Friday, 29 December 2017

या तो अभी या फिर तीन-चार जन्मों के पश्चात .....

या तो अभी या फिर तीन-चार जन्मों के पश्चात .....
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यह मुझे ही नहीं सभी को जीवन में आध्यात्मिक दृष्टी से कई बार मार्ग दर्शन प्राप्त होता है जिसकी हम प्रायः उपेक्षा कर देते हैं| बार बार उपेक्षा कर देने पर अनेक कष्ट पाकर फिर कई जन्मों के पश्चात बापस उस चेतना में आते हैं जहाँ वह मार्गदर्शन मिलता है| पर तब तक कई जन्म व्यर्थ चले जाते हैं|
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हर निष्ठावान व्यक्ति के समक्ष दो मार्गों में से अनिवार्य रूप से एक मार्ग चुनने का विकल्प अवश्य आता है, जहाँ तटस्थ नहीं रह सकते| एक तो ऊर्ध्वगामी मार्ग है जो सीधा परमात्मा की ओर जाता है, दूसरा अधोगामी मार्ग है जो सांसारिक भोग विलास की ओर जाता है| अति तीव्र आकर्षण वाला यह अधोगामी मार्ग विष मिले हुए शहद की तरह है जो स्वाद में तो बहुत मीठा है पर अंततः कष्टमय और दुःखदायी है|
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योगमार्ग के अनुयायी हर उस साधक को जिसको कूटस्थ चैतन्य की अनुभूति होती है, ध्यान में उन सूक्ष्म लोकों का आभास या दर्शन अवश्य होता हैं जो उसके लिए कल्याणकारी हैं| साथ साथ एक अति प्रबल अधोगामी आकर्षण की भी अनुभूति होती है जो सांसारिक ऐश्वर्य का प्रलोभन देकर उस को अपनी ओर आकर्षित करता है| इस अधोगामी आकर्षण को ही अब्राहमिक मतों ने "शैतान" का नाम दिया है| "शैतान" कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि वासनाओं के प्रति वह अधोगामी आकर्षण ही है जिसे हम माया भी कह सकते हैं| इस माया की ओर आकर्षित होने वाले को तीन-चार जन्म व्यतीत हो जाने के पश्चात ही होश आता है और उसे वह विकल्प फिर मिलता है|
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यह संसार एक पाठशाला है जहाँ सब एक पाठ पढ़ने के लिए आते हैं| वह पाठ निरंतर पढ़ाया जा रहा है| जो उसे नहीं सीखते वे दुःख और कष्टों द्वारा उसे सीखने के लिए बाध्य कर दिए जाते हैं| संसार में दुःख और कष्ट आते हैं, उनका एक ही उद्देश्य है .... मनुष्य को सन्मार्ग पर चलने को बाध्य करना|
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वह मार्गदर्शन सभी को मिलता है| कोई यदि यह कहे कि उसे कभी भी कोई मार्गदर्शन नहीं मिला है तो वह असत्य बोल रहा है|
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सभी का कल्याण हो| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!

कृपा शंकर
३० दिसंबर २०१७

३१ दिसंबर को निशाचर रात्री है, बच कर रहें .....

३१ दिसंबर को निशाचर रात्री है, बच कर रहें .....
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३१ दिसंबर की रात्री को अनेक लोगों द्वारा अत्यधिक मदिरापान, अभक्ष्य भोजन, फूहड़ नाच गाना, और अमर्यादित आचरण होता है | "निशा" रात को कहते हैं, और "चर" का अर्थ होता है चलना या खाना | जो लोग रात को अभक्ष्य भोजन करते हैं, या रात को अनावश्यक घूम कर आवारागर्दी करते हैं, वे निशाचर हैं | प्राचीन भारत में सिर्फ तामसिक असुर लोग ही रात को खाते थे | अन्य लोग रात को नहीं खाते थे | ३१ दिसंबर की रात को लगभग पूरी दुनिया निशाचर बन जाएगी | अतः बच कर रहें, सत्संग का आयोजन करें या भगवान का ध्यान करें |
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तीन चार साल पहिले हम चार-पाँच मित्रों ने ३१ दिसंबर की रात्री को कड़कड़ाती ठण्ड में श्मशान भूमि की नीरवता में रहकर तप करने वाले बाबा आनंदगिरी के साथ श्मशान भूमि के एक कमरे में सत्संग भजन व ध्यान किया था | वे भी बहुत प्रसन्न हुए | फिर दुबारा अगले वर्ष कोई मित्र तैयार नहीं हुआ |
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जिस रात भगवान का भजन नहीं होता वह राक्षस रात्री है, और जिस रात भगवान का भजन हो जाए वह देव रात्रि है | सबको शुभ कामनाएँ |


ॐ तत्सत् !ॐ ॐ ॐ !!
३० दिसंबर २०१७

हमें भस्म क्यों धारण करनी चाहिए ? .....

