम था; अन्य सब एक माध्यम थे। हमारा अस्तित्व भगवान का ही एक संकल्प या उन के मन की एक कल्पना मात्र है। कोई अपना पराया नहीं है। गुरु-शिष्य का सम्बन्ध भी भगवान से ही सम्बन्ध है। गुरू भी एक निश्चित भावभूमि तक ले जा कर छोड़ देता है, आगे की यात्रा तो स्वयं को ही करनी पड़ती है। फिर न कोई गुरु है और न कोई शिष्य, एकमात्र भगवान ही सब कुछ हैं। सारे सम्बन्ध एक भ्रम मात्र हैं।
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हमारा अस्तित्व भगवान की ही एक अभिव्यक्ति है। वे ही इस देह को जीवंत रखे हुए हैं, वे ही इस हृदय में धड़क रहे हैं, वे ही इन आंखों से देख रहे हैं, इन हाथ-पैरों से वे ही सारा कार्य कर रहे हैं। हमारा पृथक अस्तित्व एक माया और भ्रम है। हमारा एकमात्र लक्ष्य सिर्फ उन के परमप्रेम की अभिव्यक्ति और उन में समर्पण है।
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जो भी हमें उन की चेतना से दूर ले जाए वह कुसंग है जो सर्वदा त्याज्य है। जो उन का प्रेम हमारे में जागृत करे वह सत्संग है। जब हमें भूख लगती है, तब भोजन तो स्वयं को ही करना पड़ता है। दूसरे का किया भोजन हमारा पेट नहीं भर सकता। वैसे ही स्वाध्याय, सत्संग और साधना तो स्वयं को ही करनी होगी। प्रभु के प्रेम में निरंतर डूबे रहना ही सत्संग है, और प्रभु को विस्मृत करना कुसंग है।
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श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान का निर्देश है कि निरंतर हर समय, अंत समय तक उनका ही स्मरण रहे --
"अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥८:४॥"
"अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्‌ ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥८:५॥"
"यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्‌ ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥८:६॥"
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्‌॥८:७॥"
"अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्‌॥८:८॥"
"कविं पुराणमनुशासितार-मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्‌॥८:९॥"
"प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥८:१०॥"
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥८:१२॥"
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥८:१३॥"
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मुझे तो पूरी श्रद्धा और विश्वास है कि भगवान ही हर समय मुझे याद करेंगे, इस देह के अंतकाल में भी। यह जीवन उन्हीं का है, यह देह भी उन्हीं की है, जो जला कर भस्म कर दी जाएगी, लेकिन मैं तो उनके हृदय में ही निरंतर सदा रहूँगा।
"वायुरनिलममृतमथेदं भस्मांतं शरीरम्‌।
ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर॥" (ईशावास्योपनिषद मंत्र १७)
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भगवान हैं, इसी समय हैं, हर समय हैं, यहीं पर हैं, सर्वत्र हैं, मेरे समक्ष हैं, हर समय मेरे साथ हैं। उन की असीम कृपा सब पर निरंतर बनी रहे।
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
५ जून २०२१

साधना स्वयं को ही करनी होगी. दूसरा अन्य कोई भी नहीं है ---

आध्यात्मिक साधना के क्षेत्र में जो अपेक्षा हम दूसरों से करते हैं, वह सर्वप्रथम स्वयं के जीवन में चरितार्थ करें। दूसरा अन्य कोई भी नहीं है।
मनुष्य देह, बुद्धि, भक्ति व सत्संग लाभ पा कर भी परमात्मा का चिंतन-मनन और ध्यान न करना -- प्रमाद यानि मृत्यु है। भगवान ने २४ घंटे हमें दिये हैं, उसका दसवाँ भाग यानि कम से कम ढाई से तीन घंटे हमें भगवान की साधना करनी चाहिये।

किसी भी आचार्य, साधू, संत, महात्मा का स्वयं का आचरण कैसा है, और उन के अनुयायी आध्यात्मिक रूप से कितने उन्नत हैं? -- यही मापदंड है उनकी महत्ता का। किसी के पास जाते ही स्वतः ही भक्ति जागृत हो जाये, शांति मिले, व सुषुम्ना नाड़ी चैतन्य हो जाये, तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से एक महात्मा है। जिसमें लोभ और अहंकार भरा हुआ है, वह साधु नहीं हो सकता।

साधू-संत -- पवित्रात्मा, परोपकारी, सदाचारी, त्यागी, बुद्धिमान, समभावी, भयमुक्त, विद्वान और ईश्वरभक्त होते हैं। साधू-संतों की तपस्या से ही समाज में कुछ भलाई है। साधु-संत जहाँ भी रहते हैं, वह भूमि पवित्र हो जाती है। उनका सम्मान और सेवा करना हमारा धर्म है।