ब्रह्माण्ड के स्वामी को भस्म सर्वाधिक प्रिय क्यों ? हमें भस्म क्यों धारण करनी चाहिए ?
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(यह लेख थोड़ा लंबा है जो पूरा पढ़कर ही समझ में आयेगा)
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एक बार जब भगवान शिव समाधिस्थ थे तब मनोभव (मन में उत्पन्न होने वाला) मतिहीन कंदर्प (कामदेव) ने अन्य देवताओं के उकसाने पर सर्वव्यापी भगवान शिव पर कामवाण चलाया | भगवान शिव ने जब उस मनोज (कामदेव) पर दृष्टिपात किया तब कामदेव भगवान शिव की योगाग्नि से भस्म हो गया | कामदेव के बिना तो सृष्टि का विस्तार हो नहीं सकता अतः उसकी पत्नी रति बहुत विलाप करने लगी जिससे द्रवित होकर आशुतोष भगवान शिव ने मनोमय (कामदेव) की भस्म का अपनी देह पर लेप कर लिया, जिस से कामदेव जीवित हो उठा |
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भगवती माँ छिन्नमस्ता, कामदेव और उसकी पत्नी रति को भूमि पर पटक कर उनकी देह पर पर नृत्य करती हैं | फिर वे अपने ही हाथों से अपनी स्वयं की गर्दन काट लेती हैं | उनके धड़ से रक्त की तीन धाराएँ निकलती हैं जिनमें से मध्य की रक्तधारा का पान वे स्वयं करती हैं, और अन्य दो धाराओं का पान उनके दोनों ओर खड़ी वर्णिनी और डाकिनी करती हैं |
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(उपरोक्त दोनों का आध्यात्मिक अर्थ बहुत गहन है जिसे किसी सुपात्र को समझाने के लिए समय व बहुत धैर्य चाहिए | यहाँ फेसबुक पर यह बताना संभव नहीं है|)
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तपस्वी साधू लोग ठंडी और गर्मी से बचाव के लिए भस्म लेपन करते हैं | त्याग तपस्या और वैराग्य का प्रतीक यह भस्म स्नान रुद्रयामल तंत्र के अनुसार अग्नि-स्नान है जो भगवन शिव को सर्वाधिक प्रिय है | शैवागम के वर्णोद्धार तंत्र के अनुसार भस्म का "भ"कार स्वयं परमकुण्डलिनी है जो महामोक्षदायक और सर्व शक्तियों से युक्त है | स्म क्रियास्वरूप भूतकाल है |
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आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य की नाड़ी "उत्तरा सुषुम्ना" है जिस में प्रवेश कर कुंडलिनी, परमकुंडलिनी हो जाती है | योगमार्ग के साधक को अपनी चेतना निरंतर इसी उत्तरा सुषुम्ना में रखनी चाहिए और सहस्त्रार जो गुरुचरणों का प्रतीक है, पर ध्यान करना चाहिए| योगी के लिए आज्ञाचक्र ही उसका ह्रदय है | सहस्त्रार में स्थिति के पश्चात ही अन्य लोक भी दिखाई देने लगते हैं और अनेक सिद्धियाँ भी प्राप्त होने लगती हैं |
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ब्रह्माण्ड के स्वामी को भस्म सर्वाधिक प्रिय क्यों है ? यह योगाग्नि में जलकर भस्म हो कर परम पवित्र होने का सन्देश है | मृत्यु के पश्चात् देह को जलाने से सब कुछ नष्ट नहीं होता, भस्म शेष रह जाती है, जो हमारी नश्वर शाश्वत आत्मा की प्रतीक है | यह भस्म प्रदर्शित करती है कि संसार में सब कुछ नश्वर है, केवल भस्म अर्थात् आत्मा ही अमर, अजर और अविनाशी है | अतएव, भस्म (आत्मा) ही सत्य है और शेष सब मिथ्या | भगवान शिव देह पर भस्म धारण करते हैं क्योंकि उन के लिए एक आत्मा को छोड़कर संसार के अन्य सब पदार्थ निरर्थक हैं | यह भस्म ही हमें यह याद दिलाती है कि हमारा जीवन क्षणिक है | भगवान शिव पर भस्म चढ़ाना एवं भस्म का त्रिपुंड लगाना कोटि महायज्ञ करने के सामान होता है | भगवन शिव अपनी भक्त-वत्सलता प्रकट करते हैं अपने भक्तों के चिताभस्म को अपने श्रीअंग का भूषण बनाकर |
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कुछ शैव सम्प्रदायों के साधुओं के अखाड़ों में विभूति-नारायण की पूजा होती है | विभूति-नारायण ..... अखाड़े के गुरुओं की देह से उतरी हुई भस्म का गोला ही होता है, जिसे वेदी पर रखकर पूजा जाता है| कुछ वैष्णव सम्प्रदायों के वैरागी साधू भी देह पर भस्म ही लगा कर रखते हैं |
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"सोइ जानइ जेहि देहु जनाइ" भगवान जिसको कृपा कर के अपना ज्ञान देते है वो ही उन्हें जान सकता है | बाकी तो .... धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां .... वाली बात है | समस्त सृष्टि भगवान शिव का एक संकल्प मात्र यानि उनके मन का एक विचार ही है | भौतिक पदार्थों के अस्तित्व के पीछे एक ऊर्जा है, उस ऊर्जा के पीछे एक चैतन्य है, और वह परम चैतन्य ही भगवन शिव हैं | उनका न कोई आदि है और ना कोई अंत | सब कुछ उन्हीं में घटित हो रहा है और सब कुछ वे ही हैं | जीव की अंतिम परिणिति शिव है | प्रत्येक जीव का अंततः शिव बनना निश्चित है | उन्हें समझने के लिए जीव को स्वयं शिव होना पड़ता है | वे हम सब को ज्ञान, भक्ति और वैराग्य दें !
शिवमस्तु ! ॐ शिव ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
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कृपा शंकर
३१ मई २०१३

भस्म, त्रिपुंड एवं रुद्राक्षमाला धारण किये बगैर शिवपूजा उतनी फलदायिनी नहीं होती .....

भस्म, त्रिपुंड एवं रुद्राक्षमाला धारण किये बगैर शिवपूजा उतनी फलदायिनी नहीं होती .....
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इस विषय पर पुराणोक्त एक कथा है कि मतिहीन कामदेव ने ध्यानस्थ शिव जी को कामोद्दीप्त करने के लिए कामवाण चलाया था| जिस से शिव जी की समाधी भंग हुई और उनकी क्रोधाग्नि में कामदेव जल कर भस्म हो गया| कामदेव की पत्नी रति के करुण विलाप से द्रवित होकर आशुतोष भगवान शिव ने कामदेव के शरीर की भस्म को अपने शरीर पर लेप लिया और कामदेव को पुनर्जीवित कर दिया| मनोभव यानि मन से उत्पन्न होने वाले कंदर्प यानि कामदेव की भस्म को अपनी देह पर रमाकर भगवान शिव ने सस्नेह घोषणा की कि 'आज से भक्त/अभक्त सबके देहावाशेषों की भस्म ही मेरा श्रेष्ठ भूषण होगी|' शैव ग्रंथों में लिखा है कि --- भस्म, त्रिपुंड एवं रुद्राक्षमाला धारण किये बगैर शिवपूजा उतनी फलदायिनी नहीं होती| इसीलिए शिवभक्त भस्म, त्रिपुंड और रुद्राक्ष माला धारण करते हैं| यह कथा ब्रह्मचर्य और वैराग्य की महिमा को भी प्रकाशित करती है|
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भस्मलेप को अग्नि-स्नान माना जाता है| यामल तंत्र के अनुसार सात प्रकार के स्नानों में अग्नि-स्नान सर्वश्रेष्ठ है| भस्म देह की गन्दगी को दूर करता है| भगवान शिव ने अपने लिए आग्नेय स्नान को चुन रखा है| शैवागम के तन्त्र ग्रंथों में इस विषय पर एक बड़ा विलक्षण बर्णन है जो ज्ञान की पराकाष्ठा है| 'भ'कार शब्द की व्याख्या भगवान शिव पार्वती जी को करते हैं .....