यह न्यू वर्ल्ड ऑर्डर क्या है? ---

यह "New World Order" क्या है? ये बड़े ही भ्रामक शब्द हैं। हो सकता है यह भविष्य की किसी संभावित नई राजनीतिक व्यवस्था का सूचक हो, लेकिन अब तक तो अमेरिका व यूरोप के दानव सेठों, सरकारों और अन्य साम्राज्यवादियों ने अपने छल-कपट व षड़यंत्रों से इन शब्दों का प्रयोग दुनियाँ को ठगने के लिए ही किया है। भारत इसका बहुत अधिक व बुरी तरह शिकार रहा है।

.दवा पहले बन जाती है, बीमारी बाद में फैलाई जाती है। दुनिया को कूटनीति, भय व प्रलोभन से मजबूर किया जाता है कि उसी दवा को लें। जब पूंजीपति दानव सेठों की तिजोरियाँ भर जाती हैं, तब उस दवा को बेकार बता कर कुछ और नई चीज ले आई जाती हैं। दुनियाँ मरे तो मरे।

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दुनिया के देशों को पिछड़ा व गुलाम बनाए रखने के लिए दानवी समाजों द्वारा उन्हें ऐसी नीतियों का पालन करने को मजबूर कर दिया जाता है कि वे सदा पिछड़े ही रहें। वहाँ के कुछ राजनेताओं, न्यायाधीशों व अधिकारियों को खरीद लिया जाता है। तरह तरह के भाड़े के आंदोलन वहाँ खड़े कर दिये जाते हैं। और ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दी जाती हैं कि वे देश व समाज पिछड़े ही रहें। तरह तरह के भ्रामक नारों, मज़हबी पंथों व समाजों का निर्माण दूसरों को पराधीन बनाने के लिए किया जाता है।
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अब तक तो ये ही world order रहे हैं। अब देखो क्या नई व्यवस्था (New World Order) आती है? सिर्फ सनातन धर्म ने ही परोपकार और वसुधैव कुटुम्बकम् की परिकल्पना की है, अन्य किसी ने भी नहीं। विषय बहुत गहरा और लंबा है। अतः आपके विवेक पर छोड़ रहा हूँ। आप स्वयं इस विषय पर विचार करें। ॐ तत्सत् !!
२ जून २०२१
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पुनश्च :---
देवों और दानवों में सृष्टि के आदिकाल से ही सदा संघर्ष रहा है। कभी देव जीते हैं, तो कभी दानव। सनातन धर्म ही एकमात्र दैवीय संस्कृति है, अन्य सब दानवी हैं। वर्तमान भारत, दानव समाजों से पददलित है, जिसका त्राण सत्यनिष्ठा से श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेशों के आचरण से ही हो सकता है। गीता के उपदेश ही सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा व वैश्वीकरण करेंगे। जब तक गीता का ज्ञान हमारे आचरण में है, तब तक भारत व सनातन-धर्म को कोई नष्ट नहीं कर सकता। ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!

मेरी उपासना, और मेरा स्वधर्म ---

 मेरी उपासना, और मेरा स्वधर्म ---

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जब भी परमात्मा के प्रति हृदय में प्रेम उमड़ता है, आँखें स्वतः ही बंद हो जाती हैं, और दृष्टि कूटस्थ में चली जाती है। कूटस्थ -- एक अनंत विस्तारमय चेतना है, जिसमें सारी सृष्टि समाहित है -- सारी आकाश गंगाएँ, सारे चाँद, तारे, नक्षत्र और जो भी कुछ भी सृष्ट व असृष्ट है, वह सब उस के भीतर है, बाहर कुछ भी नहीं। उसका केंद्र सर्वत्र है, परिधि कहीं भी नहीं, सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश है, कहीं कोई अंधकार नहीं। सिर्फ प्रेम ही प्रेम, और आनंद ही आनंद है। वह अनंत विस्तार और उस से परे जो कुछ भी है, वे ही मेरे परमप्रिय परमात्मा हैं, वे ही मेरे परमेष्ठि गुरु हैं, और वह ही मैं हूँ, यह नश्वर देह नहीं, जो उनका एक उपकरण मात्र है। यह सृष्टि चलायमान है जिसमें से एक अद्भुत मधुर ध्वनि निःसृत हो रही है। वह ध्वनि, प्रकाश, प्रेम और आनंद -- मैं ही हूँ। यही मेरी उपासना, यही मेरा स्वधर्म और यही मेरा अस्तित्व है| ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
२ जून २०२०