"भकारम् श्रुणु चार्वंगी स्वयं परमकुंडली|
महामोक्षप्रदं वर्ण तरुणादित्य संप्रभं ||
त्रिशक्तिसहितं वर्ण विविन्दुं सहितं प्रिये|
आत्मादि तत्त्वसंयुक्तं भकारं प्रणमाम्यह्म्||"
महादेवी को संबोधित करते हुए महादेव कहते हैं कि हे (चारू+अंगी) सुन्दर देह धारिणी, 'भ'कार 'परमकुंडली' है| यह महामोक्षदायी है जो सूर्य की तरह तेजोद्दीप्त है| इसमें तीनों देवों की शक्तियां निहित हैं|
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यहाँ 'परमकुंडली' का अर्थ बताना अति आवश्यक है| मूलाधार से आज्ञाचक्र तक का मार्ग अपरा सुषुम्ना है| जब कुण्डलिनी महाशक्ति गुरुकृपा से आज्ञाचक्र को भेद कर सहस्त्रार में प्रवेश करती है तब वह मार्ग उत्तरा सुषुम्ना है| अपरा सुषुम्ना में कुण्डलिनी जागती है, और उत्तरा सुषुम्ना के मार्ग में यह "परमकुंडली" कहलाती है|
महादेव 'भ'कार द्वारा उस महामोक्षदायी परमकुण्डली की ओर संकेत करते हुए ज्ञानी साधकों की दृष्टि आकर्षित करते हुए उन्हें कुंडली जागृत कर के उत्तरा सुषुम्ना की ओर बढने की प्रेरणा देते हैं कि वे शिवमय हो जाएँ|
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शिवमस्तु ! ॐ स्वस्ति ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ मई २०१३

अंत मति सो गति ....

अंत मति सो गति .....
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गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि अंतकाल में भ्रूमध्य में ओंकार का स्मरण करो, निज चेतना को कूटस्थ में रखो आदि| अनेक महात्मा कहते हैं मूर्धा में ओंकार का निरंतर जप करो| योगी लोग कहते हैं कि आज्ञाचक्र के प्रति सजग रहो और ब्रह्मरंध्र में ओंकार का ध्यानपूर्वक जप करो आदि| इन सब के पीछे कारण हैं|
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मनुष्य जब स्वभाविक रूप से देहत्याग करता है यानी मरता है, उस से पहिले ही यह तय हो जाता है कि उसे कहाँ किस देह में और कैसे जन्म लेना है| इस देह को छोड़ने से पहिले ही दूसरी देह की भूमिका बन जाती है| अंत समय में जैसी मति होती है वैसी ही गति होती है| इस देह में ग्यारह छिद्र हैं जिनसे जीवात्मा का मृत्यु के समय निकास होता है ..... दो आँख, दो कान, दो नाक, एक पायु, एक उपस्थ, एक नाभि, एक मुख और एक मूर्धा| यह मूर्धा वाला मार्ग अति सूक्ष्म है और पुण्यात्माओं के लिए ही है| नरकगामी जीव पायु यानि गुदामार्ग से बाहर निकलता है| कामुक व्यक्ति मुत्रेंद्रियों से निकलता है और निकृष्ट योनियों में जाता है| नाभि से निकलने वाला प्रेत बनता है| भोजन लोलूप व्यक्ति मुँह से निकलता है, गंध प्रेमी नाक से, संगीत प्रेमी कान से, और तपस्वी व्यक्ति आँख से निकलता है| अंत समय में जहाँ जिसकी चेतना है वह उसी मार्ग से निकलता है और सब की अपनी अपनी गतियाँ हैं|
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जो ब्राह्मण संकल्प कर के और दक्षिणा लेकर भी यज्ञादि अनुष्ठान विधिपूर्वक नहीं करते/कराते वे ब्रह्मराक्षस बनते हैं| मद्य, मांस और परस्त्री का भोग करने वाला ब्राह्मण ब्रह्मपिशाच बनता है| इस तरह की कर्मों के अनुसार अनेक गतियाँ हैं| कर्मों का फल सभी को मिलता है, कोई इससे बच नहीं सकता|
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सबसे बुद्धिमानी का कार्य है परमात्मा से परम प्रेम, निरंतर स्मरण का अभ्यास और ध्यान | सभी को शुभ कामनाएँ | ॐ ॐ ॐ ||
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
२७ दिसंबर २०१७

हृदयाकाशरूप ईश्वर से अभेद प्राप्त कर लेना मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी साधना और सबसे बड़ी उपलब्धि है .....

हृदयाकाशरूप ईश्वर से अभेद प्राप्त कर लेना मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी साधना और सबसे बड़ी उपलब्धि है .....
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बृहदारण्यक में राजा जनक को ऋषि याज्ञवल्क्य ने जो उपदेश दिए हैं, वे अति महत्वपूर्ण हैं| पर उनकी समाधि भाषा को कोई श्रौत्रीय ब्रह्मनिष्ठ आचार्य ही समझा सकता है| हृदयाकाश रूप ईश्वर और उससे अभेद प्राप्त करने का उपदेश भी ऋषि याज्ञवल्क्य के उपदेशों में है| मेरे जैसे अकिंचन व्यक्ति में कुछ कुछ अति अल्प मात्रा में समझते हुए भी उसे व्यक्त करने की थोड़ी सी भी सामर्थ्य इस जन्म में तो नहीं है| उसके लिए और जन्म लेना पड़ेगा|
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मुझे कोई मोक्ष नहीं चाहिए, मैं नित्य मुक्त हूँ| आत्मा पर पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण जो अज्ञान रूपी आवरण पड़ा हुआ है, उस अज्ञान रूपी आवरण से मुक्त होने के लिए अभी और जन्म लेने ही पड़ेंगे| इस जन्म में तो यह संभव नहीं है| भगवान सनत्कुमार, ऋषि याज्ञवल्क्य व भगवान श्रीकृष्ण जैसे गुरु, और नारद, जनक व अर्जुन जैसे शिष्य व वेदव्यास जैसी प्रतिभाएँ इस भारतवर्ष की पुण्यभूमि में ही अवतरित हुई हैं| उससे भी पूर्व जब ब्रह्मा जी ने ऋषि अथर्व को, और अथर्व ने अन्य ऋषियों को ब्रह्मज्ञान दिया वह भी क्या युग रहा होगा !
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मूर्धा का द्वार .... सुषुम्ना, ब्रह्मरंध्र और उससे परे का लोक सामने प्रकाशमान होकर प्रशस्त है| लगता है यह इस देह रूपी वाहन को कैसे त्यागा जाए इसकी तैयारी करने का आदेश है| अब बचा खुचा जीवन परमात्मा की चेतना में ही निकले, अन्य कोई कामना नहीं रही है|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
२७ दिसंबर २०१७

कुछ प्यार भरे सुझाव और अनुरोध .....

कुछ प्यार भरे सुझाव और अनुरोध .....
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(१) रात्री को सोने से पूर्व बिस्तर पर ही सीधे बैठकर कम से कम आधे घंटे तक परमात्मा का ध्यान करें और निश्चिन्त होकर जगन्माता की गोद में ऐसे ही सो जाएँ जैसे एक बालक अपनी माँ की गोद में सोता है| यदि ध्यान नहीं लगता है तो गायत्री मन्त्र का या द्वादशाक्षरी भागवत मन्त्र का या अन्य किसी गुरु-प्रदत्त मन्त्र का जाप करते रहें| अपनी सारी चिंताएँ जगन्माता को या अपने इष्ट देव/देवी को सौंप दें| जब तक नींद नहीं आये तब तक मन्त्र का जाप करते रहें| किसी भी तरह की चिंता को समीप न आने दें|
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(२) प्रातःकाल उठते ही थोड़ा जल पीएँ और लघुशंकादि से निवृत होकर फिर कम से कम आधे घंटे तक जैसा ऊपर बताया है वैसे ही परमात्मा का ध्यान करें|
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(३) पूरे दिन परमात्मा की स्मृति अपने चित्त में बनाए रखें| यदि भूल जाएँ तो याद आते ही फिर उस स्मृति को अपनी चेतना में स्थापित करें| एक बात याद रखें कि आप जो कुछ भी कर रहे हो वह परमात्मा की प्रसन्नता के लिए ही कर रहे हो| ऐसा कोई काम न करें जो भगवान को प्रिय न हो| धीरे धीरे भगवान स्वयं ही आपके माध्यम से कार्य करना आरम्भ कर देंगे|
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(४) जो भी आप भोजन कर रहे हो वह भगवान को निवेदित कर के इस भाव से ग्रहण करें कि साक्षात भगवान ही उसे ग्रहण कर रहे हैं| खाएँ वही जो भगवान को प्रिय है| भोजन से पूर्व गीता में दिया ब्रह्मार्पणम् वाला मन्त्र धीरे से अवश्य बोलें, और प्रथम ग्रास के साथ "ॐ प्राणाय स्वाहा" मन्त्र भी धीरे से अवश्य बोलें|
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उपरोक्त तो न्यूनतम धर्माचरण है जिसका पालन करने से निश्चित रूप से सभी का कल्याण होगा| ये पंक्तियाँ स्वयं जगन्माता की प्रेरणा से ही लिखी जा रही हैं| सभी का कल्याण हो|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
२५-१२-२०१७